Vah ab bhi vahi hai - 42 in Hindi Novel Episodes by Pradeep Shrivastava books and stories PDF | वह अब भी वहीं है - 42

वह अब भी वहीं है - 42

भाग -42

मैं यह सब फालतू की बातें सोच ही रहा था कि, तुम चहकती हुई बोली, 'ऐ, तू मेरी बात सुन भी रहा है कि सो रहा है, या मुंगेरीलाल के सपने देख रहा है। अब सपने देखना बंद कर। विलेन-किंग नहीं, बिजनेस किंग बन, बिजनेस किंग।'

'सुन रहा हूं... ज़्यादा ना बोला कर समझी। जरा अपना दिमाग ठिकाने रख कर मुझे एक बात बता, दूसरी औरत के साथ मुझे संबंध बनाते देख कर, तेरे को बुरा नहीं लगता क्या?'

'मैंने तुमसे कितनी बार कहा कि, मुझे गरीबी, गुलामी से ज़्यादा और कुछ भी खराब नहीं लगता। समझे। जो कर रही हूं, इन दोनों से छुटकारा पाने के लिए कर रही हूं। जब इनसे छुटकारा मिल जाएगा, तो दूसरी औरत के पास भेजना तो छोड़, तेरे को मैं दूसरी औरत की तरफ देखने भी नहीं दूंगी। समझे।'

'समझ रहा हूं, सब समझ रहा हूं। एक बात बता, जैसे तू बोल रही है, कर रही है, ऐसे तो एक दिन जब धंधा चल निकलेगा, तो तू मुझे भी छोड़ देगी। कोई और ढूंढ़ लेगी। क्योंकि तू तो मुझे काम निकालने के लिए एक औजार की तरह प्रयोग कर रही है। काम निकल जाने पर तो वैसे भी टूल को टूल-बॉक्स में रख कर कोने में रख दिया जाता है।'

मेरी इस बात पर तुम कुछ देर हंसती हुई मुझे देखती रही, फिर बोली, 'तेरे जैसा कोई दूसरा टूल मिलने वाला नहीं। इसलिए तुझे छोड़कर किसी और का हाथ पकड़ने वाली नहीं।'

इस बारे में हम-दोनों की बातें बार-बार होती रहीं, अपनी-अपनी कोशिशें भी करते रहे, यह कोशिशें धीरे-धीरे रंग लाने लगीं। रमानी बहनों से काम मिलते ही तुम्हारी कुल जमा-पूंजी और साथ ही मेरे पास जो कुछ था वह सब मिलाकर काम चलाने भर का एक पुराना हाफ डाला ट्रक भी ले लिया। लेकिन रमानी बहनों ने शुरू से ही खुराफात शुरू कर दी।

पहले महीने में एक रुपया भी पेमेंट नहीं किया। महीने भर किसी तरह हम-दोनों काम चलाते रहे। हमने अपने बहुत ही गाढ़े समय के लिए जो पैसा अलग रखा था, उसे भी लगा दिया। यहाँ तक कि बरसों से तमाम कठिनाइयों के बावजूद जो कुछ गहने मैंने बचा रखे थे, वह भी बेच दिए। हम-दोनों यह न करते तो हमारा काम दो हफ्ते में ही बंद हो जाता।

मगर एक महिने बाद भी जब पैसा नहीं मिला तो मजबूरन हमें रमानी बहनों के हाथ जोड़ने पड़े कि, जैसे भी हो हमें पैसा दें, नहीं तो हमारा काम रुक जाएगा। मगर दोनों टस से मस नहीं हुईं। खाली हमारी पगार हमें दे दी बस। कुछ दिन धंधा उससे आगे खिंचा। लेकिन जब उसके बाद डीजल का भी पैसा नहीं रहा तो हम-दोनों फिर उन मगरूर बहनों के सामने खड़े हुए।

लेकिन हमें दो-टूक जवाब मिला कि जब मार्केट से पेमेंट उन्हें मिलेगी, तभी वो हमें देंगी। उनके जवाब से हमें दिन में ही तारे नजर आने लगे। हमें कहाँ से पता चलेगा कि उन्हें पेमेंट मिली कि नहीं। मैंने तुम से कहा कि, 'इनकी बातों से तो लगता है कि ये हमेशा एक ही बात कहेंगी कि पेमेंट नहीं मिली।'

तुम चुप रही, हम अवाक थे, हम-दोनों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? अगले दिन ट्रक में डीजल भरवाने के लिए भी पैसा नहीं था। चिंता के मारे उस रात हम-दोनों खाना भी नहीं खा सके। हम-दोनों की हालत बड़ी खराब हो गई थी। हमारी सारी पूंजी दांव पर लगी हुई थी। जो देखते-देखते डूबने जा रही थी।

कमरे में हम-दोनों चुपचाप बैठे थे। तुम्हारी आँखों में मैं आंसू और निराशा दोनों देख रहा था। देखते-देखते रमानी बहनों ने हमारे सपनों के सुन्दर महल को ढहा दिया था। महल के खंडहर को हम विवशताभरी नज़रों से देखते रहने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहे थे, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।

इसी बीच मेरे दिमाग में आया कि, ये तो पहले बड़ा कहती थी कि, ये बहनें इसकी बात चाह कर भी टाल नहीं सकतीं। लेकिन इन दोनों ने तो जानबूझ कर पूरी साजिश के तहत बीच मंझधार में लाकर नाव पलट दी है। एक-एक तिनका तक हमसे ले लिया है, कि हमें तिनके का भी सहारा ना मिले।आखिर मैंने तुझ से कहा, 'तू तो कहती थी कि ये दोनों तेरी बात मना नहीं कर सकतीं। लेकिन ये तो सीधे-सीधे धोखा दे रही हैं।'

'हां, समझ रही हूँ, लेकिन मैं भी ऐसे हाथ-पे-हाथ धरे बैठी नहीं रहूंगी। मैं अगर बरबाद होऊँगी तो इन्हें भी नहीं छोड़ूंगी।'

तुम्हारी बात से मैं खीज उठा, लेकिन अपनी खीझ को दबाये हुए कहा, 'हम-लोग कर भी क्या सकते हैं? अब तो इतना पैसा भी नहीं है कि ट्रक हिलाने भर को भी डीजल भरा सकें।'

'तो ठीक है, जब-तक पैसा नहीं देंगी, तब-तक हमारी ट्रक भी नहीं चलेगी। माल नहीं देंगे।'

'तुम भी अजीब बात करती हो, इससे उन पर क्या फ़र्क पड़ेगा। हमारे अलावा कई लोग सप्लाई कर रहे हैं, वो करते रहेंगे। उनकी फैक्ट्री तो चलती ही रहेगी। ये दोनों हमें नौकर ही बना के रखना चाहती हैं। इसीलिए ये साजिश रची। तुमने जो बता दिया था कि, हमारे पास पैसा है, उसे भी बरबाद कर देने के लिए इन दोनों ने साजिश के तहत हमें काम दिया। जिससे हम अपनी गरीबी दूर करने का सपना भी ना देख सकें। इनके फेंके टुकड़ों के लिए इनके बताये कुकर्मों को भी आँख बंद कर करते रहें। इसके अलावा जीवन में कुछ और करने की हम कोशिश भी न कर सकें।'

'हम सपना भी देखेंगे, उनको पूरा करने की कोशिश भी करेंगे। इनकी साजिश से हम अपनी गरीबी दूर करने की कोशिश बंद नहीं कर देंगे।'

'फिलहाल तो इन्होंने बंद ही करवा दिया है। कल से अपनी ट्रक खड़ी रहेगी, जबकि इनकी फैक्ट्री चलती रहेगी। मगर एक बात बताओ। पहले तो तुम कहती थी कि, इन दोनों की तुम्हें इतनी बातें मालूम हैं, इतने राज मालूम हैं कि ये तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगी।'

'झूठ नहीं कहा था। अभी तक यही नहीं किया।'

'क्यों?'

'क्योंकि मेरे पास उनके सिर्फ़ राज हैं। लेकिन उनके पास पैसा है, ताकत है। देखा नहीं उस दिन कैसे-कैसे लोग आए थे। उनके राज खोलकर मैं उन्हें सिर्फ़ कुछ देर को बदनाम कर सकती हूं। जिसका उन पर कोई खास फ़र्क पड़ने वाला नहीं। लेकिन वो थोड़ा सा पैसा खर्च करके हमें ही खत्म करा सकती हैं।'

'जब ये सब जानती-समझती हो, तो फिर काहे को इतना आगे बढ़ गई। इससे तुम्हारी-मेरी सारी जमा-पूंजी, मेहनत सब बरबाद हुई कि नहीं। आखिर ये करके क्या मिला तुम्हें? बिना आगे-पीछे सोचे सारी कमाई डुबा दी। मुझे बहुत दुख हो रहा है समीना, बहुत ज़्यादा। गुस्से का तो क्या कहूँ तुमसे, ऐसे में तो तुम पर गुस्सा करना भी मूर्खता ही है। तुमने न मुझको न खुद को, कहीं का नहीं छोड़ा।'

मेरी बात पूरी होते-होते तुम रोने लगी। मैं चुप कराने लगा तो तुम बच्चों की तरह मेरी गोद में सिर रखकर और भी ज़्यादा बिलख पड़ी। मुझे बड़ा दुख हो रहा था। तन-बदन में रमानी बहनों के लिए क्रोध की ऐसी आग धधक उठी थी कि मन में आया कि जाकर दोनों की गर्दन एक साथ मरोड़ दूँ। लेकिन हम तो इतना विवश थे कि पूरी आज़ादी से अपने मन का सोच भी नहीं सकते थे।

यहां भी मैं सुन्दर हिडिम्बा के सोने के पिंजरे में बंद होने जैसी विवशता, आत्मविहीन दास होने जैसा महसूस कर रहा था। दोनों में एक बारीक सा फर्क मुझे यह दिख रहा था कि सुन्दर हिडिम्बा का पिंजरा जहां पूरी तरह बंद था, वहीं रमानी बहनों का पिंजरा पूरी तरह खुला था, एकदम ओपन जेल जैसा।

लेकिन यहां हमारे पंखों को इतना गीला रखा जाता था कि हम उड़ने लायक नहीं होते थे। तो अपने गीले पंखों को ध्यान में रखते हुए मैंने तुम्हें समझाते हुए कहा, 'सुनो जब धंधा बंद ही हो गया है, तो ट्रक रखने से क्या फायदा? उसे जितनी जल्दी होगा उतनी जल्दी बेच देंगे। पूरा पैसा ना सही, कुछ तो वापस मिल ही जाएगा। उसे खड़ा रख कर उसके टायर गलाने से कोई फायदा नहीं।'

कुछ देर तक मेरी बात सुनने के बाद तुम चुप हुई और आंसू पोंछती हुई बोली, 

'हां, तुम सही कह रहे हो। लेकिन यह बात एक बार इन चुड़ैलों से जरूर कहूँगी। शायद ये सब सुन कर कुछ कर दें।'

'अब मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती। जब उन्होंने यह सब साजिशन किया है तो क्यों कुछ करेंगी। इतना बड़ा धंधा संभालती हैं, ये मामूली सी बात क्या उनकी समझ में नहीं आ रही होगी।'

'तो सुनो, हम भी इन्हीं की तरह करते हैं। कल जब इनसे ट्रक बेचने के लिए कहेंगे, अगर तब भी ये काम भर का भी पैसा नहीं देंगी, तो उसी समय हम भी कह देंगे कि, 'हमारा हिसाब अभी कर दीजिये। हम काम छोड़ कर जा रहे हैं।' ट्रक बेच कर जो पैसा मिलेगा, उससे कोई छोटा-मोटा अपना काम-धंधा करेंगे।'

'जरूरी है कि उन पैसों से कोई धंधा चल ही जाए। ऐसे तो अपनी हालत हम और खराब करेंगे। खाना-पीने से ज़्यादा सिर छिपाने की समस्या है, उसका क्या करेंगे?'

'तो तुम्हीं बताओ क्या किया जाए?'

'कल एक कोशिश बिना उम्मीद के ही करते हैं।'

'ठीक है, मैं सवेरे ही कहूंगी कि, हम मजबूरी में ट्रक बेचने जा रहे हैं, अगर आप हमें काम चलाने भर का भी पैसा रोज दे दें तो हम ना बेचें । देखती हूँ क्या कहती हैं।'

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Suresh

Suresh 5 months ago