Vah ab bhi vahi hai - 46 in Hindi Novel Episodes by Pradeep Shrivastava books and stories PDF | वह अब भी वहीं है - 46

वह अब भी वहीं है - 46

भाग -46

'तुम्हारी बात पर मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा, 'तुझे ताना मारने के अलावा भी कुछ आता है क्या? जब देखो काम-काम, मेरे बिना कोई काम भी नहीं कर सकती ? जब देखो सिर पर सवार हो जाती है। चल बता क्या है?'

तुमने ने जो-जो काम बताए, उनमें से ज़्यादातर मैं कर ही चुका था। थोड़े बहुत रह गए थे, उन्हीं के लिए तुम अफना रही थी।

मेरे गुस्सा दिखाने पर तुम बोली, 'चल ज़्यादा भाव मत खा। छोटकी का फ़ोन आ गया है। थोड़ी देर में दोनों आ रही हैं। फ़ोन पर ही चटक रही थीं, कि सारी तैयारियां हो गईं कि नहीं? गेस्ट कुछ ही देर में पहुंच जाएंगे।'

तुम इस बात को मुंह टेढ़ा कर, जुबान ऐंठती हुई बोली थी। तुम रमानी बहनों पर अपना गुस्सा ऐसे ही उतारती थी। असल में उस दिन हर महीने में एक-दो बार होने वाली रमानी बहनों की वह ख़ास पार्टी थी जिसमें मुश्किल से दस-बारह लोग होते थे, और रात भर खाना-पीना, अय्याशी यही सब चलता था।

दोनों बहनें जिस बेहयाई-बेशर्मी के साथ अपने मेहमानों के साथ ऐश करती थीं, हम भी उसी बेहयाई-बेशर्मी के साथ पार्टी में शामिल होते थे। पार्टी में हर अय्याशी का हम-दोनों अनिवार्य हिस्सा होते थे। उस रात हम-दोनों कमाई भी खूब करते थे।

पिछली कई बार के तरह तुमने उस दिन फिर कोशिश की, कि रमानी बहनें मुझे अपनी हवस का शिकार जरूर बनाएं। तुम्हारी कोशिश उस दिन भी सफल हुई। उस दिन तुम हमेशा होशियार रहने वाली छोटी बहन को भी ज़्यादा नशा कराने में कामयाब हो गई थी। तुमने ऐसा किया, कि दोनों बहनें मुझसे हवस मिटा कर बेसुध बिस्तर पर पसर गईं। हम-दोनों अपने उद्देश्य में कामयाब तो हो गए थे, लेकिन पार्टी के अरेंजमेंट से जो अच्छी-खासी कमाई हुई थी, वह सारी की सारी कहीं गिर गई।

आखिर हम भी तो नशे में ही होते थे। भले ही बाकियों से कम। असल में हम-दोनों दोहरे नशे में होते थे। रईशजादों की चमक-दमक भरी पार्टी का हिस्सा बनने से हम-दोनों एक अलग ही तरह के नशे में चूर होते थे। उस समय हम-दोनों खुद को नौकर नहीं उन रईशजादों ही की तरह होने का अहसास करते थे।

उस दिन पैसा खोना ही नहीं बल्कि एक और भी कष्टदायी बात हुई थी। पार्टी में रात-भर तुम जिस रईशजादे के साथ थी, उस कमीने जानवर ने तुम्हें बुरी तरह यातना दी थी। तुम्हें दो जगह गहरी चोट आ गई थी, जिससे दो-तीन दिन चलने में भी परेशानी हुई थी। होंठ, आंख की सूजन खत्म होने में भी तीन-चार दिन लग गए थे। कमीना रात-भर तुमसे यही कहता रहा कि, ''तुम ऐक्ट्रेस बिपाशा से भी ज्यादा सेक्सी और सुन्दर हो, तुम मेरे साथ चलो, मेरी मिसेज बनकर हाई-फाई लाइफ एन्जॉय करो, अपने इस इन्क्रेडिबल सेक्सी असेट को कैस करो...और सुबह ऐसे देखा जैसे तुमसे कभी मिला ही नहीं ।

पार्टी के अगले दिन पहले ही की तरह हमने सोचा था कि रमानी बहनें रात मेरे साथ मिलने के बाद, मुझसे थोड़ा संकोच या दबकर रहेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। होशो-हवाश कायम होते ही दोनों पहले ही की तरह पेश आईं। हमें हमारे दासत्व का अहसास कराती हुई ही नजर आईं।

रंच-मात्र को भी यह नहीं लगा कि दोनों उस आदमी के सामने हैं, उससे बात कर रही हैं, जिसके साथ रात में दोनों ने पूरी निर्लज्जता के साथ अपनी हवस मिटाई थी। हम-दोनों का वह उद्देश्य फिर रमानी बहनों की निर्लज्जता में बह गया जिसे ध्यान में रखकर तुम योजना बनाती और पूरी कोशिश करती थी, कि वो दोनों मुझे अपनी हवस का शिकार बनाएं, जिससे बाद में जब वो हम-दोनों के सामने पड़ें तो पानी-पानी हो जाएं। और हम अपना काम निकाल सकें। अपनी योजना के बार-बार असफल होने से हम परेशान हो ही रहे थे, कि बहनों की निर्लज्जता से एक और समस्या आ खड़ी हुई। अब मैं इन बहनों की हवस का शिकार पार्टी वाली रात केअलावा भी महीने में पांच-छह बार होने लगा।

मगर इन सबके बावजूद भी, हम-दोनों ही आपस में इन बहनों की इस बात के लिए बराबर तारीफ करते, कि दोनों चाहे जो भी हों, सुबह से लेकर आधी रात तक पंद्रह-सोलह घंटे भूतों की तरह काम करती हैं। अपना काम करने में कहने भर को भी लापरवाही, आलस्य नहीं करतीं। उनकी इस खूबी की हम सिर्फ़ बात ही नहीं करते थे, बल्कि उनकी ही तरह काम करने का पूरा प्रयास भी करते थे। मगर हमारी मेहनत का फायदा सीधे हमारी मालकिनों को मिलता, हमें तो पगार के अलावा थोड़ा बहुत और मिल जाता था बस। जो वास्तव में मालकिनों की दया होती थी।

हां हमारी मेहनत ने इतना जरूर कर दिया था, कि दोनों बहनें रमानी हाऊस की, हम-दोनों के बिना कल्पना भी नहीं कर पाती थीं। और हां, इन सब के साथ ही पैसों पर हमारी हाथ की सफाई भी चलती रही। यह काम हम अपने कामों में शामिल एक और काम की तरह ही करते जा रहे थे।

एक दिन अचानक ही तुमने बताया कि इन बहनों का भाई अमेरिका से अपने परिवार के साथ आ रहा है। उसके स्वागत के लिए अगले ही दिन से तैयारियां शुरू हो गईं। मैं आश्चर्य में था। तुम मुझसे ज़्यादा उस लड़के को जानती थी, क्योंकि मुझसे पहले से थी वहां। तुमने वह सब देखा था कि कैसे इस लड़के ने धोखे से अपने बाप की पीठ में छूरा भोंक कर उनका व्यवसाय हड़प लिया था।

बेटे से मिले इस आघात से वो ज्यादा दिन अपना जीवन तो नहीं बचा पाए थे, लेकिन अपने बचे-खुचे बिजनेस को इन दोनों बेटियों के सहारे ही दुबारा खड़ा कर दिया था। इन बहनों ने अपने फादर के लिए, अपने लिए जो किया वो बेमिसाल है। मुझे आश्चर्य इस बात का था कि, ये बहनें जो पहले इस भाई को एक सेकेंड भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं, आज उसी भाई के लिए पालक-पांवड़े बिछाए बैठी हैं।

उसके स्वागत के लिए हम-दोनों को क्या-क्या नसीहतें नहीं दीं गईं। और जब आया तो इन बहनों ने उसे सिर-आंखों पर बैठाया। उसके साथ उसकी अमरीकन पत्नी भी थी। सब पंद्रह दिन रूके रहे। हमने यह समझा कि वह घूमने आया है। लेकिन नहीं वह बिजनेस के लिए आया था। बहनों ने भाई के साथ मिलकर बिजनेस को नए रास्ते पर डाला। भाई के जाने के बाद एक परिवर्तन और हुआ कि, हम-दोनों को बहनें आपसी बातचीत भी अंग्रेजी में ही करने को कहतीं, बराबर बतातीं, समझाती भी रहतीं।

अमेरिका वापस जाने के बाद भाई रमानी बहनों की फैक्ट्री का माल और बड़े पैमाने पर मंगाने लगा। मैं और तुम यह नहीं समझ पा रहे थे कि, यह बहनें हम-दोनों के अलावा और पढ़े-लिखे बंदे क्यों नहीं रख रहीं।

भाई देखने, बात करने में रमानी बहनों सा ही चालाक था। जितने दिन रहा, काम में वह भी भूतों सा ही जुटा रहा। उसकी अमरीकन पत्नी को, शुरू में तो हम यही नहीं जान पाए कि ये उसकी कर्मचारी है या दोस्त। बिजनेस पार्टनर है, लाइफ पार्टनर है या क्या है? जब वह दोनों हंसते-बोलते तो लगता जैसे दोनों के बीच बहुत करीबी रिश्ता है। लेकिन काम के समय कभी भाई बॉस लगता तो कभी उसकी पत्नी । जिसका पूरा नाम इमेल्डा ब्राउन रमानी था। भाई उसे इमेल्डा ही पुकारता था।

उसके दो बेटे, एक बेटी थी। तीनों के नाम नील, जय, शुभांसी रमानी था। उसकी पत्नी परियों सी खूबसूरत थी। तीन बच्चों की मां थी, लेकिन देखकर लगता जैसे किसी सीनियर क्लास की स्टूडेंट है। भाई, उसके पूरे परिवार ने भारतीयता से पूरी तरह छुट्टी ले ली थी। खाना-पीना, कपड़ा, रहना-सहना सब कुछ एकदम अमरीकन। उसकी पत्नी को छोटे-छोटे तंग कपड़ों में देखकर मैं बड़ा नर्वस हो जाता था। दैवयोग से उसे कहीं भी ले जाने, ले आने की ड्यूटी हमारी तुम्हारी ही थी।

मुझे बड़ी घबराहट होती थी, कि ये कहीं मेरे किसी काम, मेरी किसी बात का बुरा न मान जाएँ, जिससे मुझे लेने के देने पड़ जाए। घबराहट इसलिए भी ज़्यादा होती थी, क्योंकि उसके खुले बदन को न देखने की मैं लाख कोशिश करता, लेकिन मेरी नजर पड़ ही जाती। फिसल ही जाती। मेरी यह हरकत तुम्हारी पकड़ में आ ही जाती थी। तुम्हारी नजर से मेरी एक भी हरकत नहीं छिप पा रही थी।

रात जब तुम बात करती तो मुझे आगाह जरूर करती। मैं इमेल्डा की तारीफ करता हुआ उसके किसी अंग का जिक्र कर देता तो तुम मुझ पर टूट पड़ती। बड़ा बिदकती हुई कहती, ' सुन, ख्वाब में भी तू उसके पैर की धूल भी नहीं छू सकता। देखने को तो और लोग भी उसे देख ही लेते हैं। वह इतनी नाज़ुक है, कि छूई-मूई(मिमोसा पुडिका) से भी चोट खा जाए, तूने कहीं भूल के भी अपने पत्थर से जिस्म से उसे छू भी लिया, तो वो यूं ही बिखर कर हवा हो जाएगी।

मेरी समझ में नहीं आता कि, तू विलेन-किंग बनने का भूखा है या फिर नई-नई औरतों का । मुझसे मिलने से पहले इतने दिनों तक छब्बी के साथ रहा, उसके पहले कितनी औरतों को भोगा, तू खुद ही बताता है कि, तुझे यह भी याद नहीं, यहां रमानी बहनों जैसी अमीर, खूबसूरत लड़कियों को इतने दिनों से भोग रहा है, फिर भी तेरा पेट नहीं भरता औरतों से, अब भरी दोपहरी हो या रात, सुबह हो या शाम, घर हो या बाहर हर समय उस अमरीकन को भोगने का दीदा फाड़-फाड़ के सपना देखता रहता है। मेरी समझ में नहीं आता कि तुम मर्दों को औरतें खाली भोगने के लिए ही दिखतीं हैं । भोगते जाते हो, भोगते जाते हो, भोगते ही रहते हो, फिर भी तुम लोगों का पेट नहीं भरता, मन नहीं भरता, आखिर किस मिट्टी के बने हो तुम लोग।'

तुम्हारी बातें एकदम सही थीं, इसी लिए मुझे कड़वी लगीं। मैंने तुम्हारी सच बातों को मानने के बजाये प्रतिकार करते हुए कहा, 

'उसी मिट्टी के, जिसकी तू बनी है, हाँ तेरी अक्ल ज्यादा मोटी मिट्टी की बन गई है, इसीलिए मामूली सी बात भी समझ नहीं पाती।'

'अच्छा! तू बड़ी पतली अकल का है न, तो चल समझा वो मामूली सी बात जो मेरी समझ में नहीं आ रही है। आज मैं समझ कर रहूंगी तेरी पतली अक्ल की सारी बातें।'

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Suresh

Suresh 5 months ago