Vah ab bhi vahi hai - 51 in Hindi Novel Episodes by Pradeep Shrivastava books and stories PDF | वह अब भी वहीं है - 51

वह अब भी वहीं है - 51

भाग -51

एक दिन फैक्ट्री मैनेजर ने अचानक ही तुम्हारे लिए पूछ लिया कि, 'इसकी हालत क्यों खराब हो रही है?' तो मैंने उसे सब बताया। उस दिन उसने जिस तरह से बात की, उससे लगा कि यह ऊपर से भले ही सख्त, रूखे व्यवहार वाला दिखता हो, लेकिन वास्तव में है दयालु। वह बिहार के किसी जिले का रहने वाला था। उसी ने फिर एक बड़े डॉक्टर का पता दिया। कहा, 'अच्छे डॉक्टर को दिखाओ तभी ठीक से पता चल पायेगा कि कौन सी बीमारी है? बीमारी का ठीक-ठीक पता चलने पर ही सही ट्रीटमेंट हो पाएगा।'

मैनेजर की बातों से मैं बहुत परेशान हो गया, तुमको अगले ही दिन उसी डॉक्टर के पास ले गया। तुम चलने को तैयार नहीं हो रही थी कि, बड़ा डॉक्टर है, बहुत पैसा लेगा। लेकिन मैं नहीं माना, मैंने कहा कि, 'तुम्हारे जीवन से बढ़ कर नहीं है पैसा।'

जब डॉक्टर के पास पहुंच गया तब भी तुम मना ही करती रही। कहती रही, 'चल ना वापस। काहे को मगजमारी करता है। मैं उन्हीं दवाओं से ठीक हो जाऊँगी।'

आखिर मैं खीझ उठा, तो गुस्सा होते हुए बोला, 'ऐसा है, तू अब चुपकर। उन्हीं दवाओं से ठीक होना होता, तो अब-तक कब का हो गई होती। महीने के महीने बीतते जा रहा हैं। जो कह रहा हूं वह चुपचाप कर।'

डांट खाने के बाद तुम कुछ नहीं बोली, डॉक्टर से ठीक से चेकअप कराया। इस डॉक्टर ने पिछले सभी डॉक्टरों को गलत बताते हुए, उनकी सारी दवाएं बंद कर दीं। कई जांचें कराईं। कुछ की रिपोर्ट तो कुछ ही देर में मिल गई, लेकिन कुछ की एक-दो दिन बाद मिलीं। सारी रिपोर्ट्स मिलने पर जब फिर पहुंचे डॉक्टर के पास तो उसने पहले तुमको अलग करके मुझे जो बताया, उसे सुनते ही मेरे होश गुम हो गए। हाथ-पांव फूल गए।

तुम एक नहीं, दो-दो भयानक रोगों की शिकार हो चुकी थी। दोनों ही रोग शरीर में अपनी पूरी पैठ बना चुके थे। इलाज लंबा नहीं जीवन भर चलने वाला था। इसके बाद भी ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी। मेरी घबराहट देखकर डॉक्टर ने मुझे समझाया-बुझाया। दवाएं लिख कर, हिम्मत से काम लेने को कह कर भेज दिया।

डॉक्टर के केबिन से मैं जैसे ही बाहर आया, तुमने पूछना शुरू कर दिया।

'क्या बताया डॉक्टर ने?'

मैं टालता रहा। अपने चेहरे पर उड़ रही हवाइयों को भी छिपाने की कोशिश करता रहा। मगर तुम पीछे पड़ी रही। मैं रास्ते भर टालता रहा। लेकिन घर पहुंचकर तुम बोली, 'तुम सच-सच काहे नहीं बता रहे हो।'

मैंने कहा, 'सच ही तो बता रहा हूं बार-बार। बुखार बिगड़ गया है बस, लेकिन तुम विश्वास ही नहीं कर रही हो तो मैं क्या करूं।'

इस बार तुम गुस्सा होती हुई तेज़ आवाज़ में बोली, 'तुम बार-बार झूठ बोल रहे हो समझे। हमें कल की छोकरिया समझ रखा है कि, झूठ-सच जो कहोगे आंख मूँद कर मान लूंगी। जब से तुम डॉक्टर से बात करके, बाहर आए हो तब से तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ा हुआ है। इतनी देर हो गई है, लेकिन अभी तक चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं। अरे सही बताने में इतना काहे डर रहे हो। हमें इतना कमजोर काहे समझ रहे हो।'

तुम इतना पीछे पड़ गई कि, मैं विवश हो गया। विवश इसलिए भी हुआ कि तुम पसीना-पसीना हो रही थी, आँखों से आंसू गिर रहे थे, कमजोरी के मारे ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी। मगर जिद पर अड़ी हुई थी। तुम्हारी हालत पर मुझे इतनी दया आई कि मैंने सच बता दिया। उसे सुनकर तुम बड़ी देर मुझे आवाक देखती रही।

तुम्हारी हालत देखकर मैंने सोचा कि, तुम सच जानकर रोओगी-धोओगी। लेकिन तुमने ऐसा कुछ नहीं किया। कुछ देर में ही खुद को संभाल कर बोली, 'तो इसमें इतना परेशान होने वाली कौन सी बात है। खाएंगे दवाई, जो होगा देखा जाएगा। अरे ऐसे भी कौन सी ज़िंदा हूँ। रोज-रोज मर ही तो रही हूँ। बेवजह ही इतनी देर से परेशान किए थे। तुम्हारे चेहरे पर हवाईयों, सामान पकड़ते समय कांपते हाथों को देख कर ही मैं समझ गई थी कि मामला कुछ ज्यादा ही बड़ा है?'

इसके बाद हम-दोनों बड़ी देर तक चुप बैठे रहे। आते समय बड़ा पाव, भेलपूरी ले आए थे। तुम को कुछ राहत मिले यह सोचकर तुम्हें खिलाने और खुद भी खाने की सोची, लेकिन हम-दोनों पूरा क्या आधा भी नहीं खा सके। और कोई समय होता तो यह सब पांच मिनट में खत्म हो जाता।

लेकिन उस समय हम ऐसे खा रहे थे, जैसे कि हलक के नीचे जा ही ना रहा हो और हम उसे जबरदस्ती अंदर ठूंस रहे हों। तुम मुझे कहती खा, मैं तुम्हें कहता खा। एक बार मैं ज़्यादा कहने लगा तो तुम बड़ा-पाव किनारे खिसकाती हुई एकदम मुझसे लिपट गई। मेरी छाती में सिर छिपाकर हुचक-हुचक कर रोने लगी। मैंने भी बांहों में भर लिया। तुम्हें चुप कराने के लिए, मेरे पास कहने को कोई शब्द नहीं थे, तो मैं तुम्हारा सिर सहलाता रहा।

तुम बड़ी देर तक ऐसे ही रोती रही, और मैं भविष्य में तुम्हारे, अपने सामने आने वाली भयावह स्थिति को सोच कर सिहर रहा था। तुमने मेरे लाख कहने पर भी कोई दवा नहीं खाई। मैंने तुम्हारा ध्यान रखते हुए बाद में तुम्हारी मनपसंद कचौड़ी और आलू, कद्दू की सब्जी बनाई। बहुत कहने पर भी नहीं खा रही थी, जब मैंने अपने हाथों से खिलाना शुरू किया तब तुम मुश्किल से थोड़ा सा खा पाई। कहने भर को।

तुम्हारी ह्रदय बेधने वाली परेशानी देख कर मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं दिया। मुझे तुम्हारी आँखों में आंसू बराबर दिख रहे थे, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि तुम मेरे ह्रदय के आंसू देख कर उन्हें बहाओ। मुझे अब हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा दिख रहा था। तुम्हें देखता तो ऐसा महसूस होता जैसे तुम उस अँधेरे में मुझसे कहीं दूर और दूर होती, काले आसमान में किसी नन्हें तारे सी झिलमिलाने लगी हो। मेरी उदासी इतनी घनी होती गई कि मैं संज्ञा-शून्य सा हो गया।

अगले दिन मैं खाना बनाने किचेन में गया तो गैस चूल्हे पर तवा रख कर खड़ा रहा, गैस जलती रही, बहुत देर हो जाने पर तुम लड़खड़ाती हुई देखने पहुँच गई। कभी पूरे रमानी हाऊस को, अपनी तीखी आवाज़ से गुंजा देने वाली तुम्हारी आवाज़ में, अब वह शक्ति नहीं रह गई थी कि मुझे एक आवाज़ दे कर बुला सकती।

अब तुम्हारी आवाज़ सामने बैठा व्यक्ति ही सुन सकता था। तुमने जब मेरी बांह पकड़ी तो मेरी संज्ञा लौटी, तुम्हें देख कर मैं घबड़ा गया। तवा बीच में हल्का केसरिया सा हो रहा था। जल्दी से तुम्हें वहीं एक तरफ बैठा कर खाना बनाया, फिर तुम्हें वापस कमरे में पहुंचा कर खाना ले आया। अगले दो-तीन दिन मैं होटल नहीं गया। कारीगर के सहारे छोड़ दिया। तुम्हारी सेवा में लगा रहा। नई दवाओं से तुम्हें कुछ राहत मिली तो तुम एकदम पीछे पड़ गई कि 'होटल जाओ, धंधा सम्भालो। कब-तक मेरी सेवा में लगे रहोगे। कोई मर्द औरत की इतनी सेवा करता है, मैंने तो यह ख्वाब में भी नहीं सोचा था। इतने साल शौहर के साथ रही, कई बार बीमार पड़ी, लेकिन उसने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा, खाने-पीने की तो बात ही छोड़ दो। ऊपर वाले से दुआ करती हूँ कि हर औरत को तुम्हारे जैसा ही शौहर दे। कोई दवा असर करे या न करे, लेकिन तुम्हारी सेवा, तुम्हारे बेइंतेहा प्यार ने इतना असर कर दिया है कि अब तुम होटल सम्भालो, मैं ठीक हूँ।'

तुम्हारी ज़िद के चलते मैं चौथे दिन होटल चला गया। तुम्हें अकेला छोड़कर जाने का मेरा मन बिल्कुल नहीं हो रहा था, तो मैंने कहा, 'सुन, तू भी मेरे साथ होटल चल। वहाँ एक तरफ तुम्हारे लेटने भर की जगह बना दूंगा, वहीं आराम करना।'

लेकिन तुम नहीं मानी। बोली, 'वहां ग्राहक आते-जाते रहेंगे, शोरगुल में आराम कहाँ कर पाऊँगी। मैं रहूंगी तो तुम काम भी ठीक से नहीं कर पाओगे। इसलिए तुम जाओ मैं यहीं रहूंगी। जरूरत पड़ी तो फ़ोन करूंगी। वैसे भी यहां ताला लगा के तो चल नहीं सकती। मैनेजर किस समय आ जाए, कोई ठिकाना तो रहता नहीं।'

तुम्हारी जिद, बातों के आगे मुझे झुकना ही पड़ा। मैं चला गया। लेकिन होटल पर मेरा मन नहीं लग रहा था। संयोगवश उस दिन रोज से कहीं तीन गुना ज़्यादा कस्टमर आ रहे थे। आगे के दो होटल उस दिन पता नहीं क्यों बंद थे। शाम चार बजते-बजते मेरा मन बड़ा घबड़ाने लगा। मैंने सोचा होटल कारीगर के सहारे छोड़ कर चलूं। लेकिन ग्राहकों की आवाजाही मुझे रोक ले रही थी। मगर पांच बजते-बजते मैं खुद को रोक नहीं पाया। तुम्हारे पास तुरंत पहुँचने के लिए अफनाया हुआ चल दिया।

रमानी हाऊस पहुंचा तो मेन गेट के बगल वाला छोटा गेट खुला हुआ था। मैं बाइक खड़ी कर अंदर दाखिल हुआ तो लॉन में ही मैनेजर, तीन चार लोग और दिखाई दिए। मैनेजर ने मुझे देखते ही कहा, 'आप?'

वह अपना मोबाइल कान में लगाने ही जा रहे थे, लेकिन मुझे देखते ही हाथ नीचे कर लिया। तभी मेरे मोबाइल पर एक रिंग होकर बंद हो गई। निकाल कर नंबर देखा तो वह नंबर मैनेजर का ही था। वह मुझे ही फोन कर रहे थे। मुझे देखते ही काट दिया था। मैंने उनके पास पहुंच कर नमस्ते किया। मन थोड़ा सशंकित हुआ कि आज इनके साथ इतने लोग क्यों? मैं कुछ पूछता उसके पहले ही उन्होंने पूछा, 'तुम-दोनों के बीच कोई झगड़ा-वगड़ा चल रहा था क्या?'

उनके इस प्रश्न से मैं एकदम घबड़ा गया कि क्या हो गया है? ये ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? मैंने उन्हें देखते हुए कहा, 'नहीं तो। हम-दोनों के बीच तो कोई झगड़ा नहीं चल रहा। हमारे बीच झगड़ा होता ही नहीं।'

मेरे जवाब पर उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा, 'ठीक है।' फिर चुप हो गए तो मैं सर्वेंट क्वार्टर की तरफ मुड़ा। मेरा मन तुम पर लगा हुआ था। लेकिन मेरे मुड़ते ही मैनेजर थोड़ा भारी आवाज़ में बोले, 'यहीं रुको, अभी कहीं नहीं जाओ।'