TEDHI PAGDANDIYAN - 30 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories PDF | टेढी पगडेडियाँ - 30

टेढी पगडेडियाँ - 30

टेढी पगडंडियाँ

30

सिमरन कुछ देर तो गुमसुम खङी रही फिर उसने अलमारी खोलकर सर्टिफिकेट वाली फाइल टिकाई । मुँह हाथ धोकर कपङे बदले । फिर रसोई में जाकर हारे में उपले डालकर आग सुलगाई और साबुत मूँग की दाल चढा दी । उसका चाय पीने का मन हो रहा था पर अकेले अपने लिए कैसे बनाए । ये गुरनैब तो नाराज होकर न जाने कहाँ निकल गया । उसे अपनेआप पर गुस्सा आया – बेकार में ही उसे नाराज कर दिया । अब कई दिन यूँ ही रूठा रहेगा । ऊपर से एक दो दिन की बात रह गयी थी । उसके बाद उसने अपनी नौकरी पर चले जाना था । जब घर से जा ही रही थी वह , फिर बोलकुबोल बोलने की क्या जरूरत थी पर मन का क्याकरे । चौबीस घंटे डरा सहमा रहता है और वह भी बिना बात ही भङक गया । अभी घर में बीबी जी होते तो ये बहस छिङनी ही नहीं थी । शुरु हो भी जाती तो मिनटों में ठंडी हो जाती । घर में बुजुर्गो का होना इसीलिए जरूरी कहा गया है । बात बिगङने ही नहीं देते । अभी पापा जी होते तो कान पकङकर घर में बुला लेते । भटकने नहीं देते और इस तरह गुस्से में तो घर से जाने देने का सवाल ही नहीं था पर अब तो इंतजार ही करना पङेगा । पापा जी , बीबी जी का भी और गुरनैब का भी । चाय पीने का इरादा छोङ वह भीतर कमरे में जाकर लेट गयी ।
लेटते ही सोचो ने उसे घेर लिया । ये हवेली कितनी खुशियों से भरी थी । जब ढाई साल पहले वह इस हवेली में ब्याह कर आई थी तो सबने कितने लाड चाव किये थे । मरासियों , बनजारणों , महंतों ने कितने इनाम और वारने पाये थे , कोई हिसाब ही नहीं । कई दिन तक हवेली के दरवाजे पर ढोल बजता रहा था । कितने शगुण सवारथ किये गये थे । बीबी जी ने पूरा साल उसे किसी काम को हाथ नहीं लगाने दिया था । राजकुमारियों की तरह से उसके सब नखरे उठाये । एक से एक महंगे सूट , एक से एक दामी जेवर उसके लिए बनवाये गये । हर तीज त्योहार पर नये कपङे और नये जेवर उसके लिए खरीदे जाते । जुतियों के तो ढेर लगा दिये थे चाचे ने । जब भी कोटकपूरा या मुक्तसर जाते उसके लिए जुत्ती पक्का पक्का आती । पापा जी पटियाले गये दो दरजन परांदे , ढेर सारी फुलकारियाँ और रेशमी नाले लाये थे । फिर चाचा की शादी हो गयी और जसलीन चाची बनकर आ गयी । गुरनैब तो शुरु से ही शर्मीला था पर चाचे ने चाची को खूब ऐश करायी । इतने में ननी के आने की आहट सुनाई दी । पापा जी के जमीन पर पैर न लगते थे । चाचा , गुरनैब और पापा जी तीनों उसके खाने पीने का कितना ध्यान रखते थे । और यह ननी तो सबकी आँख का तारा थी । अगर ये किरण के पैर न पङते तो सब कितने मजे से जिंदगी बसर कर रहे थे । इस किरण नाम की मुसीबत के आते ही सब तहस नहस हो गया । बीबीजी और पापाजी ऊपर से जितना मर्जी सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे थे , भीतर से बुरी तरह डरे हुए और सहमे हुए थे । चाचा और चाची के रिश्तों में खटास आ गयी थी । जसलीन चाची की हसी बनावटी हो गयी थी । फिर अचानक एक दिन चाचा की रात को एक्सीडैंट में भयानक मौत हो गयी । सब लोग दबी जबान से कह रहे थे , ये कोई हादसा नहीं है , कत्ल हा पक्का कत्ल । और आज पूरे तेरह दिन बाद ये चाची के दोनों भाइयों का कत्ल हो गया । उसे अंदर तक झुनझुनी आ गयी । साथ ही ख्याल आया कि कहीं ये गुरनैब का काम तो नहीं । जिस तरह से आज घबराया पङा है , बात बात में खीझ रहा है शक तो हो रहा है पर पता कैसे चले ।
उसने आसमान की ओर देखा और आँखें बंद करके दोनों हाथ उस अदृश्य शक्ति को जोङ दिये – हे सच्चे पातशाह मेहर कर । अब कोई कांड न हो । सब सुखी रहें ।
गुरनैब गुस्से में घर से निकल तो आया पर अब आगे कहाँ जाए । क्या करे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । उसने जीप शहर की तरफ मोङ दी । तेज जीप भगाते हुए भी उसका दिमाग सिमरन की बातों की ओर ही लगा हुआ था –
एक तेरा चाचा था कि सारी दोपहर वहीं उस कमजात के पैरों में ही निकाल देता था । दूसरा तू है जिसे उस कमीनी की गुलामी से फुरसत नहीं मिलती । पापा जी ने कोठी बना के दे दी और तुम दोनों चाचा भतीजा को रंगगलियाँ मनाने को ठिकाना मिल गया ।
क्या बक रही है तू
वही जो सच है । वही जो किसी अंधे को भी दिखाई दे रहा है । चाचे को तो किसी ने मार दिया अब आगे पता नहीं , क्या होने वाला है । मैं तो परसों जा रही हूँ । तू रह अपनी उसी रखेली के साथ ।
और भी पता नहीं क्या क्या बोले जा रही थी वह कि वह जीप उठाकर चला आया । इन्ही सोचों में डूबा डूबा वह गोल डिग्गी पहुँच गया तो उसे होश आया । उसने कलाई उठाकर घङी देखी , शाम के सात बजे थे । अचानक उसे भूख का अहसास हुआ । आज सुबह से उसने दो आलू के परोंठो को सिवा कुछ नहीं खाया था । बाकी परोंठे और चाय वहीं छोङ आया था । उसके बाद उसने चाय तक नहीं पी थी । कल भी दोपहर को जो रोटी लंगर की पंगत में बैठकर खा ली वही खाई । रात में भी वह भूखा ही लेट गया था । बीजी के बार बार कहने पर भी रोटी उससे खाई ही नहीं गयी ।
अब उसने जीप कपूर चिकनस की ओर मोङ ली । यह होटल दोनों टाटा भतीजे का पसंदीदा जगह थी । चाचा के जाने के चौदह दिन बाद वह यहाँ आया था । वह होटल के बाहर बिछी कुर्सी पर बैठ गया । बैरा पानी का गिलास , जग और सलाद रख गया । गुरनैब ने यह सब देखा ही नहीं । उसी तरह अपने ख्यालों में गुम बैठा रहा । होटल के मालिक जगरूप ने उसे बैठे देखा तो उसके पास चला आया । उसके कंधे पर हाथ रख निरंजन की बातें करता रहा । गुरनैब बीच बीच में हाँ हूँ करता रहा । तब तक लङका खाना रख गया । खाना देख कर गुरनैब ने कहा – ऐसा कर , इसे पैक करदे । अभी खाया नहीं जा रहा । थोङी देर में खा लूँगा और जाकर जीप में बैठ गया । नौकर ने खाने का लिफाफा बढाया तो वह गाँव की ओर मुङ लिया ।

बाकी कहानी अगली कङी में ...

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