MAIN TO ODH CHUNRIYA - 35 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories PDF | मैं तो ओढ चुनरिया - 35

मैं तो ओढ चुनरिया - 35

मैं तो ओढ चुनरिया

अध्याय 35


कुरुक्षेत्र एक ऐतिहासिक , धार्मिक और सांस्कृतिक शहर है । कुरुक्षेत्र वही जगह है, जहां भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। कौरवो और पांडवों के बीच हस्तिनापुर के राज सिंहासन की लड़ाई इसी जगह हुई थी, जिसे महाभारत के युद्ध के नाम से जाना जाता है। ब्रह्म कुंड को हिंदुओं द्वारा पवित्र माना जाता है और यह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। अल बरूनी के लेखन में इस पवित्र जलाशय का उल्लेख भी किया गया है। सूर्य ग्रहण पर यहां स्नान मेले में हजारों की भीड़ उमड़ती है, इस विश्वास के साथ कि डुबकी लगाने से अनन्त मोक्ष मिलेगा। तो लाखों लोग इस समय कुंड में स्नान कर रहे थे । कई लोग पूजा अर्चना में लीन थे । मैं आराम से होटल की मेज पर बैठी इन लोगों को आते जाते देख रही थी । नानी आँखें बंद कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रही थी । होटलवाले ने रोटियाँ सेकीं और डाल कर ले आया । हमने दाल और रोटी ली । नानी ने अपने थैले से कल पूरियाँ निकाली और गरम गरम दाल के साथ खाने लगी । खाना खाकर हमने एक बार फिर घाट के मंदिरों के दर्शन किए । और ट्रेन पकङ कर सहारनपुर लौट आए ।
रात होते न होते नानी को बुखार आ गया ।
यह बुखार कई दिन चला । नानी कहीं भी तीर्थ करने जाती ,तो अगले दिन प्रशाद , जल कोई माला या चूङियाँ लेकर माँ को देने जरुर आती थी पर इस बार चार दिन बीत गये । नानी के दर्शन नहीं हुए तो माँ उनसे मिलने गयी । नानी बुखार से तप रही थी । कब्ज से उनका पेट फूलना शुरु हो गया था । नानी की हालत देख कर माँ घबरा गयी । उल्टे पैर घर आई और पिताजी को साथ ले गयी । पिताजी ने जाते ही इंजैक्शन दिया । कुछ गोलियां दी । माँ वहीं नानी के पास रह गयी थी । नानी का बुखार थोङी देर को उतरा पर फिर हो गया । नानी बार बार कहती उस होटल वाले ने ग्रहण वाली दाल खिलादी । अब मैं ठीक नहीं होना । सुबह मामा अपनी रेल की डयूटी से लौटे तो वे भी घबरा गये । तय हुआ कि नानी को अस्पताल ले जाया जाय । नानी किसी भी कीमत पर जाने को तैयार न हुई । दो दिन और बीत गये । मामा गुस्से में आ गये । तू हमें पूरे शहर में बदनाम करवाना चाहती है ।
नानी ने हथियार डाल दिये । चल ठीक है – परसों चलेंगे । कल एकादशी है । मैं कल गौ दान करुँगी । उसी दिन एक कपिला गाय खरीदी गयी । उसके पैरों के लिए चाँदी के कङे बनवाए गये । अगले दिन बार बार मना करने के बावजूद नानी नहाई । मामी ने पंडित के लिए खाना बनाया । माँ ने संदूक खोल कर गाय के ऊपर देने के लिए चादर निकाली । नानी धीरे धीरे संदूक के पास आई और एक छल्ला मुझे ढूँढ कर दिया ।
पूरे विधिविधान से पूजा हुई । गाय दान की गयी । पंडित जी ने भोजन किया और भारी दक्षिणा लेकर प्रसन्नचित्त विदा हुए । नानी ने उस दिन करीब दस दिनों के बाद एक रोटी खाई ।
अब जहाँ तुम्हारा मन करे ले जाओ । यह मिट्टी है जैसे खरच करना चाहे कर सकते हो । माँ के आँखें भर आई – भाबी ऐसे क्यों बोल रही है । दवा करेंगे । तुम ठीक हो जाओगी ।
उस पीङा में भी नानी खुल कर हँसी – कर लो तसल्ली ।
शाम को नानी को बाजोरिया अस्पताल में भरती करवा दिया गया । डाक्टर ने उनका चैक्प किया और कई पाइपों में उन्हें जकङ दिया गया । माँ उनके सिरहाने बैठी कभी गीता पाठ करती कभी विष्णुसहस्रनाम जपती ।
दोपहर में नानी अनंतयात्रा पर चली गयी । इसके साथ ही एक युग समाप्त हो गया । बात बात में पाकिस्तान के सतघरे और उकाङा मंडी को याद करती नानी जीवन में एक बार पाकिस्तान जाकर अपना घर देखने की हसरत दिल में लिए दुनिया छोङ गयी । मेरा ब्याह देखने की साध भी उनके साथ ही चुप हो गयी ।
परिवार के विधिविधान के अनुसार उन्हें समाधी अवस्था में पालथी लगाकर बैठाया गया था । समाधी में बैठी वे किसी भी कोण से मृत देह नहीं लग रही थी । समाधी मे लीन किसी जोगन सी वे शांत आँखें बंद किये दीवार से लगी थी । हाथ में रुद्राक्ष की माला , बदन पर भगवा चोला और बगल में बैरागन । मैं एकटक उन्हें देख रही थी । कितना रूप चढा था उस दिन उन्हें । लोग आते , उनके पैर छूते । रुपए और फूल चढाते । चादर ओढाते । एकबार फिर से पैर छूते । एक कोने में खङे हो जाते । अगले दिन उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें हरिद्वार के ठोकर घाट पर जलसमाधी दे दी गयी । किसी अपने के दिवंगत होने की यह मेरे जीवन की पहली घटना थी जिसे मैंने इतना नजदीक से देखा था । नानी से वैसे ही बच्चों के आत्मीय संबंध होते है और यहाँ तो नानी बिल्कुल पङोस में ही रहती थी । जब चाहे उससे मिला जा सकता था । कई दिन तक नानी की वह समाधी वाली छवि मेरी आँखों में कोंधती रही । सोती तो भी नानी सपने में चली आती । फिर धीरे धीरे यह क्रम टूटना शुरु हो गया । पर नानी की याद मन से कभी नहीं गयी ।
सुबह सुबह नहाकर कमलनयन स्तोत्र गाती नानी , मंदिर पर जल चढाकर लौटती नानी , हम बच्चों को टाफियाँ , लैमनजूस की गोलियाँ बाँटती नानी , रात को कहानियाँ सुनाती नानी , रामायण और सुखसागर का पाठ करती नानी , एक हाथ में पानी की सुराही और दूसरे हाथ में एक थैले में खाने पीने का सामान पकङे हमारे घर आती नानी कई रूपों में नानी मन में बसी थी ।
हाँ नानी के जाने से मेरे रिश्ते की बातों को फिलहाल विराम लग गया था । सुना मामी माँ से कह रही थी कि अब उनकी बरसी तक कोई तीज त्योहार या शुभ का काम नहीं हो सकता । चलो शुक्र है , अब मैं आराम से पढाई के बारे में सोच सकूँगी ।

बाकी कहानी अगली कङी में ...

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