Nafrat se bandha hua pyaar - 5 in Hindi Love Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 5

नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 5

सबिता ध्यान से ध्रुव को डॉक्यूमेंट पढ़ते हुए सुन रही थी। "इससे हमें कोई परेशानी नहीं है" उसने कहा जब ध्रुव ने डॉक्यूमेंट पढ़ना खतम किया।
"और इसमें एक बात और एड करदो की जब भी प्रजापतीस बिज़ी होंगे उनके स्थानीय मेले और उत्सवों में तब उस समय सिंघम ज्यादा लोगों से काम करवा सकता है ताकि काम न रुके, बिलकुल वैसे ही जैसे हम लोग करते हैं जब सिंघम्स बिज़ी होतें हैं उनके उत्सवों में।"

ध्रुव ने सर हिला के हां कहा और दिए गए कैलेंडर में डेट्स मार्क्ड कर दी। जबकि देव ने कहा था ये डॉक्यूमेंट इतना जरूरी नहीं है और इसपर साइन करने की जरूरत नही है, फिर भी सबिता ने इस पर साइन कर दिए। "इसकी एक कॉपी लो और देव सिंघम को जा कर देदो। उसके बाद जिस नए मैनेजर को हमने अभी रखा है उससे कहो की हमे एक घंटे में आ कर मिले।"

"स्योर, मैडम।" ध्रुव ने उन डॉक्यूमेंट की कॉपी ली फोटो कॉपी मशीन से जो उसके ऑफिस में ही था और ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स लेकर चला गया। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ ध्रुव के जाने के बाद, सबिता ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी की सीट से सिर पीछे टिका के बैठ गई। वोह एकटक उन कागजों को ही देख रही थी जो अभी ध्रुव ने कॉपी करने के बाद यहां टेबल पर रखे थे। हमेशा की तरह उनको देखने का कोई फायदा नही था, उसे सिर्फ काली लकीरे ही दिख रही थी। उसने बहुत ही मुश्किल से उन डॉक्यूमेंट्स के पहले दो शब्द पढ़े उसके बाद आगे पढ़ने की हिम्मत नही हुई और हार मान कर बैठ गई। आखिर सही ही तो कहा था देव सिंघम। वोह सच में अनपढ़ ही तो है। भले ही उसने बहुत बुरी तरह से बरताव किया था देव के साथ लेकिन उसके लिए अनपढ़ कहलाना किसी घातक बैज़्जती और गाली जैसा था। इससे बड़ी बेइजत्ती और कोई नही थी सबिता सिंघम के लिए। जब वो बड़ी हुई तो उसे अपने लिए मंदबुद्धि, अनपढ़, गवार, धीमी गति से काम करने, और बेवकूफ जैसे शब्दों को सुनना पढ़ता था। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था की उसने अपनी बुद्धि को कई अन्य रूपों में प्रदर्शित किया। क्योंकि उसे पढ़ना लिखना नहीं आता था इसलिए सबको लगता था की वोह दिमागी तौर पर विकलांग है। बच्चन में उसने बहुत पिटाई खाई थी और उसके साथ बहुत दुर्व्यहार किया जाता था अपने ट्यूटर से जो उसकी बुआ उसे पढ़ाने रखती थी। जब भी ट्यूटर को निकाला जाता था, क्योंकि वो सबिता को पढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाता था तो, अगली बार और भी ज्यादा क्रूर ट्यूटर को रखा जाता था सबिता को पढ़ाने जो उसपर पहले वाले से भी ज्यादा अत्याचार करता। वोह उसे बहुत मारते थे उसे भूखा रखते थे यह कह कर की इसकी ज़िद्द को तोड़ने के लिए कर रहें है क्योंकि ये बहुत आलसी हो गई है मेहनत नही करना चाहती। उन लोगों को तब भी कोई फर्क नहीं पढ़ा था जब आखिरकार एक दिन डॉक्टर ने उसका चैकअप किया और बताया उसके पढ़ने लिखने में अकुशलता का कारण, डिस्लेक्सिया।(dyslexia)
एक विकार जिसमें शब्दों, अक्षरों और अन्य प्रतीकों को पढ़ने या व्याख्या करने में कठिनाई होती है, लेकिन सामान्य बुद्धि को ये प्रभावित नहीं करता है। उसके मामले में, यह एक आनुवंशिक विकार था।(genetic disorder)

"कोई बात नही बच्चे। हमे पढ़ने लिखने की जरूरत है ही नही। इसके लिए हमारे लोग हैं ही।" उसके पापा, हर्षवर्धन प्रजापति, ने कहा जो खुद भी इसी परेशानी से जूझ रहे थे।

लेकिन उनके समय के दौरान, उन्होंने इसका ठीक से उपाय करने के बजाय, उन्होंने अपने आपको नही पढ़ने और लिखने के लिए तैयार कर लिया था क्योंकि उनकी मर्दानगी इसके आगे आ गई थी। पिछड़े समाज में मर्दों के तौहीन के खिलाफ होता अगर सब को पता चल जाता की वोह पढ़ाई लिखाई नही समझ पा रहे हैं इसलिए उन्होंने उससे दूरी बना ली। उनके भाई "यशवंत प्रजापति" ने तो अपनी आगे की पढ़ाई लंदन से की थी और वहीं एक लड़की से शादी करके वहीं बस गए थे। एक बार जो वोह गए फिर कभी वापिस नही आए। इसलिए मजबूरन हर्षवर्धन प्रजापति को कम उम्र में ही स्कूल छोड़ना पड़ा और जीवन भर यहीं रह गए, जब तक की उन्हे मार यानी कत्ल नही कर दिया गया एक हत्यारे के रूप में।
लाख कोशिशों के बाद भी, सबिता जानती थी की वोह बारिके से अपने पिता के नक्शे कदम पर ही चल रही है।
"क्या मेरा अंत भी ऐसे ही होगा? क्या में भी एक दिन खूनी हत्यारा कहलाके सड़क पर गोली मार कर कुत्ते की तरह फेक दी जाऊंगी? मैंने तो कभी ऐसी जिंदगी नही चुनी थी। मुझे इस दल दल में जबरदस्ती धकेला गया है वो भी उस "देव सिंघम" की वजह से।

***फ्लैशबैक***

***सात साल पहले***

जब सिंघम कॉटेज से सबिता को पकड़ा गया था तो उसे वापिस प्रजापति मैंशन ले जाया गया था। दो आदमियों ने उसे उसकी बुआ(पिता की बहन) के कमरे की बालकनी के सामने वाले आंगन में पकड़ रखा था। सबिता लगातार बेबसी से रोई जा रही थी, उसकी सिसकियों की आवाज़ सुन कर भीड़ इक्कठा होने लगी। उसने तो सोचा था की वोह और राघव यहां से भागने में कामयाब हो जायेंगे। वोह शहर जाके वहां अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे, जहां कोई लड़ाई झगड़ा ना हो कोई मार पीट ना हो, जहां कोई किसी को नीचा नहीं दिखता हो जहां अपनी नाक ऊंची रखने के लिए किसी की न जान ले जाता हो। उसने तो सोचा था की वोह यहां से भागने में कामयाब हो जायेगी, सारी जिंदगी एक कातिल की बेटी कहलाने से तो अच्छा है की भाग ही जाए। एक खूनी कातिल की बेटी कहलाते कहलाते कहीं वो खुद ही न इसी गंदगी में ढल जाए। यही सब सोचते हुए बस इन सब से दूर बहुत दूर जाना चाहती थी वो।
"नीलम्मा आ रहीं हैं।" भीड़ में से ही किसी ने चिल्ला कर कहा।
जैसे ही उस बालकनी में आने के लिए उस बड़े से दरवाज़ा के खुलने की आवाज़ आई चारों तरफ शोर होने लगा, सब आपस में खुसुर फुसुर करने लगे। जैसे ही नीलांबरी बाहर आई वोह सबकी तरफ देखने लगी।
"उसे पास लाओ!" उन्होंने गुस्से भरी कड़क आवाज़ में कहा।
सबिता को बालकनी के पास लाया गया जहां नीलांबरी खड़ी थी। सबिता सिर झुका के सुबक रही थी। तभी एक आदमी ने नीलांबरी के इशारे पर सबिता के पीछे से बाल कस कर पकड़ लिए और उसके बालों को पीछे की तरफ खींचने लगा ताकि सबिता अपना सिर उठा सके। वोह उसके सिर को पीछे की तरफ तब तक खींचता रहा जब तक सबिता और नीलांबरी की नज़रे आपस में नही टकरा जाती। सबिता को अपनी बुआ धुंधली से नज़र आ रही थी। रो रो कर उसकी आंखों में आंसू इकट्ठा हो रखे थे।

"आखिर तुमने साबित कर ही दिया की तुम एक वैश्या की बेटी हो" नीलांबरी ने गरजते हुए कहा।
"लेकिन....अफसोस.. इस बात का भी है की तुम्हारी रगो में एक प्रजापति का भी खून दौड़ रहा है। और मैंने अपने भाई से वादा किया था की में तुम्हारा ख्याल रखूंगी।"

सबिता चुप थी उसने कोई जवाब नही दिया, उसे तो आदत पड़ चुकी थी ये सब सुनने की। बच्चन से यही ताने तो सुनती आ रही है की वो "एक वैश्या की बेटी है", "भाई को किया वादा"। सबिता जानती थी की उसकी बुआ को बिलकुल नहीं पसंद की वोह यहां प्रजापति मैंशन में रहे। जब जन्म देते वक्त उसकी मां का निधन हो गया था तब उसके पिता हर्षवर्धन प्रजापति ने उस नवजात को घर ले आए थे। और जब हर्षवर्धन को भी मार दिया गया था तब से वोह उसकी बुआ की ज़िमेदारी बन गई। सबिता को समझ नही आ रहा था की जब उसकी बुआ उससे इतनी नफरत करती है तो क्यों उसे जाने नही देती यहां से? क्यों उसे इतनी कठोर जैसी जिंदगी में जबरदस्ती कैद कर के रखा है?
"उस लड़के को भुल जाओ, तो में तुम्हे छोड़ दूंगी," नीलांबरी ने फैसला सुनाते हुए कहा। "और इस मैंशन में भी मैं तुम्हे पूरी जिंदगी रहने दूंगी"।
सबिता ने तुरंत जवाब दिया "नही!, बिलकुल नहीं!"
उसे तो जवाब सोचने की भी जरूरत नही थी वो जानती थी उसे क्या कहना है, उसने बस ठान लिया था की यहां से जाना ही है।
नीलांबरी आंखे हैरानी से फैल गई। उसकी आंखों में गुस्सा छलकने लगा सबिता के पागलपन को सुन कर। वोह बालकनी में ही रेलिंग के और नजदीक आ कर खड़ी हो गई, वोह अभी भी सबिता को ही देख रही थी।
"तुम बचपन से ही जिद्दी हो, लेकिन तुम्हे लाइन पर कैसे लाना है ये में अच्छे तरीके से जानती हूं।"
उसने उस आदमी की तरफ देखा जो सबिता को पकड़े हुए था और कहा, "इसे यहां बांध दो और उस लड़के को ले जाओ और दूसरी तरफ बांध दो।"

इतना सुनते ही उस आदमी ने तुरंत सबिता को खीचना शुरू कर दिया और ले जा कर वहीं पर पेड़ से बांध दिया। सबिता ने भी कोई कोशिश नही की विरोध की क्योंकि वो जानती थी इसका कोई फायदा नही होने वाला।
"इसे जब तक मारते रहो जब तक मैं ना कहूं रुकने के लिए।"
जैसे ही सबिता ने अपनी बुआ को आदेश देते सुना उसने महसूस किया की चाबुक की तार इसके पीठ पर पड़ने लगे हैं। वोह दर्द से अपने नाखून को पेड़ की खाल पर गड़ा रही थी अपने रोने की आवाज़ को दबाने के लिए।

"उसे तेज़ मारो! अगर तुम ढीले पड़े तो तुम्हे भी कोढों की मार सहनी होगी," नीलांबरी ने उस आदमी को धमकाते हुए कहा जो सबिता पर कोढ़े बरसा रहा था।

सबिता दर्द सहते हुए चुपचाप मार बर्दाश्त करती रही, उसकी आंखें बंद होने लगी वोह लगभग बेहोश हो चुकी थी। वोह आंखें बंद करके अपने आने वाले भविष्य के बारे में सोचने लगी। जब ये सब खत्म होगा मैं फिर राघव के साथ भागने की कोशिश करूंगी, और इस बार किसी के हाथ नही आऊंगी।
राघव, प्रजापति मैंशन में काम करने वाले हैड कुक का बेटा था जिसे सबिता की तरह ही खाना बनाना बहुत पसंद था। सबिता और राघव दोनो को एक दूसरे से प्यार हो गया था और दोनो ही यहां से भाग जाना चाहते थे कहीं दूर सुरक्षित जगह जहां अपनी नई जिंदगी शुरू कर सके। सबिता राघव के साथ भागने का प्लान याद करने लगी जो उसने बनाया था। वोह दोनो यहां से दूर जाने के बाद एक नई दुनिया बसाएंगे जहां उनका एक छोटा सा घर होगा। और अपने घर के पास ही चाय की एक छोटी सी दुकान खोलेंगे जहां हल्का फुल्का स्नैक्स और चाय बेचेंगे। जबकि वो अच्छे से जानती थी की उसे पढ़ना लिखना नहीं आता लेकिन खाना तो बनाना आता ही है ना, उतना काफी है। बचपन में काफी समय वोह किचन में बिताती थी जहां उसने कई तरह के खाना बनाना सीख लिए थे। सभी को उसके हाथ का बना खाना बहुत पसंद आता था। जो भी उसके हाथ का बना खाना खाता था वो बस एक ही बात कहता था "तुम्हारे हाथ में तो जादू है"। यही वजह थी उसे पूरा विश्वास था की वोह उसका प्लान काम करेगा और जितने भी पैसे वोह कमाएगी राघव के साथ एक अच्छी जिंदगी की शुरआत तो कर ही लेगी, काम से कम एक छोटा सा घर तो बना ही लेगी।
सबिता कब से अपने खालों में खोई हुई थी, उसे एहसास तब हुआ जब चाबुक की मार का दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया। धीरे धीरे दर्द से कराह गई और बेहोश होने लगी।

जब सबिता की आंखें खुली तो सूरज की चमकदार रोशनी उसके ऊपर पड़ रही थी। उसे पता ही नही था की कब से वोह यहां पेड़ पर बंधी हुई है और कब तक वो ऐसे ही बेहोश रही। उसके होंठ गर्मी से सूखने लगे। उसके होंठ इतने सुख गए थे की अगर ज़रा सा भी वोह अपने होंठ को हिलाती तो वो फट जाते। उसे पानी चाहिए था बहुत प्यास लगी थी लेकिन हिम्मत नही हुई मांगने की और ना ही उसने कोशिश की। उसे लगता था की अगर उसने पानी मांगा तो उसके बदले उसे अपनी हार माननी पड़ेगी तभी पानी मिलेगा वरना नही। कुछ ही देर में उसकी बुआ तक भी ये खबर पहुंच गई की सबिता को होश आ गया है। सबिता को फिर उसकी बुआ के पास ले जाया गया और उसकी बुआ ने फिर वोही सवाल किया।
"मुझसे वादा करो कि तुम उस लड़के को छोड़ दोगी, तो में तुम्हे हमेशा यहां अपने पास रहने दूंगी।"
सबिता अब तक बहुत कमज़ोर हो चुकी थी वो बोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन शब्द नही निकल रहे थे फिर भी कोशिश करते हुए वोह बस इतना ही कह पाई, "नही।"
फिर तो ये सिलसिला तीन दिन तक चलता रहा। तीन दिन तक उसे भूखा प्यासा रख कर बस मारते रहे पर फिर भी सबिता ने हार नहीं मानी।
चौथे दिन जब सबिता को होश आया तो उसने अपने आप को अपने कमरे में अपने बैड पर उल्टा लेटा यानी मुंह के बल लेटा हुआ पाया। उसे अपनी पीठ बस आग की तरह जलती हुई महसूस हो रही थी। तभी उसे महसूस हुआ की कोई उसकी पीठ पर दवाई लगा रहा है जिससे उसे ठंडक का एहसास हो रहा था।
"उफ्फ! क्या कर दिया है उन्होंने तुम्हारे साथ।" किसी जानी पहचानी आवाज़ पड़ी सबिता के कान में। वोह औरत उसकी मां की बहन थी जो प्रजापति राज्य में एक वैध और दाई का काम करती थी। अठारह साल पहले वोही थी जिसने सबिता की मां की डिलीवरी करी थी।
"तुम बिलकुल अपनी मां पर ही गई हो," उसने खीज कर कहा। "और खच्चर की तरह जिद्दी भी।"
"हालांकि शैला जानती थी की हर्षवर्धन किसी और से प्यार करता है और उससे कभी शादी नही करेगा, फिर भी उसने उसे और अपने प्यार को नही छोड़ा था। उसने समाज की बनाई हुई मर्यादा को तोड़ कर हर्षवर्धन से संबंध बनाए रखा था।"
सबिता ने कोई जवाब नही दिया। वोह इस वक्त अपने शरीर पर इतना दर्द महसूस कर रही थी की, ना ही उसका बोलने का मन था ना ही हिम्मत थी।
कुछ ही देर बाद, किसी ने उसके कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।
"क्या इसे होश आ गया है? मैडम ने इन्हे बुलाने भेजा है।" सबिता ने एक आदमी की कड़क आवाज़ सुनी।

"ये अभी नहीं आ सकती तुम्हारे साथ। ये अभी कमज़ोर है कितनी चोट भी लगी है इसे।" सबिता की मौसी ने जवाब दिया।
"मैडम ने कहा है इन्हे में ले आऊं अगर इन्हें होश आ गया है तो। हम उनकी आज्ञा को टाल नहीं सकते। आगे से हटो!"
सबिता ने महसूस किया की किसी ने उसकी बाजुओं को पकड़ा हुआ है और घसीट के बैड से नीचे उतार दिया। वोह इतनी कमज़ोर थी की ठीक से खड़ी भी नही हो पा रही थी। उन आदमियों ने उसे ठीक से पकड़ा और सीढियां चढ़ते हुए नीलांबरी के कमरे के बाहर छोड़ दिया। उसके पैरों ने उसका साथ नहीं दिया और वो घुटने के बल गिर पड़ी। नीलांबरी के कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था और सबिता उसके कमरे के बाहर घुटना मोड़े अधमरी हालत में बैठी थी। उसको लेकर आने वाले वोह दो आदमी भी वहीं उसके पास खड़े थे। सबिता जानती थी क्यों उसे यहां छोड़ा है और अब उसकी बुआ के बाहर आने का इंतजार कर रहे थे। बचपन से ही उसे उसकी बुआ के कमरे में आने की अनुमति नहीं थी। उसकी बुआ जाति धर्म में बहुत ही ज्यादा विश्वास रखती थी। क्योंकि सबिता की मां एक छोटी जाति की थी इसलिए नीलांबरी की नज़र में सबिता और उसकी मां की औकात उसकी नौकरानियों से भी कम थी। सिर्फ ऊंची जाति की नौकरानियों को ही इज्जाजत थी की उसके कमरे की साफ सफाई करे और उसका खाना और बाकी का सामान रखने ले जाने उसके कमरे में घुसे।
तभी किसी ने नीलांबरी के कमरे के अंदर ही दरवाज़े के पास एक बड़ी सी कुर्सी रख दी और फिर कुछ समय बाद नीलांबरी अंदर से आके उस पर बैठ गई। वोह सबिता बहुत ही गौर से देख रही थी। बहुमुशक्कत करने के बाद भी सबिता अपनी आंखों को लगातार खोले नही रख पा रही थी।
"क्या अब तुम उसे छोड़ दोगी?" नीलांबरी ने आराम से पूछा।
सबिता ने अपनी अध खुली आंखों से अपनी बुआ की तरफ देखा और धीरे से फुसफुसाते हुए जवाब दिया, "नही।"
सबिता को लग रहा था की अब उसकी बुआ उसकी बात सुन कर फिर गुस्सा होगी लेकिन वो तो हल्का सा हस रहीं थी।
"मुझे तुम पर गर्व, मेरी प्यारी बच्ची। आज तुमने साबित कर दिया की तुम सच में एक प्रजापति हो। हम कभी भी किसी के सामने झुकते नहीं।"
सबिता ने कुछ नही कहा। वोह बस एकटक अपनी बुआ की तरफ देख रही थी। वोह बस पूछना चाहती थी की उन्होंने राघव के साथ क्या किया है लेकिन उसकी जबान और आंखें साथ नही दे रही थी, उसके अंदर हिम्मत ही नहीं बची थी की वोह कुछ बोल सके।
"लोहे की तरह सख्त इच्छा और धैर्य है तुम्हारे पास, तुम बड़ी चीजों के लिए बनी हो, तुम्हारे अंदर सच्चे प्रजापति का खून है तुम राज करने के लिए बनी हो। पीढ़ियों से हमारी घर की औरतें राज करती आईं हैं। अब से और अभी से में खुद तुम्हे उस योग्य बनाऊंगी।"

सबिता ने बेहोशी में ही ना में सिर हिलाते हुए कहा, "मुझे ऐसी जिंदगी नही चाहिए। मुझे आज़ादी चाहिए।"

उसकी बुआ नीलांबरी उसे गौर से देख रही थी, "क्यों? क्योंकि तुम्हे उस लड़के के साथ अपनी जिंदगी बितानी है, वोह जिंदगी जिसमे पैसों की किल्लत, दुख और बेचारगी की जिंदगी होगी, जहां ज्यादा से ज्यादा तुम एक झोपड़ी ही खरीद पाओगी?"

"हां! मुझे ऐसी ही जिंदगी चाहिए यहां से तो बेहतर ही होगी।" सबिता ने झट से जवाब दिया।

नीलांबरी उसकी बात सुन कर चुप हो गई। फिर अपना सिर झटक कर उन्होंने कहा, "में चाहती हूं की तुम एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जिओ और में जरूर तुम्हे आज़ाद कर दूंगी अगर मुझे ये यकीन हो जाए की तुम और राघव एक दूसरे से सच्चा प्यार करते हो और एक दूसरे का साथ कभी नही छोड़ोगे।

"में उस के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहती हूं।" सबिता ने कहा।

"में जानती हूं! लेकिन वो तुम्हारे साथ अपनी जिंदगी नही बिताना चाहता।" नीलांबरी ने उसे समझाते हुए कहा।

सबिता ने अपना सिर ऊपर कर के नीलांबरी को देखा और कहा, "क्या! वोह मेरा साथ नही चाहता। प्लीज! हमे जाने दो ताकि हम एक हो सके। इसके बदले मैं अपनी सारी प्रॉपर्टी, पैसे, सब कुछ आपको देने को तैयार हूं। बस हमें जाने दो।"

नीलांबरी चुप थी। वोह कुछ सोचने लगीं।
"मैं जानती हूं जो तुम उस लड़के के लिए महसूस करती हो वोह शायद सही हो और सच्चा हो पर वो तुम्हारे लायक नही है। उसने तुम्हे फसाया है पैसों के लिए। जब उसे यह एहसास हुआ की तुम अपना सब कुछ शायद छोड़ दोगी तो वो भाग गया।"

"नही! उसने मुझसे वादा किया था की मेरा साथ कभी नही छोड़ेगा और हम दोनो मिलकर बिना प्रजापति के पैसों और ताकत के अपनी जिंदगी शुरू करेंगे।"

"उसने झूठ कहा था। और हो सकता है की उस वक्त झूठ ना कहा हो लेकिन अब जान मुसीबत आई तो वो अपने वादे पर टिक नहीं पाया।"

"आपने क्या किया है राघव के साथ?"

"ज्यादा कुछ नही। पर जितना भी किया है...... पाँच कोड़े पड़ने के बाद ही वो अपने आज़ादी की भीख मांगने लगा। और उसने एक और वादा भी किया लेकिन...... इस बार मुझसे। उसने कहा की वोह कभी भी प्रजापति की ज़मीन पर दुबारा कदम नहीं रखेगा।"

"आप झूठ बोल रहीं हैं! आपने उसे मरवा दिया ना!" सबिता घबराने लगी।

"मैं झूठ नही बोल रही। तुम खुद उससे बात कर लो।" नीलांबरी ने शांत भाव से कहा। फिर अपनी एक नौकरानी को बोल कर फोन मंगवाया। नौकरानी ने नंबर डायल किया और जब घंटी बजने लगी तो सबिता को फोन पकड़ा दिया।

सबिता ने एक जानी पहचानी आवाज़ सुनी।

"हैलो?"

"राघव!" सबिता ने एक राहत भरी सांस ली उसकी आवाज़ सुन कर की वोह जिंदा है।

"सबिता?

"राघव, तुम ठीक तो हो? इन लोगों ने तुम्हारे साथ क्या किया?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूं। और इस वक्त शहर में हूं।"

"प्लीज तुम जल्दी से यहां आयो और मुझे भी ले जाओ अपने साथ, राघव। मेरी बुआ ने कहा है की अगर हम एक साथ रहेंगे तो वो मुझे जाने देगी। मैने सब कुछ सोच लिया है........."

"आई एम सॉरी! मुझे माफ करदो सबिता, में नही आ सकता। में उस भयानक और खतरनाक जगह दुबारा आके अपने आप को खतरे में नही डाल सकता।" राघव ने आराम से ही सबिता की बात बीच में काटते हुए कहा।

"राघव, ये क्या कह रहे हो तुम?" सबिता की घबराहट अब बढ़ने लगी।

"मुझे माफ करदो, में अपने वादे पर टिक नही पाया की हम यहां से भाग कर एकसाथ नई दुनिया बसाएंगे, मैं नही कर सकता।"

"पर राघव, तुम तो अच्छी तरह से जानते हो ना की मैं........"

"सॉरी, सबिता। प्लीज मुझे माफ करदो। पर मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा।"

"राघव, प्लीज। में पूरी कोशिश करूंगी की तुम्हे कुछ ना हो जब तुम मुझे लेने आओगे। प्लीज एक बार तो सुनो......"

"आई एम सॉरी।"

"राघव......"

कॉल कट चुकी थी। सबिता ने रिडायेल का बटन दबाया पर फोन स्विच्ड ऑफ का मैसेज आने लगा। वोह बार बार रिडायेल का बटन दबा रही थी लेकिन राघव ने फोन ऑफ कर दिया था। सबिता फोन को खाली आंखों से देख रही थी। ये सब सुनकर उसे सदमा सा लगा था।

"मुझे माफ करदो, मेरी बच्ची," नीलांबरी ने प्यार से कहा। उसकी आवाज़ में पछतावे झलक रहा था।
"प्यार के मामले में आदमियों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। तुमने उसे सब कुछ दिया....अपना प्यार,
अपना मन। जो भी तुम्हारे पास है। पर उसने क्या किया? वोह तुम्हे बुरे वक्त पर अकेला छोड़ गया।"

सबिता अभी भी शॉक में थी, उसने जैसे कुछ सुना ही नहीं , उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

"उस लड़के को मुश्किल से ही पांच कोड़े पड़े थे की वो अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगा, की वोह तुम्हे छोड़ देगा। में ये मानती हूं की मैने उसे तुम्हे छोड़ने के बदले पैसे देने का प्रस्ताव रखा था। पर अगर वो तुम्हे सच में प्यार करता तो वो प्रस्ताव ठुकरा देता और पैसे कभी नही लेता जैसे तुमने किया।"

अब भी सबिता नीलांबरी को खाली आंखों से देख रही थी। उसे पता ही नही चला कब और कैसे उसे वापिस उसके कमरे में पहुंचा दिया गया। पर उस रात, और आगे की रातों में जब भी वो अपने बैड पर लेटती थी उसे अपनी हार का एहसास होता था की वोह यहां से इस नर्क भरी जिंदगी से भाग नही पाई। उसकी बुआ एक बात पर तो सही थी की सबिता कभी हार नही मानेगी। उसके बाद छह महीने तक सबिता ने कम से कम बीस बार भागने की कोशिश की लेकिन हर बार पकड़ी जाती और फिर टॉर्चर सहती। आखिर कार छह महीने बाद थक हार कर उसने भागने की ज़िद्द छोड़ दी।

***प्रेजेंट डे***

सबिथा ने याद किया कि कैसे वह बचने के अपने आखिरी प्रयास के बाद बहुत लंबे समय तक सदमे और हार की स्थिति में रही थी। और फिर एक साल बाद वो अपने सदमे से उभरने लगी और अपने दिल को पत्थर जैसा कठोर बना लिया। उसने अपनी बुआ का दिया हुआ प्रस्ताव स्वीकार कर लिया की वोह उसे प्रजापति का नेतृत्व करने के लिए तैयार करेंगी।

उसने तय कर लिया था कि इस हिंसक, नीरस जीवन से बचने की कोशिश करने के बजाय, वह इसे पूरी तरह से गले लगाएगी और जीत कर ही अब बाहर निकलेगी। जो उसने किया भी। उसने अपने खुद के नियम बनाना शुरू कर दिए जिसमे एक यह भी था की किसी को भी अपने डर को कभी वापिस नही देखना चाहिए। या तो सब से डरता रहे या सब उससे डरे। सबिता को पता था की अगर उसे इस नर्क में जीना है तो कौनसा रास्ता चुनना होगा। उसे अपने पिता के साथ कुछ ही यादें थी। उसके पिता हर्षवर्धन प्रजापति को जब मार दिया गया था तब वो सिर्फ पांच साल की थी। उसे ये याद था की जब वो अपने पिता को देखती थी तो दौड़ कर उनके पास चली जाती थी। उसके पिता हमेशा मुस्कुराते हुए खुशी से उसे अपनी बाहों में उठाते थे और हवा में ऊपर ले जाते हुए उछालते थे और वो खिलखिला कर हस पड़ती थी। वोह हमेशा उसके लिए कोई तोहफा और खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर लाते थे। वोह हमेशा कोशिश करते थे उसके साथ अच्छा वक्त बिताने की जब भी उन्हे समय मिलता था। सबिता की ही तरह, वोह भी शिक्षित थे भले ही पढ़ने और लिखने में असमर्थ हो। एक बात सबिता को अच्छे से याद थी की कैसे उसके पिता एक बात उसे हमेशा सिखाते थे की "एक निडर योद्धा एक बार मरता है, और एक डरपोक हज़ार बार मरता है।" जब उसे आखरी बार पकड़ा गया था और उसे वापिस प्रजापति मेंशन में लाया गया था तब एक साल तक उसे ये लगता रहा था की वोह हज़ार बार मरी है। जैसे जैसे समय बिता मौत से उसका डर खतम हो गया। वोह जानती थी की वोह एक खतरनाक जिंदगी जी रही है जहां कभी भी उसे मरवा दिया जा सकता है। पर जब भी उसे मौत आए तो वो एक योद्धा की तरह ही यहां से जाए। अपनी ट्रेनिंग के दौरान और जब उसने प्रजापति एस्टेट की भागदौड़ संभाली तो उसने उन सभी को नौकरी से निकाल दिया जिन लोगों ने उसका अपमान किया था और उसके खिलाफ गए थे।
वोह अपनी इच्छा से ही नही बल्कि बेरहमी से भी लोगों पर हुकुम चलाने लगी। अंत में सब उससे डरने भी लगे और इज्ज़त भी करने लगे। उसने अपने आप को क्रूर आदमियों से घेर लिया जो बिना उससे सवाल किए उसके आदेशों का पालन करते थे। इससे फर्क नहीं पड़ता की उसने कितने ही नए अच्छे बुरे काम किए थे इस जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए पर वो कभी भी देव सिंघम को माफ नही कर सकती थी। उसके विश्वासघात के कारण ही तो उसने अपनी सबसे कीमती चिज़ खो दी थी। उसकी उस एक गलती के लिए वोह उसे बर्बाद करना चाहती थी जब भी वो उसके सामने आता या उसका ख्याल आता उसका गुस्सा बढ़ जाता। क्योंकि देव की उसके लोग बहुत इज्ज़त करते थे सिर्फ उसके एस्टेट में ही नही बल्कि बाहर के भी और ये बात सबिता को और ज्यादा गुस्सा दिलाती थी। अब अगले आने वाले कुछ महीने सबिता के लिए मुश्किल भरे होने वाले थे। सबिता को पूरा शक था की कहीं उसके साथ काम करते हुए जिससे वोह सबसे ज्यादा नफरत करती है उसे वोह कोई गंभीर नुकसान ना पहुंचा दे या मार ही न डाले।









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