Nafrat se bandha hua pyaar - 13 in Hindi Love Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 13

नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 13

एक हफ्ता बीत गया।
सबिता अपने ऑफिस में बैठी थी उसके सामने ध्रुव और कुछ लोग खड़े थे। सबिता उन्हे निर्देश देते हुए कोई काम समझा रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"कम इन," सबिता ने उसे बुलाया, उसे लग रहा था की देव सिंघम के आदमी है जो दूसरे डॉक्यूमेंट्स और जरूरी कागज़ लेकर आया होगा, बट उसका अंदाज़ा गलत था।
यह तो अनिका है। सबिता पहले से ही जानती थी की अनिका और अभय वापिस इंडिया आ चुके हैं। उसकी बुआ नीलांबरी हर रात को उससे पूछती थी अनिका के बारे में, की उस ने कुछ बताया या नही। नीला, सबिता को, कुछ डरी हुई कुछ घबराई हुई नज़र आती थी। हालांकि सबिता को ज्यादा कोई फर्क नही पढ़ता था की उसकी बुआ नीलंबरी ऐसे क्यों बरताव करती है। उसकी कोई रुचि नहीं थी ये जानने में नीला को क्या परेशान कर रहा है।

"सॉरी फॉर इंटरउप्त टू यू लाइक दिस, सबिता। पर मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है, अगर तुम बिज़ी हो तो में बाहर इंतजार करती हूं।," अनिका ने कहा।

सबिता को सोचने लगी की ऐसा क्या है जो उसे उससे बात करनी है। उन दोनो के बीच में तो कभी कुछ कॉमन नही रहा। पर फिर भी, उसने ध्रुव से सभी को लेकर बाहर जाने को कहा।

"बैठो," कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए सबिता ने कहा।

जैसे ही अनिका आगे आई सबिता की नज़र अनिका के पेट पर टिक गई। उसने अनिका के प्रेगनेंसी के बार में सुना था। उसने सिंघम और प्रजापति के लोगों को आपस में बात करते सुना था की अभय और अनिका को पहले बेटा होगा या बेटी। और क्या ये आना वाला बच्चा दोनो परिवारों की दूरियां या आपसी रंजिश मिटा पाएगा या नहीं।
अनिका कुर्सी पर बैठ गई और सबिता की तरफ देखने लगी।
"आई एम सॉरी, मुझे तुम्हे पहले ही आने की खबर देनी चाहिए थी, पर मुझे तुम्हारी मदद की बहुत जरूरत है।"

"कैसी मदद?"

अनिका को समझ नही आ रहा था की वोह अपनी बात कैसे कहे, उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। उसको लग रहा की सबिता उसकी बात सुन कर क्या प्रतिक्रिया देगी, कहीं वो गुस्से से उस पर फट न पड़े। वहीं सबिता उसको सुनने के लिए इंतजार कर रही थी।
अनिका ने गहरी सांस ली और अपने आप को तैयार किया बोलने के लिए।

"में कुछ जरूरी चीज़ पता लगा रही हूं, सबिता। और उसके लिए मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। में हमारी बुआ पर नज़र रखना चाहती हूं, जिसमे तुम मेरी मदद करो।"

सबिता ने अपनी भौंहे सिकोड़ी और कहा, उस नीला पर? उसके बारे में तुम्हे क्या जानना है?"

"असल में उसके बारे में कुछ नही जानना बल्कि उनके पास से हाथ से लिखा लैटर चाहिए।" अनिका ने जवाब दिया।

"नीलबारी ने विजय सिंघम को कई लैटर्स लिखे थे जब विजय सिंघम लंदन में पढ़ाई कर रहे थे। उनमें से मैने कुछ पढ़े है, और में श्योर हूं उन्होंने भी जवाब में कोई न कोई लैटर इन्हे भेजा होगा। मुझे लगता है अभी भी वोह लैटर्स उनके पास ही होगा और शायद उसे अपने कमरे में या लाइब्रेरी में कहीं छुपा रखा होगा। मुझे वोह लैटर्स चाहिए, सबिता।"

सबिता जानती थी अगर विजय सिंघम ने नीलांबरी को कोई लैटर भेजा था तो नीलांबरी ने जरूर उन लैटर्स को सहेज कर रखा होगा।
"तुम्हे वोह लैटर्स क्यों चाहिए? जहां तक में जानती हूं की अगर ऐसा कोई लैटर्स लिखा गया है तो ये लगभग तीस साल से भी ज्यादा पुरानी बात होगी।"

"यस, यू आर राइट," अनिका ने गंभीरता से कहा।
"वोह लैटर्स पुराने होंगे। पर मुझे वोह लैटर्स चाहिए क्योंकि पर्सनल लैटर्स से हमे उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी मिल सकती है।"

"कैसी जानकारी?" सबिता को समझ नही आ रहा था की अनिका आखिर चाहती क्या है।

अनिका ने उसे समझने की कोशिश करते हुए कहा, "में ये प्रूफ करना चाहती हूं की तीस साल पहले शुरू हुआ झगड़ा इतना भी जरूरी नहीं था।"

जहां सबिता भौंहे सिकोड़े आंखे छोटी किए समझने की कोशिश कर रही थी वहीं अनिका एकदम शांत थी।

"मैं एक और बात भी साबित करना चाहती हूं की तुम्हारे पिता हर्षवर्धन प्रजापति ने, अरुंधती सिंघम को नही मारा।"

फिर कुछ देर एकदम शांति बनी रही।

"तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?" सबिता शांति से पूछा।
"मेरे पापा अपने गुस्से और दुर्व्यवहार के लिए जाने जाते थे।"

"बिलकुल सही, पर वो लोगों को दान देने और बड़ा दिल रखने के लिए भी जाने जाते थे।" अनिका ने शांति से जवाब दिया। "मैने उनके बारे में उन लैटर्स में पढ़ा है जो अरुंधती सिंघम ने विजय सिंघम को लिखे थे। और मैंने वोह लेटर्स भी पढ़े हैं जो तुम्हारे पिता ने अरुंधती को लिखे थे।"
अनिका ने सबिता को बताया की उसने लैटर्स में क्या क्या पढ़ा और कैसे उसे लगता है की हर्षवर्धन प्रजापति, अरुंधती सिंघम को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। जब अनिका ने बोलना बंद किया तब भी सबिता अनिका को गौर से देख रही थी।

"मेरे पापा पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं, अनिका। उन्हे डिस्लेक्सिक (dyslexic) है।"

सबिता की यह बात सुन कर अनिका अवाक रह गई पर फिर जल्द ही उसने अपने आप को नॉर्मल कर लिया।

"शायद नहीं आता हो, पर यह भी तो हो सकता है की उन्होंने किसी और से लैटर्स लिखवाए हों। भले ही उन्होंने खुद नही लिखा हो लेकिन ये शब्द, ये जज़्बात उनके ही हैं।"

सबिता इस बारे में सोचने लगी। बचपन में उसने देखा था की वोह किसी से कुछ लैटर्स लिखवाते थे, बोलते खुद थे लिखता कोई और था।
"ठीक है। तो मुझसे एक्सेक्टली क्या चाहती हो? क्या तुम यह चाहती हो की मैं........"

इससे पहले की सबिता आगे कुछ बोलती उसके ऑफिस का दरवाज़ा धाड़ से खुला और देव सिंघम गुस्से से गरजने को तैयार वाली एक्सप्रेशन चेहरे पर लिए अंदर आया।
"अनिका। तुम ठीक हो?" उसने पूछा।

अनिका ने सिर हिला दिया। "हां, मैं ठीक हूं, देव। मैं बस अपनी कजन से ऐसे ही बात करने आई थी।"

""तुम यहां खुद आई हो? या किसी ने तुम्हे यहां बुलाया है? देव ने अनिका से पूछा लेकिन उसकी गरजती नज़रे सबिता पर ही थी।

लेकिन सबिता को उसकी बात का बिलकुल भी बुरा नही लगा। क्योंकि वह जानती थी कि अभय और देव सिंघम को पता चल गया होगा कि कैसे नीलांबरी ने अनिका को भारत आने के लिए छल किया था। बल्कि सबिता ने भी उनका इसमें साथ दिया था।

"हां! में खुद ही यहां आई हूं। मैं बस सबिता से मदद चाहती थी," अनिका ने जवाब दिया।

"हेल्प?"

"मै बस यह चाहती थी सबिता उन लैटर्स का पता लगाए जो तुम्हारे पापा ने नीलांबरी को लिखे थे, देव। मुझे लगता है शायद उससे जरूर हमे कुछ पता चलेगा।"

देव उसे गहरी नजरों से देखने लगा।
"माना की वोह लैटर्स हमारे काम आ सकते हैं, तोह भी ये हमारी मदद क्यों करेगी?"

"मैं करूंगी," सबिता ने शांति से कहा। "पर मैं खुद अकेले यह सब नही कर सकती।"
सबिता अच्छे से देख सकती थी की अनिका की आंखों मैं की वोह उसकी बात समझ रही है। अनिका समझ गई थी की सबिता यह काम अकेले क्यों नही कर सकती क्योंकि अगर उसे लैटर्स मिल भी गए तब भी वोह समझ नही पाएगी की वोह क्या है। क्योंकि उस प्रॉब्लम से ग्रसित तो सबिता भी थी जिस वजह से उसे पढ़ना लिखना नहीं आता था।

"मैं करूंगी तुम्हारी मदद ढूंढने में," अनिका ने आराम से कहा।

सबिता ने हां में सिर हिला दिया। "ठीक है तो मैं तुम्हारे आने का इंतजाम करती हूं प्रजापति मेंशन में।"

"नो!" देव गुस्से से सबिता से बोला। "मुझे तुम पर बिलकुल भी भरोसा नहीं है की तुम वहां कुछ गलत नही करोगी।"
वोह अनिका की तरफ पलटा, "मैं जानता हूं की अभय को भी बिलकुल पसंद नहीं आएगा की तुम प्रजापति मैंशन में जाओ।"

"देव," अनिका ने प्यार से उसे रोकना चाहा। "मैं जानती हूं तुम्हे मेरी बहुत फिक्र है लेकिन तुम चिंता मत करो मैं मेरी आंटी को अच्छे से जानती हु, मैं उन्हे हैंडल कर लूंगी, मुझ पर भरोसा रखो।"

देव थोड़ा शांत होने लगा। "ऐसा नहीं है की मैं तुम पर भरोसा नहीं करता, या तुम किसी और हो हैंडल नही कर सकती, अनिका। मैं बस यह कह रहा हूं की तुम नही जानती यहां के लोग क्या क्या कर सकते हैं। अगर तुम जाना चाहती हो तो ठीक है फिर मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।"

उसकी बात सुन कर अनिका कुछ सोचने लगी और फिर आंखों में चमक लाते हुए बोली, "मुझे लगता है यही सही रहेगा, देव। तुम नीलांबरी को बिज़ी रखना और में और सबिता उनका कमरा चैक करेंगे।"

"नही, मैं तुम्हे इसके साथ अकेले नहीं भेज सकता।"

"देव!" अनिका ने देव की बात काटनी चाही।

"तुम बॉडीगार्ड के साथ रहना और मैं जाऊंगा इसके साथ रूम चैक करने।" देव ने गंभीरता से सबिता की तरफ देखा।

सबिता चुपचाप उन दोनो को सुन भी रही थी और देख भी रही थी की यह दोनो खुद ही बात कर रहे हैं और खुद ही प्लान बनाए जा रहे हैं। सबिता के चेहरे पर इस वक्त भावशून्य एक्सप्रेशन थे क्योंकि उसने महसूस किया था की देव सिंघम उसे देख रहा है वो भी कुछ गुस्से वाले भाव से, कुछ संदेहजनक भाव से,और कुछ ऐसा जो सबिता समझ नही पा रही थी। सबिता ने यह भी नोटिस किया की देव सिंघम ऐसे बात कर रहा था जैसे वो अनिका को अपने परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य मानता हो। उसे नही पता क्यों, लेकिन उसके व्यवहार से उसे थोड़ी हैरानी तोह हुई थी। सबिता को तो यही लगता था की देव सिंघम किसी चीज़ या किसी इंसान से अगर नफरत करता है तोह वोह है प्रजापति।

सबिता और देव की नज़रे एक दूसरे पर ही टिकी हुई थी। उन दोनो की यह घूरने की प्रतियोगिता को अनिका की आवाज़ ने तोड़ा।
"तो, क्या में कल आ सकती हूं प्रजापति मैंशन अपने प्लान को अंजाम देने?"

सबिता ने अपनी नजर देव पर से हटा ली और अनिका की तरफ देखने लगी जो उसे बहुत उत्साही दिख रही थी।

"मैं सारे इंतजाम कर दूंगी," सबिता ने धीरे से कहा।


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रात को जब सबिता सोने के लिए बैड पर लेटी तो उसके दिमाग में अनिका की बातें घूमने लगी। क्या सच में ऐसा है की उसके पिता ने अरुंधती सिंघम को नही मारा? सबिता और सवाल पूछना चाहती थी अनिका से लेकिन बीच में अचानक से देव आ गया अनिका का गार्डन एंजेल बन कर और सबिता की बात अधूरी रह गई। उसे इस बात का बिलकुल भी बुरा नही लगा की अनिका को सबिता से कोई नुकसान पहुंच सकता है। बल्कि जिस तरीके से देव, अनिका से, बात कर रहा था उसे देख रहा था सबिता को अपने अंदर एक बेचैनी सी महसूस हो रही थी। देव सिंघम अपने भाई की पत्नी के प्रति सुरक्षात्मक, देखभाल करने वाला और कोमल था। सबिता को अब समझ में आने लगा की क्यों उसे अपने अंदर इतनी बेचैनी हो रही है।

वोह तड़प थी जो वोह महसूस कर रही थी।
जब से उसके पिता की मृत्यु हुई थी, तब से किसी ने भी कभी भी उसके प्रति ऐसा स्नेह नही दिखाया था। कभी किसी ने उसकी परवाह नही की थी, कभी किसी ने उसका ख्याल नही रखा था। वोह हमेशा सोचती थी की उसके परिवार या उसके प्रेमी से भी अगर उसे स्नेह मिले तो कैसा लगेगा। अपने विचारों में डूबी हुई सबिता को अब नींद आने लगी थी, उसने लाइट्स ऑफ की और आंखें बंद करली।














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