Nafrat se bandha hua pyaar - 26 in Hindi Love Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 26

नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 26

"मैडम, लड़ाई हो गई है हमारे लोगों और सिंघम के लोगों के बीच। और दो लोग घायल भी हो गए हैं।"

सबिता ने अपनी भौंहे सिकोड़ ली सुन कर और ध्रुव के उसे बीच में डिस्टर्ब कर कर क्योंकि वोह अभी किसी से फोन पर बात कर रही थी।

"मुझे सूचित करते रहना। और अगर लेट भी हो जाए तोह भी मुझे फोन करके अपडेट्स देते रहना।" सबिता ने फोन पर उससे बात कर रहे शख्स से कहा।

उसने फोन रखा और ध्रुव की तरफ भौंहे सिकोड़ कर देखा। "तुमने या फिर तुम्हारे किसी आदमी ने रोका क्यों नही?" सबिता ने ध्रुव से पूछा।

"हम पिछले तीन हफ्ते से दोनो गुटों के बीच बढ़ती गर्मागर्मी को कम करने की कोशिश कर रहे थे, मैडम। पर मुझे लगता है अब आपको भी बीच में पड़ना पड़ेगा।" ध्रुव ने जवाब दिया।

"प्रॉब्लम क्या हुई? शुरू के दो महीने तो सब ठीक था। अब अचानक क्या हुआ? सबिता ने पूछा।

"हमे भी ठीक से कुछ मालूम नही है, मैडम।" ध्रुव ने जवाब दिया।

"ठीक है, चलो फिर।" सबिता ने कहा और अपनी गन उठा कर अपने पास रख ली और ध्रुव के साथ अपने ऑफिस से बाहर निकल गई।

भीड़ लग चुकी थी। और कुछ लोग एक दूसरे को मुक्के पर मुक्के बरसा रहे थे।

सबिता ने अपनी गन निकाली और हवा में चला दी जिसकी आवाज़ सुन कर सभी अपनी अपनी जगह पर रुक गए। सबिता भीड़ की तरफ बड़ी और उन दो आदमियों के पास आ कर खड़ी हो गई जो जख्मी हालत में भी एक दूसरे पर मुक्के बरसा रहे थे।

"यह क्या हो रहा है यहां?" सबिता ने पूछा। "आप लोग अपने अपने काम पर क्यों नही है?"

सब चुप रहे। किसी ने कुछ नही कहा।

"या तोह जवाब दो नही तोह फिर तुम्हे भुगतना पड़ेगा।" सबिता ने खतरनाक सी आवाज़ में कहा।

भीड़ के पीछे से निकल कर एक प्रजापति का आदमी सामने आया जिसे सबिता पहचानती भी थी। "मैडम, यह सिंघम के लोग है जो हमसे बुरी तरह बात करते हैं। वोह ऐसा दिखाते है जैसे हम पर कोई एहसान कर रहें हैं। हम........"

"तुम सब के बारे में क्या?" दूसरे आदमी ने उसे बीच में रोकते हुए कहा। "क्या तुम लोगों ने उस हत्याकांड के बारे में बात करना शुरू नही किया था जो बीस साल पहले हुआ था, जबकि हमे ऑर्डर दिया गया था की उस बारे में कोई बात नही करेगा।" वोह आदमी जो बोल रहा था वो सिंघम का आदमी था।

इससे पहले की सबिता उन सब को डांटती की बच्चों के जैसे लड़ रहे हो उससे पहले भीड़ को चीरते हुए एक आदमी सामने आया।

देव सिंघम भीड़ के बीचों बीच आ कर खड़ा हो गया जैसे कोई राजा हो और सब प्रजा उसके चारों तरफ चुप चाप खड़े हो।

"किसने गोली चलाई, जबकि मैने मना किया था की कोई भी साइट पर गोली नही चलाएगा और ना ही लेकर आएगा? देव ने चिल्लाते हुए पूछा।

सभी चुप थे।

"मैने चलाई।" सबिता ने शांत से ही जवाब दिया।

देव ने एक नज़र सबिता की तरफ देखा फिर भीड़ की तरफ अपनी नज़र फेर ली। "अपने काम पर वापिस जाओ। अगर काम में ज़रा सी भी देरी हुई तोह जिसकी वजह से भी हुआ होगा उसे आ कर मुझे जवाब देना होगा।" देव ने सबको समझाते हुए कहा।

उसके बाद फिर एक नजर सबिता की तरफ देखते हुए देव अपने ऑफिस की तरफ वापिस चला गया।

सबिता थोड़ी नाराज़ हो गई देव के इस तरह उससे बिना कुछ बोले चले जाने से। उसे देव की नज़रों में उसके लिए कुछ निराशा महसूस हुई थी।

दो हफ्ते बीत चुके थे उस रात के बाद। उसके बाद से, उन दोनो के बीच कोल्ड वॉर जैसी स्तिथि बनी हुई थी, जब भी वोह मिलते थे और काम की बात डिस्कस करते थे।

उससे एक बार थोड़ी सी ही बात की थी उससे, जब उसने उससे कंट्रेसेप्टिव यूज किया है या नही पूछा था, उसके अलावा उसने उस रात के बारे में कभी बात नही की थी और नाही देव ने कोई बात की थी उस बारे में। उसने तोह बोल दिया था की उसने पिल्स ली थी लेकिन आश्वस्त होने की बजाय उसने महसूस किया था की देव उसे संदेह की निगाहों से देख रहा है।

और ना ही उसे बुरा लगा था की देव उसपर विश्वास नहीं कर रहा है। क्योंकि ना ही उसने सबिता को किसी से मिलते देखा था नाही वोह किसी को डेट कर रही थी तोह उसका पिल्स ले लेना देव को थोड़ा असमंजस में डाल दिया था। पर सबिता की दुनिया में, जो इस वक्त उसकी पोजीशन है, उसके दुश्मन इसी फिराक में रहते थे की उस पर हमला कर उसे बर्बाद कर दे, वोह कोई चांस नहीं लेना चाहती थी। वोह अपने आप को हर तरीके से सुरक्षित रखती थी किसी भी अनचाही मुश्किल से बचने के लिए।

सबिता की आंखे अभी भी जाते हुए देव सिंघम पर थी। वोह तब तक देखती रही जब तक वोह उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गया।

उसने एक तेज़ सांस छोड़ी। वोह जानती थी उस रात के बाद अगली सुबह उसने बहुत बुरी तरह बरताव किया था देव के साथ। पर उस समय, वोह बहुत आश्चर्य भी थी और शर्मिंदा भी थी की सब बाते भुला कर उसने कैसे उसके साथ रात बिता ली, कैसे उसकी इच्छा उसकी नफरत और गुस्से पर हावी हो गई।

छः सालों से वोह इसलिए टिक पाई थी की उसने अपने ऊपर नियंत्रण रखा हुआ था। पर देव सिंघम की एक छुअन से उसने अपना नियंत्रण खो दिया और अपने आप को सौप दिया।

जैसे ही वोह ध्रुव के साथ अपने ऑफिस रूम में पहुंची उसने ध्रुव को आदेश देते हुए कहा, "मुझे तुरंत बताना अगर दुबारा आज की तरह कुछ हुआ तोह। यह हमारे लिए बहुत जरूरी है। मैं नही चाहती इस प्रोजेक्ट को शुरू करने में अब कोई परेशानी आए।"

ध्रुव ने अपना सिर हिला दिया। "जी मैडम, में जरूर बताऊंगा। आप कामों में बिज़ी थे इसलिए में खुद सब संभालने की कोशिश कर रहा था।"

सबिता ने उसे घूरते हुए पूछा, "लड़ाई शुरू होने की वजह क्या थी?"

उसके सवाल से ध्रुव थोड़ा सकपका गया जो कभी कभी ही होता था। "दोनो के बीच सट्टेबाजी लगी थी शायद, मैडम।"

"कैसी सट्टेबाजी? घुमाफिरा के मत बताओ। ठीक से साफ साफ बताओ।"

ध्रुव ने सिर हिला दिया।
"हमने सुना है की कुछ लोग बातें कर रहे थे की आपके और देव सिंघम के बीच कुछ ठीक नही चल रहा है। हमारे कुछ लोगों का मानना है की यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाएगा और बीच में ही बंद हो जायेगा।"

"हम्म्म्म!" सबिता ने आराम से ही कहा जबकि उसकी बात सुन कर वोह परेशान हो गई थी। ऐसा तोह नही था की उसके और देव सिंघम के बीच पहले सब ठीक था या हम दोनो दोस्त दे। तोह उन्हे ऐसा क्यों लगता है की हम दोनो के बीच अब कुछ ठीक नही चल रहा और पहले ठीक था?
"आज शाम उसी जगह पर सब को फिर से इकट्ठा करना जब सबकी शिफ्ट खतम होगी और सब एक साथ उपस्थित हो। मैं उनसे बात करना चाहती हूं।"

ध्रुव ने सिर हिला दिया और उसके ऑफिस से बाहर चला गया।

उसके जाते ही सबिता ने एक ठंडी आह भरी और कुर्सी से टेक लगा कर बैठ गई। अब जब उसके लोगों के भविष्य के लिए वोह कुछ कर रही थी तोह अब कुछ खराब नही होने दे सकती थी। उसने सोचा की उसको अपने गुस्से और नफरत को अलग रख कर देव सिंघम के साथ बात करनी चाहिए। जबकि उसका दिमाग इसकी इजाज़त नहीं दे रहा था तब भी वोह जानती थी की यही सही तरीका है। इस ख्याल को अपने दिमाग में रखते हुए वोह खड़ी हुई और अपने कमरे से बाहर निकल गई। देव के ऑफिस के बाहर आके उसने दरवाज़ा खटखटाया।

उसने सुना की अंदर से एक गहरी सी आवाज़ आई, "कम इन"। उसे बहुत हिचकिचाहट हो रही थी अंदर जाने में इसलिए दो पल वो वहीं खड़ी रही।

सबिता ने दरवाज़ा खोला और अंदर आ गई। देव अपनी सीट पर बैठा लैपटॉप पर कुछ टाइप कर रहा था। उसने नज़रे उठा के तब देखा जब सबिता उसके नजदीक आ कर सामने कुर्सी पर बैठने लगी। जब देव ने सबिता को देखा तो हैरानी से उसकी आंखे फैल गई और उसे देखने लगा।

देव बिलकुल बच्चों जैसा दिख रहा था, बिलकुल मासूम सा। उसका निचला होंठ हल्का बाहर निकला हुआ था और पाउट जैसा मुंह बना रखा था।

सबिता का मन तोह किया बस अभी उसकी किस करले।

फिर अपने मन से बेवकूफी भरे खयालों को निकाल कर, वोह देव को अपनी भौंहे सिकोड़ कर घूरने लगी। देव ने कुछ नही कहा, वोह अभी भी उसे वैसे ही देख रहा था।

सबिता जानती थी की दोनो के बीच यह चुप्पी देव नही तोड़ेगा और उसे ही पहल करनी होगी। तोह उसने ही पहल करते हुए कहा, "मैं यहां तुमसे समझौता करने आई हूं। हमे किसी एक प्वाइंट पर सहमत होना होगा नही तोह हमारे लोग हमें लड़ता देख खुद भी लड़ते रहेंगे।"

देव जी कुछ सोचते हुए उसे देख रहा था, अचानक उसकी बात सुन कर उसकी त्यौरी चढ़ गई। लेकिन सबिता को वोह और भी ज्यादा अट्रैक्टिव लगने लगा था।

"किस बारे में हम कॉम्प्रोमाइज करेंगे?" देव ने पूछा।

"हमे अपने पास्ट को भुला कर एक दूसरे के साथ सभ्य तरीके से पेश आना चाहिए। हमारे लोगों में बहुत ही ज्यादा असुरक्षा और अस्तिथरता है जिससे उनका काम प्रभावित हो रहा है।" सबिता के आगे बोलने से पहले ही देव उठ खड़ा हुआ।

अब उसका चेहरा बिल्कुल भी उदास या बच्चों जैसा नही लग रहा था। अब वोह भयंकर दिखने लगा था। अब वोह उसे किसी जंगली जानवर या दरिंदे के जैसे देखने लगा था।

देव चल कर सबिता के पास आया और उसकी चेयर के दोनो साइड अपने हाथ रख कर और झुक कर बोला, "ओह रियली?" वोह कुछ खिजा सा लग रहा था। "अचानक तुमने ऐसा सोचा, जैसे तुम यहां सबसे मैच्योर इंसान हो जो पास्ट भुला कर समझौता करना चाहती हो। तुम ही थी ना वोह जो बच्चों जैसी हरकत कर रही थी दो हफ्ते पहले। मुझे पर गोली चलाई और न जाने क्या नही किया।"

"मैं......." सबिता को समझ नही आ रहा था की क्या कहे। यह पहली बार था की उसकी बोलती बंद हो गई थी। देव सही ही तोह था। सबिता ने ही बखेड़ा खड़ा किया था और बुरी तरह बरताव किया था अगली सुबह। "मैं मानती हूं। मैने कुछ ज्यादा ही रिएक्ट कर दिया था।" सबिता ने कहा।

देव ने अपनी भौंहे उचकायी।

"ओके फाइन। मैने ओवररीक्ट किया था उस दिन।" सबिता ने अनिच्छा से स्वीकार किया।

"क्यों?"

"क्यों का क्या मतलब है? क्या ऐसे मुझे नही करना चाहिए था?"

"मेरे साथ तोह नही। जहां तक मुझे याद है हमने बहुत अच्छा वक्त बिताया था एक दूसरे के साथ। और उसके बाद मुझे बस यही याद है की तुमने मुझ पर गोली चलाई।"

उस रात की बात फिर से याद करके सबिता के शरीर में झुरझुरी सी पैदा हो गई। उसको इग्नोर करके वोह फिर बहस पर ध्यान देने लगी।
"तुम जानते हो यह इतना भी आसान नहीं है।"

देव उसे ध्यान से देख रहा था। "तोह तुम यह कहना चाहती हो की हमारे पास्ट की वजह से ही तुमने ऐसा बरताव किया?"

सबिता ने सिर हिला दिया।

"तोह अब क्या हुआ?"

"तुम कहना क्या चाहते हो?"

"तुमने कहा कि तुमने उस दिन इसलिए ऐसा बरताव किया था क्योंकि हमारे बीच हमारा पास्ट अभी भी है। लेकिन कुछ मिनट पहले तुम पास्ट भुला के अपने लोगों के लिए और काम को जल्द पूरा करने के लिए, समझौता करने की बात कर रही थी।"

"ओके।" सबिता को समझ नही आ रहा था की बातों का रुख अब किस ओर जा रहा है।

"क्या तुम फिर से वैसे ही बरताव करोगी अगर हम फिर से एक दूसरे के साथ रात गुज़ारे?"

"ऐसा दुबारा कभी नही होगा।"

"क्यों नही?"

"क्योंकि मैं....." सबिता को समझ नही आ रहा था की क्या कहे। "क्योंकि मैं नही चाहती। यह ऐसी चीज़ नही है जिसे दुबारा की जाए।" वोह खुद ही महसूस कर रही थी की वोह झूठ बोल रही है।

सबिता को थोड़ा अनकंफर्टेबल देख कर देव के चेहरे पर कुटिल मुस्कुराहट आ गई। "तुम लकी हो की मैने दो हफ्ते पहले ही अपने ऑफिस को साउंड प्रूफ कराया था नही तोह सभी को पता चल जाता की तुम मेरे साथ कितना एंजॉय कर रही हो।"

सबिता ने उसे घूरते हुए देखा और कहा, "तुमसे कितनी बार कहा है की उस रात की बात मेरे सामने मत करा करो।"

"इसमें कोई बुरी बात तोह नही है।"

"बिलकुल है।" सबिता के सामने खड़ा शख्स हमेशा ही उसे गुस्सा दिलाता था अपनी हरकतों से।



















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(पढ़ने के लिए धन्यवाद)

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