Nafrat se bandha hua pyaar - 29 in Hindi Love Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 29

नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 29

"मैडम, क्या आप दूसरा रूम यूज करना चाहेंगी, हमने स्पेशली आपके लिए ही तैयार कराया है।"

सबिता न उसकी तरफ देखा। वोह अधेड़ उम्र का था और बहुत ही नर्वस लग रहा था। वोह हॉस्पिटल का ही कोई स्टाफ मेंबर था।
सबिता और सबिता के आदमी, उस एक्सक्लूसिव प्राइवेट हॉस्पिटल के मीटिंग रूम के बाहर खड़े थे, जो हॉस्पिटल उसके दादाजी के दोस्त का था। सालों से उसके दादाजी को रूटीन चेकअप और कभी कभी सर्जरीज के लिए इस हॉस्पिटल में लाया जाता था।

"हम यहां इसी में ठीक है," सबिता ने कहा। "कुछ लोग और आने वाले हैं यहां। कितने बजे मेरे दादाजी को डिस्चार्ज मिलेगा?"

उस आदमी ने सबिता की हताश नज़रों में देखा। "शायद शाम पांच बजे तक हो जायेगा। पर प्लीज हमारी अवभागत को स्वीकार कीजिए। जो रूम हमने आपकी मीटिंग के लिए तैयार करवाया है वोह ज्यादा कंफर्टेबल और बड़ा है।"

सबिता न अपनी भौंहे सिकोड़ ली उस आदमी के बार बार आग्रह करने पर। फिर हल्का मुंह बना कर वोह उसी रूम की तरफ जाने के लिए उस आदमी के पीछे पीछे अपने आदमियों के साथ प्राइवेट विंग की तरफ चलने लगी। जैसे ही वोह सब उस रूम तक पहुंचे और दरवाज़ा खोल कर अंदर जाने को हुए, सबिता और उसके आदमियों ने रूम की तरफ अपनी अपनी गन निकाल कर तान दी।
अंदर उस बड़े से पर्सनल रूम में अपने काफी सारे आदमियों के साथ बैठा था 'रेवन्थ सेनानी'।

उसका अनचाहा प्रेमी।

"सबिता, वेलकम," रेवन्थ ने बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ कहा।

तुरंत ही सबिता को चिड़चिड़ाहट सी महसूस होने लगी।
"तुम्हारा बहुत ज्यादा हो रहा है अब," सबिता ने उसे वार्न करते हुए कहा। सबिता उसे पहले भी कई बार वार्न कर चुकी थी की वोह अपना इस तरह से मज़ाक ना बनवाए। पर वोह तब भी उसके पीछे पड़ा हुआ था। फूल तोह आने बंद हो गए थे, लेकिन उसकी जगह दूसरे गिफ्ट्स आने शुरू हो गए थे, जैसे की ज्वैलरी और साड़ी। लेकिन सबिता वोह सभी गिफ्ट्स चेतावनी के साथ वापिस भिजवा देती थी।
उसकी बुआ नीलांबरी तो खुशी से उछल गई थी की एक अमीर और ताकतवर इंसान उसकी भतीजी के पीछे पड़ा है शादी करने के लिए। सबिता इस बारे में अपनी बुआ से ज्यादा बात नहीं करती थी, पर उसकी बुआ के लिए वोह दिन नर्क जैसा होगा अगर उन्होंने रेवन्थ को सबिता के सामने उसके दूल्हे के रूप में खड़ा कर दिया तोह।

बाहर से तोह रेवन्थ सेनानी बेहद हैंडसम लड़का था जो उसे भी विरासत से ही इतनी खूबसूरती मिली थी। पर उसकी रेपुटेशन, क्रूर और उसके यहां की औरतों को प्रताड़ित करने की, जग जाहिर थी।

सबिता अंदर से घृणा से कांप उठी, जब रेवन्थ उसे अपनी ठंडी और थकी हुई आंखों से देख रहा था।

"आई एम सॉरी, अगर मेरे यहां होने से तुम्हे किसी भी तरह की परेशानी हुई हो, सबिता," रेवन्थ ने बहुत ही सभ्यता से कहा। "हमने हाल ही में यह हॉस्पिटल खरीदा है। और जब मुझे पता चला की वीरेंद्र प्रजापति का यहां सर्जरी के लिए भर्ती किया गया है, तोह मैं आ गया उन्हे रिस्पेक्ट देने के लिए।"

सबिता को उसका बहाना, की वोह यहां उसके दादाजी से मिलने हॉस्पिटल आया है, कुछ हजम नही हुआ। लेकिन वोह यह जानती थी की वोह हॉस्पिटल अब रेवन्थ सेनानी ने खरीद लिया है। सिंघम और प्रजापति भी अपने इन्वेस्टमेंट अपने इलाके में ही करते थे लेकिन सेनानी अपनी ज्यादा से ज्यादा इन्वेस्टमेंट अपने इलाके से बाहर ही किया करते थे।

सिर्फ सेनानी का परिवार ही बड़े से मेंशन में रहता था, बाकी के उसके लोग आज भी गरीबी में ही जी रहे थे।
यह सच था की सेनानी ने अभय सिंघम को कैनल और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट प्रोजेक्ट को ज्वाइन करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। और यह बात सबिता को और भी ज्यादा इरिटेट करती थी।

"मेरे पास इन सब के लिए समय नहीं है," सबिता ने ठंडे भाव से कहा। "मैं चाहती हूं की तुम मुझे शादी के प्रस्ताव के लिए परेशान करना बंद करदो। मैं तुम्हे अपना जवाब पहले ही बता चुकी हूं।"

"मैं जानता हूं," रेवन्थ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा। "पर मैं जानता हूं की एक दिन मैं तुम्हारे दिल में, कहीं किसी कौने में, अपने लिए थोड़ी सी जगह बना ही लूंगा।"

सबिता को उसकी मुस्कुराहट बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसे उसकी हसी बनावटी लग रही थी। उसने सुना था की रेवन्थ बहुत कम ही अपने इमोशंस दिखाता था....जब तक की वो उस समय के दौरान ना हो जब वोह जानबूझ कर औरतों पर अत्याचार और यातनाएं करता था।

"मैं तुमसे हमारे लोगों की तरफ से माफी मांगना चाहता हूं," रेवन्थ ने कहना जारी रखा। "मैने सुना है की मेरे कुछ लोगों की वजह से तुम्हारे समान के ट्रांसपोर्टेशन में रुकावट आई थी और तुम्हे परेशानी हुई थी।"

सबिता ने उसकी बात का जवाब देने में ज्यादा ध्यान नहीं दिया। वोह जानती थी जरूर इन सब में खुद रेवन्थ सेनानी शामिल हो सकता है, जिसने खुद ही अपने लोगों को प्रजापति को परेशान करने के लिए उकसाया होगा। पर बिना पुख्ता सबूत के वोह उस पर आरोप नही लगा सकती थी।

"प्लीज बैठ जाओ, सबिता। मैं चाहता हूं की आज की हमारी इस मुलाकात को हम बिना वक्त गवाए यह डिस्कस करने में लगाए की मैं तुम्हारी किस तरह से शिपिंग कंपनी में या किसी और काम में मदद कर सकता हूं।" रेवन्थ ने सबिता से कहा और फिर दूसरी तरफ हाथ हिलाते हुए किसीको बुलाया।
"तुम क्या लोगी, चाय या कॉफी और कौनसे स्नैक्स लेना पसंद करोगी बात करने के दौरान?" रेवन्थ ने पूछा।

"हम यहां कोई बात नही कर रहे हैं," सबिता ने कहा। "मुझे अकेले में अपने आदमियों से कुछ ज़रूरी बात करनी है। मुझे बहुत खुशी होगी अगर तुम हमे अकेला छोड़ दो।"

रेवन्थ सेनानी उसे अपनी हारी हुई आंखों से देख रहा था। "सबिता तुम मुझे अपना दुश्मन समझना बंद करदो," रेवन्थ ने धीरे से कहा। "मैं जानता हूं तुम अभी तैयार नहीं हो, पर मुझे कोई दिक्कत नही है। तुम अपना मन बनाने के लिए जितना वक्त चाहो ले सकती हो। आखिर मैं तुम्हे मेरा ही होना है। मैं तुमसे वादा करता हूं की तुम्हारी सारी जिमेदारियां पूरी करूंगा और चिंताएं दूर कर दूंगा। और तुम्हारे लोगों को भी अपने लोगों के साथ ही देखरेख करूंगा।"

सबिता ने अपने गुस्से पर काबू करने के लिए अपनी मुट्ठी भींच ली। वोह उस आदमी के सामने अपना रिएक्शन नहीं दिखाना चाहती थी। जबकि सबिता और सिंघम दोनो ही अपने लोगों का नेतृत्व करने में विश्वास रखते थे, और रेवन्थ सेनानी लोगों पर राज करने में। जबकि असल बात तोह यह थी की रेवन्थ को ऐसा लग रहा था की वोह सबिता पर एहसान कर रहा है, उसकी जिमेदारी लेकर.....जिसका मतलब यह हुआ की वोह उसके संचालन और ताकत पर कब्जा कर रहा है.....यह बात और ज्यादा गुस्सा दिला रही थी सबिता को।

सबिता ने रेवन्थ की आंखों में ठंडे भाव से देख रही थी। "तुमने आज यह साबित कर ही दिया अभी सब बकवास बातें बोलकर,,,,,,,,,की तुम भ्रम में जीते हो। या तोह तुम यहां से चले जाओ या फिर मैं और मेरे आदमी दूसरा कमरा खोज ले अपनी मीटिंग के लिए।"

रेवन्थ सेनानी धीरे से हस ने लगा। हालांकि इसकी गर्दन की नसे तन चुकी थी, और सबिता जान गई थी की वोह गुस्से में है।
"मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तुम बहुत जिद्दी और हठी हो।" रेवन्थ ने कहा। "मेरे पेरेंट्स ने पहले ही मुझे समझाया था इसके बारे में,,,,,कहा था की तुम्हे न चुनूं। पर मुझे बहुत खुशी है की मैने उनकी बात नही सुनी।"

रेवन्थ ने गहरी नजरों से सबिता को देखा। "तुम वैसी ही हो जैसी मुझे चाहिए थी। मैं किसी की नही सुनूंगा,,,जो भी हमारे रिश्ते के खिलाफ होंगे। जबकि तुम्हारी कजन की वजह से मेरे छोटे भाई की जान गई पर फिर भी इससे मेरी फीलिंग्स पर कोई असर नहीं पड़ा। जबकि मुझेसे ना इंतज़ार होता है ना ही पसंद है, फिर भी मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा।

सबिता ने उसके शोखी से उठते लबों को नजरंदाज कर दिया। सबिता बस अपने आदमियों को कहने ही वाली थी की दूसरा रूम ढूंढो,,तभी रेवन्थ ने अपने आदमियों को आदेश दिया जाने के लिए। वोह भी उनके पीछे जाने लगा।

राहत की सांस लेते हुए सबिता आगे बढ़ी और अपनी शेड्यूल मीटिंग और डिसकशन शुरू कर दिया।



*************

जितनी देर में सबिता ने अपनी मीटिंग खतम की थी उतनी देर में उसके दादाजी के डिस्चार्ज की प्रक्रिया पूरी हो गई थी। वोह दोनो अब प्रजापति मेंशन वापिस आ गए थे। उन्हे आते आते काफी देर हो गई थी। सबिता हमेशा की तरह संजय से बात कर रही थी डाइनिंग टेबल पर डिनर करते वक्त। वोह उसे संक्षिप्त में प्रजापति एस्टेट के बारे में बता रहा था जहां सबिता को ध्यान देने की ज़रूरत है।

जैसे ही उसने खाना खतम किया, संजय चला गया। सबिता उठ खड़ी हुई और अपने कमरे में चली गई। अपने कमरे में जा कर सबिता फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चली गई। कुछ देर बाद, वोह सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए घर से बाहर निकल गई। जब वोह अपनी एसयूवी (suv) में बैठने ही वाली थी तभी उसे दूसरी तरफ ध्रुव दिखाई पड़ा। वोह सबिता के साथ चलना चाहता था।
"मैं किसी पर्सनल काम से जा रही हूं, ध्रुव। और वहां मैं अकेले ही जाना चाहती हूं।" सबिता ने ध्रुव से कहा।

उसकी बात सुनकर ध्रुव अचंभित लग रहा था। सबिता ने ध्रुव की आंखों में देखा जो धीरे धीरे बड़ी हो रही थी जैसे जैसे वोह समझता जा रहा था। ध्रुव का जबड़ा जकड़ गया लेकिन उसने सिर हिला दिया और गाड़ी से उतर गया।

सबिता ने अपनी सफाई में कुछ कहना जरूरी नहीं समझा। हालांकि वोह हमेशा ही अपने लोगों का ख्याल रखती थी, लेकिन उसे इसकी परवाह बिलकुल नहीं थी वोह लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। क्योंकि अभी तक किसी ने भी उसके खिलाफ ना कुछ कहा ना कुछ किया और ना उसके साथ कभी कोई बात्सुलुकी की।

जब तक सबिता कॉटेज पहुंची तब तक आधी रात हो चुकी थी। उसने देखा कॉटेज के बाहर के चमचमाती हुई स्पोर्ट्स कार खड़ी है। और कॉटेज के अंदर से हल्की हल्की रोशनी आ रही है।

सबिता अपनी एसयूवी से उतरी और कॉटेज के गेट पर पहुंच कर दरवाज़ा खोल दिया। जैसे ही उसने अंदर पहला कदम रखा, किसी मजबूत हाथों ने उसे उसकी कमर से पकड़ कर अपनी बाहों में खींच लिया और दीवार से टिका दिया।

देव सिंघम भूखे शेर की तरह उस पर टूट पड़ा। उसके होंठों को अपने होठों से जब्त कर चूमने लगा। सबिता भी उसी तरह उसका साथ देने लगी।

























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(पढ़ने के लिए धन्यवाद)

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