TEDHI PAGDANDIYAN - 43 in Hindi Novel Episodes by Sneh Goswami books and stories PDF | टेढी पगडंडियाँ - 43

टेढी पगडंडियाँ - 43

टेढी पगडंडियाँ 

 

43 

 

साफ सफाई से निपट कर किरण ने घङी देखी , छोटी सुई एक को छूने चली थी । दोपहर अपने शिखर पर थी । बाहर आग बरस रही थी । गुरजप आने वाला होगा । गाँव के ही एक प्राइवेट स्कूल में उसे नर्सरी में दाखिल करवाया है । थोङा बङा हो जाय तो शहर भेजने के बारे में सोचा जाए । अभी के लिए ये प्राइवेट स्कूल ही ठीक है । सरकारी स्कूल में सौ बच्चे हैं पर मास्टर एक ही है । वह भी पास के गाँव गिल पत्ती का होने की वजह से टिका हुआ है । अक्सर उसे सरकारी काम से शहर जाना पङता है तो बच्चे पूरा दिन धमाचौकङी मचाते रहते हैं । और ऐसा महीने में कम से कम दस दिन तो होता ही है । बाकी के पंद्रह दिन वह सभी कक्षाओं के बच्चों को नीम के पेङ के नीचे लेकर बैठ जाता है । अब वह क्या पढाता है और बच्चे कितना पढते हैं , ये तो वाहेगुरु जाने ।

गाँव में किसी बानिये ने प्राइवेट स्कूल खोला है दो साल पहले । नाम रखा है लार्ड कृष्णा कान्वेंट स्कूल । यहाँ पढाई के नाम पर मनमानी फीस ली जाती है । ढेर सारी किताबें और ढेर सारी कापियाँ स्कूल से ही बेची जाती हैं । यहाँ तककि यूनीफार्म भी स्कूल वाले ही देते हैं । हर रोज कोई न कोई फंक्शन होता रहता है जिसमें भाग लेने के नाम पर खूब सारा पैसा देना होता है । पर लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है तो दुकान अच्छी चल रही है । यहाँ दो सौ बच्चे पढने जाते हैं ।

चूल्हे पर चढी चाय उबल कर चूल्हे में जा गिरी थी और आग फक करके बुझ गयी थी । परात में धरा आटा किरण की मुक्कियों से मुलायम होकर अब ढीला होने लगा था पर किरण उसे लगातार गूंधे ही जा रही थी । इतने में बाहर से मम्मी मम्मी पुकारता हुआ गुरजप भीतर आया तो कुछ गरमी से और कुछ गुस्से से तमतमाया हुआ था । चेहरा सुर्ख पलाश जैसा हो गया था । आते ही उसने स्कूल बैग दूर मंजी पर फेका और वहीं मुँह फुलाकर बैठ गया ।

क्या हुआ मेरे शेर पुतर को ?

गुरजप वैसे ही बना रहा ।

बता तो सही क्या हुआ , किसी ने कुछ कहा क्या ?

मैंने नी किसी से बात बुत करनी ।

मत करना । पहले हुआ क्या ?  बता न मेरे राजा बेटा ।

वो महीन्दु पिंदु , जग्गा पग्गा , गोलू डोलू  बहुत गंदे हैं । मैंने उनके साथ खेलने नहीं जाना । उनसे बात ही नहीं करनी ।

मुझसे तो करेगा न । आ देख मैंने तेरे लिए खीर बनायी है ।

खीर !  गुरजप खीर का नाम सुनकर उछल पङा ।

चल हाथ मुँह धोले । अपनी वर्दी उतार दे । मैं तेरे लिए खीर डाल रही हूँ ।

मम्मी मेरे से ये उतरती नहीं है । गुरजप कमीज के बटनों से उलझ रहा था । बटन उसे खोलने नहीं आ रहे थे । किरण उठी और उसके कपङे बदलवाने लगी । फिर हाथ मुँह धुलवाकर चौंके में ले आई । गुरजप रोटी खाने लगा । आधा पेट भर गया तो उसे फिर से अपने दोस्तों की बात याद आ गयी ।

मम्मी मेरे पापा नहीं हैं क्या ?

किरण का रंग उङ गया । ये क्या पूछ रहा है गुरजप ।

है न , भापा है तो सही । तेरा इतना ख्याल रखता है । तुझे कितना प्यार करता है । तेरे लिए कितनी सारी चीजें , कितने सारे खिलौने लेकर आता है ।

वो तो भापा है । पापा थोङे न है ।

क्यों , भापा तेरा पापा क्यों नहीं है ।

मेरे दोस्त कहते हैं कि भापा तो हवेली का जमींदार है । अपनी हवेली में रहता है । तुम्हारे साथ कहाँ रहता है । सारे बच्चों के पापा उनके साथ उनके घर में रहते हैं ।

बेटा , भापे के बीजी और बाऊजी हैं न हवेली में । अगर भापा यहाँ रह गया तो वे अकेले हो जाएंगे । फिर उनकी देखभाल कौन करेगा । बङों की सेवा करनी चाहिए न ।

तो हम उनके साथ हवेली में क्यों नहीं रहते ।

हम हवेली में रहेंगे तो यहाँ कोठी में कौन रहेगा । और तू जाता तो रहता है हवेली कभी भापे के साथ , कभी बसंत के साथ । बीजी और बापूजी के साथ खेलने जब तेरा दिल करता है ।  

गुरजप सोच में पङ गया । वह थोङी देर चुप बैठा रहा फिर बोला – ठीक है , कल हम भी हवेली चलेंगे । वहीं रहेंगे ।

ठीक है , कल चले जाना , अभी तो रोटी खत्म कर ।

और वह रोटी के छोटे छोटे टुकङे करके उसके मुँह मे डालने लगी । गुरजप रोटी खाने लगा । किरण उसके चेहरे को एकटक देखती रही । इस सवाल से वह लगातार पिछले पाँच सालों से जूझती रही है ।  गुरनैब की जिंदगी में उसकी क्या जगह है , यह सवाल उसे रह रह कर परेशान करता रहा है । हवेली वालों के सामने उसकी क्या हैसीयत है । जानती थी कि यह सवाल एक दिन उसके मन के अंधेरों से निकल कर जरुर उसके सामने आ खङा होगा पर इतनी जल्दी आ जाएगा , उसने सोचा न था ।उसका नन्हा सा गुरजप इन सवालों का सामना अपनी सारी जिंदगी करेगा पर वह करे तो क्या करे  । हालात ने उसे यहाँ ला पटका है तो वह बचकर जाए तो कहाँ जाए । दुनिया के चारों कोने उस जैसी लङकियों के लिए  ऐसे ही हैं । ब्याहता पत्नि न सही , यहाँ गुरनैब के साथ कम से कम वह सुरक्षित तो है । अपनी कोठी की चारदिवारी में घिरी । बाहर सैंकङों भेङिये उस जैसी लङकियों को साबुत निगलने को मुँह खोले जीभ लपलपा रहे हैं । पंजे तीखे कर गङा देने को आतुर । हवेली में उसे न खाने की चिंता है , न ओढने पहनने की ।   

गुरजप को रोटी खिलाकर वह पलंग पर ले आई । गुरजप थका हुआ था लेटते ही नींद के आगोश में चला गया । किरण की भूख मर गयी । उसने रोटियाँ लपेट कर ऱखी । सब्जी ढकी । रसोई संभाल कर वह सारी कोठी का चक्कर लगा आई । बेचैनी में ही वाङे में जाकर पशुओं को चारा देने लगी तो बसंत दौङ कर आया – क्या हुआ बीबी जी । मैं ने पशुओं को खल और दाना डाला हुआ है ।

अच्छा , वह कोठी में लौट आई ।

 

बाकी कहानी अगली कङी में ...     

 

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