Tantrik Masannath - 23 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 23

तांत्रिक मसाननाथ - 23

तांत्रिक और पिशाच - 3


रात को देरी से सोने के कारण राजनाथ जी को सुबह उठने में काफी देर हो गई। उनकी नींद खुली जब हरिहर बाहर से दरवाजा खटखटा रहा था।
" मालिक, देखिए किसे लेकर आया हूं। "
राजनाथ जी ने हरिहर के आवाज को सुन जल्दी से उठ कर बैठ गए। राजनाथ जी के दरवाजा खोलते ही हरिहर ने मुस्कुराते हुए कहा ,
" देखिए मालिक किसे साथ लेकर आया हूं ? "
राजनाथ जी ने आंख मलते हुए देखा कि उनके सामने एक सुदृढ़ आदमी खड़ा है। देखकर उस आदमी को बूढा नहीं कहा जा सकता। उस आदमी के सिर पर बड़े बाल व चेहरे के बड़े - बड़े काले - सफ़ेद दाढ़ी को देखकर उनके उम्र को बता पाना संभव नहीं है। हल्का सा मुस्कुराते हुए वह आदमी बोला ,
" नमस्कार प्रधान जी , मैं मसाननाथ। "
राजनाथ जी तांत्रिक मसाननाथ को देखकर बहुत खुश हुए और हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
" आइए बाबाजी अंदर आइए। "
कमरे के अंदर राजनाथ जी के पीछे पीछे मसाननाथ और हरिहर ने प्रवेश किया। राजनाथ जी ने मसाननाथ को एक कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बैठने के लिए कहा। मसाननाथ उस सोफेदार कुर्सी पर जाकर बैठ गए और फिर पूछा ,
" प्रधान जी अब काम की बात पर आते हैं। असली बात क्या है वो जानना जरूरी है। "
" हाँ , लेकिन मुझसे अच्छा गोपाल आपको सबकुछ अच्छी तरह बता पाएगा क्योंकि उसके सामने ही सब कुछ घटित हुई है। आप बैठिए वह कुछ ही देर में आ जाएगा। मैं चाय के लिए कहता हूं।"
इतना बोलकर राजनाथ जी ने चाय के लिए आदेश दिया। हरिहर भी अपने मालिक के आदेश को सुनकर चाय लाने चला गया।
हरिहर के जाते ही राजनाथ जी ने मसाननाथ से पूछा ,
" आपको यहां आने में कोई दिक्कत तो नहीं
हुई। "
मसाननाथ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ,
" अरे नहीं किस बात की दिक्कत। इसी तरह घूमते रहना ही मेरा पेशा है आज इस गांव तो कल उस गांव। "
" कल रात ज्यादा हो गया था इसलिए मैं खुद से जाकर आपको बोल नहीं पाया। "
इसी बीच हरिहर दो कप चाय लेकर कमरे के अंदर आया। कुर्सी के सामने वाले टेबल पर उसने चाय रख दिया। चाय के कप को हाथ में लेकर पीते वक्त ही दरवाजे के बाहर एक आवाज सुनाइ दिया।
" साहब, अंदर आऊं ? "
यह आवाज गोपाल का है। वह दरवाजे के बाहर खड़ा था। उसे देखकर राजनाथ जी ने अंदर आने की अनुमति दी। गोपाल धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया उसके अंदर आते ही मसाननाथ में प्रश्न पूछना शुरू कर दिया।

" अब तुम बताओ कि तुम्हारे साथ क्या हुआ है? "
पूरी चाय समाप्त होने तक मसाननाथ ने गोपाल से सब कुछ विस्तृत जान लिया। बातों को बताते वक्त मसाननाथ ने गोपाल के शरीर में अद्भुत कंपकंपी को देखा। पूरी घटना को जानने के बाद मसाननाथ कुछ देर शांत रहे और फिर बोले ,
" एक बार मुझे उस कुएं के पास जाना होगा। वहां जाकर जब तक कुएं को ठीक से देख ना लूँ कुछ भी समझ नहीं पाऊंगा। हरिहर क्या तुम मुझे उस कुएं के पास ले जा सकते हो ? "
यह सुनकर हरिहर आग्रहपूर्वक बोला ,
" हाँ, हाँ बाबाजी मैं आपको वहां पर ले चलूंगा। आप मेरे साथ चलिए। "
तब तक मसाननाथ ने चाय पी लिया था। चाय के कप को सामने टेबल पर रखकर मसाननाथ खड़े हो गए। फिर हरिहर के साथ बाहर निकल कुएं की ओर चल पड़े।
राजनाथ जी के घर से उस कुएं तक चलकर जाने में लगभग 15 - 20 मिनट लगता है। उस वक्त घड़ी में लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बाहर काफी धूप निकल आया था इसीलिए हरिहर ने अपने साथ एक छाता ले लिया। बाहर निकलते ही मसाननाथ के सिर के ऊपर छाते को खोलकर हरिहर चलने लगे। मसाननाथ ने अपने प्रति इतना आदर सत्कार देख प्रसन्न होकर बोले ,
" वाह हरिहर, तुम तो मेरा काफी आदर सत्कार कर रहे हो। प्रधान जी का आदेश है क्या ? "
इसके उत्तर में हरिहर ने बोला ,
" बाबा जी आप हमारे गांव के अतिथि हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि आप हमारे गांव के मुखिया के अतिथि हैं। इसके अलावा आपको कई लोग जानते हैं। इतना आदर सत्कार तो बनता
है। "
" अरे ऐसी कोई बात नहीं । ऐसा कुछ करने की जरूरत नही है। मैंने इससे भी तेज धूप में एक गांव से दुसरे गांव घूमता रहा हूं। धूप सहने की आदत है मुझे। "

बात करते हुए मसाननाथ और हरिहर उस कुएं के पास पहुंच गए। कुएं के पास आते ही मसाननाथ ने कुएं के चारों तरफ देखा। कुएं के चारों तरफ काफी सुनसान है। कुएं के आस - पास दूर तक कोई भी घर नहीं है , केवल कुएं के पास दो बड़े नीम के पेड़ हैं। उन दोनों पेड़ों ने कुएं को ऐसे घेर रखा है मानो जिससे सूर्य की प्रकाश उसके अंदर ना जा पाए ।
हरिहर ने ऊँगली द्वारा कुएं की ओर इशारा करते हुए कहा,
" बाबा जी यही वो कुआं है। इसी कुएं को सभी अभिशापित कहते हैं। "
मसाननाथ ने हरिहर से पूछा ,
" सभी कहते हैं मतलब , क्या तुम इन सभी बातों को नहीं मानते ? "
हरिहर ने कोई भी उत्तर नहीं दिया।
अब मसाननाथ ने सामने जाकर उस सीमेंट की परत पर अपना हाथ रखा और तुरंत ही उन्हें अपने शरीर में एक बिजली का झटका महसूस हुआ। मसाननाथ आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने कुछ देर और उस कुएं को ठीक से देखा। अचानक ही उन्होंने देखा कि कुएं के पास ही चार ताले गिरे हुए हैं। सभी ताले टूटे हुए थे। मसाननाथ ने अब एक ताले को उठाया। ताले को हाथ में उठाते ही उन्होंने देखा कि ताले पर एक लाल धागा लपेटा गया है तथा ताले के दूसरी तरफ सिंदूर व हल्दी लगा हुआ था। या देखकर मसाननाथ को आश्चर्य हुआ और उन्होंने हरिहर से पूछा ,
" इस ताले में आखिर यह सब क्यों लगा है ? "
अब हरिहर बोला ,
" बाबा जी अब आपको पूरी घटना शुरु से बताता हूं। लगभग 30 साल पहले यहां पर एक जमींदार मुखिया रहते थे। उनका नाम शेरसिंह था। वो बहुत ही अत्याचारी थे। सामान्य सी गलती के लिए भी यहाँ के लोगों को दंड सहना पड़ता। उस जमींदार के शरीर में दया नाम की कोई चीज ही नहीं थी इसीलिए वह किसी पिशाच जैसा हो गया था। वो यहाँ के लोगों से कर वसूलते थे और अगर सही समय पर कोई नहीं देता तो उन्हें मार दिया जाता था। अपने हिंसा की वजह से उन्होंने कई लोगों की हत्या करके इस कुएं में फेंक दिया था। उसके बाद उन्होंने इस कुएं को बंद कर दिया था। शायद इसीलिए ताला लगा हुआ था। कई दिनों तक इस कुएं का प्रयोग ना करने के कारण पानी भी सूख गया। अब मेरे मालिक ने गांव में पानी की समस्या दूर करने के लिए इस कुएं को खोलने का आदेश दिया था। लोग यह भी बताते हैं कि जिस दिन जमींदार ने इस कुएं को बंद किया था उसी दिन उन्होंने आत्महत्या भी कर ली थी। उनके वंश का एक लड़का अब भी जिंदा है। "

अब तक मसाननाथ सब कुछ सुन रहे थे। अचानक ही बोले ,
" नहीं, सब कुछ तो समझा है। लेकिन कोई कुछ लोगों की हत्या के कारण ताले पर सिंदूर - हल्दी व मंत्र धागा लगाकर कुएं को बंद नहीं कर देगा। इसके पीछे जरूर कोई बड़ा रहस्य छुपा है। इसके बारे में मुझे जमीदार के घर जाने पर ही पता चलेगा। अब उनका लड़का कहां पर रहता है? "
हरिहर बोला ,
" बाबा जी उन लोगों के साथ हमारा ज्यादा संबंध नहीं है। लेकिन इतना बता सकता हूं कि वो सभी इस गांव में नहीं रहते। यहां से दो-तीन गांव के बाद शायद उनका घर है। लेकिन बाबा जी जबतक मालिक अनुमति नहीं देते , मैं वहां आपको नहीं ले जा सकता। "

" ठीक है , ठीक है। राजनाथ जी से ही अनुमति लेकर हम वहां जाएंगे तब तो तुम्हें कोई असुविधा नहीं है। अब यहां से चलते हैं , यहां पर रुकने से कोई लाभ नहीं। "
इतना बोलकर मसाननाथ और हरिहर गांव के प्रधान जी के घर की ओर जाने वाले ही थे कि उसी वक्त वही पागल जैसा बूढा आदमी फिर आ गया।
वह दूर से ही चिल्लाकर बोलता रहा।
" कहा था ना तुम लोगों से लेकिन तुमने मेरी बात को नहीं माना। वह आदमी मर गया न अब तुम सब भी मरोगे। गांव के सभी मरेंगे कोई नहीं बचेगा। अब तुम दोनों की बारी है। सभी मरेंगे। "
यही बोलकर वह बूढ़ा आदमी हंसते हुए चला गया । बूढ़े आदमी के जाते ही मसाननाथ ने आश्चर्य होकर हरिहर से पूछा ,
" हरिहर , यह बूढ़ा आदमी कौन है ? वो यह सब क्यों बोल रहा था ? "
हरिहर ने उत्तर दिया ,
" मैं इस बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं जानता । लेकिन लोग बताते हैं कि यह आदमी पेशे से मछुआरा था। प्रतिदिन वह सुबह-सुबह इधर से ही मछली पकड़ने जाता था। एक दिन इस कुएं के पास से जाते वक्त उसे कुएं के अंदर से कुछ अद्भुत आवाजें सुनाई दिया। ऐसी अद्भुत आवाजों को इस गांव के कई लोगों ने सुना है। उसने कुएं के पास कान ले जाकर आवाजों को और सही से सुनने की कोशिश किया। इसके बाद से ही वह आदमी पागल जैसा हो गया , वह अपने परिवार वालों को भी नहीं पहचान पाता है। अब केवल इधर - उधर घूमता रहता है। यह घटना लगभग 2 साल पहले की है। "
हरिहर की इन बातों को सुनते हुए मसाननाथ प्रधान जी के घर पहुंच गए।....

क्रमशः....


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