Tantrik Masannath - 24 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 24

तांत्रिक मसाननाथ - 24

तांत्रिक व पिशाच - 4


शाम को सभी चाय पीने बैठे हैं। आंगन के एक तरफ एक लालटेन जल रहा है। वहीं पर राजनाथ जी , तांत्रिक मसान नाथ और हरिहर बैठे हुए थे।
बात के बीच में मसाननाथ ने राजनाथ जी से जमींदार के घर जाने की अनुमति मांगी।
मसाननाथ बोले ,
" राजनाथ जी आपसे एक अनुमति चाहिए। "
राजनाथ जी ने चाय पीते हुए पूछा ,
" किस बात की अनुमति ? "
" हमें एक बार जमींदार शेरसिंह के घर जाना होगा
। इस गांव को बचाने के लिए वहां जाना जरूरी है। "
यह सुनकर राजनाथ जी कुछ देर चुप रहे और फिर बोले ,
" गांव को बचाने के लिए मतलब , मैं कुछ समझ नहीं पाया। इसके अलावा जमींदार परिवार अब इस गांव में नहीं रहता। यहां से लगभग दो-तीन गांव बाद वो सभी रहते हैं। "
" जो भी हो लेकिन मुझे एक बार उनके परिवार के साथ बात करना होगा। अगर आप अनुमति दें तो हम जल्द ही रवाना हो जाएंगे। "
इसके उत्तर में राजनाथ जी बोले,
" मैं आपके जाने का बंदोबस्त कर देता हूं। आप हरिहर के साथ जाइए वह आपको वहां तक सही से पहुंचा देगा। लेकिन बाबाजी दुख की बात यह है कि मैं वहां पर नहीं जा सकता क्योंकि कल मुझे कुछ काम है। आपको जल्द ही वहां पर जाना है वरना मैं परसो आपके साथ ही चलता। "
मसाननाथ बोले ,
" कोई बात नहीं, मैं हरिहर के साथ चला जाऊंगा। मुझे कोई असुविधा नहीं। "
राजनाथ जी ने चाय के कप को टेबल पर रखते हुए हरिहर से कहा ,
" हरिहर कल सुबह ही बाबा जी को लेकर तुम रवाना हो जाना क्योंकि उसके बाद धूप बहुत तेज निकल आता है। इतनी दूर जाकर लौटने में शाम भी हो जाएगा और शाम के बाद उधर डकैती भी होता रहता है। "
हरिहर बोला ,
" जी मालिक , हम कल सुबह ही निकल जायेंगे । "
अब मसाननाथ बोले ,
" वैसे क्या मुझे वहां तक चलकर जाना होगा? मैं चलकर इस वक्त उतनी दूर नहीं जा सकता। मेरे पूरे शरीर में बहुत ज्यादा दर्द है। कुछ दिन पहले ही शिवपुर गांव में मेरे साथ क्या-क्या हुआ आपने तो सुना ही होगा। "
हरिहर उत्सुक होकर बोला ,
" हाँ बाबाजी मैंने सब कुछ सुना है। कैसे आपने और एक दुसरे तांत्रिक ने मिलकर शिवपुर गांव की रक्षा की थी। उस कहानी को यहाँ के लोग जानते हैं। "
मसाननाथ थोड़ा सा मुस्कुराकर बोले ,
" हां अगर वो तांत्रिक नहीं रहते तो आज भी शायद उस गांव की समस्या का समाधान ना मिलता। राजनाथ जी अगर आप एक बैलगाड़ी का इंतजाम कर देते तो अच्छा रहता। "
" हां बाबा जी मैं उसकी व्यवस्था कर दूंगा। हरिहर तुम जाकर भोला से कह देना कि कल तुम लोग उसकी बैलगाड़ी से जाओगे और यह भी कह देना कि उसे तुम लोगों को साथ लेकर लौटना भी होगा। उसके परिश्रम का खर्च जितना भी हो मैं दे दूंगा। "
हरिहर ने सिर हिला कर हां में जवाब दिया।
इतना बोलकर राजनाथ जी खड़े हो गए और मसाननाथ से बोले ,
" बाबा जी कल के जमीन से संबंधित कुछ काम को अभी मुझे करना है। आप तब तक अतिथि शाला में जाकर विश्राम कीजिए। "
इतना बोलकर राजनाथ जी अपने दूसरे तल्ले वाले कमरे में चले गए। इधर हरिहर भी मसाननाथ को साथ लेकर अतिथिशाला की ओर चल पड़ा।
रात का खाना खत्म अगर मसाननाथ जल्दी से सो गए क्योंकि कल सुबह ही उन्हें निकलना होगा। राजनाथ जी ने हरिहर को कल के यात्रा की सभी निर्देश बातों को बताकर अपने कमरे में सोने के लिए चले गए।

अगले दिन सुबह हरिहर ने जाकर भोला को बुला लाया। भोला अपने बैलगाड़ी के साथ आया है। राजनाथ जी को नमस्कार करके मसाननाथ और हरिहर बैलगाड़ी पर बैठ गए। खाने का सामान उन्होंने बैलगाड़ी में ही रख लिया है।
हरिहर ने जाने से पहले राजनाथ जी से कहा ,
" मालिक अब चलता हूं ,शाम से पहले ही लौट आऊंगा। "
धीरे-धीरे बैलगाड़ी ने खट- खट करके यात्रा को शुरू किया। रास्ता बहुत ज्यादा खराब नहीं है इसीलिए उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हो रही। वैसे सुबह - सुबह गांव का वातावरण बहुत ही मनोरम है जिसे देखते ही मन उसी में खो जाता। रास्ते के दोनों तरफ बड़े-बड़े पेड़ लगे हुए हैं। दो - तीन छोटे बच्चे बैलगाड़ी के पीछे दौड़ते हुए आ रहे हैं। मसाननाथ प्रकृति की इन खूबसूरत दृश्य को अपनी आंखों में बसा रहे थे। बीच-बीच में कुछ पतंगे आकर उनकी बैलगाड़ी पर बैठ जाते। चैत्र महीने की सुबह होने के कारण शीतल हवा से शरीर मैं ठंडक भी लग रही है। सूर्य का ताप इस वक्त नहीं है। रास्ते में ही उन्होंने सुबह के खाना को खा लिया। इसके बाद लगभग दोपहर के 12 बजे के आसपास वो सभी जमींदार शेरसिंह के घर पहुंचे।
बैलगाड़ी से उतर भोला के साथ कुछ बातें करके मसाननाथ और हरिहर ने जमींदार घर की ओर पैर बढ़ाया। सामने के द्वार को पार करते ही उन्हें एक बड़ा सा आँगन दिखाई दिया और आँगन के उस पास एक बड़ा सा पुराना घर सिर उठाए खड़ा है। उस घर को देखकर समझा जा सकता था कि जमींदार साहब कितने अमीर थे।
इधर - उधर आंगन में नजर डालते ही मसाननाथ ने देखा कि एक औरत बैठकर कुछ कर रही थी।
मसाननाथ और हरिहर को देखकर उस महिला ने आकर पूछा ,
" आप कौन हैं ; क्या किसी को खोज रहे हैं? "
हरिहर कुछ बोलने जा रहा था लेकिन उसे मसाननाथ ने रोककर कहा ,
" हाँ, हम किशनपुर गांव से आए हैं। जमींदार साहब के लड़के के साथ मिलना चाहता हूं। "
" आप यहां पर बैठिए , मैंने बुलाता हूं। " बोलकर वह महिला सीढ़ी से ऊपर चली गई।
कुछ देर बाद ही वह महिला फिर नीचे आई और मसाननाथ व हरिहर से बोली ,
" बाबूसाहब ऊपर हैं। उन्होंने कहा कि मैं आपको उनके कमरे में लेकर जाऊँ। आप दोनों मेरे साथ आइए। "
उस महिला के पीछे पीछे मसाननाथ और हरिहर सीढ़ी से ऊपर चढ़ने लगे। सीढ़ी खत्म होते ही एक बड़ा सा बालकनी जैसा कमरा दिखाई दिया। उस कमरे में आराम से बैठकर एक आदमी हुक्का पी रहा था। धीरे - धीरे मसाननाथ और हरिहर उस आदमी के पास गए।
उस आदमी के पास पहुंचते ही वह महिला बोली ,
" साहब , ये दोनों आपसे मिलने आए हैं। "
इतना बोलकर वह महिला वहां से चली गई।
मसाननाथ ने उस आदमी से पूछा ,
" क्या आप ही जमींदार साहब के लड़के हैं? "
उस आदमी ने हुक्के को नीचे रखते हुए कहा ,
" हाँ, मैं ही जमींदार शेरसिंह का लड़का प्रताप सिंह हूं। लेकिन मैंने आपको नहीं पहचाना। "
मसाननाथ ने मुस्कुरा कर कहा ,
" मेरा नाम तांत्रिक मसाननाथ है। "
यह सुनते ही जमींदार के लड़के प्रताप ने खड़े होकर मसाननाथ को प्रणाम किया। ,
" अच्छा आप ही तांत्रिक मसाननाथ हैं। मुझे माफ कर दीजिए बाबा जी मैं आपको पहचान नहीं पाया । मैंने आपके बारे में अपने बाबा शिवराज सन्यासी से बहुत कुछ सुना है।...
अरे आप अभी तक खड़े क्यों हैं आप आकर यहां पर बैठिए। "
यह कहते हुए प्रताप ने एक कुर्सी मसाननाथ की ओर बढ़ा दिया तथा उसके पास रखे कुर्सी पर हरिहर को बैठने के लिए कहा।
मसाननाथ कुर्सी पर बैठते हुए बोले ,
" असल में प्रताप मैं यहां पर आया हूं एक जरूरी विषय को जाने के लिए। तुम्हें सब कुछ खुल कर मुझे बताना होगा। कुछ भी छुपाने से काम नहीं चलेगा वरना मैं इस समस्या का समाधान नहीं कर पाउँगा। "
यह सुनकर प्रताप को थोड़ा आश्चर्य हुआ और बोला ,
" आखिर क्या बात है बाबा जी , मैं तो कुछ समझ नहीं पा रहा। "
" मैं यहाँ किशनपुर गांव की एक समस्या के बारे में बात करने आया हूं। वहां पर एक कुआं है जिसे लगभग 30 साल पहले बंद किया गया था। पानी की समस्या को दूर करने के लिए अचानक ही 2 दिन पहले उसे खोल दिया गया। उसे खोलने के बाद ही कुछ समस्या की शुरुआत हो गई। इसके बाद मुझे पता चला कि उस गांव में जमींदार रहते वक्त आपके पिता ने उस कुएं को बनवाया था। उसके साथ जुड़ा कुछ काला इतिहास भी मुझे पता चला। यह बातें सच है या झूठ यही जानने के लिए मैं यहां पर आया हूं। "
इन बातों को सुनकर प्रताप ने जवाब दिया ,
" उन गांव वालों ने ही यह सब आपको बताया होगा। आखिर उन लोगों ने आपको क्या बोला जरा भी बताइए। "
इसके उत्तर में मसाननाथ बोले,
" यह सब आप बाद में सुन लेना लेकिन पहले आप मुझे यह बताइए कि जिस आप आपके पिताजी की मृत्यु हुई , उस रात की कोई बात आपको याद है? "
प्रताप ने बोलना शुरू किया,
" अगर आप जानने आए हैं तो मैं कुछ भी नहीं छुपाऊंगा। जितना भी मुझे याद है मैं आपको सब कुछ बताता हूं।
उस वक्त में काफी छोटा था। शाम को पिताजी आए और धारदार औजार लेकर घर से चले गए और फिर जब लौटे तब काफी रात हो चुकी थी। इसके अलावा उनके कपड़ों पर बहुत सारा खून लगा हुआ था तथा उनके चेहरे पर काफी रोष था। ना जाने क्यों पिताजी बोल रहे थे कि अब मैं सभी पापों से मुक्त हूं और अब अंतिम पाप भी मिट जाएगा। शिवराज बाबा के पास सब व्यवस्था मैंने कर दिया है।
उसी रात मेरे पिताजी की मृत्यु की समाचार मेरे पास पहुंची। मुझे पता चला कि मेरे पिताजी ने आत्महत्या कर लिया है। इसके अलावा मैं कुछ भी नहीं जानता क्योंकि मैं उस वक्त काफी छोटा था। इससे ज्यादा मुझे कुछ भी याद नहीं है। "
प्रताप द्वारा इतनी सारी बात बताने के बाद
मसाननाथ ने पूछा ,
" इसका मतलब सचमुच आपके पिताजी काफी अत्याचारी थे। लोगों की हत्या करना शायद उनका प्रतिदिन का कार्य था। "
इसके उत्तर में प्रताप ने कहा ,
" नहीं, नहीं बाबाजी। आप गलत समझ रहे हैं। मेरे पिताजी अत्याचारी आदमी नहीं थे। इसके उलट उन्होंने कई सारे आदमियों का उपकार किया था। मुझे ज्यादा कुछ नहीं पता लेकिन मैंने अपनी मां से सुना था कि मेरे पिताजी काफी अच्छे आदमी थे। लोगों की सहायता करना उनका स्वभाव था। ना जाने क्यों गांव के लोग मेरे पिताजी के बारे में ऐसा बोलते हैं कि वो हत्यारे थे ? वैसे इस कुएं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता। "
मसाननाथ बोले ,
" क्या आप सब कुछ सही बोल रहे हैं प्रताप जी ? मैंने तो लोगों से दूसरा कुछ सुना है। बड़ी ही अद्भुत बात है कि एक ही आदमी के लिए दो लोगों का दो अलग विचार है। गांव वाले और आपके दोनों के विचार काफी अलग-अलग हैं। गांव वाले बताते हैं कि आपके पिताजी लोगों की हत्या करके उस कुएं में उनकी लाशों को फेंक देते थे। क्या यह सब पूरी तरह झूठ है। कुछ तो ऐसा हुआ था जिस वजह से गांव वाले ऐसा कहते हैं। "
अब प्रताप बोले,
" सच बताऊं तो उस कुएं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि गांव वाले जो भी कह रहे हैं वह पूरी तरह झूठ है। मुझे आज भी यह रहस्य समझ नहीं आता कि गांव वाले मेरे पिताजी के बारे में ऐसा क्यों कहते हैं। मैंने अपने पिताजी को किसी दूसरी तरह देखा था। इसीलिए मैं इन गांव वालों की बातों को नहीं मानता। असल सच्चाई क्या है यह तो मुझे भी नहीं पता। "
मसाननाथ कुछ देर चुप चाप बैठे रहे और फिर बोले ,
" यही जानने के लिए तो मैं यहां पर आया हूं। वैसे आपने कहा कि आपके पिताजी की मृत्यु से पहले उन्होंने सन्यासी शिवराज बाबा के पास से कुछ काम करवाया था। शिवराज बाबा कहां पर रहते हैं अगर आप मुझे बता सकते तो अच्छा होता। शायद उनके पास से हम कुछ जान सके। "
प्रताप ने कुछ देर सोच कर उत्तर दिया ,
" हाँ , रुकिए मैं उनका पता एक कागज पर लिख देता हूं। "
बोलकर प्रताप कमरे के अंदर चला गया और कुछ देर बाद हाथ में एक कागज लेकर लौट आया। उस कागज को मसाननाथ को देते हुए प्रताप बोले,
" यह लीजिए मैंने इसमें सन्यासी शिवराज बाबा का पता लिख दिया है। "
मसाननाथ ने उस कागज के टुकड़े को ले लिया और प्रताप से एक कागज और कलम देने को कहा। प्रताप ने भी जल्दी से एक कागज व कलम लाकर मसाननाथ को दे दिया। अब मसाननाथ ने उस कागज पर ना जाने क्या लिखना शुरू कर दिया। उनके लिखावट को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो वो कोई चिट्ठी लिख रहे हैं।
कुछ देर लिखने के बाद मसाननाथ खड़े हो गए और हरिहर से बोले ,
" हरिहर इस चिट्ठी को तुम्हें इसी पते पर पहुंचा देना होगा। याद रखना इस चिट्ठी के उत्तर में हमारी समस्या का बहुत सारा समाधान मिल जाएगा। जब तक इस चिट्ठी का उत्तर ना मिले तुम वहां से मत लौटना। इस चिट्ठी का उत्तर मुझे चाहिए वरना इस कुएं के रहस्य के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं चलेगा। मैं इतना अंदाजा लगा सकता हूं कि उस कुएं में जो चार मंत्र द्वारा बंधे ताले लगे थे उसे सन्यासी शिवराज बाबा ने ही लगवाया था। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया था ? इसके कारण को जानने के बाद ही मैं कुछ कर सकता हूं।
हरिहर तुम अभी रवाना हो जाओ देरी मत करो। तुम चिंता मत करना मैं भोला के साथ लौट जाऊंगा और वहां जाकर मैं राजनाथ जी को सब कुछ समझा दूंगा। मैं इसी वक्त चला जाऊंगा क्योंकि उधर शाम के बाद चोरी - डकैती की संभावना हो सकती है। जो भी हो मैं एक तांत्रिक हूं भगवान नहीं। " .......


क्रमशः.....

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