Aiyaas - 2 in Hindi Social Stories by Saroj Verma books and stories PDF | अय्याश--भाग(२)

अय्याश--भाग(२)

पंडित भरतभूषण चतुर्वेदी की बेगुनाही साबित हो चुकी थी और उनके गाँव से चले जाने पर सभी गाँव वालों को पश्चाताप हो रहा था,लेकिन अब कोई फायदा नहीं था,चतुर्वेदी जी जब अपने आप को बेगुनाह बता रहे थे तो उनकी किसी ने नहीं सुनी....
ये खबर पाकर वैजयन्ती के मायके से उनके बड़े भाई दीनानाथ त्रिवेदी उन सबको अपने गाँव लिवा जाने के लिए जा पहुँचे,वैजयन्ती ने बहुत मना किया कि वो अपने पति का घर छोड़कर कहीं नहीं जाएगी,हो सकता है कि किसी दिन वें लौंट आएं,तब दीनानाथ वैजयन्ती की बात सुनकर बोले....
वैजयन्ती! पड़ोस में बता दो कि तुम मेरे साथ अपने मायके में रह रही हो,पंडित जी लौटेगें तो उन्हें ख़बर मिल जाएगी,मैं तुम्हें यहाँ दो दो सयानी बेटियों के साथ अकेले नहीं छोड़ सकता,जमाना बहुत ख़राब है,कल को इनका ब्याह भी तो करना है तो किसका मुँह ताकती फिरोगी मदद के लिए।।
वैजयन्ती को भाई की बात सही लगी और वो अपने तीनों बच्चों सहित मायके आ पहुँची,वैजयन्ती के बड़े भाई दीनानाथ गाँव के मंदिर के पुजारी हैं और मँझले भाई रामस्वरूप त्रिवेदी इलाहाबाद कोर्ट में वकील हैं शान्त स्वाभाव और बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं,वे अच्छे चित्रकार और लेखक के साथ अच्छे रसोइया भी हैं,उनका बनाया खाना जो एक बार चख ले तो जिन्द़गी भर स्वाद नहीं भूलता था ,
लेकिन वें अपने बड़े भाई से बहुत डरते हैं क्योकिं दीनानाथ त्रिवेदी का मानना है कि पुरुषों का रसोई में जाना शोभा नहीं देता,पुरूषों को अपना पुरूषत्व बरकरार रखना चाहिए, इसलिए जब वो कहीं बाहर जाते थे तब वें सबके लिए स्वादिष्ट भोजन तैयार करते हैं,
और सबसे छोटे भाई रामभक्त त्रिवेदी बिल्कुल अपने नाम के विपरीत हैं ,नास्तिक हैं पूजा-पाठ में विश्वास नहीं रखते थे,उनके लिए कर्म और मानवता ही सबसे बड़ी पूजा है,थियेटर में काम करते हैं,वें बनारस में रहते हैं और उन्होंने अब तक ब्याह ना किया था,सभी कहते हैं कि थियेटर की एक्ट्रेस दमयन्ती से उनका प्रेम-प्रसंग चल रहा हैं,वें काफी दिलफेंक और रसिया प्रवृत्ति के इन्सान हैं ,उन्हें माँस,मछली,अण्डा शराब से भी परहेज नहीं हैं,इसलिए बड़े भाई दीनानाथ त्रिवेदी उन्हें बिलकुल नापसंद करते हैं,
बड़ी भाभी सावित्री बहुत ही भली और दयालु प्रवृत्ति की महिला हैं,उनकी तीन बेटियाँ हैं जो ब्याहकर ससुराल चलीं गईं हैं,बचे हैं तो दो बेटे गंगाधर और श्रीधर,जो सत्यकाम से दो तीन साल बड़े हैं,वैजयन्ती की मँझली भाभी शैलजा बहुत ही घमण्डी हैं वो इसलिए कि उसने काँलेज में पढ़ाई की हैं ऊपर से वो जज की बेटी हैं,बाप के पास बहुत पैसा है और वो अपने बाप की इकलौती बेटी हैं,उसकी एक ही बेटी है शैलजा को ज्यादा बच्चे नहीं चाहिए थे,इसलिए बेटी के बाद उसने दोबारा माँ बनने की नहीं सोची।।
वैजयन्ती उस घर आई तो उसकी भाभी ने उसे सीने से लगा लिया,एक औरत ही दूसरी औरत का दुःख समझ सकती है जब प्यार करने वाला पति उससे दूर चला जाता है तो उस औरत पर क्या गुजरती है ये सावित्री भलीभांति समझती है,दोनों ननद-भौजाई ने मिलकर घर सम्भाल लिया,अब वैजयन्ती के आने से सावित्री को भी आराम हो गया था,हँस बोलकर यूँ ही साथ मिलकर घर के काम निपट जाते और फिर कुछ ही दिनों में दीनानाथ जी ने प्रयागी और त्रिशला के लिए घर और वर भी ढूढ़ लिएं,
एक ही घर में लड़के मिल गए,दोनों ही चचेरे भाई थे,वैजयन्ती खुश थी वो इसलिए कि दोनों बहनें एक साथ एक ही घर में रहेगीं,कुछ ही दिनों में दोनों का ब्याह भी सम्पन्न हो गया और अब वैजयन्ती इस जिम्मेदारी से आजाद हो चुकी थी,बिना बाप के दो बेटियाँ का ब्याह हो जाना बहुत बड़ी बात थी,अगर बड़े भाई ना होते तो वो कैसे इस जिम्मेदारी से निवृत्त हो पाती और यही सोचकर कभी कभी उसकी आँखें भर आतीं।।
सत्यकाम भी बहनों के ससुराल जाने के बाद अपने ममेरे भाइयों से जल्द ही घुलमिल गया,बड़े भाई का नाम गंगाधर था और छोटे का श्रीधर,कभी कभी आपस में मारपीट भी हो जाया करती थी लेकिन गृहणियाँ समझदार थी इसलिए बच्चों की बातों को दिल ना लगाती और आपस में सुलझाकर मनमुटाव दूर कर देतीं।।
यूँ ही दिन बीत रहे थे,अब सत्यकाम दस बरस का हो चुका था,पड़ोस में एक दम्पति रहते थे जिनका नाम रामचरित मिश्रा था उनकी पत्नी का नाम सुजाता था ,जो कि निःसंतान थे ,तब उनके घर में सुजाता की भतीजी विन्ध्यवासिनी आई जिसके माता पिता हैजे से चल बसे थे,इसलिए उसे सुजाता ने अपने घर में आसरा दे दिया।।
एक दिन सत्यकाम से उसकी माँ ने कहा कि बगल वाली मामी से जाकर थोड़ा सा दही ले आ ,घर में दही खतम हो गया है दही जमाना है,फिर क्या था सत्यकाम जा पहुँचा सुजाता मामी के घर उसने बाहर से आवाज दी....
सुजाता...मामी....सुजाता मामी...,माँ ने थोड़ा सा दही माँगा है।।
तब विन्ध्यवासिनी बाहर निकली और धीरे से बोली.....
बुआ तो मंदिर गईं हैं आती होगीं।।
सत्यकाम ने विन्ध्यवासिनी को देखा तो देखता ही रह गया और उससे पूछा....
तुम कौन हो? यहाँ क्यों आई हो?
मैं विन्ध्यवासिनी हूँ,मेरे माँ बाप नहीं है इसलिए अपनी बुआ के पास आ गई,विन्ध्यवासिनी बोली।।
ओह....तुम्हें अपने माँ बाबूजी की याद नहीं आती,सत्यकाम ने पूछा।।
आती है बहुत आती है,विन्ध्यवासिनी बोली।।
ठीक है तो मैं जाता हूँ सुजाता मामी आएं तो कह देना कि मैं दही लेने आया था,सत्यकाम बोला।
कौन आया था? नाम तो बताओ,विन्ध्यवासिनी ने पूछा।।
कहना कि सत्यकाम आया था और इतना कहकर सत्यकाम चला गया....
तो ये थी सत्यकाम और विन्ध्यवासिनी की पहली मुलाकात,जो कि बाद में और भी मुलाकातों में तब्दील हो गई...
विन्ध्यवासिनी सत्यकाम से दो साल बड़ी थी,देखने में सुन्दर और सुशील थी,घर के कामकाज में भी निपुण थी,अब दोनों ही धीरे धीरे अच्छे दोस्त बनते जा रहे थे....
दोनों ने एकदूसरे के प्यार से बुलाने वाले नाम भी रख लिए थे,विन्ध्यवासिनी सत्यकाम को सत्या बुलाती और सत्यकाम विन्ध्यवासिनी को बिन्दू बुलाने लगा,दोनों के घर में कुछ भी बनता तो एक दुसरे को खिलाएं बिना खुद ना खाते,दोनों के बीच बहुत बड़ी समानता भी ये थी कि दोनों ही दूसरों के घरों में आश्रित थे,दोनों में झगड़े भी बहुत होते और सत्या बिन्दू पर हाथ भी उठा देता फिर बिन्दू कहती....
तू मुझसे दो साल छोटा है ना! इसलिए मैं तुझसे कुछ नही बोलती,किसी दिन ऐसा मारूँगी ना कि नानी याद आ जाएगी...
हाँ...हाँ...जा..जा आई बड़ी मुझे मारने वाली,सत्या कहता।।
फिर दोनों में दिनभर बोलचाल बंद रहती लेकिन शाम तक फिर सब वैसे का वैसा हो जाता,कभी सत्या बिन्दू की चूड़ियाँ तोड़ देता तो कभी उसे पेड़ की डाल से धक्का दे देता और बिन्दू उसके जमा किए हुए शंख और गोटियाँ चुरा लेती,ऐसे ही दो साल बीत गए,अब सत्या बारह साल का हो चुका था और बिन्दू चौदह की,लेकिन दोनों की दोस्ती में कोई फरक नहीं पड़ा था।।
जब कभी दीनानाथ जी दोनों को साथ देख लेते तो वैजयन्ती से कहते....
तुम अपने बेटे को क्यों नहीं समझाती? आजकल पाठशाला के सबक कम याद करता है,विन्ध्यवासिनी के साथ ज्यादा घूमता है।।
तब वैजयन्ती अपने लाल को समझाते हुए कहती....
बेटा! बिन्दू के साथ अब तेरा ज्यादा घूमना अच्छा नहीं,अब वो बड़ी हो गई है।।
तब सत्यकाम अपनी माँ वैजयन्ती से कहता....
माँ! तुम भी कैसीं बातें करती हो?वो कहाँ बड़ी हुई है उसकी हरकतें तो एकदम बच्चों जैसीं हैं,
और फिर वैजयन्ती अपने बेटे के सामने हार मान लेती.....
अब तीनों बच्चे मतलब गंगाधर,श्रीधर और सत्यकाम गाँव की पाठशाला से आठवीं पास कर चुके थे,तीनों की उम्र में अन्तर था लेकिन कक्षाओं में नहीं,तब दीनानाथ जी सोचा कि इन सबको आगें की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद भेज दिया जाएं और फिर दीनानाथ जी तीनों को इलाहाबाद में एक कमरा किराएं पर दिलवा दिया,पन्द्रह दिन या महीने भर में वहाँ जाते और जरूरत का सामान और रूपए पहुँचा आते,सत्या के जाने से विन्ध्यवासिनी अब अकेली पढ़ गई थी।।
सत्या जब छुट्टियों में घर आता तो दोनों साथ में खेलकर इतने दिनों की कसर पूरी कर लेते ,अब सब भी सत्यकाम को सत्या कहकर पुकारने लगे थे....
ऐसे ही समय बीत रहा था,सत्या के दोनों भाई बड़े होने के नाते उसका बहुत ख्याल रखते वो पढ़ने में भी होशियार था इसलिए घर से हिदायतें भी मिली थी कि सत्या का ख़ास ख्याल रखा जाएं,गंगाधर अपने हिस्से का घी दूध भी सत्या को दे देता तब सत्या कहता तुम मुझे बहुत प्यार करते हो ना!
तब गंगाधर कहता....
तू दिल का बहुत अच्छा है रे,मैने कितने बार तुझे देखा है कि तू स्वयं भूखा रह जाता है और अपने हिस्से का खाना गरीबों को दे आता है,तू बहुत दयालु है रे!
श्रीधर भी सत्या को चाहता था लेकिन गंगाधर ज्यादा चाहता था,सत्यकाम को चित्रकारी का बहुत शौक था,इसलिए गंगाधर उसके लिए रंग ब्रश और भी चित्रकारी का सामान लाकर देता।।
सत्या इलाहाबाद में जहाँ रहता था तो उनके बगल में एक बालविधवा लड़की रहती थी,उम्र यही कोई बीस बाइस साल,उसके परिवार में केवल उसकी माँ थी,पता नहीं एक रात उसे कोई घर से उठा ले गया,तब उसकी माँ इन तीनों के पास मदद माँगने आई,तीनों ने उसे रात भर ढूढ़ा लेकिन वो लड़की ना मिली,लेकिन सुबह तक वो लड़की आ गई,तब कुछ समय बाद पता चला कि वो माँ बनने वाली है,
उसे जो उस रात उठा ले गया तो ये गर्भ उसी का था,उसने उसके साथ कुकृत्य किया था और सज़ा लड़की को मिल रही थी,समाज वालों ने दोनों माँ बेटी को बहुत धिक्कारा ,दोनों का जीना मुश्किल कर दिया,सामाजिक बहिष्कार कर दिया,तब उस लड़की ने मजबूर होकर आत्महत्या कर ली,लेकिन अब उसकी लाश के अन्तिम संस्कार के लिए भी कोई तैयार ना होता था,तीनों लड़के मजबूर थे और वें भी एक ओर खड़े होकर इस तमाशे को देख रहे थे ....
तब सत्या से ना रहा गया और उसने हिम्मत दिखाई, वहीं किसी की बैलगाड़ी रखी थीं और वो उस लड़की को उठाकर बैलगाड़ी में डालने लगा,लोगों ने मना किया तो उसके दोनों भाई भी सामने आ गए,फिर तीनों उसे बैलगाड़ी में लादकर समसान घाट ले गए,अपने पैसों से लकड़ियाँ खरीद उसकी चिता लगाकर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया.....
ये खबर जब दीनानाथ तक पहुँची तो वें आगबबूला हो उठे और तीनों लड़को का खून पीने को उतारू हो गए....

क्रमशः...
सरोज वर्मा.....


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