Nafrat se bandha pyaar - 41 in Hindi Love Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 41

नफरत से बंधा हुआ प्यार? - 41

एक हफ्ता बीत चुका था वीरेंद्र प्रजापति के अंतिम संस्कार को बीते। इन्वेस्टिगेशन की रफ्तार भी धीमी गति से ही चल रही थी क्योंकि उन्हें कुछ खास अभी तक पता नहीं चला बस एक चीज़ के सिवाए।

देव इस वक्त सिंघम मैंशन में लाइब्रेरी में एक पत्र पढ़ रहा था। उसने अपनी दादी का यह पत्र पहले भी कई बार पढ़ा था, पर उस रात फिर उसका मन हो रहा था एक बार और पढ़ने का। उसको उसकी दादी के हाथ से लिखे हुए वोह पत्र बहुत पसंद थे जो उसकी दादी ने तब लिखे थे जब वोह खुद जवान हुआ करती थी। देव और उसकी फैमिली सिंघम एस्टेट आया करते थे जब देव छोटा था, उसने याद किया वोह समय जब कभी कभी उसकी दादी उसे गोद में बिठा लेती थी। वोह उसे अपनी बचपन की मज़ेदार कहानियां, किससे सुनाया करती थी। देव को वोह सुनना बहुत पसंद था। वोह बार बार उनसे वोही कहानियां सुनता था। और उनसे कई सवाल करता रहता था। देव की जिज्ञासा देख कर एक बार उसकी दादी देव को और उसके बड़े भाई अभय को सेनानी प्रोविंसेज लेकर गई थी, जहां उन्होंने अपना बचपन बिताया था। देव ने नोटिस किया था की उसकी दादी और सबिता प्रजापति के बीच काफी समानताएं हैं। दोनो ही सुंदर, मजबूत और गुस्से वाली हैं। दोनो ही में एक अच्छे लीडर की क्वालिटीज हैं जो किसी भी सिचुएशन में बुरे से बुरे वक्त में भी अपने लोगों के संभाल सकती हैं।

कभी कभी सबिता उसे उसकी मां की भी याद दिलाती थी, जो सुशील और शांत थी। उसकी मां की तरह ही सबिता को भी खाना बनाना बहुत पसंद था। उनके कॉटेज वाले दिनों में कई बार सबिता ने सिंपल डिशेज के साथ एक्सपेरिमेंट किए थे। उसने देखा था की जब भी सबिता कोई डिश बनाती थी और देव को सर्व करती थी तोह वोह देव को पहला निवाला लेते वक्त ध्यान से देखती थी। और उसकी आंखों में तुरंत चमक आ जाती थी जब देव उसके खाने की तारीफ करता था।

देव का दिल भरी होने लगा। वोह जनता था की सबिता प्रजापति सिर्फ उसकी है और उसके लिए ही बनी है। कोई भी आज तक उसकी जिंदगी में इतना करीब नही आया जितना की सबिता आई थी। और अगर वोह अपनी ज़िंदगी सबिता के साथ नही बिता सकता, तोह वोह किसी भी और लड़की को अपने करीब अब सोच भी नही सकता। यह तोह उस दूसरी लड़की के लिए नाइंसाफी होगी। वोह चाहे कितनी भी खूबसूरत हो, लेकिन देव की नज़रों में वोह हमेशा दूसरी रहेगी जो शायद उसकी परछाई की तरह रहे जिसे देव ने अपने दिल में बसा कर रखा है।

देव ने सोच लिया था की वोह अब कल सेनानी को फोन करेगा और उन्हें अपना फैसला सुना देगा की उसकी **ना** है। वोह शादी नही करना चाहता है। अगर शादी हो भी जाती है तोह कोई खुश नहीं रहेगा और परेशानियां और बढ़ेंगी। वोह सेनानी को अपना फैसला सुनाने से पहले अपने लोगों को और अभय को चौकन्ना रहने के लिए भी कहना चाहता था क्योंकि उसकी ना के बाद सेनानी चुप नही बैठेंगे।

"नींद नहीं आ रही है?" एक जानी पहचानी लड़की की आवाज़ देव को सुनाई पड़ी।

उसने अपनी नज़रे पत्र से हटा कर दरवाज़े की तरफ टिका दी।
"नही," देव ने जवाब दिया। "मैं एक इंपोर्टेंट कॉल का वेट कर रहा हूं। तुम यहां कैसे? मेरी नीस या नेफ्यू तुम्हे अभी भी रात भर जगा कर रखते हैं।"

अनिका मुस्कुरा पड़ी। "हम्मम! अभी एक स्ट्रॉन्ग किक की वजह से ही नींद खुल गई," अनिका ने जवाब दिया।

देव भी वापिस अनिका की मुस्कराहट का जवाब मुस्कुरा कर करना चाहता था लेकिन वोह नही कर पाया क्योंकि बहुत दर्द होता था उसे अनिका की आंखों में देखने से क्योंकि अनिका की आंखें उसे अनिका की बहन की याद दिलाती थी। दोनो की आंखें काफी मिलती जुलती थी।

दिन हो या रात देव बहुत कोशिश कर रहा था की साबित को न याद करे और उन लम्हों को भी जो दोनो ने साथ बिताए थे। पर उसकी यादें देव के दिमाग से जाती ही नही थी। वोह बीच मजदारे में फस गया था।

"देव.....क्या तुम ठीक हो?" अनिका ने पूछा।

देव ने अपना सिर हिला दिया। "हां मैं ठीक हूं," देव ने जवाब दिया।

अनिका कुछ पल देव को ऐसे ही देखती रही जैसे उसके जवाब से संतुष्ट नहीं हो। वोह आगे उससे और सवाल पूछती उससे पहले ही देव ने पूछ दिया। "क्या तुम्हे अभय ने फोन करके बताया की वोह कल आ रहा है?"

"हां। मैने उसका मैसेज देखा था और अभी थोड़ी देर पहले उसे कॉल किया था। उसने बताया मुझे की उसने उस डॉक्टर से बात की थी जिसेसे मैने मिलने के लिए कहा था और उसे यहां आने के लिए मना लिया है।"

देव ने अपना सिर हिला दिया। वोह आगे कुछ और कहने ही वाला था की तभी उसका फोन बज पड़ा। "एक्सक्यूज़ मी," देव ने कहा और तुरंत अपना फोन उठा लिया।

"हमे वोह मिल गए हैं," देव को फोन के दूसरी साइड से आदमी आवाज़ सुनाई पड़ी। उस आदमी ने देव को कुछ बातें बताई जिससे देव सन्न रह गया।

"ठीक है। उन दोनो का ख्याल रखना। मैं बस अभी आ रहा हूं," देव ने उसे निर्देश देते हुए कहा।

जैसे ही उसने कॉल कट किया, उसने दूसरा नंबर डायल कर दिया। फोन की घंटी बार बार बजे जा रही थी। देव समझ गया था की उसका फोन नही उठाया जाएगा, वोह बस फोन को काट करने ही वाला था की उसका फोन सामने वाले ने उठा लिया।

"सबिता। वोह हमें मिल गए है। वोह जिन्हे तुम ढूंढ रही थी। मैने हम दोनो के लिए फ्लाइट का इंतजाम कर लिया है। हमे तुरंत निकलना होगा।" देव ने फिर उसे लोकेशन की सारी डिटेल्स भी दी।

बिलकुल शांति छाई हुई थी फोन पर क्योंकि सबिता चुपचाप सुन रही थी। उसने उससे यह बिल्कुल भी नही पूछा की तुम किसके मिलने की बात कर रहे हो। "मैं आधे घंटे में वहां पहुंचती हूं," सबिता ने बस यही कहा।

देव, सबिता की आवाज़ में घबराहट महसूस कर पा रहा था। अनिका अभी भी लाइब्रेरी के दरवाज़े के बाहर देव को उत्सुकता से देख रही थी।

"मुझे अभी जाना होगा, अनिका," देव ने कहा और दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा। "अगर कल अभय के आने से पहले मेरी उससे बात नही हुई तोह जब वोह आएगा तोह तुम उसे बता देना की मैं कल तक लौट आऊंगा और अगर नही आ पाया तोह बता दूंगा।"

अनिका ने अपना सिर हिला दिया। "मैं उम्मीद करती हूं की जिस भी काम के लिए तुम जा रहे हो वोह हो जाए," अनिका ने प्यार से कहा। "मैं तुम दोनो की साइड ही हूं, बस फिर से सब पहल जैसा हो जाए।"

देव जब अनिका के पास पहुंचा तोह उसने उसके गाल पर प्यार से किस किया और मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक यू।" और फिर बाहर चला गया।

जैसे जैसे देव गाड़ी चला रहा था वोह अपने मन में कई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था। पर फिर भी उसे कुछ समझ नही आ रहा था की क्या हो रहा है। पर उसे यह शक था की वोह उस वजह तक शायद पहुंच गया है जिसके कारण सबिता ने अपने प्यार को ठुकरा दिया था।

****

सबिता चुपचाप देव को देख रही थी। वोह किसी से फोन पर बात कर रहा था। जैसे ही देव ने उसे फोन किया था और इनफॉर्म किया था की वोह मिल गाएं हैं....... वोह समझ गई थी की देव किस की बात कर रहा है। वोह तुरंत ही अपने कमरे में से निकल गई थी और फिर प्रजापति मैंशन से बाहर आके उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट करदी थी। फर्राटे की स्पीड से वोह उस जगह पहुंच गई थी जिस जगह पर देव ने उसे मिलने के लिए कहा था।

देव सबिता को लेकर एक छोटे से प्लेन में चढ़ गया और उसे सीट पर बिठा कर उसके सामने बैठ गया। देव ने सबिता से इस दौरान एक बार भी बात नही की थी और ना ही कुछ पूछा था। इसलिए शायद सबिता कुछ परेशान सी थी जो देव भी शायद समझ रहा था।

सबिता का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था और बेचैन होने लगा था। वोह मन ही मन कई अनुमान लगा रही थी उसके बारे में जब होने वाला था। वोह कितने वक्त से इस दिन का इंतजार कर रही थी। उसने बहुत कुछ सैक्रीफाइस किया था और चुपचाप अपनी बुआ का अत्याचार और तानाशाही सही थी सिर्फ इसी वजह से। सिर्फ इसी वजह से तोह वोह उनकी हर बात मानती चली आई थी। उसने एक गहरी सांस ली और अपने आपको संभालने लगी क्योंकि बेचैनी, डर और घबराहट तीनो बढ़ने लगी थी।

सबिता एक दम से चौक गई जब उसे अपने हाथ पर किसी के हाथ का स्पर्श हुआ। "हम एक घंटे में पहुंच जायेंगे," देव ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा। "तुम चाहो तोह थोड़ी देर सो सकती हो।"

सबिता ने हां में अपना सिर हिला दिया और सीट से सिर टिका कर अपनी आंखें बंद कर ली।

****

दो घंटे बाद सबिता का दिल व्याकुलता और उकसुकता में धड़क रहा था और आगे होने वाली संभावना से वोह कांप रही थी। वोह एक घंटे पहले ही पहुंच गए थे और उसके बाद एक गाड़ी में बैठ कर वोह इस जगह आए थे जहां एक घर बना हुआ था। जब वोह यहां पहुंची तोह सबसे पहले चिज़ उसने देखी वोह यह थी की एक छोटा से दरवाज़ा था। उसके अंदर आके उसने देखा कई डार्क कलर के यूनिफॉर्म में गार्ड्स खड़े थे घर के दरवाज़े के बाहर। वोह जल्दी से दरवाज़ा खोल कर अंदर चली गई और सामने देखते ही रुक गई।

उसका ध्यान शायद ही मध्य उम्र की उस औरत पर गया था जो सामने बैठी घबराहट से सबिता को देख रही थी। उसका सारा ध्यान तोह उस छोटे से बच्चे पर था जो उस औरत को पकड़ कर बैठा था। उस छोटे से प्यारे से बच्चे के चेहरे पर डर दिख रहा था।

धीरे धीरे सबिता उन दोनो की तरफ बढ़ने लगी। "इस कमरे से बाहर जाओ," सबिता ने आराम से उन गार्ड्स को आदेश दिया जो उस औरत और बच्चे के दोनो साइड खड़े थे। शायद वोह बच्चा उन गार्ड्स से डर रहा था।

गार्ड्स के जाने के बाद भी उस औरत ने उस बच्चे को छोड़ा नहीं और कस कर पकड़ लिए। उस बच्चे ने भी उस औरत को कस कर पकड़ लिया।

सबिता ने अपने आप को रिलैक्स किया और चेहरे पर मुस्कुराहट ले आई भले ही वोह अंदर से घबरा रही थी। वोह उस छोटे से सोफे के नजदीक गई जहां वोह औरत और बच्चा बैठे थे और उनके सामने घुटनों के बल बैठ गई।

"सहाना?" सबिता ने उस बच्चे को प्यारा से पुकारा। जबकि उसके खुद के होंठ लड़खड़ा रहे थे पर बच्चे को शांत और सुरक्षित महसूस कराने के लिए उसने अपने चेहरे पर मुस्कुराहट बर करार रखी।

उस छोटी सी लड़की की चमकती हुई गहरी हरी आंखें सबिता को देखने लगी पर उसने कुछ कहा नहीं। "मुझसे डरो नहीं, सहाना। मैं तुम्हारी......." सबिता को अपनी बात खतम करने से पहले ही वोह औरत बोल पड़ी।

"नही। तुम नही हो," वोह औरत चीखते हुए बोली। "तुम उसकी मां नही हो!"

सबिता के अंदर गुस्सा भड़क पड़ा। उसने उस औरत को घूर कर देखा जो कभी उसके लिए सरोगेट मदर थी। "सहाना मेरी बेटी है, बीना। मुझे पता है तुम इतने सालों से नीलांबरी के कहने पर उसे छुपा कर रखी हुई थी।"
सबिता का मन तोह कर रहा था की उस औरत को उठा कर बाहर फेक दे ताकि वोह अकेले में अपनी बेटी के साथ कुछ वक्त बिता सके। पर उसकी बेटी तोह बिना को जकड़े हुए थी और डर से देख रही थी।

बीना ने ज़ोर से ना में अपना सिर हिलाया। "नही मैं सच कह रही हूं। सहाना तुम्हारी बेटी नही है। यह मेरी नतनी है। तुम्हे बेटा हुआ जो पैदा होने के साथ ही मर गया था सात साल पहले।"

यह सुनते ही सबिता का हाथ कपकपान लगा। वोह अपने आप को कंट्रोल करने लगी उस बच्ची को गोद में लेने और उस पागल औरत से दूर ले जाने के लिए जिसने इतने सालों तक उसके बच्चे का अपरहण किया था।

"प्लीज मेरा यकीन करो, साबी। यह मेरी नतनी है। नीलांबरी ने तुमसे झूठ बोला है की यह तुम्हारी बेटी है।"

"मुझसे झूठ मत बोलो," सबिता ने कहा। "मैने उसकी कुछ फोटोज़ देखी है जब वोह बड़ी हुई तब की। कुछ फोटोज़ में तोह वोह मेरी मां जैसी दिखती थी। इसकी आंखें बिलकुल उनकी ही तरह है। मैं जानती हूं........."

"वोह इसलिए है क्योंकि तुम्हारी मां मेरी कजन है। हमारे परिवार में हरी आंखे तोह बहुत ही कॉमन है। इसी वजह से नीलमबरी ने बड़ी बेरहमी से मेरी बेटी और दामाद को मरवा दिया। ताकि वोह उनका बच्चा चुरा सके और तुम्हे दे सके।"

"यह सच नहीं हो सकता," सबिता ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा। क्योंकि सबिता जानती थी की उसकी बुआ नीलांबरी उसकी सोच से भी ज्यादा शातिर है।

"यही सच है, साबी," बीना ने दुखी होते हुए कहा। "मैंने ही तुम्हारी डिलीवरी करवाई थी। बच्चा पैदा करते समय तुम होश में नही थी और मैंने खुद अपनी आंखों से देखा था तुम्हे बेटा हुआ था।"

"क....कहां है उसकी बॉडी फिर?" सबिता ने पूछा, बीना की बातें सुन कर उसे गहरा सदमा लगा था।

"उस बच्चे के शरीर को हमारे समाज के ही कब्रिस्तान में दफना दिया गया था। नीलांबरी ने उसकी अंतिम क्रिया भी करने नही दी थी।"

सबिता को ऐसा लगा जैसे उसका शरीर बेजान सा हो गया है मानो सांस लेना ही बंद कर दिया हो।

बीना ने बोलना जारी रखा। "उसके अगले दिन, मेरी बेटी और दामाद की हत्या कर दी गई। नीलांबरी ने मुझे बुलाया और कहा की मैं अपनी बेटी की बेटी को लेके यहां से भाग जाऊं। उसने मुझे बहुत धमकाया की अगर उसकी बात नही मानी तोह वोह मुझे और मेरी नतनी को मार देगी।"

सबिता उसे ऐसे ही देख रही थी। बीना की बातें सुनते हुए उसकी आंखे हैरानी से फैल गई थी। उसका दिमाग मानने को तैयार ही नहीं था जो भी उसने अभी अभी सुना।

देव उससे कुछ दूरी पर उसके पीछे ही खड़ा था, और चुपचाप सब सुन रहा था।

वोह औरत बीना ज़ोर ज़ोर से रोने लगी थी। "नीलांबरी मुझे और सहाना को मारना चाहती है जैसे उसने मेरी बेटी और दामाद को मार दिया था। मैं अपनी बच्ची सहाना के साथ कुछ नही होने दूंगी। प्लीज इसे बचा लो!"

उस औरत ने सबिता का हाथ पकड़ लिया। "प्लीज, साबी। सहाना को बचा लो! मेरी बच्ची के साथ कुछ मत होने दो! वोह मासूम सी बच्ची है!"

सबिता बस सहाना को देख रही थी। उसने कुछ नही कहा बस उस छोटी सी बच्ची को देखती रही। वोह बच्ची अपनी नानी से और चिपक गई और डर से धीरे धीरे रोने लगी।

देव सबिता के नज़दीक बढ़ा और उसके पास ही खड़ा हो गया। "तुम्हे और तुम्हारी बच्ची को कुछ नही होगा," देव ने उस औरत से कहा। "हम वादा करते हैं की तुम्हे सेफ रखेंगे। बच्ची डर गई है। इसे लेकर तुम अंदर कमरे में जाओ तब तक मैं यहां तुम्हारी सुरक्षा का इंतजाम करता हूं।"

"क....कौन हो तुम?" उस औरत बीना ने पूछा।

"मैं देव सिंघम हूं," देव ने जवाब दिया।

उसका सरनेम सुन कर बिना थोड़ा निश्चित हो गई। उसका डर अब थोड़ा कम हो गया और वोह उसे बड़ी उम्मीद से देखने लगी। उसने अपनी आंसू पोछे और सहाना को गोद में उठा लिया। उस कमरे से ही जुड़े एक और कमरे में वोह उसे ले गई। अब इस कमरे में सबिता और देव ही थे बस। देव का दिल भारी होने लगा जब उसने सबिता को उसी जगह घूरते हुए देखा जहां अभी वोह औरत और वोह बच्ची बैठे थे। देव उसकी चाहते हुए भी कोई मदद नहीं कर सकता था। देव घुटने के बल बैठा और अपनी बांह सबिता के कंधे पर रख दी। उसने बिना कुछ कहे बस उसे पकड़ लिया। सबिता के, स्पर्श महसूस होते ही, आंसू बहने लगे।
"मुझे तोह यकीन ही नहीं हो रहा है यह...... मैने आज के दिन के लिए छह साल इंतजार किया था," सबिता ने फुसफुसाते हुए कहा। "छह साल अपनी बेटी से मिलने के लिए। सिर्फ इसी वजह से मैं आज तक जिंदा हूं। और अब....."

हम तुम्हारा ब्लड टेस्ट और डीएनए टेस्ट करवाएंगे पहले।," देव ने प्यार से कहा।

एक सिरहन सी महसूस हुई सबिता को लेकिन उसने कुछ नही कहा।

****

दो घंटे बाद देव सब को लेकर शहर पहुंच गया। डॉक्टर ने सबिता और सहाना का ब्लड सैंपल लिया। और उन दोनो के बालों का सैंपल भी लिया।
देव ने बीना और सहाना को हाई सिक्योरिटी के साथ एक गेस्ट हाउस में ठहरवा दिया जो सिंघम्स का ही था। और इस बात का सुनिश्चित करते हुए की वोह दोनो वहां कंफर्टेबल हैं उसके बाद वोह सबिता को लेकर अपने पैंटहाउस चला गया। सबिता पूरे रास्ते चुप रही।
"मुझे एक दिन में रिपोर्ट चाहिए," देव ने गाड़ी चलाते हुए ही फोन पर किसी को फरमान सुनते हुए कहा।
कॉल कटने के बाद देव ने सबिता की तरफ देखा की वोह ठीक तोह है। सबिता बस सामने रोड की तरफ ही देख रही थी।
"हमे कल तक रिजल्ट्स मिल जायेंगे," देव ने सबिता को उसकी तरफ देखते हुए प्यार से कहा।

"मुझे पता है रिपोट्स में क्या आएगा। बीना सच कह रही थी," सबिता ने उदासीनता से कहा जिससे देव को उसकी चिंता होने लगी।
देव ने उसे आगे कुछ नही कहा क्योंकि वोह बिना सबूत के उसे कोई खाली दिलासा नही देना चाहता था।

थोड़ी देर में ही वोह पैंटहाउस पहुंच गए।
"थोड़ा आराम कर लो, सबिता। तुम एक पल के लिए भी सोई नहीं हो।" देव ने उसे बैड पर बिठाते हुए कहा। "मैं तुम्हारे कमरे के साथ वाले कमरे में ही हूं। किसी भी चीज़ की जरूरत हो तोह मुझे बुला लेना।"
सबिता ने कुछ नही कहा। वोह बस चुपचाप उठ कर बाथरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। देव उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था। वोह उसके करीब उसके पास रहना चाहता था। उसे पकड़ कर उसके साथ सोना चाहता था। उसे कंफर्ट महसूस कराने के लिए। पर वोह खुद टूटा हुआ महसूस कर रहा था। सबिता अब किसी और एस शादी करने वाली थी। उसके अंदर एहसासों ने अब विद्रोह कर दिया था, वोह बस पलट कर जाने ही वाला था की वोह रुक गया क्योंकि उसे सबिता के रोने की आवाज़ आने लगी थी। वोह धीरे धीरे रोने और सिसकने की आवाज़ नही थी। वोह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए रोने की आवाज़ थी। ऐसे रोने की जब कोई बुरी तरह टूट जाता है, बहुत दुख में और दिल से फफक पड़ता है।
सबिता का रोना सुन कर देव को ऐसा लगा जैसे उसका खुद का दिल टूट गया हो। वोह तुरंत बाथरूम की तरफ दौड़ा और दरवाज़ा खोल दिया। सामने सबिता एक दीवार से टिक कर बैठी हुई थी और अपने पैर मोड़ कर घुटनों में मुंह छुपा रखा था। देव तुरंत नीचे बैठ गया और सबिता को पकड़ लिया ताकी उसका दुख कुछ कम कर सके। जब सबिता रो रो के थक गई तोह देव ने उसे गोद में उठा लिया और बैड पर लेटा दिया। वैसे तोह अब सबिता के लिए वोह पराया था लेकिन उसके दुख के आगे देव को कुछ समझ नही आया। वोह बस उसे कंफर्ट फील करना चाहता था जिसे वोह बहुत प्यार करता था क्योंकि सबिता को इस वक्त उसकी जरूरत थी।

देव उसके साथ ही बैड पर लेट गया और उसे बाहों में भर लिया।











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(पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏)

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