Aiyaas - 16 in Hindi Social Stories by Saroj Verma books and stories PDF | अय्याश--भाग(१६)

अय्याश--भाग(१६)

झुमकी काकी अपनी कोठरी से थाली लेकर आई तो मोक्षदा ने थाली में खाना परोस दिया और स्वयं की थाली लगाकर खाने बैठ गई,झुमकी काकी भी रसोई से बाहर खाना खाने बैठ गई,खाते खाते झुमकी काकी बोली....
बिटिया ! एक बात बोलूँ।।
हाँ!काकी कहो ना! मोक्षदा बोली।।
मुझे तो लड़का नेक दिखें है,तुम्हारी क्या राय है? काकी ने पूछा।।
स्वाभाव का तो सरल ही दिखता है,अब मन का कैसा हो कुछ कहा नहीं जा सकता ,मोक्षदा बोली।।
अब छोटे मालिक ने अपना मुनीम बनाया है तो कुछ सोचकर ही बनाया होगा,झुमकी काकी बोली।।
भइया की बातें ,भइया ही जानें मैं क्या जानू? मोक्षदा बोली।।
काहें तुम काहें नहीं जानती बिटिया,तुम भी तो इस घर में रहती हो,झुमकी काकी बोली।।
हाँ! रहती तो हूँ लेकिन मालिक तो भइया ही हैं,कल को भाभी आ जाएगी तो ना जाने मेरा क्या होगा? वो ना जाने कैसा व्यवहार करें मेरे साथ,मैं तो ये सोचकर ही डर जाती हूँ,मोक्षदा बोली।।
सही कहती हो बिटिया! इसलिए तो छोटे मालिक ने अभी तक ब्याह नहीं किया कि कहीं तुम्हें कष्ट ना हो,झुमकी काकी बोली।।
यही तो मुझे अच्छा नहीं लगता ,जब सब लोंग कहने लगते हैं कि देखो तो अपनी बाल विधवा बहन के पीछे ठाकुर बाबू शादी नहीं कर रहें,मोक्षदा बोली।।
उन्होंने कोशिश तो की तुम्हारा दूसरा ब्याह करने की लेकिन समाज इनकार करता है,झुमकी काकी बोली।।
काकी! बस करो ये बातें,मेरे जख्मों को मत कुरेदो,अब सहन नहीं होता,मोक्षदा बोली।।
ना बिटिया! मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहती थीं,मेरी बातों से तुम्हें दुःख हुआ तो मुझे माँफ कर दो,आज के बाद फिर से पुरानी बातें ना कहूँगी,झूमकी काकी बोली।।
दोष तुम्हारा नहीं है काकी! सब दोष तो मेरे भाग्य का है,भाग्य का लेखा कोई नहीं बदल सकता,मोक्षदा बोली।।
ना बिटिया! स्वयं को ना कोसो,उस ऊपरवाले की ना जाने क्या मर्जी है? जो इतनी सी उम्र में इतना बड़ा दुःख दे दिया तुम्हें,झुमकी काकी बोली।।
ये सब छोड़ो काकी ! ये बताओ और कुछ चाहिए,मैं तो खा चुकी,मोक्षदा बोली।।
नहीं बिटिया! मेरा भी खाना हो गया,झुमकी काकी बोली।।
तो अब मैं रसोई के किवाड़ लगा देती हूँ नहीं तो कहीं बिल्ली दूध ना पी जाएं,मोक्षदा बोली।
तो बिटिया! दूध ऊपर झींकें में क्यों नहीं टाँग देती? झुमकी काकी बोली।।
दूध अभी ठण्डा नहीं हुआ है इसलिए नीचें ही रहने दो,मोक्षदा बोली।।
ठीक है बिटिया! तो तुम अपने बिस्तर पर जाओ,मैं भी अपनी कोठरी में जाती हूँ,झुमकी काकी बोली।।
ठीक है काकी ! और इतना कहकर मोक्षदा अपने बिस्तर पर आकर लेट गई,लेकिन उसकी आँखों से नींद कोसो दूर थी,वो अपने आगें आने वाले जीवन के बारें में सोच रही थी कि भविष्य में उसका क्या होगा?कितना अच्छा होता अगर वो लड़का होती,कुछ तो सरल हो जाता उसके लिए जीवन जीना,पुरूषों के लिए क्यों कोई पाबन्दियाँ नहीं होतीं,सब कुछ स्त्रियाँ ही क्यों सहें? उसने तो नहीं चाहा होगा ना कि वो विधवा हो जाएं तो फिर क्यों? इस बैरी समाज ने सारा दोष उसके सिर मढ़ दिया,क्या उसे खुश रहने का अधिकार नहीं है? क्यों उसे रंगीन वस्त्रों से वंचित रखा जाता है,उसे भी तो रंगों से बहुत प्यार है,होली के रंग-बिरंगे रंगों में रंगने का शौक तो उसे भी है तो उसका ये शौक कभी भी पूरा ना हो सकेगा,शुभ कार्यों में लोंग मेरी छाया भी पड़ने नहीं देते ,क्या मैं इतनी अभागी हूँ ?शायद मेरे इन प्रश्नों के उत्तर मुझे कभी भी नहीं मिल पाएंगे.....
और ये सब सोचते सोचते मोक्षदा कब नींद के आगोश में चली गई उसे पता भी नहीं चला......
दूसरे दिन सुबह मोक्षदा को सुबह उठने में कुछ देर हो गई,तब तक उसके अमरेन्द्र भइया , सत्यकाम जाग चुके थे ,स्नान करके भी आ चुके थे और सुबह के जलपान की प्रतीक्षा में थे ,जब मोक्षदा को झुमकी काकी जगाने आईं तो मोक्षदा बोली.....
काकी! लगता है ताप चढ़ गया है,आज बिस्तर से उठने का मन नहीं कर रहा है।
कोई बात नहीं बिटिया! तबियत ठीक नहीं है तो तुम लेटी रहो,छोटे मालिक से कहें देते है कि तुम्हारी तबियत ठीक नहीं,झुमकी काकी बोली।।
और फिर झुमकी काकी ने अमरेन्द्र से जाकर कह दिया कि बिटिया की तबियत ठीक नहीं है,अमरेन्द्र ये सुनकर बोला....
कोई बात नहीं,मैं हलवाई के यहाँ से जलेबी और पकौड़ियाँ ले आता हूँ नाश्ते के लिए क्योकिं मुझे तो कुछ बनाना नहीं आता,पहले तो महाराजिन लगी थी खाना बनाने के लिए लेकिन उसके स्वर्ग सिधारने के बाद तो रसोई के सारे काम मोक्षदा ही करती है।।
हम सब तो जलेबियाँ और पकौड़ी खा लेगें लेकिन क्या मोक्षदा जी को ऐसी हालत में तला हुआ खाना देना मुनासिब होगा,सत्यकाम ने पूछा....
आपकी बात भी सही है,अमरेन्द्र बोला।।
उन्हें घर का ही कुछ हल्का फुल्का खाना चाहिए,सत्यकाम बोला।।
लेकिन अब इस समस्या का हल क्या है? अमरेन्द्र ने पूछा।।
इस समस्या का एक ही हल है कि भोजन मैं बनाऊँगा,सत्यकाम बोला।।
आपको भोजन बनाना आता है,अमरेन्द्र ने पूछा।।
मोक्षदा जी जैसा अच्छा तो नहीं बना पाऊँगा लेकिन खाने लायक तो बना ही लेता हूँ,सत्यकाम बोला।।
जी! आप भोजन बनाऐगे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा,अमरेन्द्र बोला।।
अरे! इसमें क्या है? आप ने मुझे अपना मित्र माना है तो मैं इतना तो कर ही सकता हूँ,सत्यकाम बोला।।
जी! ठीक है,तो फिर क्या बना रहे आज खाने में? अमरेन्द्र ने पूछा।।
जो आप कहें,सत्यकाम बोला।।
जो आपसे अच्छा बन जाएं तो बना लीजिए,अमरेन्द्र बोला।।
नाश्तें में मैं हम सबके लिए पूरी और आलू की तरकारी बना लेता हूँ क्योंकि ये मुझे बहुत पसंद है इसलिए अच्छे से बनानी भी आती है और मोक्षदा जी के लिए दलिया ठीक रहेगा,सत्यकाम बोला।।
जी! ठीक है,मैं आपकी सहायता के लिए रसोई में ही बैठता हूँ,अमरेन्द्र बोला।।
जी! बहुत ही बढ़िया,सत्यकाम बोला।।
और फिर थोड़ी सी मेहनत मसक्कत के बाद आखिर नाश्ता तैयार हो ही गया,सबने आलू पूरी खाएं और मोक्षदा के बिस्तर पर दलिया पहुँचा दिया गया,
नाश्ता करने के बाद सत्यकाम बाहर आम के बाग की ओर गया और उसे वहाँ उसे गिलोय दिख गई उसने उसे तोड़ा और उसका रस निकाल कर मोक्षदा के पास लेकर गया और उससे कहा कि इसे पी लें....
ये क्या है?मोक्षदा ने पूछा।।
गिलोय का रस है,इससे आपका ताप जल्दी उतर जाएगा,सत्यकाम बोला।।
सत्यकाम की बात सुनकर जैसे ही मोक्षदा ने गिलोय का रस पिया तो बोली.....
छीः...छीः....कितना कड़वा है,
देवी जी! आपकी बोली से तो कम ही कड़वा है,सत्यकाम बोला।।
मैं क्या इतना कड़वा बोलती हूँ? मोक्षदा ने पूछा।।
जी! इससे भी ज्यादा,आपके एक एक शब्द पत्थर की तरह होते हैं,घाव हो जाता है ..घाव,सत्यकाम बोला।।
सच में,मैनें तो ये कभी नहीं सोचा,मोक्षदा बोली।।
ये आपका दोष नहीं है,जो हर वक्त आपके मन में उथलपुथल मची होती है,ये उसी का दुष्प्रभाव है,जिससे आपकी बोली में मिठास नहीं रह गई है,सत्यकाम बोला।।
तुमनें कैसें मेरे मन का हाल जाना? मोक्षदा ने पूछा।।
ये सब तो आपके चेहरे से साफ साफ झलकता है,कोई भी बता देगा,सत्यकाम बोला।।
लेकिन आज तक तो किसी ने नहीं कहा,मोक्षदा ने पूछा।।
बहुत कम लोंग ऐसे होते हैं,जो दूसरों को खुश देखना चाहते हैं इसलिए उनकी भलाई की बात उन्हें बताते ही नहीं है,सत्यकाम बोला।।
तो इसका मतलब है कि तुम मुझे खुश देखना चाहते हो,मोक्षदा ने पूछा।।
मैं तो सबको खुश देखना चाहता हूँ लेकिन मेरी वजह से सब दुःखी हो जाते हैं,सत्यकाम बोला।।
ये कैसीं बातें करते हो?मोक्षदा ने पूछा।।
जी! मेरी वजह से बहुत से लोगों को दुःख पहुँचा है इसलिए कह रहा हूँ,सत्यकाम बोला।।
मुझे तो ऐसा नहीं लगता ,तुम तो मुझे काफी खुशदिल मालूम पड़़ते हो,मोक्षदा बोली।।
ये सब कहने की बातें हैं,चेहरा देखकर किसी के मन का पता नही लगाया जा सकता,सत्यकाम बोला।।
लेकिन अभी तो तुमने कहा कि तुमने मेरा चेहरा देखकर जाना कि मेरे मन के भीतर उथलपुथल चल रही है,मोक्षदा बोली।।
कुछ चेहरे आइने की तरह साफ होते हैं,सत्यकाम बोला।।
तुम्हारी बातें मुझे समझ नहीं आईं,मोक्षदा बोली।।
आप मेरी बातें ना ही समझें तो अच्छा है,सत्यकाम बोला।।
जैसी तुम्हारी मर्जी,मोक्षदा बोली।।
मेरी मर्जी चली होती है ना तो बहुत कुछ बदल जाता इस समाज में,सत्यकाम बोला।।
अच्छा जी! क्या बदलना चाहते हो तुम? मोक्षदा ने पूछा।।
सबसे पहले तो तुम पर से ये बाल विधवा का दाग हटवा देता,ये जो तुम सफेद साड़ी में फींकी सी जिन्दगी जी रही हो तो तुम्हारे भाई से कहकर तुम्हारा दूसरा विवाह करवा देता,क्या तुम्हारा मन कभी कभी रंगीन कपड़े पहनने का नहीं करता?तुम भी तो चाहती होगी कि तुम्हारी कलाइयों में लाल,हरी,पीली ,नीली चूड़ियाँ छनकें,हर सावन पर अपनी हाथलियों पर मेंहदी लगाने का मन तो तुम्हारा भी करता होगा,सच ...सच...बोलो करता है कि नहीं,सत्यकाम ने पूछा।।
ऐसी बातें मत करो जिनका कोई मतलब ही ना निकलता हो,मोक्षदा बोली।।
यही तो बस मेरी इन्हीं बातों से ही तो सबको चिढ़ है,इसलिए तो मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता,सत्यकाम बोला।।
मेरा वो मतलब नहीं था,मोक्षदा बोली।।
मैं सब समझता हूँ ,मैं यहाँ से जा रहा हूँ और इतना कहकर सत्या वहाँ से चला गया और मोक्षदा उसे जाते हुए देखती रही.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा.....


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