Aiyaas - 24 in Hindi Social Stories by Saroj Verma books and stories PDF | अय्याश--भाग(२४)

अय्याश--भाग(२४)

सत्यकाम अमरेन्द्र के घर से कुछ भी लेकर नहीं आया था,वो बिल्कुल खाली हाथ था उसके पास अगर कुछ था तो वो था मोक्षदा की कढ़ाई किया हुआ रूमाल,जिसे उसे मोक्षदा ने उपहारस्वरूप भेंट किया था,जिस रास्ते पर वो चल रहा था वो रास्ता उसका स्वयं का चुना हुआ ही था।।
वो रास्ते में यूँ पैदल चलता रहा जहाँ आसरा मिल जाता तो वही टिक जाता,रात कभी किसी पेड़ के तले गुजारता तो दिन के पहर रास्तों पर चलते चलते,अगर कहीं मजदूरी का काम मिल जाता तो एक दो दिन मजदूरी करके आगें जाने के लिए खर्चा निकाल कर फिर बढ़ जाता,उसका मन भी नहीं करता था एक जगह टिकने का,क्योंकि पहले उसने कई जगह टिककर देख लिया था।।
उसकी मंजिल कहाँ थी ये वो खुद ही नहीं जानता था,बस वो चलता चला जा रहा था मगर किसकी तलाश में? ये किसी को नहीं पता था,जब इन्सान को इस संसार से विरक्ति हो जाती है और उसकी मोह-माया खतम हो जाती है तो फिर उसे किसी चींज की सुध नहीं रहती,ना उसे लोक-लाज का भय रहता है और ना अपनी मान-मर्यादा का,उसे तो बड़ा सुकून और शान्ति चाहिए होती है और सुकून और शान्ति की खोज में ही सत्या भटक रहा था,ऐसे ही भटकते भटकते उसने अपने जीवन के दो साल और ब्यतीत कर दिए.....
और एक दिन वो यूँ ही एक गाँव के पास से होकर गुजर था,उसे कुछ थकान सी महसूस हुई और वो वहीं मंदिर के पास लगें बरगद के पेड़ की छाँव के तले बैठ गया,उसे अपनी तबियत कुछ ढ़ीली सी लग रही थी,काफी कमजोरी और थकान महसूस हो रही थी क्योंकि उसने कई दिनों से भरपेट खाना नहीं खाया था,इसलिए बरगद के पेड़ तले लेटते ही उसे नींद आ गई,वो काफी देर तक वहाँ यूँ ही सोया रहा...
कुछ ही देर में वहाँ मंदिर के पुजारी जी आ पहुँचे और उन्होंने जैसे ही सत्या को देखा तो बोलें.....
ये कौन भिखारी मंदिर के पास डेरा डालकर बैठा है,मंदिर की शोभा बिगड़ती है इसके यहाँ पड़े रहने से।।
पुजारी जी की आवाज़ सुनकर सत्या की आँख खुली और वो बोला....
माँफ कीजिए! बहुत बीमार हूँ,शरीर में हिम्मत नहीं है उठने की।।
तो मैनें क्या भिखारियों का ठेका ले रखा ? जो कोई भी आकर यहाँ डेरा डाल लेगा और मैं डालने दूँगा,अभी दो चार लोगों को बुलवाकर तुझे यहाँ से फिकवाता हूँ,पुजारी जी बोले।।
तभी पुजारी जी ने आस पास के लोंगो को आवाज़ दी.....
राधे....श्यामू....गंगा....नारायण.... यहाँ आओ जल्दी और इस भिखारी को यहाँ से उठाकर गाँव के बाहर फेंक दो,ना जाने कौन जात है? मंदिर को अपवित्र कर दिया....
पुजारी जी की बात सुनकर सत्या कुछ नहीं बोला,वो किसी से बहस नहीं करना चाहता था,वो देखना चाहता था कि दुनिया में इन्सानियत कितनी गिर गई हैं इसलिए उस समय उसने चुप रहने में ही भलाई समझी.....
जब सत्या को सब लोंग उठाकर ले जाने लगें तो एक बूढ़ी औरत उन सबके पास आकर बोली.....
अरे! इसे कहाँ ले जा रहे हो? ये तो हमारे घर आएं थे,हमारे रिश्तेदार हैं।।
लेकिन कुम्हारिन काकी! हम सब गाँववाले तो बरसन से देख रहें हैं कि तुम्हारे घर तो कभी कोई मेहमान नहीं आता,फिर आज ये मेहमान कहाँ से पैदा हो गया,उस भीड़ में से एक ने पूछा।।
जरूरी तो नहीं कि इस लड़के से हमारी रिश्तेदारी हो,कुछ रिश्ते इन्सानियत से भी तो बनते हैं,हम रखेगें इसे अपने घर में जब तक ये ठीक नहीं हो जाता,बुढ़िया बोली।।
कुम्हारिन काकी!तुम भी कैसीं बातें करती हो? ऐसे कैसे रख लोगी अपने घर में,ये कहीं कोई चोर-उचक्का हुआ तो,भीड़ में से दूसरा बोला।।
हमारे घर में चुराने के लिए है ही का,एक ठो बकरी है और दो-चार बरतन भाड़े,ले जाना होगा तो ले जाएगा चुराके,हम भी कौन सा वो सामान मरते बखत अपनी छाती पर लादकर ले जाने वाले हैं,कुम्हारिन काकी बोली।।
अभी ठीक से सोच और समझ लो,रामप्यारी!पुजारी जी भी बोले....
सब सोच और समझ लिया है हमने,इस लड़के को हमारे घर पहुँचा दो,हम इसकी सेवा करके इसे ठीक कर देगें,रामप्यारी बोली।।
अभी भी समय है ,फिर से एक बार समझ लो,कुम्हारिन काकी! और फिर इसे ले जाओगी तो खिलाओगी क्या? तुम तो खुदई भर पेट नहीं खा पाती,भीड़ में से तीसरा बोला।।
जो रूखा सूखा हम खाते हैं तो इसे भी वही खिला देगें,रामप्यारी बोली।।
ठीक है तो भाई! इस लड़के को रामप्यारी के घर पहुँचा दो,पुजारी जी बोले।।
और फिर सत्या माई के घर आ पहुँचा,उसे सब एक टूटी सी चारपाई पर लिटाकर चले गए,रामप्यारी सत्या के पास पहुँची,अपनी हथेली से छूकर उसका ताप देखा जो कि अभी भी बहुत तेज़ था,रामप्यारी ने फौरन घड़े का ठंडा पानी एक कटोरें में निकाला और गीली पट्टियांँ उसके माथे पर धरने लगी,पट्टियांँ रखने से ज्वर कुछ कम हुआ तो रामप्यारी ने फौरन ही बकरी का दूध दोहकर चूल्हें पर उबलने के लिए चढ़ा दिया,फिर उसे ठण्डा करने के लिए एक कटोरे में दूध भरकर पानी से भरे परात पर रख दिया कुछ ही देर में दूध ठण्डा हो गया तो रामप्यारी ,सत्या से बोली.....
लेव बचुआ! ई दूध पी लेव,भूख लगी होगी और बिमारी में बकरी का दूध बहुत फायदा करता है.....
माई! तुम मुझे अपने घर क्यों ले आई? सत्या ने पूछा।।
तुम्हें सब बुरा-भला कह रहे थे,हम बहुत देर से ई तमाशा देख रहे थे लेकिन बोले कछु नाहीं,फिर सब तुमको गाँव के बाहर निकालने की बात करने लगें तो हमें तुम पर तरस आ गया,तो हमने सबसे कह दिया कि तुम्हें हमारे घर पहुँचा दें,इन्सानियत भी कछु होती है कि नाहीं....रामप्यारी बोली।।
तुम ममता की देवी हो,एक पराए इन्सान पर इतना विश्वास कर लिया कि उसे अपने घर में आसरा दे दिया,सत्या बोला।।
ई सारे खेल तो वो सब ऊपरवाला रचता है,हम तो केवल जरिया होते हैं,शायद तुम्हारी किस्मत में हमारे घर का दाना पानी लिखा हो,रामप्यारी बोली।।
माई! तुम्हारे जैसा हर कोई सोचने लगें तो ये दुनिया पल भर में बदल जाए,सत्या बोला।।
बचुआ!ये दुनिया कभी ना बदलेगी,काहें से इहाँ बुरे लोंग कभी खतम होने वाले नाहीं,रामप्यारी बोली।।
माई!तुम सच में बहुत अच्छी हो,सत्या बोला।।
अब ज्यादा बातें नाहीं करो,ये दूध पी के आराम करों,तब तक हम चाक पर कुछ बर्तन बना लेते हैं,रामप्यारी बोली।।
और इतना कहकर रामप्यारी बाहर चली गई,सत्या ने दूध का बरतन अपने होठों पर लगाया तो उसे हींक सी आ गई क्योंकि इससे पहले उसने कभी भी बकरी का दूध नहीं चखा था,लेकिन फिर उसने अपने मन को पक्का किया और एक साँस में ही सारा दूध गटक गया,वो दूध ना पीकर रामप्यारी और उसकी ममता का निरादर नहीं करना चाहता था,उसे अभी भी कमजोरी लग रही थी इसलिए वो फिर से चारपाई पर लेट गया और कुछ देर बाद उसे नींद भी आ गई,
शाम होनें को आई थी और रामप्यारी अपना काम निपटाकर अपने घर के भीतर आई,फिर उसने सत्या को जगाकर एक लोटें में पीने के लिए पानी दिया,फिर बोली....
बचुआ! ई पुड़िया दी है गाँव के वैद्य ने ,बोले कि मरीज को खिला देना तो आराम लग जाएगा,तुम ये पुड़िया खा लो तो तुम्हें आराम लग जाएगा.....
फिर रामप्यारी ने अपनी सूती धोती के पल्लू के छोर में से पुड़िया निकालकर सत्या को दे दी,सत्या ने वो पुड़िया की दवा पानी के साथ गटक ली,
फिर रामप्यारी बोली....
बचुआ! बाहर दलान में बाल्टी में कुएंँ का ताजा पानी भरकर रख दिया है,तुम जाकर हाथ मुँह धो लो,तब हम खानें को कुछ बना लेते हैं,रामप्यारी ने चूल्हा सुलगाया और बटलोई में मूँग की दाल चढ़ा दी,दाल पक जाने के बाद उसने कुछ रोटियाँ भी चूल्हें में सेंक लीं और फिर दाल रोटी थाली में परोसकर बाहर दलान की चारपाई में बैठे सत्या को देदी और बोली....
लो बचुआ खा लो,मुझ बुढ़िया के पास यही रूखा सूखा है।।
ऐसी बात ना करो माई! ये तुम्हारी ममता करोड़ो रूपयों से भी ज्यादा है,इस ममता का कोई मोल नहीं,ये तो अनमोल है,तुमने जो इन्सानियत दिखाई है मेरे लिए उसका मैं सदैव ऋणी रहूँगा,सत्या बोला।।
ना बचुआ! माँ के लिए सब बच्चे एक समान होते हैं,तुम भी तो हमारे बच्चा ही हो,रामप्यारी बोली।।
माई! तुम क्या अकेली हो इस दुनिया में,सत्या ने पूछा।।
बहुत लम्बी कहानी है बचुआ! फिर कभी कहेगें,रामप्यारी बोली।।
ठीक है अब कुछ और ना पूछूँगा,सत्या बोला।।
अगर बुरा ना मानो तो हम एक बात पूछे,रामप्यारी बोली....
हाँ!माई बोलो! सत्या बोला....
कौन जात हो? रामप्यारी बोली।।
मैं ब्राह्मण हूँ माई!सत्या बोला।।
राम....राम...ई का पाप हो गया हमसे,अपना छुआ खाना खिला दिया तुमको,रामप्यारी बोली।।
माई! तुम्हारे साथ साथ पाप का भागीदार तो मैं भी हूँ,पाप तो मुझे भी पड़ेगा कि मैनें अपना सच सबसे छुपाया,सत्या बोला।।
नहीं!बचुआ! तुम पापी नहीं इन्सान हो,जो आजकल देखने को नहीं मिलते,रामप्यारी बोली।।
माई!ये बातें बस रहने दो,बहुत दुनिया देखी है मैनें और अपने अनुभव से ये तो जान ही सकता हूँ कि कौन सच्चा है और कौन झूठा,सत्या बोला।।
महान आत्मा लगते हो बचुआ! लगता माया-मोह के बन्धनों से मुक्त हो चुके हो,वो जननी और जनक धन्य है जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया,रामप्यारी बोली।।
बन्धनों से तो सच में मुक्त हो चुका हूँ,बस भटकता फिर रहा हूँ शांति की खोज में, सत्या बोला।।
ब्याह काहें नहीं किया अब तक,रामप्यारी बोली।।
सन्यासियों का कहीं ब्याह होता है माई! सत्या हँसते हुए बोला.....
तुमसे तो कोई भी शीलवती,सतवन्ती कन्या ब्याह करने को राज़ी हो जाएं,तुम्ही ने नहीं चाहा होगा ब्याह करना,रामप्यारी बोली।।
माई!मेरी बातें छोड़ो और तुम भी खाना खा लो,सत्या बोला।।
हाँ! सही कहते हो बचुआ! अभी काम भी तो पड़ा है,आज तो चाँदनी रात है,लालटेन यहीं बाहर रखकर कुछ काम निपटा ही लेते हैं,रामप्यारी बोली।।
अरे! माई! तुम खाना खाकर आराम करों,मेरी तबियत ठीक होते ही मैं तुम्हारे सारे काम पूरे करवा दूँगा,सत्या बोला।।
बचुआ!हमें क्या और पाप में डालोगें ? रामप्यारी बोली।।
तो क्या तुम्हारे घर में मुफ्त का बैठकर खाऊँगा? सत्या बोला।।
इसका मतलब है तुम अबसे हमारे पास ही रहोगे,रामप्यारी ने पूछा।।
अगर तुम चाहो तो रह जाता हूँ,सत्या बोला।।
इससे बढ़िया और का सकता है बचुआ?,मुझ बुढ़िया को सहारा मिल जाएगा,रामप्यारी बोली।।
तो फिर माई! खाना खाकर सो रहो,अब काम करने के लिए तुम्हारा बेटा तुम्हारे पास है ,सत्या बोला.....
और फिर कुछ ही दिनों में सत्या ने स्वस्थ होकर माई का सारा काम सम्भाल लिए,उसने चाक चलाना,मिट्टी को बरतन योग्य बनाना सब सीख लिया,वो नित नए नए बर्तन गढ़ता और उन्हें पकाकर फिर बैलगाड़ी में लादकर बगल वाले हाट में बेचकर भी आता,वो अब माई को ज्यादा काम नहीं करने देता था,अब उनके बाड़े में बकरी की जगह एक गाय आ गई थी,साथ में दो बैल और अपनी बैलगाड़ी भी थी ,उसी बैलगाडी पर ही सत्या पके हुए बरतन लादकर हाट ले जाता......
ऐसे ही सत्या को माई के पास रहते हुए सालभर ब्यतीत हो गया और फिर एक दिन सत्या माई के साथ बैलगाड़ी में बरतन लादकर बेचने के लिए हाट गया और फिर वहाँ एक महिला अपने पति के साथ मिट्टी के कुछ घड़े खरीदने आई और उसने जैसे ही सत्या को देखा तो उसकी आँखों से अविरल धारा बह चली और उस महिला को देखते ही सत्या का मन भी द्रवित हो गया,वो उससे बहुत कुछ पूछना चाहता था लेकिन संकोचवश कुछ बोल ना सका......
वो महिला भी सत्या से बहुत कुछ कहना और पूछना चाहती थी लेकिन अपने पति के साथ होने के कारण संकोच वश कुछ कह ना सकी और वहाँ से चली गई......

क्रमशः......
सरोज वर्मा......






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