Tantrik Masannath - 26 in Hindi Horror Stories by Rahul Haldhar books and stories PDF | तांत्रिक मसाननाथ - 26

तांत्रिक मसाननाथ - 26

तांत्रिक व पिशाच - 6

दोपहर को खाने के बाद तांत्रिक मसाननाथ अपने कमरे के बिस्तर पर आराम कर रहे थे। घड़ी में जब उन्होंने देखा कि 4 बज रहा है तब बिस्तर छोड़ बाहर कुर्सी पर जाकर बैठ गए। उनके हाथ में उस वक्त सन्यासी शिवराज बाबा के द्वारा भेजा गया चिट्ठी था। मसाननाथ उस चिट्ठी को देखते हुए हरिहर के आने का इंतजार करने लगे। हरिहर सुबह 10 बजे निकला है और अबतक नहीं लौटा।
मसाननाथ कुछ सोच रहे थे कि उसी वक्त बाहर से हरिहर की आवाज आई।

" हाँ यहाँ पर रख दो। तुम्हें कितना देना है ?
तुम मुझे बता दो ,मैं लिख कर रख दूंगा। जब मालिक आएंगे तब उनसे पैसे ले लेना। "
हरिहर के यह कहते ही वह आदमी चला गया।

उस आदमी के जाते ही हरिहर ने मसाननाथ से कहा ,
" बाबाजी ये रहा लकड़ी और आपने जो ताँबे के सिक्के के लिए कहा था उसे ढूंढने में बहुत मेहनत लगा। "
बोलते हुए हरिहर आँगन के एक तरफ बैठ गया।
मसाननाथ बोले,
" यह क्या बैठ गए। जाओ और खा लो। सुबह से शायद तुमने कुछ भी नहीं खाया।
हरिहर ने इसके उत्तर में बताया,
" जाते वक्त थोड़ा सा लाई लेकर गया था वही खाया हूं। अब एक कप चाय पिऊंगा। बाबा जी क्या आपके लिए भी एक कप चाय बोलूं? "

" हाँ जरूर। "

यह बोलकर हरिहर ने खाना बनाने वाली से कहा,
" 2 कप चाय मौसी। "

इसके बाद मसाननाथ बोले ,
" मुझे वो कागज दो। देख लूँ जो लाने को कहा था वही लाए हो या नहीं। "
हरिहर ने उस कागज को मसाननाथ के हाथ में दे दिया और बोला ,

" वहां है आम की लकड़ी, इधर रखा है सिंदूर, हल्दी, सरसों के दाने, हरड़, पांच कौड़ी , शुद्ध घी , सूखा मिर्च और ये रहा ताँबे का सिक्का। ये नौ सामान ही तो आपने लाने को कहा था। "

मसाननाथ ने एक बार कागज और सामग्री सब कुछ देख, प्रसन्न होकर बोले ,
" वाह हरिहर! तुम तो सब कुछ ले आए। अब आओ बैठो तुम्हें चिट्ठी में क्या लिखा है उसे बताता हूं। "

इसी बीच खाना बनाने वाली महिला दो कप चाय देकर गयी।
हरिहर ने चाय पीते हुए मसाननाथ से पूछा ,
" तांत्रिक बाबा अब बताइए कि शेर सिंह अच्छे आदमी थे या अत्याचारी? "
मसाननाथ चाय पीते हुए बोले,
" शेर सिंह एक अच्छे आदमी थे। अत्याचारी तो नहीं थे। "
हरिहर ने प्रश्न किया ,
" अत्याचारी नहीं थे तो कौन उन लाशों को कुएं में फेंकता था ? "
मसाननाथ ने उत्तर दिया,
" उन हत्याओं को शेर सिंह ने ही किया था। "
अब हरिहर फिर बोला,
" अच्छे आदमी थे और खून भी किया? तांत्रिक बाबा मैं कुछ समझ नहीं पा रहा। "
मसाननाथ कुछ देर शांत रहे और फिर बोले,
" हरिहर अगर मैं तुम्हें चिट्ठी में जैसा लिखा है वैसा समझाने जाऊं तो तुम्हें कुछ भी समझ नहीं आएगा। मैं तुम्हें अपनी तरह समझा कर बताता हूं।
हमारे तंत्र शास्त्र में वशीकरण नाम की क्रिया है। तंत्र सिद्धि क्रिया भी इसी में से एक तंत्र शब्द है। वशीकरण का मतलब है कि किसी एक मनुष्य के शरीर के एक अंश जैसे उसके कपड़े, उसके बाल व शरीर का कोई आभूषण भी हो सकता है। इन विभिन्न सामान से उस व्यक्ति को मंत्र द्वारा अपने वश में करने को ही वशीकरण कहते हैं। और तंत्र सिद्धि का मतलब है कोई एक व्यक्ति अगर बताए गए दिनों तक किसी देव - देवी व किसी तंत्र में क्रमशः साधना करता रहे एवं वह अगर उस साधना में सफल होता है तो उसे उस साधना में तंत्र सिद्ध कहा जाता है।
उस गांव में मालती नाम की एक सुंदरी महिला थी। रूप के साथ उनके अंदर कुछ विशेष गुण भी थी लेकिन दुर्भाग्यवश सभी अवगुण थे। शेरसिंह इसी अवगुण का शिकार हो गए। अपनी सुंदरी पत्नी होने के बावजूद मालती के रूपजाल में शेर सिंह फंस गए। इसका एक ही कारण था और वह है वशीकरण तंत्र। मालती देवी किसी बड़े पिशाच की उपासना करती थी। मालती इस पिशाच तंत्र में सिद्ध होना चाहती थी। जिसके लिए लगभग 1 साल का समय लगता है। इस तंत्र साधना के पूजा के लिए कुछ विशेष नियमों को मानना पड़ता है। इस पूजा को साल के प्रथम महीने की अमावस्या से अंतिम महीने की अमावस्या तक करना पड़ता है । कुछ महीने तो साधारण तरीके से पूजा की जाती है
जिसमे हर महीने के अमावस्या को एक नरबलि की जरूरत पड़ती है। लेकिन कुछ महीने के बाद इस पूजा में हर शनिवार एक नरबलि देना पड़ता है। और अंतिम अमावस्या को पूजा के अंतिम दिन पांच लोगों की नरबलि आवश्यक है। पूजा सम्पूर्ण होते ही साधक पिशाच तंत्र में सिद्ध हो जाएगा। इसके बाद उसे कोई भी नहीं हरा सकता। मालती का उद्देश्य भी यही था।
मालती समझ गई थी कि गांव के जमींदार की अनुमति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता इसीलिए अगर जमींदार को ही वश में किया जाए तो उनकी यह साधना बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाएगा। इसीलिए मालती ने सबसे पहले जमींदार को अपने वश में किया। इसके फलस्वरूप जमींदार मालती के कहे अनुसार कार्य करते थे। जमींदार साहब का अपने ऊपर कुछ भी नियंत्रण नहीं था। मालती को जब भी नरबलि के लिए किसी व्यक्ति की जरूरत होती तब जमींदार से कहकर किसी भी आदमी को , वो क्या कहते है इंग्लिश में हाँ, किडनैप करवाकर वह उसका नरबलि देती। "

तबतक हरिहर ने अपना चाय पी लिया था। कप को रखते हुए उसने मसाननाथ से पूछा ,
" वैसे तांत्रिक बाबा नरबलि देना इतना आसान नहीं है तो यह सब कहां होता था ? "

" यही सभी समस्याओं का जड़ है। यह कार्य उस कुएं के नीचे होता था। "

हरिहर आश्चर्यचकित हो गया और बोला ,
" कुएं के अंदर, यह कैसे सम्भव है ? अंदर तो पानी रहा होगा? "

" कुएं के अंदर पानी था लेकिन इस तंत्र साधना के पहले जमींदार ने सबकुछ व्यवस्था कर लिया था। क्योंकि उस वक्त जमींदार साहब मालती के इशारे पर काम कर रहे थे। इसके फलस्वरूप मालती ने पूरे गांव में यह अफवाह फैला दिया कि कुएं में खून करके लाशों को फेंका जाता है , इसीलिए गांव वाले इस कुएं से पानी लेने नहीं आते थे। और तभी से यह जल संकट शुरू हुआ। गांव वाले इस कुएं से पानी लेने नहीं आते थे इसीलिए इसके नीचे पिशाच मूर्ति स्थापित करने में और सुविधा हुई। यह सभी कार्य जमींदार ने खुद ही संपूर्ण करवाया। अंदर जाने के लिए एक सीढ़ी भी बनवाया गया। हर अमावस्या को पिशाच की पूजा के लिए जब मालती कुएं के अंदर जाती, इसके बाद जिसकी बलि दी जाएगी उसे लेकर जमींदार खुद कुएं के अंदर जाते थे। इसी तरह हर अमावस्या को नरबलि होता रहा। और इन सब की व्यवस्था जमींदार साहब अनजाने में खुद ही करते थे। "

हरिहर ने मसाननाथ को रोकते हुए प्रश्न किया,
" जमींदार इतना पाप कर रहे थे क्या उन्हें कुछ भी पता नहीं चल रहा था ? "

मसाननाथ ने उत्तर दिया ,
" यह वशीकरण तंत्र इतना प्रभावी है कि किसी भले आदमी को भी खराब से खराब कार्य करवा सकता है। इसीलिए ऐसे आदमी से दूर रहने में ही भलाई है लेकिन दुर्भाग्यवश शेर सिंह उसके रूप के जाल में फंस गए। अपने रूप के जाल में फंसाकर ही मानते ने जमींदार को पूरी तरह अपने वश में कर लिया। अब उस शाम की बात बताता हूं जब वह विभत्स घटना घटी।
उस दिन सुबह के वक्त पास के गांव में अर्थात जहां पर सन्यासी शिवराज बाबा रहते हैं वहां पर शेर सिंह किसी कार्य के लिए गए थे। अपने कार्य को समाप्त कर जमींदार शाम के वक्त सन्यासी शिवराज बाबा के आश्रम पहुंचे। वहां जाकर जब शेर सिंह ने सन्यासी शिवराज बाबा के चरणों को छूकर प्रणाम करने गए तभी सन्यासी शिवराज बाबा चौंक गए। उनके पूरे शरीर में एक बिजली दौड़ गई और डर से दो कदम पीछे हट गए। शेरसिंह के खड़े होते ही उनकी आंखों में देखकर सन्यासी शिवराज बाबा समझ गए कि यह शरीर शेर सिंह का नहीं , है यह शरीर इस वक्त किसी और के वश में है। उन्होंने तुरंत ही अपने तंत्र शक्ति के माध्यम से शेर सिंह के ऊपर हुए वशीकरण को
समाप्त कर दिया। इसके बाद सन्यासी शिवराज बाबा अपने ध्यान शक्ति के माध्यम से शेर सिंह के द्वारा किए गए गलत कार्य को जान गए तथा शेर सिंह को भी उन्होंने सब कुछ बताया। सब कुछ सुनने के बाद शेर सिंह अंदर से एकदम टूट गए।
लेकिन जब शेर सिंह को सन्यासी शिवराज बाबा से पता चला कि आज ही इस साधना का अंतिम अमावस्या है तथा आज ही इस साधना का अंतिम दिन भी है। आज इस साधना को पूर्ण करने के लिए 5 लोगों की नरबलि लगेगी। और उन 5 लोगों के तालिका में जिनके नाम हैं उसे सुन शेर सिंह गुस्से से आगबबूला हो गए। क्योंकि उन पांच लोगों में सभी शेर सिंह के परिवार वाले थे। उस तालिका में थे शेर सिंह स्वयं , उनका लड़का, उनकी पत्नी, उनका प्रिय सेवक व दरबान। उन सभी की बलि देकर मालती अपने गलत कार्य का प्रमाण पूरी तरह समाप्त कर देना चाहती थी। जिससे बाद में कोई उसके इस घिनौनी अपराध को जान ना पाए। "

इसी बीच फिर से हरिहर ने पूछा,
" तांत्रिक बाबा मुझे एक बात समझ नहीं आ रहा है कि आखिर जमींदार साहब सन्यासी शिवराज बाबा के पास ही क्यों गए ? क्या वह पहले से ही उन्हें जानते थे ? "

मसाननाथ ने उत्तर दिया,
" कुछ बड़े धनी परिवार नियम अनुसार अपने यहाँ ब्रह्मण पुजारी नियुक्त करते हैं। वह परिवार केवल उसी नियुक्त पुजारी या पुरोहित के द्वारा ही सभी शुभ कार्य करवाते हैं। अब अपने मालिक अर्थात मुखिया राजनाथ जी को ही देख लो जैसे उन्होंने मुझे बुलाया। इससे पहले भी जितने शुभ कार्यक्रम इस घर में हुए ब्राह्मण पुजारी के रूप में मुझे ही उन्होंने बुलाया है , और आज के पूजा के लिए भी मुझे ही बुलाया। हालांकि अब समस्या काफी गंभीर है। मुझे असल में केवल उस जगह के अशुभ दोष को काटने के लिए एक पूजा की जाए इसीलिए बुलाया था। ठीक इसी तरह सन्यासी शिवराज बाबा भी उस जमींदार परिवार के ब्राह्मण पुरोहित थे। अपनी सभी शुभ कार्य , पूजा , श्राद्ध इत्यादि सब कुछ सन्यासी शिवराज बाबा ही करते थे। इसीलिए शेरसिंह लौटते वक्त उनके आश्रम में प्रणाम करने गए थे। "
कुछ देर शांत रहने के बाद फिर से तांत्रिक मसाननाथ ने बताना शुरू किया,
" इसके बाद जमींदार शेर सिंह और सन्यासी शिवराज बाबा ने तय किया कि मालती को रोकना होगा , और इसका एकमात्र उपाय यह है कि मालती की हत्या करनी होगी क्योंकि अगर वह जिंदा रही तो किसी ना किसी तरह इस तंत्र साधना को अवश्य पूर्ण कर लेगी। उसकी हत्या भी उसी रात करनी होगी। इसके बाद सन्यासी शिवराज बाबा को साथ लेकर शेर सिंह अपने घर पहुंचे। उस शाम को जब शेर सिंह एक धारदार हथियार लेकर जा रहे थे , उस वक्त सन्यासी शिवराज बाबा बाहर ही प्रतीक्षा कर रहे थे। इसके बाद दोनों कुएं के पास गए। कुएं के पास पहुंचते ही सन्यासी शिवराज बाबा समझ गए कि अंदर पूजा व यज्ञ शुरू हो गया है। पूरे कुएं को उन्होंने मंत्र शक्ति द्वारा पहले बांध दिया जिससे कुएं से निकलने वाली कोई अशुभ शक्ति गांव में न फैल जाए। इसके बाद शेर सिंह पीछे पीछे सन्यासी शिवराज बाबा भी कुए के अंदर गए। और फिर वह दोनों अपने कार्य को समाप्त करके बाहर निकल आए। उस रात हल्की बारिश व बिजली गरजने के कारण मालती की चीखें किसी भी गांव वालों को नहीं सुनाई दिया। इस चिट्ठी में सन्यासी शिवराज बाबा ने यह भी लिखा है कि शेर सिंह जब धारदार हथियार द्वारा मालती की शरीर पर वार कर रहे थे तब पूरे कुएं में एक अद्भुत भूकंप भी उन्होंने महसूस किया था। अगर जल्दी से वह दोनों वहां से नहीं निकलते तो शायद कुएं के अंदर ही दब सकते थे। इसीलिए मालती को बिना जलाये ही दोनों कुएं से बाहर आ गए। उनके बाहर निकलते वक्त कुछ भयानक शक्ति कुएं से बाहर की ओर निकलना चाहती थी। ऐसा कुछ अवश्य होगा इसीलिए सन्यासी शिवराज बाबा ने पहले से ही मंत्र शक्ति द्वारा कुएं के मुँह को बांध दिया था। उसी रात गांव के एक मिस्त्री को बुलाकर पूरे कुएं के मुंह को सीमेंट की परत द्वारा बंद कर दिया गया। तथा उसके चारों कोने में चार ताले लगाए गए। ये चारों ताले पवित्र ताले थे। तालों को मंत्र द्वारा पवित्र किया गया था। एक मंत्रयुक्त पवित्र शक्तिशाली धागे के द्वारा कुएं के अंदर रहने वाले अशुभ शक्ति को सन्यासी शिवराज बाबा ने अंदर ही रोक दिया।

इसके बाद आधी रात को सन्यासी शिवराज बाबा को उनके आश्रम में पहुंचाकर शेर सिंह अपने घर पहुंच गए। जमींदार शेर सिंह के उस रात घर लौटने की घटना को ही हमने उनके लड़के प्रताप से सुना था। उसने बताया कि उसके पिताजी के कपड़ों पर खून लगा हुआ था। वो खून मालती की ही थी। इसके बाद जो घटना घटी वह पूरी तरह शेर सिंह का अपना व्यक्तिगत है। शायद वो अपने द्वारा अनजाने में किए गए अपराध में इतना डूब गए थे कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। जो भी हो लेकिन अपने अनजाने में उन्होंने गांव कि कई आदमियों को बलि में झोंक दिया था। यहीं पर इस चिट्ठी की कहानी समाप्त हुई।"

हरिहर ने तुरंत ही पूछा ,
" तांत्रिक बाबा यह तो कहानी थी क्या यहीं पर सब कुछ खत्म। आप गांव को कैसे बचाएंगे क्या इस बारे में उन्होंने कुछ भी नहीं बताया ? "

मसाननाथ ने फिर बोलना शुरू किया,


" सन्यासी बाबा ने सब कुछ ही बताया है , और उसे करने के लिए हमें बहुत ही कठिनाई का सामना करना होगा यह भी उन्होंने लिखा है। पहले तो हमें यह करना है कि हमें उस कुएं के अंदर जाना होगा। "

यह बात सुनते ही हरिहर आश्चर्यचकित हो गया और बोला,
" रात को और वह भी उस भयानक कुएं के अंदर कौन जाएगा ? "

" हम और तुम , क्यों क्या हुआ? और किसी साहसी व्यक्ति को तो मैं इस गांव में नहीं पहचानता । "
कहते हुए मसाननाथ मुस्कुराने लगे।

यह हंसी देखकर हरिहर को थोड़ा गुस्सा आया और वह बोला,
" तांत्रिक बाबा आप हँस रहे हैं इसमें तो हमारी जान भी जा सकती है। "

अचानक ही दूर से किसी के चिल्लाते हुए मुखिया घर की ओर आते हुए दिखाई दिया।...

क्रमशः....


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