Dogi ka Prem - 8 in Hindi Animals by कैप्टन धरणीधर books and stories PDF | डोगी का प्रेम - 8 - चेरी का शत्रु भाव

डोगी का प्रेम - 8 - चेरी का शत्रु भाव

जिस तरह इंसान को किसी व्यक्ति से अनबन हो जाती है या शत्रुता हो जाती है तो..वह उन सबको शत्रु मानने लगता है जो उस व्यक्ति से संबंध रखते है, उसके मित्र, उसके भाई बहिन, परिवार के अन्य लोग उसके रिश्तेदार ..वह जब भी उनको देखेगा अंदर ही अंदर कूढता रहेगा । अपने शत्रु के शत्रु को मित्र मानकर उससे व्यवहार करेने लगता है ।
चेरी मौहल्ले के एक डोगी.. जो वह भी लेब्रा ही था उससे चिड़ती थी ..चिड़ने का कारण उसका सजातीय होना नही था ..क्योकि बाकि लेब्रा डोगी से खेलने का मन उसका होता था ।
बैर का कारण यह ,जब चेरी छोटी थी तब उस डोगी से उसकी मुलाकात हुई .. तो उसने उसको काट लिया था ..तबसे उससे शत्रुता पाले बैठी थी । वह जैसे ही दिखाई देता बावली हो जाती ..हम सोचते ..यह सिर्फ..विरोध में भौंकती है..लेकिन ऐसा नहीं था ..एक बार उसे देखकर दौड़ पड़ी..चेरी को आते देख ..वह डोगी भागकर अपने घर के गेट के अंदर घुसकर जोर जोर से भौंकने लगा ..चेरी उसके गेट पर जाकर भौंकने लगी ..मैं उसके पीछे पीछे गया ..उसे बुलाने लगा..मुझे अपने पास आया देख वह गेट के अंदर जाने लगी ..तब तक तो वह डोगी भी बाहर आ गया, चेरी ने उसकी गर्दन को पकड़ लिया ..मैने दोनों को छुड़ाया..अंदर से उस डोगी की मालकिन भी आ गयी ..वह अपने डोगी को अंदर खींचकर ले गयी ..मैने चेरी को छोड़ दिया ..चेरी अपने पैरों से मिट्टी पीछे फेंकती हुई भौंकती भौंकती गेट के पास चली गयी..वह अपने दोनों आगे के पैरों को गेट के नीचे डालकर अपना मुंह गेट के नीचे लगा कर उसको देख देखकर ललकार रही थी ..जैसे कह रही हो ..बाहर निकल ..बाहर निकल..मुझे हंसी आरही थी उसकी पहलवानी देखकर ..मैने गले की रस्सी पकड़ी और ले आया ..किन्तु वह पीछे देख देखकर भौंक रही थी ..
हमने देखा कि उस डोगी के परिवार वालों को भी देखकर वह चिड़ती थी ..जैसे उस परिवार का सदस्य रास्ते से निकलता ..चेरी अंदर चाहे खेल रही हो या खाना खा रही हो वह दौड़ पड़ती..वे भी जानते थे कि यह हमे देखते ही भौंकती है ..जब यह भौंकती तो वे भी मुस्कुरा कर निकल जाते ।
एक दिन चेरी को बाहर मैन रोड़ पर घुमा रहा था ..बगल से कार निकली ..चेरी भौंकती हुई उसके पीछे पीछे दौड़ने लगी ..
हम जानते थे .. चेरी उस परिवार के सदस्य को देखकर दौड़ती है , इसीलिए हम बच्चों को घुमाकर लाने के लिए ..उसे नहीं देते थे ..
एकबार मैं दौड़ लगा रहा था, सोचा चेरी भी साथ साथ दौड़ लेगी ..उसको भी साथ साथ लिए उसकी रस्सी लिए दौड़ रहा था ..अचानक उस परिवार का सदस्य अपनी कार से निकला ..वह मेरे दायें भाग में दौड़ रही थी ..सहसा भौंकती हुई मेरे सामने से मेरे बायें भाग में आगयी ..मैं रस्सी में उलझकर ..धड़ाम से सड़क पर गिर गया ..मेरे घुटने व हथेली छिल गयी थी ..रस्सी भी छूट गयी ..चेरी दौड़ी..किन्तु उसी पल मेरे पास आ गयी वह मुझे सूंघने लगी ..संभवतः उसे एहसास हो गया था कि मेरे लग गयी है ..मैं उठकर घर के अंदर आ गया चेरी भी पीछे पीछे आ गयी ..मैं अपनी चोट देख रहा था ..चेरी भी वही देख रही थी ..मै बोला गिरा दिया ना तुमने ..चेरी पूंछ हिला रही थी ..मेरे पास ही बैठ गयी और मेरे चोट लगे स्थान को अपने नथुनों को हिला हिलाकर सूंघ रही थी .. मै उसकी संवेदना समझ रहा था ..शाम को जब उसे फिर घुमाने लेकर गया तो मुझे चलने में दिक्कत हो रही थी ..मैने कहा धीरे चलना मेरे से चला नही जायेगा तेरे साथ..मैने देखा चेरी जो तेज कदम से चलती थी वह धीरे चल रही है ..
क्रमश --



Rate & Review

गायत्री शर्मा गुँजन

जानवर जितना वफादारी निभा सकता है उतना निश्चलता से हम कोई रिश्ता नहीं निभा सकते । क्योंकि मानसिकता ऐसी है कि जहां स्वहित , वहीं झुकाव ! बहुत बेहतरीन लेखन !

कैप्टन धरणीधर
Kuldeep pareek Pareek

nice

Hannah

Hannah 2 months ago

ek pashu premi hi samjh sakta h..

Anirudh  Pareek

Anirudh Pareek 2 months ago