Vo Pehli Baarish - 41 in Hindi Novel Episodes by Daanu books and stories PDF | वो पहली बारिश - भाग 41

वो पहली बारिश - भाग 41


मीटिंग खत्म होते ही निया बाहर निकल आई , और उसके पीछे पीछे बाहर आती हुई चंचल बोली।
“निया.. एक मिनट मेरे साथ आओ, बात करनी है।"

निया चंचल के पीछे मीटिंग रूम में जाकर मुँह लटकाए खड़ी हो गई।

“फिक्र मत करो, मैं तुमसे दोबारा कुछ नहीं पूछूँगी, की क्या हुआ है और क्या नहीं।"

“फिर?”, निया ने धीरे से बोला।

“मुझे पता है, की तुमने अपनी तरफ से पूरी मेहनत करी थी, पर अब तुम्हें जाना पड़ रहा है, तो किसी भी बात को लेकर परेशान मत होना। मैं इस बात का ख्याल रखूंगी की तुम वहाँ जाकर भी हमारे ही किसी प्रोजेक्ट पे काम करो...”, निया को प्यार से समझाते हुए चंचल बोली।

“थैंक्स मै'म..”, बाहर निकलती हुई चंचल को निया ने बोला, जिसपे चंचल धीमे से मुस्करा दी।

कुछ देर बाद अपने डेस्क पे बैठी निया को ध्रुव का मैसेज आता है।

“कॉफी?”

“हाँ..”, ये लिखते ही, निया अपने डेस्क से उठ कर ब्रेकआउट एरिया चली गई।

चन पलों बाद ध्रुव भी डेस्क से उठ कर, निया के पीछे वहाँ पहुँच गया।

“आज का स्टार आ गया.. मुबारकां मुबारकां.. हमारे बीच का काम्पिटिशन तुम जीत गए।", मुस्कराते हुए निया ने ध्रुव को आते देख बोला।

“तुम ठीक हो ना?”, निया के हँसते हुए चेहरे को देख ध्रुव ने थोड़ी गंभीरता से पूछा।

“मैं तो एकदम ठीक हूँ.. लगता है तुम्हें कुछ हो गया है, सुबह से मुझसे यही सवाल करे जा रहे हो।"

“हह.. हाँ, वो कुछ तो है, जो मुझे सही नहीं लग रहा।"

“मैं एकदम ठीक हूँ.. मेरे घर वालों ने सिखाया है, की अपने लिए दुखी होने से ज्यादा दूसरे के लिए खुश होना बेहतर है, इसलिए मैं बस खुश हूँ तुम्हारे लिए।"


“अच्छा..”, धीरे से बोलते हुए, ध्रुव ने अपने मग में कॉफी डाली।

“तो फिर आज की पार्टी कहाँ है?”

“जहाँ तुम्हें चाहिए हो..”

“ठीक है, फिर तो कोई महंगी सी जगह ढूंढती हूँ मैं। आज तुम्हारी पार्टी में चलेंगे.. दो दिन बाद मेरी फेरवेल वाली पार्टी में।"

“हह.. तुम जा रही हो?”

“हाँ.. तुम पागल हो गए हो क्या, सुना नहीं तुमने, अंदर बोला तो था ना ये।"

“हाँ.. ये तो बोला था, पर फ्लैट में तो यही रहोगी ना?"

“हमारी कंपनी, तुम्हारी कंपनी की तरह यहाँ थोड़ी है। मैं वापस चली जाऊँगी, कुछ दिन सिमरन के साथ उसके रूम में रहूँगी, फिर देखती हूँ, क्या करना है...", निया ने ध्रुव को बताया।

“ओह.. अच्छा।", मायूस सा ध्रुव ये बोल कर वहाँ से निकल गया।

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निया अपना ज्यादातर समान समेट रही थी, जब रिया उसके पास आकर बोली।

“देख तूने मुझसे कहा था, की तू नई रूम्मेट ढूंढ कर देगी।"

“हाँ... तू फिक्र मत कर.. जब तक नहीं मिलेगी, मैं किराया दूँगी। वैसे भी मुझे कौन सा अभी नया घर मिल गया है।"

“तो एक काम कर ना.. तू यहीं रह जा, जब तक तुझे कुछ नहीं मिलता। रोज़ यही से आना जाना कर लियो।"

“हहम्म.. सीधा सीधा बोल ना की तुझे मिस करेगी।”, अपने सामने खड़ी रिया को देखते हुए निया बोली और जाकर उसको गले लग गई।

“हाँ.. वो भी करू शायद, पर अभी मुझे अपने पैसों की चिंता ज्यादा है।", रिया ने भी गले लगते हुए कहा।

“तुम दोनों ये बेस्ट फ्रेंड बेस्ट फ्रेंड शो फ्री में दिखाते हो क्या?”, सामने खड़े हुए कुनाल ने दोनों को गले लगे हुए देख कर बोला।

“क्या?”, रिया ने गंदा सा मुँह बनाते हुए पूछा।

“क्या क्या.. तुम्हारा दरवाज़ा फिर से खुला था। ठीक है, हम जहाँ रहते है, वहाँ कोई खतरे वाली बात नहीं है, पर फिर भी इंसान थोड़ा तो ध्यान देता है..”, कुनाल रिया को ज्ञान देते हुए बोल ही रहा था, की इतने उसके साथ खड़ा हुआ ध्रुव जाकर निया को गले लगा लेता है।

ध्रुव के अचानक से गले लगाने पे निया धीरे से बोली, “क्या हुआ?”

“वो कुनाल.. उसे तो ऐसा ही लगता है ना, की हम साथ है.. तो बस...", हल्का सा पीछे होते हुए ध्रुव बोला।

“यहां सारे एक से बढ़ कर एक है।", कुनाल बोला।

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“वैसे मैं अभी ठीक हूँ।", सुनील चंचल की तरफ देखते हुए बोला।

“जितनी जल्दी ठीक हो जाओगे, उतना ही अच्छा है, तुम्हारे लिए।", पास ही बैठी चंचल ने सुनील की जगह टीवी पे ध्यान देते हुए बोला।

“वैसे तुम, एक बार पूछ सकती थी ना, की मैं कैसा हूँ?”, सुनील ने जवाब में बोला।

“और तुम एक बार के लिए.. बस एक बार के लिए, ये सब मेरी मम्मी को नहीं बताते तो क्या चला जाता तुम्हारा।", चंचल ने रूखे अंदाज में बोला।

“देखो वो तो..", सुनील बोल ही रहा होता है, की चंचल का फोन बज जाता है।

“ये मैं क्या सुन रही हूँ।", चंचल के हैलो बोलते ही सामने से आवाज़ आती है। "जरूरी था क्या की तुझे ये सब जितना।"

“मम्मी, ये फैसला मैंने नहीं ऑफिस वालों ने किया है।"

“पर तू मना भी तो कर सकती थी ना, की तू इसके बिना काम नहीं करेगी।"

“तो वो साफ साफ कहते, की मत करो.. हम किसी और को ढूंढ लेंगे। उनके पास कमी नहीं है कोई।"

“तो छोड़ दे, इसकी ही कंपनी में ढूंढ लो कोई जॉब।"

“जबरदस्ती थोड़ी चली जाऊँगी, इसकी कंपनी में कोई जॉब होनी भी तो चाहिए, मेरे लिए।"

“इतनी बड़ी कंपनी है, कुछ तो होगा ही तुम्हारे लिए.. ऐसा कैसा टॉप किया था तुमने, की तुम्हें कोई नौकरी देने को भी राज़ी नहीं होता।"

“मम्मी.. ऐसे नहीं होता है ना, मैं कितनी बार आपको समझाऊ यार..”, कुछ देर यूं ही बात कर, आखिरी में चंचल ने गुस्से में फोन काट कर दूर पटक दिया। "सुना ना तुमने..”, साथ बैठे सुनील को चंचल ने बोला।
“हाँ.. सुनाने के लिए तो तुमने फोन स्पीकर पे रखा था।", सुनील ने चिड़ते हुए जवाब दिया। "तुम्हें पता है, मैं ना इन सब चीजों से परेशान हो चुका है।"

“मैं भी..”, चंचल के इतना बोलते ही दोबारा से फोन बज पड़ा। "और लो फिर से फोन या गया.. तुम्हारी वकालत करने के लिए।"

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“तुम्हें तुम्हारे दोस्त से गाड़ी नहीं मिली अभी तक?”, अपनी गाड़ी में साथ वाली सीट पे बैठे दीवेश से नीतू ने पूछा, तो देखा की वो सो गया था। “इसके कहीं भी सोने की आदत गई नहीं है अभी तक..”, खुद से बोलते हुए नीतू मुस्करा दी।

दीवेश नीतू की सोसाइटी से कुछ दूर एक दूसरी सोसाइटी में ही अपने दोस्त के पास जा रहा था।

“उठो.. तुम्हारी सोसाइटी आ गई..”, दीवेश को जी भर के निहारने के बाद नीतू बोली।
“हह.. क्या टाइम हो गया?”, एक दम से उठ कर दीवेश बोला।

“8:30”

“इतनी लेट कैसे हो गए?”

“वो..”, नीतू बोल ही रही होती है, की उसे काटते हुए दीवेश आगे बोला।

“मुझे डेट के लिए लेट हो गया मैं, कल मिलते है, बाय..”, गाड़ी से निकल कर दिवेश भागा।













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