Kismat ka likha in Hindi Love Stories by Khushi Saifi books and stories PDF | किस्मत का लिखा

किस्मत का लिखा

"किस्मत का लिखा”

“दानियाल ! तुमको याद है जब हम पहली बार मिले थे उस रेस्टरेंट में, जब तुम गलती से हमारी टेबल पर कर बैठ गये थे”... रिदा ने मुस्कुराते हुए पिछले दिनों को याद किया।

“हाँ! बोहोत अच्छे से याद है, उस दिन को कैसे भूल सकता हूँ जिस दिन मुझे मेरी ज़िन्दगी मिली” दनियाल के लहज़े से मोहब्बत साफ झलक रही थी।

“पर रिदा तुमने क्या हंगामा खड़ा किया था, सब लोग तुमको देख रहे थे.. हा हा हा !” दनियाल ने एक ज़ोरदार कह-काह लगाया जो पार्क की फिजा में गूंज गया।

“अरे! तुमने हरकत ही एसी की थी, भला कोई यूँ बैठता है रिज़र्व टेबल पर, उप्पर से हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे तुम!” रिदा ने बुरा सा मुंह बना कर कहा।।

“अच्छा चलो छोडो ! नही तो तुम अभी झगड़ा शुरू कर दोगी मेरे साथ और इस हसीन मौसम में मेरा बिलकुल झगड़े का मूड नहीं है।।“ दनियाल ने रिदा की तरफ देखते हुए कहा।।

“अच्छा जनाब ! तो झगड़ा मैं करती हूँ” रिदा तो जैसे बिलकुल ही झगड़े का मूड बन बैठी थी।

“नहीं यार ! मैंने ये कब बोला” दनियाल को माहौल कुछ गरम होता महसूस हुआ।

“तो क्या मतलब था तुम्हारा ! हम्म क्या कहना चाह रहे थे” रिदा बुरा मान गयी थी।

“देखो! अगर तुमने अभी के अभी मूड ठीक नही किया ना तो देख लेना मैं क्या करूँगा फिर” दनियाल रोमेंटिक होने ही लगा था कि रिदा ने टूक दिया।

“बस बस! सोचना भी मत निकाह से पहले मुझे छूने के बारे में” रिदा डर कर थोड़ा दूर खिसक गयी।

“अरे यार ! डरने की ज़रूरत नही है, कुछ नहीं करूँगा तुम्हे, टच भी नहीं करूँगा निकाह से पहले। मैं जानता हूँ की तुम्हारी इज़्ज़त कितनी कीमती है, हम कोई एसा काम नहीं करेंगे जिससे तुम्हारे अम्मी पापा या मेरे अम्मी अब्बू का नाम निचा हो। है ना रिदा! ये ही खुवहिश है ना तुम्हारी”।

दानियाल जैसे रिदा की रग रग से वाक़िफ़ था।

“हम्म्म् ! थैंक यू दनियाल, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी” रिदा ने मोहब्बत से दनियाल का शुक्रिया अदा किया।।

“ठीक है, ठीक है! अब सेंटी मत हो जाना, घर जाना है या नही” दनियाल ने माहोल को ठीक किया।।

“चलना चहिये, काफी वक़्त हो गया” रिदा कहती हुई खड़ी हो गयी “अल्लाह हाफिज दनियाल, अपना ख्याल रखना”

“तुम भी रिदा, अल्लाह हफिज !”

दोनों अपनी-अपनी राह चल दिए, कितनी पाक मोहब्बत थी दोनों की, ना कोई धोखा, ना कोई झूठ, ना किसी का दिल दुखाने की ख्वाहिश, बस मोहब्बत से लबा-लब भरे दो दिल जो एक दूसरे के ख्वाहिश-मंद थे।

रिदा एक टिपिकल मुस्लिम फैमिली से थी उसका घर मोहब्बतों से भरा हुआ था, सब एक दूसरे से बोहोत मोहब्बत करते थे, घर में सब ही पढ़े लिखें थे, घर में उसके पापा का होल्ड था, सब काम उनकी इजाज़त से किये जाते थे, बस ना जाने कैसे बिना इजाज़त मोहब्बत कर बैठी थी वो, मोहब्बत भी एसी की उससे दूर जाने का बस सोचने भर से ही उसकी सांसें रुकने लगती।

पर कहीं न कहीं वो भी जानती थी कि उसकी फैमिली तैयार नही होगी। नहीं मानेगी दनियाल के लिए क्यूंकि

उसके पापा को सख्त नफरत थी मोहब्बत की शादी से,उन्हें यूँ लगता था कि जैसे लव मैरिज कोई बोहोत बड़ा गुनाह है।

दूसरी तरफ दनियाल था जो घर में सब से बड़ा बेटा था, पुरे घर की ज़िम्मेदारी थी उस पर, वो रिदा के बारे में अपने घर बात कर भी लेता पर रिदा डरती थी कि कहीं उसके पापा को लव मैरिज का पता चल गया तो क्या हंगामा बरपा होगा घर में। इस लिए वो दनियाल को कोई तसल्ली बक्श जवाब नहीं दे पाती थी पर दोनों के दिल जानते थे की एक दूसरे के बिना रहना कितना मुश्किल है।।

आलम ये था कि दोनों एक दूसरे को दुआओं में मंगा करते और कर भी क्या सकते थे, डरते थे कि सिर्फ एक गलत कदम और फिर दुनिया जीने नहीं देगी न उन्हें और न ही उनके माँ बाप को, दुनिया तना कशी से मार डालेगी। अपने रब पर यक़ीन रखे हुए चल रहे थे दोनों उस राह पर जहाँ उन्हें नहीं मालूम था की मंज़िल मिलेगी भी या नही या यूँ ही दोनों तनहा रह जायंगे खाली हाथ और खली दिल्।

दानियाल बार बार फ़ोन मिला रहा था पर रिदा की तरफ ओफ जा रहा था बोहोत कोशिश के बात कॉल लगी और रिदा की आवाज़ कानो में आई।

“हेल्लो.. दनियाल! कैसे हो”

“मैं ठीक नही हूँ रिदा”

“कयूँ ? क्या हुआ दनियाल, सब खैरियत है ना, मुझे बताओ क्या बात है” रिदा परेशान हो गयी।

“रिदा ! अम्मी अब्बू मेरी शादी की बात कर रहे है”

दूसरी तरफ ख़ामोशी थी, बस रिदा के साँसों की आवाज़ थी।

“रिदा ! तुम सुन रही हो ना, प्लीज़ जवाब दो”

“हममम ! सुन रही हुं”

“रिदा मैं ये शादी नहीं करना चाहता, तुम्हारे सिवा किसी का तसवुर भी नही कर सकता, तुम क्या चाहती हो”

“मैं कुछ नही चाहती, कर लो शादी” दूसरी तरफ से एक दर्द से भरी आवाज़ आई।

दानियाल को इस जवाब की उम्मीद नही थी, वो चाहता था की रिदा उससे कोई उम्मीद दे और उससे रोके ले पर रिदा के जवाब ने उससे हिला कर रख दिया, कॉल डिस-कनेक्ट हो चुकी थी। दनियाल के कानो में बस टूं टूं की आवाज़ आ रही थी वो कितनी ही देर यूँ ही फ़ोन का रिसीवर कान से लगाए खड़ा रहा पर कब तक।

उसके माँ बाप का शादी के लिए दबाव बढ़ा तो उसने ये कह कर टाल दिया “कर लीजिये जो आप लोगो की मर्जी हो” .. रिदा ने उससे मायूस किया था, अब उसने सोच लिया था कि जो होगा देखा जाएगा। पर वो ये नहीं समझ पा रहा था की रिदा ने एसा क्यों किया।। कोई उम्मीद कोई भरोसा तो दे सकती थी जिस के सहारे वो सारी उम्र उसका इंतज़ार कर सकता था।

रिदा को समझ नही आ रहा था कि इस सिचुएशन को कैसे हैंडल करे, उसने अपनी अम्मी को दनियाल के बारे में बताया था पर उनका गुस्सा करना वाजिब था।

“रिदा ! तुम्हारा दिमाग तो ठीक है, क्या तुम अपने पापा को नही जानती कि वो कितना नापसंद करते है मोहब्बत की शादी को, तुम्हे एसा सोचना भी नही चहिये... भूल जाओ उसे, जो हुआ सो हुआ अब खत्म करो ये सिलसिला”

अममी गुस्से में बोलती रही और रिदा सिर्फ बेबसी से सुनती रही।। कुछ नहीं था उसके पास की वो अपना केस लड़ सके।। बस ख़ामोशी से सुनती रही और आँखों से पानी चलता रहा।। कर भी क्या सकती थी रिदा, उसकी परवरिश में कूट कूट कर भरा गया था की माँ बाप की, बड़ों की इज़्ज़त करो, किसी की ना-फरमानी मत करो ।

शायद दनियाल नहीं समझ सका कि रिदा ने एसा जवाब क्यों दिया, कैसे समझती उसे, वो तो खुद नहीं जानती थी कि किन लफ़्ज़ों में दनियाल को तसल्ली दे.. कैसे उससे होसला दे.. किस बिना पर उसे रोक ले जबकि उससे तो खुद उम्मीद नही थी।

मां की तरफ से एसी बेनियाज़ी देख कर रिदा ने फैसला कर लिया था अब वो किसी से कुछ नही कहेगी, बस अपने अल्लाह से फरियाद करेगी और अगर उसकी मोहब्बत, उसकी लगन सच्ची हुई तो उससे और दनियाल को कोई अलग नहीं कर सकता।।

दिन गुज़रते गए और रिदा खामोश थी वहीं दनियाल की तरफ शादी की तैयारियां जोर पकड़ रही थी, देखते ही देखते दनियाल की शादी का दिन भी आ पोहंचा।

दानियाल दूल्हा बन कर खूब जच रहा था, बारात दुल्हन के घर पऊंची तो कुछ अफरा तफरी का आलम था, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। बस उड़ती उड़ती खबर मिली की दुल्हन ने निकाह से इंकार दिया था, वजह दनियाल की फैमिली को पता नहीं चल पायी और बरात खली हाथ लोट गयी।।

“रिदा ! कहाँ हो बेटा” रिदा के पापा ने उससे पुकारा था।।

“जी पापा ! अपने बुलाया”

“हां बेटा ! यहाँ बेठो, कुछ बात करनी थी तुम से”। रिदा यहीं चेयर पर बैठ गयी और पापा की तरफ देखने लगी।

“मेरी बात गौर से सुनना बेटा, मैं तेरे से कुछ मांगने चाहता हुं।। मैं जानता हूँ की सब के अपने अरमान होते हैं पर बेटा मुझे तुम पर मान है इस लिए तुम्हारी ज़िन्दगी का फैसला तुमसे बिना पूछे ही कर बैठा हुं। मेरे एक दोस्त के रिश्तेदार का बेटा है।। लोग बोहोत अच्छे और शरीफ है। उनका बेटा भी अच्छा खासा पढ़ा लिखा है अच्छी जॉब करता है।।“

रिदा सर झुकाए सब सुन रही थी।

“वो निकाह करना चाहते हैं आज ही, मैं ज़बान दे आया हूँ बेटा! मेरी इज़्ज़त तेरे हाथ है।। तू क्या फैसला करेगी बेटा, मैं मुंतज़िर हूँ तेरे जवाब का”

“फैंसला तो आप कर चुके हैं पापा” रिदा ने अपने दिल में कहा पर जुबान से इतना ही कह पायी

“जो आपको ठीक लगे पापा, मुझे आपका फैसला मंज़ूर है”

“जीती रेह मेरी बच्ची! मुझे यही उम्मीद थी तुमसे” रिदा के पापा अपनी बेटी का जवाब सुन कर खुश हो कर चले गए।

रिदा खामोश बैठी रह गयी, उससे दनियाल का ख्याल आ रहा था पर उसने दिल को डांट दिया अब उसे पीछे नहीं देखना था, अपने पापा की इज़्ज़त का मान रखना था।

शाम को रिदा को तैयार किया गया.. निकाह के लिए कुछ ही लोग आये थे, मौलवी साहब ने निकाह पढ़ाया दनियाल बिन मरूफ से साथ क्या आपको निकाह क़बूल है।।।

“कबूल है” रिदा ने गायब दिमागी से जवाब दिया और निकाह नामे पर दस्तखत कर दिए।

चारो तरफ शोर उठा “मुबारक हो! मुबारक हो!”

ओर यूँ रिदा की रुखसती हो गयी।

रिदा दुल्हन बनी सेज पर बैठी थी, तभी किसी के आने की आहट हुई और एक मरदाना आवाज़ ने आदाब बोला।

रिदा चोंकी थी जेसे उसने कोई जानी पहचानी आवाज़ सुनी हो, लेकिन अपना वेहम समझ कर एसे ही बैठी रही।।।

खमोश फिजा में फिर वही आवाज़ गुंजि।।।

“हमारी शादी बोहोत अचानक हुई या यूँ कहूँ कि आपकी शादी... मेरी शादी तो आज की तारीख में फिक्स थी पर आपसे नहीं किसी और लड़की से, उसने शादी से इंकार कर दिया, वजह मैं नहीं जनता, जानने की कोशिश भी नहीं की, होगा उसका कोई ज़ाती मामला। खेर भला हो आपके पापा का जिन्होंने मुश्किल वक्त में हमारा साथ दिया और हमें बदनामी से बचा लिया।। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपको यहाँ कोई तकलीफ नहीं हो”

रिदा सुनती रही और अपनी बढ़ती धड़कनों को नार्मल करने की कोशिश करती रही ।। वो जान गयी थी ये कोई और नहीं बल्कि दनियाल ही था।

“इंशा अल्लाह” निदा ने घुंगट में से कहा।

अब चौकने की बारी दनियाल की थी, उससे समझ नही आया की ये रिदा की आवाज़ थी या किसी और की, उसने बिना इंतज़ार किये रिदा का घुंगट हटा दिया और रिदा का मुस्कुराता चेहरा सामने था। दानियाल को यकीन नही आया कि जो लड़की सामने दुल्हन बनी बेठी है वो उसकी रिदा ही है।

किस्मत ने दोनों का साथ लिखा थ।। शायद सच्ची मोहब्बत अपना आप मानवा ही लेती है।।। और यही रिदा और दनियाल के साथ हुआ था , दोनों किस्मत के लिखे पर खुश थे उन्हें अपने सब्र और नेकी का इनाम खुदा ने इस सूरत दिया था ।

समाप्त !

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