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तुम्हे उदास सी पाता हूं मैं कई दिन से,
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम?

सेहरा को बडा़ नाज़ है अपनी वीरानी पे
उसने देखा ही नहीं आलम तेरी तन्हाई का

घरों पर नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद 
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है 

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं.