jay mataji

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" मौन " जो शब्दोंका नया सफर है.. " प्रणव ॐ " तक पहुँचनेका..जोकि " प्रणव ॐ" से ही लफ्ज़ोको अस्तित्व मिला है, पर वो अनभिज्ञ है अभी ! लफ्जोको खुदके अस्तित्व " ॐ " से भिज्ञ होना बाकि है अभी.... शुरुआत है अभी... !

वैसा ही हमारा भी है... ! हमभी अनभिज्ञ है ! सफर जारी है...

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हा ये सच है की उस परमात्मासे सभी अवगत है ! पर क्या सचमे हम उस परम तत्व से अवगत है ? क्या परमात्मा चाहता है कोई चढ़ावा ? उसे क्या प्रिय है - भक्ति या भलाई ? गर भक्ति हो और भलाई नहीं तो क्या लाभ ? मानव निर्मित मंदिरोमें खोजती हु में प्रभुको पर उस बातसे बिलकुल अनजान की प्रभु तो प्रभुद्वारा निर्मित मानवमनमंदिर में बसता है ! वो रइस परिवारके बच्चेमें भी है और गरीब बूढ़े आदमीमें भी तो वही है और बेज़ुबान जिवमें भी तो वही है !

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फर्क है मौन और ख़ामोशी में ! मुस्कानके साथ हो वो मौन है.. ! जिसमे हसी नहीं वो मौन नहीं पर ख़ामोशी है.. ! समजना हो तो एक ही वाक्य में समजा जा सकता है दोनों के बिच के फर्क को..

" मौन जिया जाता है.. और,
ख़ामोशीमें जीना पड़ता है...! "

જય માતાજી 🙏

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मंज़िल आनंद है,
तो सफर परमांनद.. !

मंज़िल से ज्यादा सफरसे प्रेम होना चाहिए....! सफर परमानंद है... ! जैसे कोई भक्त की मंज़िल उसके प्रभु के चरण है... मंज़िलकी प्राप्ति ही उसका आनंद है... ! पर भक्ति करना सफर है... भक्ति करते करते उसमे खो जाना ही परमानंद है.... ! मंज़िल पर पहोचने तक सफरका आनंद लो मंज़िल कब आ जाएगी पता ही नहीं चलेगा.... !

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