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ये शब्द

ये शब्द ही तो हैं
जो बांध लेते हैं डोर से
हाँ रिश्तों की अदृश्य डोर से।
मुंह से निकल कर सीधे
दिल में उतर जाते हैं।
अजनबी को भी बना लेते हैं अपना।
और कभी अपने को भी
कर देते हैं पराया।
यही शब्द कभी राम को
देते हैं चौदह वर्ष का वनवास
और कभी कराते हैं महाभारत।
यही शब्द सूर कबीर तुलसी
की लेखनी से अमर हो जाते हैं।
तो मीर गालिब की गजलों में
मोहब्बत के पैगाम बन जाते हैं।
मर कर भी अमर हो जाते हैं शब्द
और गूँजते रहते हैं सदियों तक
प्रभावित करते हैं आने वाली पीढियों को।
सहजे जाते हैं ग्रंथों में
ताकि लोग उनसे कुछ सीखें
और चुनें कल्याणकारी रास्ता।
रक्षा करें इस कायनात की
सबकी भलाई के लिये।
इस लिये शब्द हमेशा ही
ऐसे हों जो प्रेम से भीगे हुए हों।
दया करुणा से सजे हुए
दीपक की लौ की तरह
आशा की ज्योति लिये हुए।
शब्द जो दुखी लोगों की मुस्कान
और मुश्किल राहों के फूल बन जांय
और अमर हो जांय सदा के लिये ।

स्वरचित व मौलिक
जमीला खातून

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जरा देर को पास आओ तो क्या है
कभी प्यार से मुस्कराओ तो क्या है।
मुश्किल से ये छंद घडियां मिलीं हैं
खुशी से इन्हें तुम बिताओ तो क्या है।

जमीला खातून

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मैं नहीं आ पाया तो क्या
तुम होली मना लेना।
मेरे नाम का थोड़ा गुलाल
अपने गालों पर लगा लेना।।

मैं भी तेरे प्रेम में रंग कर
कर लूँगा तुमको याद प्रिये।
हो सका तो साथ मनाएंगे
होली अगले साल प्रिये।

जमीला खातून
सेना और पुलिस के जवानों के लिए जो त्यौहारों पर अपनों से दूर रहते हैं।

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आज गाँव के पनघट की गोरियां याद आ गईं।
पगडंडी पर गीत गातीं छोरियां याद आ गईं।।
शहर में तो कुछ पता ही नहीं चलता त्यौहारों का
मस्ती और प्यार में रंगी वो बचपन की होलियां याद आ गईं।
जहाँ रंग से कम अपनेपन से ज्यादा रंगते थे चेहरे।
गले मिलने से हो जाते थे आपसी रिश्ते और गहरे।
भंग मिठाई खाकर नाचती थी हुरियारों की टोली
रंग देते थे जमीं और आसमां भी गाँव के भोले लोग जो ठहरे।।

स्वरचित
जमीला खातून

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आज क्यों ये मन हुआ बेचैन है
तेरी याद में भरे भरे से नैन हैं।
आइना ये आंख बन कर रह गई।
तेरी ही सूरत इन आंखों में बस गई।।

जमीला खातून

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तेरे इश्क में या खुदा ये सूरज
रात में भी जलता है।
अन्धेरा न हो जाये तेरी कायनात पर
इसलिये खुद को जला कर रौशनी करता है।
थोड़ा औरों के लिये भी जियो
शायद ये हम से कहता है।
भोर में रंग भर देता है फूलों में
परिंदों के गीत सुनकर
जलते हुए भी खुश रहता है।
अपनी किरणों से देता है
धरती की हर शै को रवानगी
हर जीव जन्तु जर्रे जर्रे में
खुदा का नूर भरता है।

जमीला खातून

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मोहब्बत गर खता है तो सजा मंजूर है मुझको
गुजारिश है खता मेरी बताने तो चले आओ।

हवाओं के सर्द झौंके कई बार आते जाते हैं।
हमें सुख दुख का एहसास करा जाते हैं।।
जीवन में मिलते हैं हर मोड़ पर लोग कई
पर उनमें से सब नहीं कुछ लोग ही याद आते हैं।।

जमीला खातून

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प्रकृति देखो बासन्ती त्यौहार मना रही।
चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ लुटा रही।
धरती बिखेर रही है छटा निराली
जंगल में छाई पलाश के फूलों की लाली
खेतों ने ओढ़ ली चादर पीली सी
कुहू कुहू बोले कोयल मतवाली।।
नव किसलय की लाली से पेड़ मुस्का रहे।
कलियों को चूमकर भौंरे गुनगुना रहे।
सर्दी के जाने से खुशनुमा हो गया मौसम
भोर की बेला में परिन्दे चहचहा रहे।।
फसलों को देख कर किसान खुश हो रहा।
सयानी बेटी की शादी का सपना बुन रहा।

स्वरचित
जमीला खातून

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लोग हंसते हैं मरहम लगाते नहीं
जख़्म दिल के न सबको दिखाया करो।
आखिर मोहब्बत की ही निशानी है ये
फूल समझ कर यादों में सजाया करो।।

जमीला खातून

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