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નથુરામ ગોડસે , લંકાપતિ રાવણ , મહારથી કર્ણ અને આના જેવા ઘણાં પોતાની જગ્યાએ સાચાં હતા પણ તેમનાં રસ્તા ખોટાં હતાં.
હમણાં જ્યાં ધર્મ અને અધર્મ ની વાત થાય ત્યાં આવાં વ્યક્તિ ની તરફેણમાં ઘણી વાતો થાય છે , એક રીતે જોવા જઈએ તો આ સારું છે કારણકે આપણા દેશમાં ખરાબ માં ખરાબ વ્યક્તિ ને પણ દરેક ત્રાજવે તોળીને બોલાય છે. પણ એ વિચારવા જેવું છે કે શા માટે આવાં વ્યક્તિ ઓની બોલબાલા વધી છે , મારા માનવામાં એવું છે કે આપણો સમાજ હવે ઈમાનદારી નો ઢોંગ કરી કરીને થાકી ગયો છે અને દરેક કામ ને તડ ને ફડ કરીને 'પુરુ' કરવામાં માનવા લાગ્યો છે અને આપણી પાસે હજુ જુના ચશ્મા થી જ નવું જોવાની ની ખરાબ ટેવ છે અને સાથે સાથે આપણે ખોટા રસ્તે ચાલીને પસ્તાવો પણ કરીયે છીએ માટે ઐતિહાસિક પ્રમાણપત્ર માંગીએ છીએ કે આપણાં વ્યક્તિત્વ લાયક કોઈ વિભુતી છે કે શું.
માટે જ બુદ્ધ અને કૃષ્ણ કરતાં આજકાલ મહાદેવ ની બોલબાલા આજ વધુ છે કારણ કે મહાદેવ ઘણાખરા માટે અઘોરી , ગુસ્સાવાળા , તાંત્રિક વધારે છે અને એની કમ્પેરીઝન માં બીજા દેવતાઓ વધારે 'ધાર્મીક' દેખાય છે.
પણ અહીં વાત એ છે કે આપણે એ પણ જોવું જોઈએ કે જીવનના છેલ્લા 'પહોર' માં આવી વ્યક્તિ નું શું થાય છે , કોઈ પણ કામ આડાં રસ્તે ચાલીને પુરું તો થય જાય છે પણ આપણને આપણા સંસ્કાર આપણને પેટમાં એક 'ફડકો' પેદા કરી દે છે અને આપણે ધાર્મિકતા નું મુખડું પહેરી આપણી જાતને બચાવી લેવામાં પાવરધા બની ગયા છીએ ‌.
બુદ્ધિમાન વ્યક્તિ એ છે કે કાર્ય કરતા કરેલ કર્મ પર વધારે ધ્યાન આપે છે અને પોતાની જાતને 'ફડકા' થી આબાદ રાખે છે.

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क्या आप "हिंदुस्तानी जलपरी" के बारे में जानते हैं?

आरती साहा, जिन्हें "हिंदुस्तानी जलपरी" कहा जाता है, भारत तथा एशिया की ऐसी पहली महिला तैराक थीं, जिन्होंने इंग्लिश चैनल तैरकर पार किया था।

आरती साहा ने यह करनामा 29 सितम्बर, 1959 को कर दिखाया था और 1960 में, उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया था। वह 'पद्म श्री' प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी थीं।

24 सितंबर 1940 को कोलकाता में जन्मीं साहा ने हुगली नदी के किनारे तैरना सीखा। दरअसल, उत्तरी कोलकाता में साहा परिवार जहां रहता था, चम्पाताला घाट वहीं पास ही था। आरती वहां नहाने जाती थीं और बचपन से ही उन्होंने तैराकी सीख ली।

आरती कई छोटी-बड़ी प्रतिस्पर्धाओं में जीत हासिल करती गईं और आगे बढ़ती गईं। उनकी आँखों के सामने उनका सबसे बड़ा लक्ष्य खड़ा था। वह लक्ष्य था, इंग्लिश चैनल। पानी की वह सबसे लंबी और बेहद ठंडी धारा जोकि दक्षिण इंग्लैंड और उत्तरी फ़्रांस को अलग करती है। यही इंग्लिश चैनल उत्तरी सागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ती है। इसके ठंडे तापमान और तैराकी की कठिनाईयों की वजह से इसे 'स्विमिंग का माउंट एवरेस्ट' कहा जाता है।

आरती ने तय किया कि वह भी इंग्लिश चैनल को पार करेंगी। 18 साल की उम्र में आरती ने इंग्लिश चैनल को पार करने का प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो पाईं। पर वह निराश नहीं हुई और ना ही उन्होंने हार मानी। फिर क्या था, अगले प्रसाय में उन्हें सफलता मिल ही गयी और उन्होंने इतिहास रच डाला, ऐसा करने वाली, वह पहली एशियाई महिला बन गई थीं।

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न जाने क्यूं होता है ये ज़िंदगी के साथ ,
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद ...
करे फिर उसकी याद ....
न जाने क्यूं .

Good morning...

#हाइफा_दिवस
#दुनिया_का_एकमात्र_ऐसा_युद्ध_जिसमें_तलवारों_और_भालो_का_सामना_मशीन_गनो_और_तोपों_से_था

मित्रों आज 23 सितंबर है, और ये कोई आम दिन नहीं है, आज ही के दिन करीब 102 साल पहले भारत के रणबाकुरों ने हाइफा को अॉटोमन्स से आजादी दिलाई थी.

दोस्तो आज हम आपको ऐसे युद्ध के बारे में बताएंगे, जिससे हर भारतवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा .

वो अलग बात है‌ कि भारत मे ये इतिहास गायब है, पर इस युद्ध के चर्चे आपको इजरायल और ब्रिटिश इतिहास की किताबो में आज भी मिल जाएंगे.

सबसे बड़ी बात ये युद्ध भारत मे नही बल्कि सात समुंदर पार हुआ था, लेकिन उस युद्ध मे महागाथा, भारतीय रणबाकुरों ने लिखी थी.

इस युद्ध की सबसे अदभुत बात ये थी की जहां हाइफा पर पहले से कब्जा जमाये हुए, ऑटोमन्स सेना के पास मशीनगन- तोपो जैसे हथियार थे और भारत के रणबाकुरों के पास सिर्फ उनके बफादार घोड़े और तलवारे थी.

मतलब तलवारों और घोड़ो का मुकाबला सीधा मशीनगन और तोपों से था, वो भी एक अंजान जगह.

बात प्रथम विश्वयुद्ध की है जब आज के इजरायल के हाइफा शहर पर ऑटोमन्स सेना का कब्जा था, ऑटोमन्स सेना में जर्मनी - हंगरी-ऑस्ट्रिया जैसे देश सम्मलित थे. और इस सेना ने पिछले 400 साल से इजरायल के मुख्य शहर हाइफा जो समुन्द्र के किनारे बसा है उस पर अधिकार किया हुआ था.

इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत की घुड़सवार सेना से मदद ली, उन्होंने जोधपुर महाराज सर प्रताप सिंह से इस युद्ध के लिये देश की सबसे ताक़तभर घुड़सवार सेना, जोधपुर लांसर को भेजने की बात कही.


ये विश्व की पहली और आखिरी जंग थी, जिसमे तलवार भालो से सज्जित घुड़सवार सेना का मुकाबला, ऑटोमन्स सेना की मशीनगन और तोपो से था.

एक वाक्या का जिक्र आज भी आता है, जब ब्रिटिश अधिकारी ने मेजर दलपतसिंह शेखवात से कहा, की आप तलवारों से आटोमन्स सेना का मुकाबला नही कर सकते है, इसलिए आपको युद्ध नही लड़ना चाहिए, तो दलपत सिंह ने कहा था, हम राजपूताने के रणबाकुरे हैं, एक बार युद्ध के मैदान में आने के बाद बापस नही जा सकते, अब जो होगा वो युद्ध करके ही होगा.

भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत कर रहे थे.

दुनिया के आखिरी सफल और बहादुर कैवेलरी चार्ज मारवाड़ के सबसे एलीट जोधपुर लांसर्स के नाम है। मैसूर लांसर सहयोगात्मक रोल में थी।

सिर्फ 1 घण्टे में मारवाड़ी राजपूत शेरो ने 400 साल से गुलाम हाइफा शहर को दुश्मनों से आजाद करा लिया था.

इस युद्ध मे 900 भारतीय सैनिक व 60 घोड़े वीरगती को प्राप्त हुए थे.

इन्ही की याद में दिल्ली में हाइफा चौक का निर्माण किया गया है.

भारतीय सेना ने करीब 1350 ऑटोमन्स सैनिक व 36 अधिकारी बंधक बनाए थे.

आज भी इस युद्ध की याद में इजरायल में हाइफा डे मनाया जाता, है जिसमें भारत से भी शहीदों के परिवार जन या जोधपुर राज्य के वर्तमान महाराज गज सिंह जी श्रद्धांजलि देने जाते हैं.

आज हम भी इतिहास के सबसे बड़े सूरमाओं को इस हाइफा दिबस पर नमन करते हैं..

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Woman playing with ball.

Khandariya Mahadev.... Khajuraho.

विडंबना जैसा कुछ नहीं होता ....

इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि आपका ध्यान आपकी मंजिल से हट गया है ।