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उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन

देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं

क़तील शिफ़ाई

हसीं तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ सा

जो दिल जलाए बहुत फिर भी दिलरुबा ही लगे
बशीर बद्र

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

इब्न-ए-इंशा

સંબંધોની શાળા ટકાવી રાખવા માટે,

ગણિત વિષય કાચો હોવો ખુબ જરૂરી છે.

तेरे मिलाप बिन नहीं 'फ़ाएज़' के दिल को चैन

ज्यूँ रूह हो बसा है तू उस के बदन में आ

बदन गुल चेहरा गुल रुख़्सार गुल लब गुल दहन है गुल

सरापा अब तो वो रश्क-ए-चमन है ढेर फूलों का


नज़ीर अकबराबादी

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दिल की बेताबी नहीं ठहरने देती है मुझे दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहीं नज़ीर अकबराबादी

कूचे में उस के बैठना हुस्न को उस के देखना

हम तो उसी को समझे हैं बाग़ भी और बहार भी

नज़ीर अकबराबादी

क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर

क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम

नज़ीर अकबराबादी

थे हम तो ख़ुद-पसंद बहुत लेकिन इश्क़ में

अब है वही पसंद जो हो यार को पसंद

नज़ीर अकबराबादी