M.sc(chemistry),B.Ed प्रिय दोस्तों, रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में पता नहीं ऐसा कौन सा केमिकल रिएक्शन हुआ कि मैं साहित्य का हो गया।अब साहित्य लिखता हूँ, साहित्य गाता हूँ और साहित्य जीता हूँ। तो दोस्तों, जिंदगी एक उपवन है और हम सब उसके फूल, खुद महकें और दूसरों को भी महकाएं।। धन्यवाद, राकेश सागर

नए हैं पत्ते, नई हैं कलियाँ,
नया सवेरा महकती गलियाँ,
ये ओस लगती हैं जैसे मोती,
कहूँ प्रिये क्या जो पास होती,
है कोयलों को गुमान खुद पर,
उन्हें मुहब्बत का जाम देना,
जो काग छेड़े हैं तार मन के,
व्यथाएँ दिल से गुजरती होंगी,
सजल नयन डबडबाती आँखें,
पिया मिलन को तरसती होंगी।।
-राकेश कुमार पाण्डेय"सागर"

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कभी जो बरसात की फुहारें,
दुआरे तेरे बरसती होंगी,
सजल नयन डबडबाती आँखें,
पिया मिलन को तरसती होंगी,
जो आके छेड़े पवन का झोंका,
उसे संदेशों का काम देना,
जो बूंदे पूछेंगी आँसुओं से,
तुम्हारी पलकें झपकती होंगी।
-राकेश पाण्डेय"सागर"

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इन नयन के नीर सूखे, पंक्षी भी उड़ जाएं भूखे, हृदय की करुणा बताओ, क्यूँ हुई लाचार हो,
बीच नदिया में हो जैसे, टूटी सी पतवार हो।।
गिरके भी इतना गिरे, पहुँची रसातल में गिरावट, सिसकती हैं बेटियाँ, शर्मिंदा है खुद पर धरातल, चीखें सारी जल गईं,
तुम क्यूँ हुई अंगार हो, बीच नदिया में हो जैसे, टूटी सी पतवार हो।। -राकेश सागर

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तेरी यादों का मुझको,
बिछौना मिला,
ये न पूछो कि राहों में,
कौन ना मिला,
बस तुम्हारे लिए ही सँवरती रही,
मैं बिखर जाऊं कण कण,
तुम्हारे लिए,
जिंदगी भर समर्पण तुम्हारे लिए।
-राकेश सागर

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खुदा जाने फिर कब,
मुलाकात होगी,
अकेले अकेले में,
क्या बात होगी,
चले जाते हो,
साथ रहती हैं यादें,
यकीं है मुझे,
फिर हँसी रात होगी।।
-राकेश सागर

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है नहीं अनुकूल मौसम,
आँधियों से लड़ भी जाओ,
चढ़ चुकी है अब पत्यंचा,
ले धनुष को बढ़ भी जाओ,
हौसलों के तरकशों में,
कोशिशों के तीर जिंदा,
कोशिशें तू कर,
उम्मीदों से भरा एक स्वर्ग हूँ,
बीज डालो फिर उगूँगा,
मैं तो भारतवर्ष हूँ।।
-राकेश सागर

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स्वप्न जो आँखों में हैं,
वो नीर बनकर बह न जाए,
मिल सकी जो ना सफलता,
पीर बनकर रह न जाए,
उठ खड़े हो सपनों के,
पँखों को फिर आकाश करके,
मुस्कुराहट तुम बिखेरो,
मैं सृजन का हर्ष हूँ,
बीज डालो फिर उगूँगा,
मैं तो भारतवर्ष हूँ।।
-राकेश सागर

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