ये मेरा प्रथम अनुभव है अपनी रचनाओ को प्रकाशित करने का। इससे पहले मै अपनी रचनाए सिर्फ facebook पर ही post करती थी परंतु मातृभारती के साथ संपॅक मे आने के बाद मैने इन रचनाओ को प्रकाशित करवाने का निणॅय लिया। आशा है आप सबको मेरी रचनाए पसंद आएगी। आप सबके प्रतिभाव का इंतझार रहेगा।

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જટાયુ પક્ષી જેનો રામાયણ માં ઉલ્લેખ હતો કેરલામાં જોવા મળેલ Sandayamangalam hills kerala

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#काव्योत्सव -2
शीर्षक ;चलते जाना है
क्या खबर किस और जाना है, बस अपनी ही पहचान को खोते जाना है।
किस मोड़ पर मुडना हे ये नहीं जानते फिर भी आज बस मुझे चलते जाना है।
क्यू फिक्र हे सब को कल की,हमे बस तो हमारे आज को बेहतर बनाते जाना है।
क्यू घिरे रहते हे लोग परेशानियों में,हमे तो बस अपनी ही फ़क़ीरी में जीते चले जाना है।
कोई अपना नहीं यहाँ उम्मीद क्यों बढ़ाए उनकी तरफ उनकी हैसियत से ज़्यादा,
यहाँ बस अपने हुनर,क़ाबिलियत और दुआओं की खुश्बू बिखेरते जाना है।
क्या नाम दे हम अपने निजानंद को,हर हाल में खुश हो के दुसरो में ख़ुशी बांटते चले जाना है।

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https://youtu.be/n8butSnAkjE
गुरुदेव श्री पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की वाणी मे गुरु - शिष्य परम्परा का महत्व

#काव्योत्सव -२
वो एक लडकी हुआ करती थी जो सपनो मे अपनी दुनिया सजाया करती थी।

दुनिया की हकीकतो से थी अनजान युं तितलीयो से खेला करती थी।

ना था कभी डर कहीं गुम हो जाने का बस युं ही नई राह आज़माया करती थी।

खुश रहना उसकी फिदरत थी इसलिए ग़म से कोसो दुर रहा करती थी।

सपनो मे ढुंढा करती थी परींयो को फिर खुद ही परी बन जाने के ख्वाब सजाया करती थी।

प्यार भरा था उसकी आँखो मे और हाथो मे था जादु इसलिए हर बच्चे को दिवाना कर दिया करती थी।

मासुमियत से भरी साफ दिल की वो बेरहम इस दुनीया मे जिया करती थी,
इस उम्मीद से की हर इंसान नही होता इतना भी बुरा वो इंसानीयत की लौ जलाया करती थी।

वो एक लडकी थी जो सपनो मे अपनी दुनीया सजाया करती थी।---खुशी

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#काव्योत्सव -२
आहिस्ता चल ऐ ज़िंदगी,अभी कई कर्ज चुकाने बाकी है।
कुछ दर्द मिटाने बाकी है,कुछ फर्ज निभाने बाकी है।-आहिस्ता चल ऐ ज़िंदगी

रफ्तार मे तेरे चलने से कुछ रुठ गए,कुछ छुट गए,
रुठो को मनाना बाकी है,रोते हुओ को हँसाना बाकी है।-आहिस्ता चल ए ज़िंदगी

कुछ ह़सरते अभी अधुरी है,कुछ काम भी अभी ज़रुरी है
ख्वाहिशे जो घुट गई इस दिल मे,उनको दफनाना बाकी है।-आहिस्ता चल ऐ ज़िंदगी

कुछ रिश्ते बन कर टुट गए,कुछ जुडते-२ छुट गए,
उन टुटे-छुटे रिश्तो के ज़ख्मो को मिटाना बाकी है।-आहिस्ता चल ऐ ज़िंदगी

तु आगे चल मैं आती हुं,क्या छोड तुजे ज़ी पाऊंगी,
इन सांसो पर हक है जिनका,उनको समजाना बाकी है।
आहिस्ता चल ऐ ज़िंदगी,अभी कई कर्ज चुकाने बाकी है।

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