अपनी ढ़ेर सारी गलतियों से बचा हुआ व्यक्ति हूं। अगर वह गलती अतीत में होती तो यह जीवन वैसा ना होता, जैसा आज है। इस मायनों में हमेशा बचा हुआ व्यक्ति रहूंगा'।

मेरे होने में यह पौधा भी शामिल है।रूम में एक सदस्य का दर्जा दिया है। सुबह हम दोनों पानी साथ में पीते है। अंधेरा होते ही पौधे की पत्तियाँ सिकुडने लगती है। मानो इनका दिन ख़त्म होने के बाद सभी सोने कि तैयारी में जुट जाते है।
इसलिए रात में दफ़्तर से लौटने पर धीमे क़दमों से रूम में प्रवेश करता हूँ, ताकि वक्त से पहले उठ ना जाए। जिस दिन शोर करते हुए पहुँचता हूँ, सभी पत्ते गहरी नींद से जागे हुए मिलते है। इन्हें फिर सुलाना मुझे कभी नहीं आया। अगर ये रात में जाग उठे तो फिर लंबे समय बाद इनके पत्ते सिकुड़ते है। मैं कई दिनों तक पत्तों का सिकुडने ही देखता रहा। मुझसे पहले यह पत्ते सुबह उठ जाते है। इन पौधों की अपनी एक ख़ुशबू है, जो पूरे कमरे में महकतीं है। उस ख़ुशबू में पौधे की उपस्थिति शामिल है। मै इसे महीनों से महसूस कर रहा। पौधे के प्रति मेरा व्यवहार मानव के तरह है। मेरा लगाव उन चीजों से अधिक जहां दुख की गुंजाईश शुन्य होती।

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रुम खाली करते समय सारा समय गाड़ी में डाल दिया, लेकिन रुम के भीतर का एकांत जिसने हमेंशा मेरा साथ दिया, उसे रुम में छोड़कर लौट आया। उसे अपने साथ लाना चाहता था, लेकिन मेरे सभी समान के तुलना वह भारी और बड़ी चीज थी। वर्षों तक रुम में रहते एकांत इतना बड़ा हो चुका था ना मैं उसे गाड़ी में ला पाया ना अपने भीतर रखकर घर ला सका।

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तु सागर हैं वही, जिसकी मैं हूं नंदी। अंत मेरा लिखा तुझमें ही।
गजेंद्र वर्मा

हम सभी के भीतर एक व्यक्ति छिपा हुआ है, अगर उससे मित्रता अच्छी है तो वह हमें कभी एकांकी होने नहीं देगा। दुख में सुख का एहसास दिलाएगा। उस व्यक्ति को समझना खुद को पहचानना है। अकेले रहने के बावजूद कभी खुद का अकेला होना महसूस नहीं करता। मेरे भीतर का व्यक्ति मुझसे दिनभर कई तरह का संवाद करता है। हमारी दोस्ती लगभग तीन सालों से जब मैंने अकेले रहने का निर्णय लिया था। मेरे इच्छाओं की तरह उसकी भी इच्छाएं है, उसके खुश होने में मैं भी उतना ही खुश होता हूं। शायद इसलिए मैं तस्वीर भी खुद की दो बार लेता हूं। शहर आने के बाद जितना समय अपनो को नहीं दिया, उतना खुद को दिया है। जितना खुद के लिए करता हूं, उतना ही भीतर के व्यक्ति के लिए भी करने की चाह रखता हूं। समय के अनुसार हर कार्य उपयुक्त लगता है। लेकिन कॉलेज के दौरान जब पत्रकारिता संस्थान में काम करना शुरू किया था, वह उस वक्त कॉलेज में पढ़ाई की इच्छा चाहता था। पढ़ाई के वक्त काम में किया। वर्तमान में मेरी उम्र विद्यार्थी की है, भीतर का व्यक्ति आज भी चाहता है, मुझे एक छात्र के तरह जीवन जीना चाहिए। इसलिए अब दफ्तर से लौटने के बाद देर रात नालंदा लाइब्रेरी में गुजारता हूं। पहले दफ्तर से लौटते ही दिन का खत्म होना मानता था, अब रात के 2 से 3 बजे है। एक साधारण छात्र के तरह लाइब्रेरी में घंटो लिखने व पढ़ने के पीछे हम दोनो खुश है। इस वक्त पत्रकार होना त्याग देता हूं। अगर कॉफी पीना मुझे पंसद है, तो सुबह स्विमिंग जाना भीतर के व्यक्ति को। अक्सर उन सभी को झूठ कहता हूं जो मुझसे पूछते है क्या आप शहर में अकेले रहते हैं ? मेरा हमेशा से मानना रहा है, अगर आपके भीतर का व्यक्ति आपसे खुश है, तो आप वह हर काम कर पाएंगे जिसे आप भविष्य में साकार करना चाहते। जीवन में खुद को समय देना और समझना बेहद जरूरी है। मेरे लिए भीतर के व्यक्ति के लिए कुछ करना एक सकारात्मक कार्य है।

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मेरे पास इतना सुख नहीं की तुमसे बात करने का दु:ख मुझे अकेला होने से बचा सके, जिस दिन दु:ख से बड़ा सुख होगा। उस दिन घंटो बात करुंगा।

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मुझे लगता था हम दोनों हमउम्र के हैं। भईया नहीं कहने से उम्र में छोटा होने का आभास तो कभी हुआ नहीं। मैं तो आज भी वही झगड़े, मस्ती मजाक, तुम्हारी चीजों में अपना स्वामित्व स्थापित करने जैसे दुनिया में डूबा हुआ हूं। बदलते समय के साथ अब जब तुम विवाह के करीब हो ऐसे में खुद से यही सवाल कर रहा की हम कितने जल्दी बड़े हो गए! हमें खुद को बड़े होने से बचा लेना चाहिए था, लेकिन इस प्रयास की ओर हमारा ध्यान कभी गया ही नहीं। अब तुम जीवन उस पड़ाव की ओर हो जहां से जिम्मेदारी जन्म लेगी और उसकी परवरिश में पूरी उम्र गुजर जाएगी। एक समय बाद खुद को जीवन के चौराहे पर पाऊंगा, पर इस वक्त खुद को बचा हुआ महसूस कर रहा। अब एहसास भी होने लगा हैं की वास्तव में तुम ही उम्र में बड़ हो। खैर.. इस सनसनीखेज खुलासे से ना जाने कितनी लड़कियों की हृदय गति तुमने बढ़ा दी होगी। लेकिन हर संबंध का अंत हिंसा मुक्त होना चाहिए और शुरुआत खुशनुमा। तुम इस प्रक्रिया में मुझे सफल व्यक्ति दिखाई पड़ते हो। बहुत-बहुत बधाई। विवाह के लिए नागिन डांस समेत अन्य जीव-जंतुओं के डांस स्टेप तैयार कर लूंगा। जल्द परिवार में हम पांच सदस्य होंगे।❤️

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हमारे जिए हुई में एक संगीत हमेशा साथ होता हैं, जो तस्वीर की तरह सारी चीजों को गाने में खुद-ब-खुद कैद करता हुआ चलता हैं। अक्सर अपनी यात्राओं में एक तरह का संगीत सुनता हूं। समय बिताने के बाद उन संगीत से यात्रा की यादें फुटने लगती हैं। ऐसे संगीत को किसी एकांत में सुनना सुखद अनुभव की तरह हैं। मैंने ऐसे संगीत का अलग से संग्रह बना रखा हैं, जिन्हें केवल खास दिनों में सुनना पसंद करता हूं।🤍
#happylife

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एक दु:ख जो रोज शाम के वक्त दिन के खत्म होने पर होता है, और एक सुख हैं कि दिन का अंत फोन में कैद कर लिया है, जिसे बाद में देखकर याद कर सकता हूं। दोनों के बीच शाम के वक्त खुद को पाता हूं। मेरे फोन में अधिक तस्वीर शाम के वक्त की हैं। रोज सुबह की धुप रूम में आती हैं, फिर वापस लौट जाती हैं। नींद से उठने पर दिन आधा हो चुका होता हैं। देर से उठने से अब दिन छोटा लगने लगा हैं। आज-कल आसमान में बादल भी दिन को रात में बदलने दोपहर से चले आते हैं। बादलों के कारण दोपहर भी शाम जैसी लगने लगी हैं, और शाम रात के करीब। आज भी आसमान में दोपहर से काफी बादल छाए हुए थे। अंधेरा होने से लगा मानों बादलों ने दिन के साथ-साथ शाम को भी अपने में समा लिया हैं। आसमान में बादलों की उपस्थिति से शायद पुरा गांव मान चुका होगा, की दिन लोगों को अपने हिस्से की शाम दिए बगैर ही आज चला गया। लेकिन गांव के अंतिम छोर में दिन बादलों से संघर्ष करता हुए मिला। बादलों ने दिन को पूरी तरह पकड़ा हुआ था। एक आवाज आसमान में गूंज रही थी, जिसे बादलों में सूर्य की लालिमा के रूप में देखकर सुना जा सकता था, की दिन अभी भी हैं। हमेशा वक्त से पहले अंघेरा होना दिन का ख़त्म होना नहीं होता। जैसे-जैसे दिन बादल से बाहर आने लगता बादल का रंग भी सफेद से लाल होने लगा था। थोड़ी देर में दिन बादलों से बाहर निकलकर शाम के रूप में दिखने लगा था, जिसकी रोशनी हर घर के अतिम छोर पर पहुंचने लगी।यह सुखद घटना की तरह हैं, जब उम्मीद खत्म होने के बाद अचानक जीवित हो जाए। गांव में होने पर अक्सर शाम इस जगह पर होता हूं। इस जगह से शाम को अंतिम समय तक देखा जा सकता हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो सूर्य का घर दूसरा गांव ही हैं। मेरे लिए शाम को अंतिम समय तक देखना, किसी चिता को जलते हुए अंतिम समय तक इंतजार करने जैसा हैं। उस वक्त का दुःख दिन के चले जाने समान हैं। 🌻


तस्वीर - आत्मनिर्भर।

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एक दु:ख जो रोज शाम के वक्त दिन के खत्म होने पर होता है, और एक सुख हैं कि दिन का अंत फोन में कैद कर लिया है, जिसे बाद में देखकर याद कर सकता हूं। दोनों के बीच शाम के वक्त खुद को पाता हूं। मेरे फोन में अधिक तस्वीर शाम के वक्त की हैं। रोज सुबह की धुप रूम में आती हैं, फिर वापस लौट जाती हैं। नींद से उठने पर दिन आधा हो चुका होता हैं। देर से उठने से अब दिन छोटा लगने लगा हैं। आज-कल आसमान में बादल भी दिन को रात में बदलने दोपहर से चले आते हैं। बादलों के कारण दोपहर भी शाम जैसी लगने लगी हैं, और शाम रात के करीब। आज भी आसमान में दोपहर से काफी बादल छाए हुए थे। अंधेरा होने से लगा मानों बादलों ने दिन के साथ-साथ शाम को भी अपने में समा लिया हैं। आसमान में बादलों की उपस्थिति से शायद पुरा गांव मान चुका होगा, की दिन लोगों को अपने हिस्से की शाम दिए बगैर ही आज चला गया। लेकिन गांव के अंतिम छोर में दिन बादलों से संघर्ष करता हुए मिला। बादलों ने दिन को पूरी तरह पकड़ा हुआ था। एक आवाज आसमान में गूंज रही थी, जिसे बादलों में सूर्य की लालिमा के रूप में देखकर सुना जा सकता था, की दिन अभी भी हैं। हमेशा वक्त से पहले अंघेरा होना दिन का ख़त्म होना नहीं होता। जैसे-जैसे दिन बादल से बाहर आने लगता बादल का रंग भी सफेद से लाल होने लगा था। थोड़ी देर में दिन बादलों से बाहर निकलकर शाम के रूप में दिखने लगा था, जिसकी रोशनी हर घर के अतिम छोर पर पहुंचने लगी।यह सुखद घटना की तरह हैं, जब उम्मीद खत्म होने के बाद अचानक जीवित हो जाए। गांव में होने पर अक्सर शाम इस जगह पर होता हूं। इस जगह से शाम को अंतिम समय तक देखा जा सकता हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो सूर्य का घर दूसरा गांव ही हैं। मेरे लिए शाम को अंतिम समय तक देखना, किसी चिता को जलते हुए अंतिम समय तक इंतजार करने जैसा हैं। उस वक्त का दुःख दिन के चले जाने समान हैं। 🌻


तस्वीर - आत्मनिर्भर।

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किताब पढ़ने की तीव्र इच्छा होने पर अक्सर उन लेखकों को पढ़ता हूं जिन्हे पहले भी पढ़ लिया है। कुछ लिखने से पहले पढ़ने की आदत हैं। हमेशा पढ़ते वक्त अचानक से मुझे बीते समय के छुटे हुए लोग नजर आते हैं। जो अपने नए और पुराने खूबसूरत यादों के कपड़े ओड़े मुझे तितली बने गुलाब के पेड़ में बैठे हुए जान पड़ते हैं। हमेंशा से उन्हे लिखने की कोशिश में असफल रहा हूं। इसलिए आज लंबे समय तक उन्हें देखता रहा। फिर इच्छा हुई इसे हाथों में लू। उसकी उपस्थित दर्ज करने बिना आवाज किए अपनी डायरी के पन्ने पलटने लगा। इसे तितल के पास जाने कदम का बढ़ाना कह सकते हैं। जैसे ही मैंने लिखना चाहा तितली तुम आज भी पहले जैसी खूबसूरत हो...,यह लिखने से पहले वह आकाश में जाते हुई दिखी। उसकी चाल में नाराजगी थी। उसे मेरे लिखने की आहट मालुम हैं। पेड़ से चले जाना मुझे निजी एंकात भंग कर देने जैसा लगा। इसकी माफी कैसी होगी? मैं फिर किताब में लौटना चाहता था। इससे पहले उसे फिर अपनी स्थिति में लाने नाम पुकारने लगा..इस बार मैंने तितली नहीं आस्था कहां..। इसकी गूंज पुरे शरीर में महसूस किया होगा। नाम लेते ही भीतर का बनावटी पन बह गया जो था वही पुराना सच था, जिसकी कड़वाहट में आज भी पानी खारा है। लंबे वक्त के इंतजार के बाद मैंने फिर किताब पढ़ना शुरु किया। दूसरे पन्ने में पहुंचते ही मैंने उसे फिर गुलाब के पेड़ पर तितली बने हुए देख लिया, इस बार पेड़ के करीब पहुंचने से पहले मैं किताब बंद कर चुका था।🍁

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