मैं लक्ष्मी नारायण 'पन्ना', बचपन से ही कहानी और कविताओं में रुचि थी परन्तु साहित्य से कोई लगाव नही रहा, कारण कि इस क्षेत्र में जानकारी का अभाव और विषय की भिन्नता। लखनऊ शहर की आबो हवा और लखनऊ विश्वविद्द्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर कराने के पश्चात बेरोजगरी के दंस ने ज़िन्दगी के कई पहलुओं से रूबरू करा दिया, जो मेरे लेखन को धार दे गया।शुरुआत में बिना किसी जानकारी के शेरो शायरी और लघु कविताओं को लिखना शुरू किया।मुझे अपने लेखन के लिए प्रकाशक और समीक्षक की तलाश थी । प्रकाशक की तलाश तो मातृभारत

#सीखना
जिस दिन व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, वही उसका आखिरी दिन होता है ।
-Panna

#सीखना

सीखना था मोहब्बत और बग़ावत सीख बैठा है ,
बचपना भोले बचपन से ख़िलाफ़त सीख बैठा है।
नफ़रतें किसने बोई हैं जमीनों पर कोई बोले,
बात कितनी भी सच्ची हो मिलावट सीख बैठा है ।।
-Panna

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#सीखना

सीखना था बहुत कुछ मुझको यारों इस जमाने से ,
पीठ पीछे की शाजिश जान पाया आजमाने से ।
झोपड़ों को जलाने में सभी मशगूल रहते हैं,
छोड़ देतें हैं चिंगारी ओ अपने आशियाने से ।।

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ठगों का काम ही होता है सब ठगमूस कर खाना ।
मिले जो हक़ गरीबों का तो उसको ठूस कर खाना ।।
-Panna

#पागल
हमें कहतें हैं ओ पागल अगर तो शौक से कहतें रहें ।
हमारे हौसले अब तूफान सी गति में इयूँ ही बहते रहें ।।

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#परिचय

मत पूछ मेरा परिचय बस इतना समझ लेना ।
कोई शायर अधूरा सा कोई आशिक़ अधूरा सा ।।
-Panna

शिकारी भी यहाँ शिकार हैं सभी,
बड़े क़ातिल यहाँ निगार हैं सभी ।
ख़ुदा अब बन गया है क़ातिल उनका,
तभी उसपे यहाँ निसार हैं सभी ।।
-Panna
#शिकार

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दिल ए नादाँ है सम्भालूँ कैसे ।
खफ़ा जिनसे उन्ही से आरज़ू भी है ।।
#दिल

जब मेरे दिल में कोई आवाज़ सुनाई न दे ।
जब मेरी आँखों में तेरी तस्वीर दिखाई न दे ।।

मैं समझ लूँगा के मुझको छोड़ दिया है तूने ।
बस मुझे मत रोक मुझे तू और सफाई न दे ।।

#दिल

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#Mother 'sday
बस मेरी राँह तकने में ओ खाना भूल जाती है ।
ओ अपने जख़्म पर मरहम लगाना भूल जाती है।।
मुझको तकलीफ़ में पाकर वह हौसला खूब देती है ।
ओ अपनी आँखों के आँशू छुपाना भूल जाती है।।

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