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इन कंधों की ताकत पर कभी संदेह न करना दोस्त
बहुत अपनों की अर्थियां इन कंधों ने उठाई हैं।

कौसी बातें
सही या गलत?
बस इसी तुलना में हम
हमेंशा बातों का मूल्यांकन
करते रहते हैं और ये भूल जाते
हैं कि सही और गलत से भी आगे
बातों का विशेष अर्थ हो सकता है जैसे
कोई बात खुद को समझदार दर्शाने के लिए
तो कोई बात आपको थोड़ा अच्छा लगाने के लिए
करने वाले ने उसपर बड़ी सोच नहीं लगाई हो
बस सिर्फ उसमें क्षणिक आनंद का उद्देश्य
छिपा बैठा हो या फिर उसे इस लिए
कहा गया हो ताकि ये न लगे कि
सुनने वाले के पास कोई दिल
या संवेदना का अहसाह
उत्पन्न हुआ नहीं है
तो बस थोड़ा सा
खुलापन रखें
बातें करें।

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ઠંડીમાં તારી સાથે ઝગડા ઓછા થાય છે
શરદીમાં કાન તારું મહેણું સાંભળતા નથી☺️

बगावत का क्या है दोस्त, बस हो जाती है यूंही
खाली बर्तन, ठंडा चुला और कुछ दिनों की भूख
जब एक साथ चिल्लाते हैं तो लोग घर छोड़ देते हैं
और सर पे कफ़न बांध के निकल आते हैं सड़कों पे

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कल अखबार में निर्भया बलात्कार केस के बारे में पढ़ा,
निर्भया की मां का इंटरव्यू भावुक करने वाला था।
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उनके कथानुसार 7 साल पहले वे एक सामान्य गृहणी थीं जिसे अपने परिवार की खुशी में अपनी खुशी मिलतीं थी।
अचानक निर्भया के साथ हुए हादसे ने ज़िन्दगी बदल दी।
जो समय रसोई बनाने व घर के कामों में बीत रहा था अचानक अदालत व पुलिस चौकी में बीतने लगा।
जो बातें न सुनने में अच्छी लगतीं थीं न कहने में उन बातों को कहना व सुनना पड़ा।
पूरे देश का समर्थन होने के बावजूद न्याय मिलना असंभव लगने लगा था।
वे डटीं रहीं , कभी परिवार, कभी समाज, कभी अदालत तो कभी पुलिस के साथ लड़ाई लड़तीं रहीं।

और आज जब न्याय मिलना तय है फिर भी आरोपियों की सज़ा , जिनके वे हकदार हैं, मुहर लगना अब भी बाकी है।
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यहां इस देश में कहा जाता है की
"हज़ारों गुनहगार छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए"
मेरे विचार से इस विधान को कुछ इस तरह बदलने दिया जाए
"अगर हज़ार गुनाहगारों को सज़ा दिलाने में एक बेगुनाह कुर्बान होता है तो होने दें"

उन हज़ारों लाखों गुनहगारों को कानून से छूटने पर जितना भरोसा है उतना विश्वास कानून पर न्याय दिलाने के लिए देशवासियों में नहीं दिख रहा।

अगर कानून नहीं बदला तो लोग अपना बदला खुद लेने लगेंगे और फिर छूटने का विश्वास भी बना लेंगे।

जय हिंद।

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હું જતો રહીશ
પાછો નહીં આવું
એવું નથી
વિનંતી કરું છું
એટલે
ગુસ્સે નહીં થાઉં
એવું નથી

जब तक शादियों में चाचा और मामा मेज़बान होते थे
तब तक शादियों में खुशियां ज़्यादा और खर्चे कम होते थे

फिक्र मुझे लगी रहती थी तेरे आने की आस में
की आज ईन नैनों की अश्कों से प्यास भुजेगी या
इस जुदाई की आग में दिल को खाक बनना होगा।

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मुझ पर मेरी अदालत में मेरी मां के कत्ल का इल्ज़ाम है
वो आखरी सांस तक मेरा इंतज़ार करती रही मैं गया नहीं
इस मुकदमे की सुनवाई नहीं हुई सफाई गिरेबाँ में कैद है।

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मैं वो मर्ज हूँ जो तुम्हें हुआ ही नहीं
जिसे हुआ हूँ उसे पता ही नहीं

तुम्हारी जान मेरी मुट्ठी मैं है
लफ़्ज़ों से मारना ग़ुनाह तो नहीं

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