ओएनजीसी में कार्य किया। कुमायूँ विश्वविद्यालय नैनीताल(डीएसबी,महाविद्यालय नैनीताल) से शिक्षा प्राप्त की(बी.एसी. और एम. एसी.(रसायन विज्ञान)।विद्यालय शिक्षा-खजुरानी,जालली,जौरासी और राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में।"दिनमान","कादम्बिनी" गुजरात वैभव,राष्ट्र वीणा(गुजरात) तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित। 7 काव्य संग्रह प्रकाशित। बचपन में गाँव का जीवन जिया और खूब उल्लास से। धनबाद,कलकत्ता,शिवसागर,अहमदाबाद,जोरहट में कार्य किया।

उसने मुझे एक उड़ान दी
खुला आकाश दिया
आकाश को नक्षत्रों से भर दिया।
एक छोटी नदी दी
जहाँ जोंक दिखते थे,
बड़ी नदी दी
जहाँ मछलियां तैरती थीं
सिंह पानी पीते थे
हिरन प्यास बुझाते थे।
उसने मुझे पहाड़ दिया
बिल्कुल ठंडा,
कि मैं हर मौसम में
आग सेंक सकूँ,
रजाई ओढ़ सकूँ
ऊनी कपड़े पहन सकूँ।
दिया एक समुद्र
जिसके तटों पर आ-जा सकूँ,
खारे पानी की मछलियां देख सकूँ।
वह मुझे चमत्कृत करता रहा
मेरी आत्मा को पलटते रहा,
जब प्यार करने लौटा
तो अपनी कृति को परखने लगा।

* महेश रौतेला

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हमारी रातें, हमारे दिन
हमारी कहानियों के सरल से शब्द,
देश के गौरव के कदम निराले
उठी भुजाओं में तिरंगे प्यारे
गंगा की कलकल ,करुणा लिये जल,
भारत की शीतलता, सरल सी स्वतंत्रता,
युगों की विरासत,ऐतिहासिक ये आदत,
हिमालय की विशालता ,अद्भुत सी हिमाद्रता,
अरण्य में साधुता, मानस में विधाता,
गीत में भारत, वीरता में भरा रक्त,
ज्ञान के कई रंग, महकता ये आंगन,
दिशाओं का उठना,इंसानियत का खिलना,
चिरंजीवी उजाला, देश मेरा निराला,
गंगा की कलकल ,करुणा लिये जल।

**महेश रौतेला
जून २०१७

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जब चलेंगे
एक माह से दूसरे माह में,
एक ऋतु से दूसरी ऋतु में,
एक वर्ष से दूसरे वर्ष में,
एक स्थान से दूसरे स्थान को,
चिट्ठी की तरह
लिखे-पढ़े जाएंगे,
पृष्ठों जैसे खुल
लम्बी उम्र बनाएंगे ।
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* महेश रौतेला
०८.०६.२०१३

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थोड़ी देर तो चले थे साथ
मैंने मूँगफली माँगी
तुमने हाथ में रखी,
मैंने छील कर मुँह में डाला
चबा ही रहा था
कि हमारे राह के दो फाड़ हो गये।
मैं मन्दिर की ओर मुड़ा
और तुम सीधी सड़क पर निकल गयी,
प्यार जो मूँगफली में था,
वही मेरे हाथ में था।

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चलो, अपनी मुलाकातों को गिन लें
उन मुलाकातों को
जो दोस्ती के लिए हुयी हैं,
लम्बी यात्राओं में छुपी हैं
प्यार के नीचे दबी हुयी हैं।

उठा लें कुछ नाम
बता दें सबको रहस्य कि
मनुष्य को मनुष्य से मिलने में
कितनी गहराइयां होती हैं।

किसी स्थान को चुन लें
जहाँ आत्मीयता
फूल सी खिल कर रोयी थी।

गिन लें कुछ नाम
जो मन में दौड़ते-दौड़ते
कँधे में चढ़ जाते हैं।


* महेश रौतेला

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यद्यपि बात करने को बहुत कुछ नहीं,
पर हँसेंगे,मुस्करायेंगे,गायेंगे,नाचेंगे
कुछ हटकर चलेंगे।
चलते-चलते ठोकरों को गिनते जायेंगे,
या फिर अपने ही सही कदम गिन लेंगे।

घर पहुंच कर सबको बतायेंगे
कि नदी पर जो नावें चल रही थीं
आकाश में जो बादल घुमड़ रहे थे,
जंगल में जो उथल-पुथल थी,
धरती जो संदेश दे रही थी,
लोगों में जो सुख- दुख हैं,
उन सब का सारांश मैं लाया हूँ।

**महेश रौतेला
०२.०६.२०१८

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क्षणभर का साथ

क्षणभर का साथ
मुझे लौटा दो,
क्षणभर की कहानी
मुझसे कह दो,
क्षणभर की भेंट
बार-बार दोहरा दो,
क्षणभर का सौहार्द
याद करने दो,
क्षणभर की स्वतंत्रता
छू लेने दो,
क्षणभर का स्नेह
फिर देखने दो,
क्षणभर का साथ
मुझे लौटा दो ।

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* महेश रौतेला
३०.०५.२०१३

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मैंने सच्चा प्यार किया
सच्चा काम किया,
तो विश्वास होता है
स्वर्ग के द्वार तक पहुँच जाऊँगा।

मैं प्यार में चला
प्यार में बैठा,
प्यार में छटपटाया
तो लगता है
स्वर्ग तक पहुँच जाऊँगा।

** महेश रौतेला

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आओ, घर बन जायें
उसकी बातों को इकठ्ठा कर
सुनहरा कल बनायें।

राहें अब भी हैं
खेतों में फसल अब भी उगती है
आओ, कोई गीत गुनगुना लें।

घर में बच्चे अब भी दौड़ते हैं
हर सुबह को छूकर
हर दिन को घर में इकट्ठा कर लें।

घर में जो प्यार सोया है
उसे जगा दें,
आओ, घर को बार-बार सजा दें।

घर पर ही सज आती है
घर पर थकान मिटती है
आओ, घर बन जायें।

** महेश रौतेला

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कुछ ऐसी ही सूरत थी,
कुछ ऐसा ही मुखड़ा था,
कुछ- कुछ मीरा जैसी थी,
कुछ - कुछ राधा जैसी थी,
बातों-बातों में आती थी,
मीलों-मीलों मन में थी,
कुछ शैलों सा अल्हड़पन था,
कुछ जानी मानी सूरत थी,
कभी आते-जाते देखा था,
कुछ चलने का सपना था,
कुछ मीरा जैसा मुखड़ा था।

* महेश रौतेला
२६.०५.२०१३

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