ओएनजीसी में कार्य किया। कुमायूँ विश्वविद्यालय नैनीताल(डीएसबी,महाविद्यालय नैनीताल) से शिक्षा प्राप्त की।विद्यालय शिक्षा-खजुरानी,जालली,जौरासी और राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित। 6 काव्य संग्रह प्रकाशित। बचपन में गाँव का जीवन जिया और खूब उल्लास से।पहाड़ के गाँव के सभी काम करते थे।

पत्र मिला
लिखा है ,
बर्फ पिघल चुकी है
हरी घास उग आयी है
घुघुती की खुशी,
फूलधैयी की रौनक
काफल का जिगर
पत्र में डला हुआ है।
एक बात और लिखी है
जिसे पढ़ नहीं पा रहा
कि "तुमसे प्यार है"
समय की फड़फड़ाहट में
इस दौड़ -भाग में
लिखा दिख नहीं रहा है ।

~महेश रौतेला

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कहानी-किस्सों में
बहुत दूर हो आती है बात,
जितना लम्बा प्यार नहीं
उससे लम्बा किस्सा है,
जितनी लम्बी सरकार नहीं
उससे लम्बी कतार खड़ी है।
*महेश रौतेला

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अभी प्यार के कई मौसम हैं
अभी मन में और शहर हैं,
अभी गाँव में बहुत कथायें
अभी प्यार को शेष फूल हैं।

ऐसे ही मन से निखर-निखर
ऐसे ही शब्दों को पकड़-पकड़,
ऐसे ही प्यार में उछल-उछल
गीता का अंश हुआ प्रकट।

युद्धों के अक्षुण्ण जज्बात लिए
शान्ति की दीर्घ पुकार लिए,
मन मानव का जो बिखर गया
गीता में आकर ठहर गया।

पग-पग पर जो लिखा हुआ
भू-भागों में बंटा हुआ,
मानव की ऊष्मा तितर-बितर
गीता सी जब-तब हुयी प्रकट।

नदियों में घोर अँधेरा है
वृक्षों में डर बसा हुआ है,
शहरों में शोर जगा हुआ है
बोलों में मन बँटा हुआ है,
जहाँ देख न सके सही-सही
वहाँ गीता धीरे हुयी प्रकट।

**महेश रौतेला

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१९.
माँ बहुत कुछ छोड़ जाती है

माँ बहुत कुछ छोड़ जाती है
अनमोल ममता,
हाथों का प्यार,
डबडबाती आँखें,
झुरीदार चेहरा,
गोद का आनन्द,
लकीरनुमा बातें,
मीठा-मीठा इतिहास,
भीगा-भीगा आँचल,
सीधी-सादी बातें।
उसकी परिधि में रह जाता है
रात-रात भर जागना,
बीमारी में उठना
रोने में सहलाना,
खुशियों को उठाना,
मन्दिर में भगवान को
सुबह-सुबह जागना।

** महेश रौतेला

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मेरे दोस्त

मेरे दोस्त
अभी-अभी बर्फ गिरी है,
मन में हिमानी बादल तैर रहे हैं।
चिड़िया ठिठुरती
वृक्ष के डाल पर बैठी,
मुझे देख रही है।
सफेद चादर सी बर्फ पर
चलने के निशान,
अब भी शेष है।
बिटिया गले में हाथ डाले
चिड़िया सी फुदक रही है,
जीवन का व्यास समय के साथ
बढ़ रहा है,
मौसम खुलने का इन्तजार है।
मेरे दोस्त
पिछले साल की तरह इस साल भी
बर्फानी मौसम चल रहा है,
धूप मन में बिखरी पड़ी है,
कहानी-किस्से कुछ कम हो गये हैं,
दो-तीन बुजुर्ग स्वर्ग सिधार चुके हैं,
जंगल की छाया कम हुयी है,
सजने-सवरने का दर्शन जीवित है,
अभी मौसम खुलने का इन्तजार है।

*महेश रौतेला

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बर्षों बाद

बर्षों बाद
बुढ़ापा आयेगा,
मैं बूढ़ा पेड़ सा
फूल विहीन हो जाऊँगा।
शाखायें मुझसे अलग हो
कहीं और चली जायेंगी,
मेरी ही ममता मुझे नोंच
समय की टहनी पर टका देगी।
या असामायिक ही मैं
फूल-फलों से लदा
जमीन पर आ जाऊँगा,
तूफानों के बीच
अकेला खड़ा रह जाऊँगा।
बर्षों बाद
उदास हो जायेगा जीवन,
मन की परतें चूने लगेंगी,
मैं स्मृति-खण्डहर में
बैठा मिल जाऊँगा।

*महेश रौतेला

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जिन्दगी तेरी हवा कुछ और है,
तेरी सजा कुछ और है।
*महेश रौतेला

प्यार की बातों में अजब सी गुमसुदगी थी, कहाँ-कहाँ ढूंढता, जिन्दगी एक पैमाना लिये खड़ी थी। *महेश रौतेला

उन दिनों को ऐसे मत छेड़ो
कि गुस्सा आ जाय,
कोई पत्थर हाथ में आकर
किसी को लहूलुहान कर दे।

उन दिनों को इतना मत बोलो
कि चिड़चिड़ापन उभर आय
जिह्वा फिसल जाय
और कोई आन्दोलन खड़ा हो जाय।

उन दिनों को इतना याद न करो
कि प्यार का बाँध टूटने लगे,
मुस्कान में कोई छेद बन जाय
और हिलता हुआ हाथ खाली लगे।

उन दिनों को इतने जोर से न पकड़ो
कि टूट-फूट कर झड़ने लगें,
फिर दूर-दूर तक दिखायी न दें
और सारे इतिहास में एकदम अकेले लगें।

उन दिनों से कभी-कभी बात कर लें
कान उनकी ओर लगा लें,
एक हल्की थपथपाहट उन्हें दे
कदमों को आगे बढ़ा लें।
*महेश रौतेला

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