ओएनजीसी में कार्य किया। कुमायूँ विश्वविद्यालय नैनीताल(डीएसबी,महाविद्यालय नैनीताल) से शिक्षा प्राप्त की(बी.एसी. और एम. एसी.(रसायन विज्ञान)।विद्यालय शिक्षा-खजुरानी,जालली,जौरासी और राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में।"दिनमान","कादम्बिनी" गुजरात वैभव,राष्ट्र वीणा(गुजरात) तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित। 7 काव्य संग्रह प्रकाशित। बचपन में गाँव का जीवन जिया और खूब उल्लास से। धनबाद,कलकत्ता,शिवसागर,अहमदाबाद,जोरहट में कार्य किया।

अद्भुत प्रेम पुजारी का
युद्ध भूमि में डट जाना,
गीता पूर्ण कह देना
विषाद मन का छट जाना।

* महेश रौतेला

आज मैंने गांव से कहा-
एक कहानी मुझको सुनाओ
दादा-दादी की तरह
नाना नानी की तरह।
उस पेड़ की तरह
जो फल फूल देता है,
उस खेत की तरह,जो अन्न देता है।
गांव बोलने लगा-
झोला ले विद्यालय गया
सड़क -रास्ते बनाने लगा
बच्चों की टोली सजाने लगा
देश का खाका खींचने लगा,
अंधविश्वासों की मरम्मत करने लगा।
बचपन की बातें बताने लगा
राजा-रानी के घर में झांकने लगा
माँ की कहानियां बांचने लगा
पिता का संदेश सुनाने लगा।
उधर घराट की आवाज आने लगी
देवों के किस्से बनने लगे
घसियारियों की बातचीत होने लगी
कबड्डी का मैदान दिखने लगा
गुल्ली ,झाड़ी में अटक सी गयी,
ठंड में पारा जमने लगा
हवा में शीत बहने लगी
घरों के किवाड़ बंद होने लगे
अंगीठी की आग लुभाने लगी
रातों की कथा रस देने लगी।
वह लड़की जो संग आने लगी थी
बड़ी हुई तो शरमाने लगी थी,
बहुत से किस्से अजब-गजब थे
मधुशाला से निकलते ,गोबर में फिसलते।
गांव अब मेरा ठहर सा गया है
नयी तकनीक में फँस सा गया है,
पलायन का एक अड्डा दिखा है,
आज एक विद्यालय टूटा मिला है।

***महेश रौतेला
०४.११.२०१७

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जब तनाव आता है
प्यार के कुछ कंकड़ ले
मन में उछाल देता हूँ,
तुम्हें पेड़ के नीचे खड़ा कर
कुछ फूल चुनने लगता हूँ।

या फिर वर्षा में तरबतर हो
तुम्हें छाते के अन्दर ले आता हूँ,
दो-चार कदम चलते-चलते
भारी तनाव मिटा लेता हूँ,
स्मृति में ले आता हूँ कुछ ऐसा
जो गुदगुदा देता है सारे सुख- दुख।

बिछा देता हूँ अपनी इच्छा को
जाने पहिचाने पलों के, जानी पहिचानी आँखों में,
अब उतावला नहीं होता हूँ
किसी भेंट के लिए,
बस, दो-चार क्षण चुरा लेता हूँ।

प्यार की आदि शक्ति को मनन करने,
बार-बार देखता हूँ पीछे
आशा से नहीं, वीतराग योगी सा,
कोई नहीं वहाँ, लेकिन बहुत कुछ है जो मिटा नहीं अब तक
नापता है मुझे क्षण-क्षण श्रीकृष्ण- राधा सा प्यार,
मुट्ठी में उसी प्यार के कुछ कण ले
बन्द किये हूँ मुट्ठी।

** महेश रौतेला

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मैंने अपनों को खोया है
कह रहे श्रीकृष्ण गांधारी से,
नाम किसी ने नहीं खोया
केवल देह यहाँ की त्यागी है।

तू अपना ही दुख देख मनुज
कह रहे श्रीकृष्ण महाभारत में,
हार-जीत कहीं नहीं
तू धर्म पर चल कर देख यहीं।

कर सके तो कर कर्म बड़ा
कह रहे श्रीकृष्ण गीता में,
सब कुछ तो अजर-अमर है
तू कर सके न्याय तो कर यहाँ।

*महेश रौतेला

२५.१०.२०

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दुखाती हैं यादें
सालों चलने के बाद भी,
आसमान से झांकती हैं
जैसे तुम्हारी ही आँखें हों।
संबोधन हो अनछुआ सा,
कदम हों हमारे इतिहास के,
उड़ते हुए आ, लटक जाते हैं,
कभी हाथों पर, कभी कंधों पर,
जैसे बच्चे झूलते थे बचपन में।
मेरी पाठशाला के उस पाठ में
तक्षशिला और नालन्दा आये थे
भारत की ही भाषा लेकर,
तब से टकटकी लगाये
सारे विश्व को टटोलते,
एक लकीर बन अड़े हुए हैं,
भारत को थपथपाने के लिए।

*महेश रौतेला
२३.१०.२०१५

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सोचता तो हूँ
अनन्त से मिला रहूँ,
श्रीकृष्ण जब उस रूप में आयें
तो मैं भी दिख जाऊँ,
श्रीराम जब उस शक्ति में आयें
तो मैं भी खिल जाऊँ,
शिवजी जब तांडव करें
तो मैं भी नाचने लगूँ।

* महेश रौतेला

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जिन्दगी कुछ मेरी थी

जिन्दगी कुछ मेरी थी
जिन्दगी कुछ तेरी थी,
साथ-साथ प्यार करती थी
क्षण-क्षण संसार रच देती थी,
कुछ गंगा जल सी बहती थी
कुछ सूख कर मर जाती थी,
दूर तक महकती थी
निकट अहसास बांटती थी,
अँधेरों को बदलती थी
उजाला समेटती थी,
दौड़ने को राह बनाती थी
उड़ने को हवाई हो जाती थी,
संकट में मोर्चा लेती थी
शान्ति में विश्वास रखती थी,
रामायण से निकलते- निकलते
महाभारत में फँस जाती थी,
गालियों के असहज ताप पर
सुदर्शन चक्र चला देती थी,
जिन्दगी कुछ मेरी थी
जिन्दगी कुछ तेरी थी।

तुम्हें पहिचानती थी
मुझे जानती थी,
किसी की विश्वास थी
किसी का संताप थी,
जहाँ-जहाँ से निकलती थी
वहाँ अपनी दृष्टि रख जाती थी,
बिखरे बालों सी
कभी काली,कभी श्वेत लगती थी,
जिन्दगी हमारे बीच नाचती थी
कहते-सुनते चुप हो जाती थी,
जिन्दगी कुछ मेरी थी
जिन्दगी कुछ तेरी थी।

जिन्दगी जब अजनबी थी
प्रश्नों नहीं पूछती थी,
जब-तब किसी कदम को
साँप बन डस लेती थी,
इस पार से उस पार तक
कभी अमृत पिला देती थी,
विष की आदी थी
अमरत्व की आकांक्षी थी,
हमारे पड़ोस से
अनजाने रोटी उठा लाती थी,
काले कौवे को भी
प्रसाद दे आती थी,
बहुत विचित्र थी
कहा- अनकहा कह जाती थी,
हमारे बीच थी
कभी गहरी नींद में थी,
जिन्दगी कुछ मेरी थी
जिन्दगी कुछ तेरी थी।

* महेश रौतेला

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श्राद्ध :

मैंने तुमको ढूंढा कैसे
तुम मुझमें रहते क्षण-क्षण कैसे,
मेरे सुख बोले हैं तनकर कैसे
मेरे दुख बनते हैं छुपकर कैसे!

मेरी नींद खुलती है पल में कैसे
सपने आते अतिशय कैसे,
मनुष्य बनता है राक्षस कैसे
गिद्ध दृष्टि फैलती जग में कैसे!

सत्य हमसे बनता कैसे
न्याय हमको प्रिय है कैसे,
श्राद्ध हमारे मृत को कैसे
तुम रहते हो कहीं हममें ऐसे!

* महेश रौतेला

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आपने कभी सपना देखा क्या
जिसमें मैं हूँ, तुम हो
और देश हो, जनता हो,
जीवन बोध हो
"सर्वे सुखिनः सन्तु" की अवधारणा हो।

अनुभूतियाँ मधुरता लिए
हर नदी, हर झील, हर पहाड़ से निकल
धरती और आकाश को जोड़
हमारी आँखों में झिलमिलाएं।

तुमने कभी सपना देखा क्या
झूमती अन्न की बालियों का
विद्यालय जाते बच्चों का
झोले में किताबों का
किताबों में अ,आ,क,ख का।

आपने सपने देखे होंगे
बड़े-बड़े, आसमान से ऊँचे
जहाँ चींटियां नहीं
हवाई जहाज उड़ते हैं,
जहाँ पगडण्डियों पर नहीं
राजपथ पर चला जाता है,
जहां वृक्ष नहीं
वृक्षों की हड्डियां बिछी होती हैं।

सपने देखने में कुछ गलत नहीं
यहाँ कोई राजा हरिचंद्र तो नहीं
न कोई विश्वामित्र है,
पर साफ आकाश तो चाहिए
जहां सपने टिमटिमा सकें।

***महेश रौतेला
28.09.2021

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अभी लिखी नहीं गयी चिट्ठी
अभी लिखी नहीं गयी चिट्ठी
प्यार की,
कहा नहीं गया शब्द
मिठास का,
हुई नहीं बात
स्नेह की ।
अभी फूटे नहीं स्रोत
सत्य के ,
अभी सम्भावना है
प्यार की, मिठास की,
स्नेह की, सत्य की ।

महेश रौतेला

१२.०९.२०१२

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