मैं --मंजु महिमा.. साहित्य कार हिंदी भाषा. लेखन विधाएँ- कविता, संस्मरण, कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य आदि.. मो. नं. 9925220177 .

🙏🏻सुप्रभात.. कुछ शरद ऋतु के हायकु आपको नज़र हैं--
हाइकु--कोहरा, धुंध
1- घना कोहरा
कोख में सुरक्षित
प्रकाश पिंड.

2- ओढ़े शरद
कोहरे का कंबल
गर्माई धरा.

3- धुंधली धरा
कुहासे का मफ़लर,
मार्तंड-मुख.

4- घना कुहासा,
बर्फीले अहसास,
कोई ना पास.

4- बाँध गले में,
मफ़लर धुंध का,
सोया सूरज.
5- दिल उदास
छाया कुहासा मन
रवि की आस.
6- क्यों छुपे हो?
धुंध के पल्लू में ,
ओ! दिवाकर
©मंजु महिमा

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औरत : एक बोनसाई --
© मंजु महिमा

जड़े तराश तराश कर बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,
पर औरत तो सदियों पहले ही बोनसाई बना दी गई थी.
वह अपने गृहस्थी के गमले में उग तो सकती है,
पर पुरुष से ऊँची उठ नहीं सकती,
वह फल तो दे तो सकती है, पर
उनकी सुरभि फैला नहीं सकती थी, वह बन कर रह गई
बस घर की सजावट मात्र.
जिसे सुविधानुसार जब चाहे तब
जहाँ चाहे वहाँ बिठा दिया जाता था।
हो चुका बहुत,
पर अब ना बनेगी वह बोनसाई,
उसे उगना है विशाल वृक्ष बनकर,
बनना है नीड़ पक्षियों का,
देने हैं मीठे रसीले फल,
फैलानी है सुगंध उनकी चहुँ दिशाओं में,
देनी है घनी छांव, तप्त धरा को।
उसे उठना है ऊपर,
करनी हैं बातें आसमां से उसे भी ,
नहीं बनकर रहना है बोनसाई उसे अब।
नहीं बनकर रहना है बोनसाई उसे अब ।
©मंजु महिमा भटनागर

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हथेलियों में सूरज-

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

जो जला सके,

उन लोलुप वासना-रत

निगाहों को,

जो ताकती रहती है,

अबोध अहिल्याओं को.|

कर सके जो भस्म ,       

उन बलात्कारियों को,

जो छिपे हैं आज भी,

सबकी निगाहों से,

और गरज रहे हैं,

शेर बन कर.|

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

 जिसकी किरणें समा जाएँ,

कलम में हमारी ,

उधेड़ दे जो बखिए,

सिले हुए राज़ोंं के.|

हो जाएँ जिनसे रोशन,

उनके अँधेरे के गुनाह,

जो पाएं हैं, पनाह सत्ता की.

कर भस्म उनके आशियानों को,

कर दें उन्हें,

भटकने को मज़बूर | .

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर दें भस्म उन,

तथाकथित नेताओं को,

जो नेता कम पिछलग्गू

अधिक आते हैं नज़र,

जो छिपाएं हैं सफेदी में,

अपने कर्मों की कालिख,

और ढा रहे हैं जनता पर कहर.|

नोटों के नशे में धुत्त,

जिनकी कलम

हस्ताक्षर करने के लिए

तुलती है करोड़ों में.

जिनके कालीन के तले,

बिछे होते हैं,

अरबों-खरबों रुपए.

भविष्य को कर अपने

सुरक्षित,

सो रहे हैं जो बेखबर|

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर दें भस्म,
तथाकथित नेताओं को,

जो नेता कम पिछलग्गू

अधिक आते हैं नज़र,

जो छिपाएं हैं सफेदी में,

अपने कर्मों की कालिख,

और ढा रहे हैं जनता पर कहर.|

नोटों के नशे में धुत्त,

जिनकी कलम

हस्ताक्षर करने के लिए

तुलती है करोड़ों में.

जिनके कालीन के तले,

बिछे होते हैं,

अरबों-खरबों रुपए.

भविष्य को कर अपने

सुरक्षित,

सो रहे हैं जो बेखबर|

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

कर दें भस्म,

उन देशद्रोहियों को,

जो देश में आज भी,

घूम रहे हैं ज़िंदा,

कर रहे आतंकित,

जनता को पहन मुखौटा.|

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज,

जो बनकर आए

एक आशा की किरण

उन हृदयों में

जो आज बुझ चुके हैं,

खो बैठे हैं अपनी आस्था

सत्ता के प्रति  

जो लाए एक स्वर्णिम प्रभात,

उन चंद इंसानों के लिए,

जो आज भी सत्य के साए में  

ईमानदारी और विश्वास को लपेटे

गठरी बने बैठे हैं,

अपने घरौंदे में.| 

नहीं खौफ़ रखना तनिक

अपनी हथेलियाँ जलने का,

यह जलन बहुत कम होगी

‘जीते जी जलने’ से तो

राहत ही मिलेगी तब,

कर सकेंगे जब 

कुछ तो दिशाहीन,

इस भटकते समाज को

रोशनी से रु-बरू करवाकर.|

आओ उगा लें ,

हथेलियों में अपनी,

एक नन्हा सूरज|

---©--मंजु महिमा

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