विजया बैंक में सहायक प्रबंधक से सेवा निवृत। पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ से साहित्यिक विरासत एवं प्रेरणा। अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन के प्रति झुकाव। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत साहित्य सृजन की अनवरत यात्रा।

1 मंजरी
मातु यशोदा मथ रही, मथनी से पय-सार।
लटकी जो मंजीर वह, बजती बारम्बार ।।

2 मेदनी
निकल पड़ी जन-मेदनी, विंध्याचल कोआज।
नव-दुर्गा का पर्व यह, सभी बनेंगे काज।।

3 बारूद
कट्टरता की सोच ही, मानवता पर भार।
बैठी है बारूद पर, दुनियाँ की सरकार।।

4 चीवर
गेरू-चीवर पहनकर, चले राम वनवास।
अनुज लखन सीता चलीं, दशरथ हुए उदास।।

5 कलिका
कोमल कलिका देख कर, हर्षित पालनहार।
फूल खिलेगा बाग में, खुश होगा संसार।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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ऐसे प्रभु श्री राम हैं, केवल देखें भक्ति।
चखे बेर सबरी सभी, तृप्त हुए दें मुक्ति।।

प्रेम-पियारे राम हैं, जग में नहीं अछूत।
आनंदित हो मल रहे, तन-मन स्वयं भभूत।।

मनोजकुमार शुक्ल " मनोज "

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1 योग
योग-गुरू भारत बना, दिया जगत संदेश।
स्वस्थ निरोगी हों सभी, बदलेगा परिवेश।।

2 विवेकानंद
युवा विवेकानंद ने, किया अनोखा काम।
भारत की पहचान दे, दिया विश्व पैगाम।।

3 श्वास
तन में जब तक श्वास है, जीवन की है आस।
जिस दिन हमसे रूठती, मृत्यु नाचती पास ।।

4 अनुलोम
तन-योगी साधक बना, हो अनुलोम-विलोम ।
हर्षित-मन जग में जिए, स्वस्थ निरोगी व्योम।।

5 प्राणायाम
करते प्राणायाम जो, होते स्वस्थ निरोग।
दीर्घ-आयु होते तभी, बनते सभी सुयोग।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1 शशि
शीतल-शशि की रश्मियाँ, जग को करें निहाल।
दे सबको संदेश यह, जीवन हो खुशहाल ।।

2 आलोक
बिखर गया आलोक फिर, दिया उसे सम्मान।
भारत को गौरव मिला, जग में हुआ महान।।

3 तारक
तारक जग का राम है, सबका पालनहार।
संकट में रक्षा करे, लगे न जीवन भार। ।

4 भुवन
भुवन प्रभाकर आ गए, बिखरा गये प्रकाश।
उठो बावले चल पड़ो, होते नहीं निराश।।

5 पुंज
ज्योति-पुंज दीपावली, करे तिमिर का नाश।
घर-घर में खुशियाँ रहें, बिखरे सदा प्रकाश।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1 अँगीठी
जली अँगीठी बीच में, दिल में उठी हिलोर।
समय गुजरता ही गया, देख हो गई भोर।।

2 आँच
आँच-आग की तापते, नित्य श्रमिक मजदूर।
सड़क किनारे रह रहे, बेघर हैं मजबूर।

3 कुनकुना
नीर कुनकुना पीजिए, ठंडी का है जोर।
स्वस्थ रहे तन-मन सभी, लगे सुहानी भोर।।

4 धूप
धूप दीप नैवेद्य से, करते सब आराध्य।
भक्ति भाव से पूजते, पूजन के हैं साध्य।।

5 कुहासा
दुर्घटना से बच रहे, जीवन है अनमोल।
देख कुहासा सड़क पर, चालक के हैं बोल।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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नए वर्ष में खुशहाली का......(गीत)

नए वर्ष में खुशहाली का,
मंगलमय संदेश मिले।
जन गण मन को स्वस्थ निरोगी,
सुखदाई परिवेश मिले।

जीवन सबका जगमग दमके,
सुख की बदली ही बरसे।
छल-छद्मों की ढहा दिवालें,
नेह प्रेम चहुँ दिशि सरसे।

मानव पर यदि तम घिर जाए,
कभी न उसको क्लेश मिले ।

नये वर्ष में सुख यश वैभव,
नित नूतन संगीत बजे।
नई सर्जना नई चेतना,
मधुर-मधुर नवगीत सजे।

मिले सभी को तरुवर छाया,
निष्कंटक पथ कानन हो।
अन्तरघट में बजे बांसुरी,
मन-भावन वृंदावन हो।

द्वार तुम्हारे चलकर पहुँचें,
कृष्ण-सखा योगेश मिले।

मिले सुजन-सान्निध्य सभी को,
कलयुग में द्वापर युग हो।
सत्य न्याय का शंखनाद हो,
राम राज्य-सा सतयुग हो ।

हम विकास के पथ पर सबको,
लेकर साथ सदा बढ़ते।
मित्र सुदामा बने अगर तो,
उनका भी मंगल करते।

भटके राही के चिंतन को,
यथा उचित निर्देश मिले।

शांति और सद्भाव शीलता,
सदियों से सबकी चाहत।
है वसुधा परिवार हमारा,
दीन दुखी का हो स्वागत।

गीता की अमरित वाणी को,
जग में फिर सम्मान मिले।
हो अखंड कण-कण भारत का,
विश्व गुरू का मान मिले।

पुनर्जन्म जब हो धरती पर,
हमको भारत देश मिले।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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पूस
पूस मास की ठंड यह, काँपे सबके हाड़।
सूरज की जब तपन हो, भागे तब ही जाड़।।
ठंड
जाड़े मे ओले गिरें, बढ़ती जाती ठंड।
परछी में बैठा हुआ, भोग रहा है दंड।।
ऊन
ऊन लिए हैं हाथ में, रखी सिलाई पास।
माँ की ममता ने बुने, स्वेटर कुछ हैं खास।।
धूप
वर्षा ऋतु का आगमन, जंगल नाचे मोर।
देख धूप है झाँकती, मन भावन चित चोर।
आँगन
आँगन में बैठे सभी, जला अंगीठी ताप।
दुख दर्दों को बाँटते, दिल को लेते नाप।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1 स्वेटर
स्वेटर बुनती नारियाँ, दिखे समर्पण भाव।
परिवारों के प्रति रहा, उनका नेह लगाव।।
2 शाल
शाल उढ़ा कर अतिथि को,दिया उचित सम्मान।
संस्कृति अपनी है यही, कहलाता भगवान।।
3 कंबल
ओढ़े कंबल चल दिए, कृषक और मजदूर।
कर्म जगत ही श्रेष्ठ है, कभी नहीं मजबूर।।
4 रजाई
ओढ़ रजाई खाट में, दादा जी का रंग।
सुना रहे हैं ठंड के, रोचक भरे प्रसंग।।
5 अंगीठी
जली अंगीठी घरों में, वार्तालापी-भाव।
मौसम का यह दौर है, बढ़ता बड़ा लगाव।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1थरथर
काँप रहा थरथर बदन, बढ़ा ठंड का जोर।
शीत लहर ऐसी बही, हो जा अब तो भोर।।
2 मार्गशीर्ष
मार्गशीर्ष के माह में, होती श्रद्धा भक्ति।
भक्तगणों को मिल रही, इससे अद्भुत शक्ति।।
3 कंबल
कंबल ओढ़े सो गए, फिर भी कटे न रात।
ओढ़ रजाई बावले, बन जाएगी बात।
4 ठंड
ठंड कड़ाके की पड़ी, घर में जले अलाव।
फिर भी भगती है नहीं, लगता बड़ा दुराव।।
5 ठिठुर
पारा गिरता जा रहा, ठिठुर रहे हैं लोग।
बदले मौसम को सभी, सुना रहे हैं भोग।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1 पवन
पवन लटों से खेलता, उलझाता हर बार।
परेशान लट कह उठी, मानी हमने हार।।
2 सिहरन
पावस की बूँदें गिरीं, गोरी के जब गाल।
सिहरन तन-मन में हुई, जैसे मली गुलाल।।
3 उपहार
गालों पर धर-अधर ने, दिया प्रेम उपहार।
सजनी का साजन चतुर, मिला उसे है प्यार ।।
4 प्रेम
प्रेम बड़ा अनमोल है, भूला नहीं गरीब।
जीवन जीने की कला, दिल के बड़े करीब।।
5 प्रतीक
अधरों ने छेड़ी गजल, दिल में प्रेम प्रतीक।
नयन शरम से झुक गए, मुख दमके रमणीक ।।
6 प्रतिबिंब
दर्पण में प्रतिबिंब को, हुआ देख हैरान।
सज्जनता का रूप धर, हँसता है शैतान।।
7 प्रतीति
सुख-प्रतीति में जी रहे, नेताओं के संग।
उनकी ही हर बात पर, हमपर चढ़ता रंग।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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