विजया बैंक में सहायक प्रबंधक से सेवा निवृत। पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ से साहित्यिक विरासत एवं प्रेरणा। अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन के प्रति झुकाव। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत साहित्य सृजन की अनवरत यात्रा।

बुंदेलखंड की वीरांगना रानी दुर्गावती बलिदान दिवस 24 जून को है।

रानी दुर्गावती का, अमर रहा इतिहास.....

रानी दुर्गावती का, अमर नाम-इतिहास।
वीर पराक्रम शौर्य की, बजी दुन्दभी खास।।
पंद्रह सौ चौबीस में, कीर्ति पिता की शान।
दुर्गाष्टमी के पर्व पर, कन्या हुयी महान।।
माँ दुर्गा का रूप थी, दुर्गावती सुनाम।
मात पिता हर्षित हुये, माँ को किया प्रणाम।।
राजमहल में खेलकर, तरकश तीर कमान।
बच्ची बढ़ युवती हुयी, सभी गुणों की खान।।
सुतवधु नृप संग्राम की,दलपत की थी जान।
चंदेलों की लाड़ली, गौंड़वंश की शान।।
दलपत शाह-निधन पर, थामी शासन-डोर।
सिंहासन पर बैठ कर, पाई कीर्ति-अँजोर।।
किया सुशासन हो अभय, फैली कीर्ति जहान।
नन्हें वीर नारायण, में बसती थी जान।।
शासन सोलह वर्ष का, रहा प्रजा में हर्ष।
जनगण का सहयोग ले, किया राज्य-उत्कर्ष।।
ताल तलैया बावली, खूब किये निर्माण।
सुखी प्रजा सारी रहे, पा विपदा से त्राण।।
सोने की मुद्राओं से, भरा रहा भंडार।
योद्धाओं की चौकसी, अरि पर सतत प्रहार।।
हुये आक्रमण शत्रु के,विफल किये हर बार।
रण कौशल में सिद्ध थीं, सब सेना-सरदार।।
थे दीवान आधार सिंह, हाथी सरमन साथ।
दुश्मन पर जब टूटते, शत्रु पीटते माथ।।
बाज बहादुर को हरा, किया नेस्तनाबूत।
बुरी नजर जिनकी रही, गाड़ दिया ताबूत।।
अकबर को यश खल गया,करी फौज तैयार।
आसफखाँ सेना बढ़ा,आ धमका इस बार।।
समरांगण में आ गईं, हाथी पर आरूढ़।
रौद्ररूप को देखकर, भाग रहे अरि मूढ़।।
अबला को निर्बल समझ, आये थे शैतान।
वीर सिंहनी भिड़ गयी,धूल मिलाई शान।।
वीरों का सा आचरण, डटी रही दिन रात।
भारी सेना थी उधर, फिर भी दे दी मात।।
चौबिस जून घड़ी बुरी, आया असमय पूर।
अरि-सेना नाला नरइ, घिर रानी मजबूर।।
तीर आँख में आ घुसा, तुरत निकाला खींच।
मुगल-सैन्य के खून सेे, दिया धरा को सींच।।
बैरन तोपें गरजतीं, दुश्मन-सैन्य अपार।
मुट्ठी भर सेना लिये, जूझ रही थी नार।।
अडिग रही वीरांगना, अंत सामने जान।
शत्रु-सैन्य से घिर गई, किया आत्म-बलिदान।।
गरज सिंहनी ने तभी, मारी आप कटार।
मातृभूमि पर जान दे, सुरपुर गई सिधार।।
मरते जीते हैं सभी, यश अपयश की आस।
जीवन तब ही सार्थक, जो रचता इतिहास।।
जब नारी शक्ति बने, तब दुश्मन का नाश।
स्वर्णाक्षरों में लिख गई,वीरांगना इतिहास।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

Read More

प्रसंग
शुचि प्रसंग श्री राम के, देते हैं संदेश।
जीवन में धारण करें, कभी न आयें क्लेश।।

मानस
मानस अद्भुत ग्रंथ है, शुभ प्रसंग संदेश।
मानव के संकट छटें, प्रगति करे यह देश।।

अनुपम
राम कथा संवाद के, अनुपम सभी प्रसंग।
ज्ञान और वैराग्य का, है रोचक सत्संग।।

विभूति
ज्ञान और विज्ञान में, पारंगत जो लोग।
अपने उसी विभूति से, हरता मानव रोग।।

झील
नदी बावली झील हैं, ईश्वर के वरदान।
इनका संरक्षण करें, मिलता जीवन दान।।

भागीरथी
भागीरथी प्रयास कर, मोदी हुए महान ।
कई समस्या खत्म कर, जीते सीना तान ।।

पाखंडी
पाखंडी धरने लगे, साधु संत का रूप।
पोल खुली जब सामने, मुखड़ा दिखा कुरूप।।

वर्तिका
जली वर्तिका दीप की, बिखरा एक उजास ।
तिमिर भगा मन का सभी, जगी हृदय में आस ।।

कुंजी
श्रम की कुंजी है सही, खुल जाते हैं द्वार ।
कभी न जीवन में मिले, कर्मवीर को हार।।

परिमल
प्रेम रहे मन में सदा, खुलें हृदय के द्वार ।
तन परिमल की महक से, प्रियतम का श्रृंगार।।

उपवास
रोटी नहीं नसीब में, पेट करे उपवास।
हर गरीब का है यही, छोटा सा इतिहास ।।

दस्यु
बाल्मीकि जी दस्यु थे, उपजा जब है ज्ञान ।
रामायण का ग्रंथ रच, बनी सुखद पहचान।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

Read More

https://www.matrubharti.com/
नयन हँसे तो मन हँसे.........

नयन हंँसें तो मन हँसे, हँसें चाँदनी - धूप।
नयन जलें क्रोधाग्नि से, देख डरे हैं भूप।।
नयन विनोदी जब रहें, करें हास परिहास।
व्यंग्य धार की मार से, कर जाते उपहास।।
नयन रो पड़ें जब कभी,उठ जाता तूफान।
पत्थर दिल पिघलें सभी, आँसू हैं वरदान।।
नयनों की अठखेलियाँ, जब जब होतीं तेज।
नेह प्रीत के सुमन से, सजती तब-तब सेज।।
इनके मन जो भा गया, खुलें दिलों के द्वार।
नैनों की मत पूछिये, दिल के पहरेदार ।।
नयनों की भाषा अजब, इसके अद्भुत ग्रंथ।
बिन बोले सब कुछ कहें, अलग धर्म हैं पंथ।।
चितवन नैंना जब चलें, दिल में चुभे कटार।
पागल दिल है चाहता, नयन करें बस वार।।
प्रकृति मनोहर देखकर, नैना हुए निहाल।
सुंदरता की हर छटा, मन में रखे सँभाल।।
नैंना चुगली भी करें, नैना करें बचाव।
नैना से नैना लड़ें, नैंना करें चुनाव।।
नैना बिन जग सून है, अँधियारा संसार।
सुंदरता सब व्यर्थ है, जीवन लगता भार।।
सम्मोहित नैना करें, चहरों की है जान ।
मुखड़े में जब दमकतीं, बढ़ जाती है शान।।
प्रभु की है कारीगिरी, नयन हुए वरदान।
सजे रूप साहित्य का, उपमाओं की खान।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

Read More

प्रेम रंग में रंग गया, कविता तेरे संग....

प्रेम रंग में रंग गया, कविता तेरे संग ।
मेरे मन में छा गया, तेरा उजला रंग।।
कागज मसि संवेदना, लेकर चलता संग ।
जाने कब किस मोड़ में, हो जाये सत्संग ।।
कानों में बस गूँजती, मन भावन वह चंग ।
फगुनाइ में ज्यों चढ़े, हुरियारों को भंग ।।
तुमको पाने के लिये, व्याकुल है संसार ।
बड़ भागी कर पा रहे, इक तेरा दीदार ।।
वरद हस्त पाना कठिन, मुझको है यह ज्ञात ।
कुछ मनीषियों से सुना, तुम रहती अज्ञात।।
वैदिक ऋषियों ने रचे, अनुपम ग्रंथ अनंत ।
बाल्मीकि, तुलसी रमे, मीरा हो गयीं संत ।।
कालिदास जड़मति रहे, मिला आपका संग ।
सूरदास, रसखान ने, किया सभी को दंग ।।
अमर हुये साहित्य में, हो गये सभी मलंग ।
प्रेम भाव मे डूबकर, रचे ग्रंथ बहुरंग ।।
जग में सब पूजे गये, ईश अंश प्रतिरूप।
जनमन में ये छा गये, इनका बड़ा स्वरूप।।
अनुकंपा जिस पर हुई, वही हुआ निष्णात ।
जीवन भर लिखते रहे, कितने कवि दिन रात ।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

Read More

फागुन के दिन आ गये
फागुन के दिन आ गये, मन में उठे तरंग।
हँसी ठहाके गूँजते, नगर गाँव हुड़दंग ।।
हुरियारों की गोष्ठी, चारों ओर गुलाल।
रंगों की बरसात से, भींग उठी चौपाल ।।
अरहर झूमे खेत में, पहन आम सिरमौर।
मधुमासी मस्ती लिये, नाचे मन का मोर।।
जंगल में टेसू हँसे, हँसी गाँव की नार।
चम्पा महकी बाग में, शहर हुये गुलजार।।
प्रेम रंग में डूब कर, कृष्ण बजावें चंग ।
राधा पिचकारी लिये, डाल रही है रंग।।
दाऊ पहने झूमरो, गाते मस्त मलंग।
होली के स्वर गूँजते, टिमकी और मृदंग।।
निकल पड़ी हैं टोलियाँ, हम जोली के संग।
बैर बुराई भूलकर, गले मिल रहे रंग ।।
फाग-ईसुरी गा रहे, गाँव शहर के लोग।
बासंति पुरवाई में, मिटें दिलों के रोग।।
जीवन में हर रंग का, अपना है सुरताल ।
पर होली में रंग सब, मिलें गले हर साल ।।
दहन करें मिल होलिका, मन के जलें मलाल ।
गले मिलें हम प्रेम से, घर-घर उड़े गुलाल ।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

Read More

भारत में सदियों हर युग में....

भारत में सदियों हर युग में,
मातृभूमि का मान रखा है।
देश प्रेम का फर्ज निभानें,
माँ के चरणों शीश झुका है।

वेद ऋचाओं में सदियों से।
पृथ्वी को देवी माना है।
आदि सनातन काल से हमने।
हाथ जोड़कर मंत्र जपा है।
भारत में सदियों हर युग में....

रामराज्य का सपना पाला।
ऊँच-नीच का भेद मिटा है ।
शबरी के मीठे बेरों का।
ईश्वर ने भी स्वाद चखा है।
भारत में सदियों हर युग में....

हमने सदियों से हर युग में,
मातृभूमि का मान रखा है।
देश प्रेम का फर्ज निभाने,
माँ के चरणों शीश झुका है।
भारत में सदियों हर युग में....

विषय वासना कभी न भायी,
नारी का यशगान किया है।
मानवता से हाथ मिला कर।
संस्कृति का सम्मान किया है।
भारत में सदियों हर युग में....

कर्म भक्ति गीता से पायी,
घर-आँगन में वृक्ष लगा है।
फल की आशा स्वयं रही न,
बस पथिकों का ध्यान रखा है।
भारत में सदियों हर युग में....

पूरब की संस्कृति ने जग में,
धर्म ज्ञान संदेश गढ़ा है।
संकट छाने पर भी हमने,
हर मजहब का ध्यान रखा है।
भारत में सदियों हर युग में....

मूर्ति बना भारत की हमने,
माँ का मंदिर सजा रखा है।
पूजा-अर्चन और वंदना,
बाल्यकाल से शीश झुका है।
भारत में सदियों हर युग में....

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

Read More

फिर आया ऋतुराज है....
फिर आया ऋतुराज है , मधुप रहे हैं झूम ।
पुष्पों के मकरंद ने, खूब मचाई धूम ।।
हाथ जोड़ वंदन करें, सरस्वती का ध्यान ।
मनोकामना सिद्ध हो, हरती है अज्ञान ।।
ऋतु वसंत का आगमन, छाया है उल्लास।
हरित प्रकृति की गोद में, दूर हटें संत्रास ।।
पीताम्बर रंग छा गया, वसुधा बदले रूप।
पीली सरसों चूनरी, पहन चली है धूप।।
सूर्यमुखी का पुष्प अब , देता है संदेश ।
तेजस्वी तन मन रखें, तब बदले परिवेश।।
फागुन में होरी जले, जलते सभी मलाल ।
रंगों की बरसात में, माथे लगे गुलाल ।।
मधुमासी मौसम हुआ, मिलकर गाते फाग।
टिमकी संग मृदंग का, हुरियारों का राग।।
पिचकारी ले हाथ में, कृष्ण करें मनुहार।
राधा छुपती हो कहाँ, होली का त्योहार।।
ऋतु बसंत के द्वार पर, स्वागत करे पलास ।
लाल पुष्प अर्पण करे, चहुँ दिश है उल्हास ।।
मन विछोह में दहकता, ज्यों पलास का फूल ।
विरह वेदना में चुभे, दिल में बनकर शूल ।।
धीर-वीर रघुवीर हैं, सबके कृपा निधान ।
शरणागत जो भी हुआ,जीता सकल जहान ।।
राघव का मंदिर बने, अब कहता है देश ।
नवमी तिथि फिर आ रही, बदला है परिवेश ।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

Read More

 दस दोहे....


भारतीय गणतंत्र का, इकहत्तरवां साल।
खुशियों की सौगात से,करता मालामाल।।  

भारत के गणतंत्र का, करता जग यशगान ।
जनता के हित साधकर, सबका रखता मान।।

सदियों से भारत रहा, ऋषियों का यह देश।
मन में बसी सहिष्णुता, कभी न बदला वेश।।

भारत ऐसा देश यह ,जग में छवि है नेक ।  
विविध लोग रहते यहाँ, भाषा धर्म अनेक ।।  

धरती माँ के तुल्य है, सबकी पालनहार ।
वंदन अभिनंदन करें, और करें जयकार।।

जनता तो मिलकर चुने, अपनी ही सरकार ।
नेतागण निज स्वार्थवश,करते बंटाधार ।।
 
मंदिर में भगवान हैं, बाहर हैं शैतान । 
मानव खड़ा उदास है,सदियों से हैरान ।।

महुआ से लाहन बना, पीते कुछ परिवार ।
दूरी इससे जब रहे, तो जीना साकार ।। 

बीहड़ वन में दहकते, जब पलाश के फूल ।
वासंती ऋतु देखकर, हिय से हटते शूल।। 

जब आता मधुमास है, मन में उठे तरंग ।
तन मन खुद ही झूमता, ले हाथों में चंग ।। 

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

Read More

महंँगाई पर कुछ दोहे

टके सेर बिकता रहा, पहले कभी अनाज।
शिला लेख में है लिखा, कैसा था वह राज ।।

घोड़ा गाड़ी पैर से,नापा सकल जहान।
कार स्कूटर में रमा,भूल गया इन्सान।।

पीढ़ी दर पीढ़ी पड़ी, महंँगाई की मार।
वेतन कम मिलता रहा,मिलता रहा दुलार।।

पहले कम मिलता रहा, अब तो कई हजार।
अपने-अपने ढंग से, जीवन रहे गुजार।।

महंँगाई की बाढ़ से, सब तो हैं, बेहाल।
पूंँजीपति उपभोक्ता, की उतरी है खाल।।

क्रेडिट मिलता था नहीं, बाँध रहे अब किस्त।
सुख सुविधा भोगी बढ़े, पाकर अब हैं मस्त।।

पहले पैर पसार कर, सोता था भगवान ।
लम्बी चादर ओढ़कर,अब सोता इन्सान।।

मजदूरी भी है बढ़ी, भांँति-भांँति के काम।
अब कोई भूखा नहीं, राशन में है नाम ।।

तालमेल अब बन गया, उपभोक्ता सरकार ।
महंँगाई की मार से, रक्षा का आधार ।।

अपने-अपने ढंग से, जीवन जीते लोग ।
जीने के इस सफ़र में, मिल ही जाता भोग।।

जिसकी जितनी चाहना,बने जगत में खास।।
अपने पर फैलाइये, उड़ने को आकाश।।

महंँगा सब कुछ हो गया, रोटी वस्त्र मकान ।
कर्मठता से ही मिले, मानव को सम्मान।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

Read More

1 प्रेम
प्रेम हृदय में जब बसे, जग को करे निहाल ।
काम, वासना, क्रोध से, सब होते बेहाल ।।

2 ज्ञान
ज्ञान जगत में है बड़ा, उसका नहीं है छोर ।
जितना पाओगे उसे, बिखराओगे भोर ।।

3 पीड़ा
पीड़ा सबके माथ में, लिख देता भगवान ।
कर्मठ मानव जूझकर, पाता सदा निदान ।।

4 संताप
मानव खुद पैदा करे, रोग शोक संताप ।
सावधान यदि खुद रहे, दूर हटेंगे श्राप ।।

5 निर्मल
निर्मल मन की चाहना, होती है दरकार ।
दूषित मन से भागते, कौन करे सत्कार ।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

Read More