विजया बैंक में सहायक प्रबंधक से सेवा निवृत। पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ से साहित्यिक विरासत एवं प्रेरणा। अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन के प्रति झुकाव। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत साहित्य सृजन की अनवरत यात्रा।

दोहे

भाई, बहिन, पुत्र, माता, पिता ।
1 भाई
लक्ष्मण सम भाई नहीं,त्यागा है घर द्वार।
बड़े भ्रात के साथ में, रक्षा का धर भार।।

2 बहिन
कृष्ण-द्रौपदी की कथा, भाई बहिन का प्यार।
चीर हरण पर बहन का, संकट से उद्धार।

3 पुत्र
दशरथ के हर पुत्र में, पितृ भक्ति सम्मान।
राज पाट को छोड़कर, रखा वचन का मान।।

4 माता
माता है इस जगत में, सबकी पूजन हार।
भक्ति भाव आराधना, धर्म सनातन सार।।

5 पिता
मुखिया है परिवार का, पिता लगाता दाँव।
दुख दर्दों को भूलकर, देता सबको छाँव ।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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सभी प्रबुद्ध साहित्यकारों के सामने प्रदत्त पाँच शब्दों पर दोहे समीक्षा हेतु सादर प्रस्तुत हैं, 🙏🙏🙏

दशहरा, सत्य, नवरात्रि, शरद, गरबा।

1 दशहरा
महल दशानन का ढहा, वनवासी की जीत।
पर्व दशहरा ने रचा, खुशियों के नव गीत ।।

2 सत्य
विजय सत्य की हो गई, जीत गए प्रभु राम।
लंकापति के हार से, उस पर लगा विराम।।

3 नवरात्रि
सजा हुआ नवरात्रि पर , माता का दरबार।
धूप दीप नैवेद्य से, सब करते मनुहार।।

4 शरद
हुआ शरद ऋतु आगमन, मौसम बदले रंग ।
धूप सुहानी अब लगे, ओढ़ रजाई संग।।

5 गरबा
गुजराती गरबा हुआ, जग में यह विख्यात।
माँ दुर्गा की भक्ति में, जन मानस दिन रात।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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*दोहे - जनमेदिनी,प्रतिदान,वाणी,आह्वान,परिणाम*

1 जनमेदिनी
उमड़ पड़ी जनमेदिनी, नवदुर्गा में आज।
माँ दर्शन संकल्प ले, चले भक्तगण-राज।।

2 प्रतिदान
स्नेह और आशीष है, मीठे अनुपम बोल।
मिले सदा प्रतिदान में, शक्ति-विजय अनमोल।

3 वाणी
वाणी का माधुर्य ही , सम्मोहन का बाण।
कार्यकुशलता है बढ़े, हर संकट से त्राण।।

4 आह्वान
भारत का आह्वान है, जग का हो कल्याण।
मानवतावादी रहें, चले न उन पर बाण।।

सुचिता का आह्वान हो, मानव का कल्याण।
जग में हो सद्भावना, भारत देश प्रमाण।।

5 परिणाम
नेक कार्य करते रहें, बढ़ें सदा अविराम।
मंजिल सदा पुकारती, मिलें सुखद परिणाम।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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1 चंपा
चंपा के शृंगार से, होता प्रभु अभिषेक।
पुष्प बड़ा मोहक लगे, लगते उनको नेक।।

2 परिमल
महके तन परिमल सरिस, वाणी में हो ओज।
सभ्य सुसंस्कृति सौम्यता, से होती है खोज।।

3 मकरंद
फैल गई मकरंद जब, उपवन में चहुँ ओर।
पंछी कलरव कर रहे, भौरों का है शोर।।

4 कली
वर्तमान जो है कली, बनकर खिलता फूल।
डाली से मत तोड़िए, कभी न करिए भूल।।

5 प्रभात
कर्मयोग-पर्याय है, उठ अब हुई प्रभात।
भक्ति योग के संग में, तम को दे तू मात।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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5 दोहे

1 आस्था
आस्था अरु विश्वास ही, ईश्वर से सत्संग।
सदाचार जीवन रहे, मानवता हो संग।।
2 शांति
विश्व शांति चहुँ ओर हो, मानवता की जीत।
मानव सुख की कल्पना, से बनते मनमीत।।
3 रूपसी
देख रूपसी नार को, मन होता बेजार।
घायल दिल तब माँगता, उससे ही उपचार।।
4 क्रंदन
तालिबान की सोच से,बहा लहू अफगान।
क्रंदन करता है मनुज, बना है कब्रिस्तान।।
5 कलरव
वृक्षों पर कलरव करें, पक्षी सुबहो-शाम।
घर आँगन में गूँजता, भक्ति भाव हरिनाम।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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5 दोहे

1 क्वाँर
क्वाँर माह नवरात्रि को, नव दुर्गा का रूप।
शक्ति रूप आराधना, जप-तप करें अनूप।।
2 कार्तिक
कार्तिक में दीपावली,धन-लक्ष्मी का वास।
गहराया तम दूर हो, नव जीवन की आस।।
3अगहन
अगहन मासी शरद ऋतु, देती यह संदेश।
मौसम ने ली करवटें, कट जाएँगें क्लेश।।
4 मुकुल
मुकुल खिलें जब बाग में,अधरों पर मुस्कान।
भौरों के संगीत ने, छेड़ी मधुरिम तान।।
5 मंजुल
मंजुल छवि श्री राम की, मंदिर की है शान।
नगर अयोध्या सज रहा, करें सभी गुणगान।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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सजल
समांत -आने
पदांत -लगे हैं
मात्रा भार -२२

दोस्त देखकर आँखें चुराने लगे हैं ।
मित्रता की पताका झुकाने लगे हैं।।

सौगंध खाई निभाने की खूब मगर,
सीढ़ियांँ जब चढ़ीं तो गिराने लगे हैं।

कभी खाए सुदामा ने छिपाकर चने,
गरीब को चुभे दंश रुलाने लगे हैं।

कन्हैया सा दोस्त,अब मिलेगा कहाँ,
प्रतीकों में बनकर लुभाने लगे हैं।

भूल जाने की आदत सदियों से रही ,
आज फिर नेक सपने सुहाने लगे हैं ।

स्वार्थ की बेड़ियों में बँथे हैं सभी,
खोटे-सिक्कों को सब भुनाने लगे हैं।

तस्वीरें बदली हैं इस तरह देखिए,
चासनी लगा बातें,सुनाने लगे हैं ।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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पितर-पक्ष में चल पड़े ....

पितर-पक्ष में चल पड़े , पुरखे घर की ओर ।
आतुर सबको देखते, नापें दिल के छोर ।

जल तर्पण अब कर रहे, मचा रहे हैं शोर।
मात-पिता भूखे रहे, नहीं मिली कागोर।।

परलोकी जब हो गए, प्रस्तुत करते जान।
जीवित रहते कब दिया, बूढ़ों को सम्मान।

जब तक वे जिन्दा रहे, रखा न अपने साथ ।
जब अर्थी पर सो गए, पीट रहे थे माथ।।

स्वर्ग लोक से हंँस रहे, कभी न समझी पीर।
पिंडदान करते फिरें, गया-त्रिवेणी तीर।।

रूप बदल कागा नहीं, अब आते हैं भोर।
श्राद्ध-पक्ष में बन रही, उनको अब कागोर ।

गौ कागा दिखते नहीं, सभी गए हैं भाग।
पंछी सारे उड़ गए, सुने न कलरव राग ।।

प्रेम नेह सम्मान के, छूट रहे नित छोर ।
निज स्वार्थों में लिप्त हैं, चलें नेह की ओर।।

सुख-दुख में सब एक हों, थामें पर-दुख डोर।
शहरी संस्कृति ने डसा, बढे़ गाँव की ओर।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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चंपा, परिमल, मकरंद, कली, प्रभात

1 चंपा
चंपा के शृंगार से, होता प्रभु अभिषेक।
पुष्प बड़ा मोहक लगे, लगते उनको नेक।।

2 परिमल
तन परिमल सा महकता, वाणी में हो ओज।
सभ्य सुसंस्कृति सौम्यता, से होती है खोज।।

3 मकरंद
फैल गई मकरंद जब, उपवन में चहुँ ओर।
पंछी कलरव कर रहे, भौरों का है शोर।।

4 कली
वर्तमान जो है कली, बनकर खिलता फूल।
डाली से मत तोड़िए, कभी न करिए भूल।।

5 प्रभात
कर्मयोग-पर्याय है, उठ अब हुई प्रभात।
भक्ति योग के संग में, तम को दे तू मात।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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काया के जर्जर होते ही.......

काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुई हैं।
चिंताओं में डूबा यह मन,
पीड़ाएँ धनवान हुई हैं।।

सुख-दुख तो आना जाना है,
जीवन में वरदान हुए हैं।
कलयुग ने है करवट बदला,
धूमिल सब अरमान हुए हैं ।।

काल चक्र से छले गए सब,
आशाएँ शमशान हुईं हैं।
काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुई हैं.......

किस पर दोष मढ़ेंगे जग में ,
अपनों पर अभिमान रहा है ।
एक-एक सपने सब रूठे ,
पग-पग पर अपमान सहा है।।

मंजिल की क्या करें शिकायत,
राहें तक अनजान हुई हैं।
काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुई हैं.....

कष्ट सहे हैं कितने लेकिन,
सबको ही सम्मान दिया है।।
जीवन की आपा धापी में,
हमसे जो कुछ बना दिया है।

अच्छा जीवन जीने खातिर,
दिन-रातें कुर्बान हुईं हैं।
काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुईं हैं.....

छल-छद्मों के चक्र व्यूह से,
नहीं निकलना जग को आया।
दुर्योधन के षड़यंत्रों से,
छुटकारा भी कब मिल पाया।।

मोहपाश से सब हैं जकड़े,
पतवारें बेजान हुई हैं।
काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुई हैं.....

डूब रहीं आशाएँ सबकी ,
जो जग में प्रतिमान गढ़े थे।
दिवा स्वप्न बिखरे टूटे सब,
जो सबने अनुमान गढ़े थे।।

प्रभु ने जो है लिखा भाग्य में,
वही आज यजमान हुई हैं।
काया के जर्जर होते ही,
छलनाएँ बलवान हुई हैं.....


मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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