विजया बैंक में सहायक प्रबंधक से सेवा निवृत। पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ से साहित्यिक विरासत एवं प्रेरणा। अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन के प्रति झुकाव। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत साहित्य सृजन की अनवरत यात्रा।

"गुपकार" संगठन पर मेरी एक सजल सादर प्रस्तुत है 🙏🙏🙏

हम बेबस ही फँसे हुए हैं,
कितने सपने धुँये हुए हैं।

हम मुफलिसी हटाना चाहें,
कुछ धूनी में रमे हुए हैं ।

जग आतुर नभ में जाने को,
कुछ झुरमुट में घिरे हुए हैं।

हम सद्भाव जगाना चाहें,
कुछ स्वार्थों में धँसे हुए हैं।

हम सबको हैं शीश झुकाते,
कुछ अकड़े ही खड़े हुए हैं।

हम जीवन का मोल समझते,
कुछ मानव बम तने हुए हैं।

संसद भी समझाकर हारा,
कुछ नासमझी अड़े हुए हैं।

हम सरहद की करें हिफाजत,
कुछ आतंकी बने हुए हैं।

यह कैसा गुपकार संगठन,
शत्रु देश से मिले हुए हैं।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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सभी विद्वान साहित्यकारों के सामने सादर प्रस्तुत हैं, दीपावली पर कुछ दोहे, समीक्षार्थ 🙏🙏

🎆 दीपावली पर दोहे 🎆

ज्योतिपुंज दीपावली, खुशियों की सौगात।
रोशन करती जगत को, तम को देती मात।।
दीपक का संदेश है, दिल में भरें उजास।
घोर तिमिर का नाश हो, मन हो नहीं उदास।।
रिद्धि-सिद्धी और संपदा, लक्ष्मी का वरदान ।
दिवाली में पूजते, हम सब करते ध्यान।।
सदियों से दीपक जला, फैलाया उजियार ।
अंधकार का नाश कर, मानव पर उपकार ।।
हर मुश्किल की राह में, जलता सीना तान ।
राह दिखाता है सदा,जो पथ से अनजान ।।
दीवाली में दीप का, होता बड़ा महत्त्व ।
हर पूजा औ पाठ में, शामिल है यह तत्व।।
लक्ष्मी और गणेश जी, धन-बुद्धि का साथ।
दोनों के ही योग से, जग का झुकता माथ।।
मानवता की ज्योत से, नव प्रकाश की पूर्ति।
सबके अन्तर्मन जगे, दीपक की यह ज्योति।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज"

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1 दीपक
दीपक का संदेश है, दिल में भरें उजास।
घोर तिमिर का नाश हो, मन हो नहीं उदास।।

2 आलोक
सूरज का आलोक ही, देता है संदेश ।
कर्म सभी अपना करें, तो बदले परिवेश।।

3 उजास
घोर अमावस रात में, दीपक करे उजास।
अंधकार मन का हटे जीवन में उल्लास।।

4 सौहार्द
मानवता का भाव हो, बड़ा यही उपकार।
मानव में सौहार्द हो, नेह प्रेम सत्कार ।।

5 दीवाली
राम अयोध्या आ गए, हर्षित हुआ समाज।
हर घर दीवाली रहे, सुख का हो अब राज।।

6 सूर्य
सारे जग में सूर्य ही, निर्भय करे प्रकाश।
भोर करे नित धरा में, फिर निखरे आकाश।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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अहंकार रवि को हुआ.......

अहंकार रवि को हुआ, मैं इस जग की शान ।
कौन जगत में है यहाँ, मुझसे बड़ा महान ।।
कहकर रवि जाने लगा, संग गया प्रकाश ।
अंधकार छाने लगा, तब जग हुआ हताश ।।
बात उठी तब चतुर्दिश, प्रश्न बना सरताज ।
देगा कौन प्रकाश अब, अंधकार का राज ।।
दीपक कोने से उठा, फैला गया उजास ।
मानो सब से कह रहा, क्यों हैं आप उदास ।।
मैं छोटा सा दीप हूँ, जग में करूँ प्रकाश ।
सदियों से मैं लड़ रहा, कभी न हुआ निराश ।।
सुप्त मनोबल जग उठा, जागा दृढ़ विश्वास ।
जाग उठी नव चेतना, परिवर्तन की आस ।।
तब मानव ने है कहा, सुन सूरज यह बात ।
हम सब तुम से कम नहीं, तुझको दूँगा मात ।।
कमर कसी उसने तभी, रवि को देने मात ।
ऊर्जा श्रोत तलाश कर, तम से दिया निजात ।।
न्यूक्लियर में खोजता, ऊर्जा के अब श्रोत ।
अंधकार से भिड़ गया, इक छोटा खद्योत ।।
अविष्कार वह कर रहा, उस दिन से वह रोज ।
परख नली में कर रहा, नव जीवन की खोज ।।
जूझ चुनौती से रहा, मानव आज जहान ।
बौद्धिक क्षमता से हुआ, वह सच में बलवान ।।

मनोज कुमार शुक्ल 'मनोज'

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समसामयिक घटनाओं पर एक रचना 🙏🙏🙏🙏
सजल
समांत -इयाँ
पदांत -
मात्रा भार -26

वासनाओं की हवा से, बढ़ गईं दुश्वारियाँ,
सब जगह फैला प्रदूषण,मर रही हैं लड़कियाँ ।

बांँटते अपराधियों को, दलित जाति मजहबों में,
स्वार्थ का जामा पहनकर, दे रहे रुसवाइयांँ।

लोभ सत्ता का बढ़ा अब, वोट बैंकों पर नजर,
हैं सशंकित मन सभी के, छा रही बेचैनियाँ।

था सरोवर शांँत-निर्मल,साफ सुथरी थी नदी,
बाज कुछ आते कहाँ हैं, शिकार करते मछलियाँ।

प्रेम भाइ-चारे के, हमने गढ़े हैं फलसफे ,
ओझल दिलों से हो रहीं, सद्भाव की कहानियांँ ।

सोचना आता नहीं है,दिग्भ्रमित बस कर रहे,
दशकों से करते रहे, मनचाही नादानियाँ।।

दौड़ने आतुर खड़ा है, आज भारत विश्व में,
जो अँधेरे में खड़े हैं, गढ़ रहे वे आँधियाँ।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "
15,अक्टूबर 2020

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मातृ भारती के लिए 5 दोहे

1 कानून
बने सभी कानून हैं, अमल करेगा कौन ।
अपराधी भी समझते,सज्जनता है मौन ।।

2 सरकार
चुनी हुई सरकार जब, करती है कुछ काम ।
पर विरोध के नाम पर, कुछ नेता बदनाम ।।

3 झंकार
संकट जब हो देश में, गूँज उठे झंकार ।
देशभक्ति उर में जगे, दुश्मन को दें मार।।

4 मशाल
जागरूकता है यही, थामे रहें मशाल।
इनके बल पर ही सदा, सद्गुण मालामाल।।

5 उन्वान
सीमा की रक्षा करें, देश भक्ति उन्वान।
ऐसे जज्बे को नमन, दे देते बलिदान।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
9 अक्टूबर 2020

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कुछ दोहे

पिंडदान करते रहे, गया त्रिवेणी तीर।
स्वर्ग लोक से हंँस रहे, क्या समझेंगे पीर।।

जीवित रहते कब दिया, मात-पिता सम्मान।
परलोकी जब हो गए, करते फिरते दान।

जब तक जिन्दा थे कभी, रखा न उनको साथ ।
जब अर्थी पर चल दिए , पीट रहे थे माथ।।

जल तर्पण सब कर रहे, नदी जलाशय भोर।
दान क्षमा का तब मिले, मन में छिपे न चोर।।

पितृपक्ष में बन रही, उनको अब कागोर ।
रूप बदल कागा कहाँ, अब आते हैं भोर।।

शहरी संस्कृति ने डसा,चलो गाँव की ओर।
प्रेम प्यार सम्मान के, छूट रहे नित छोर ।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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दोहाश्रित सजल
पदांत -आस

कुआँ पास आता नहीं, जब लगती है प्यास।
प्यासे को जाना पड़े , सदा उसी के पास।।

संस्कृतियाँ बसतीं रहीं, सरिताओं के तीर।
नदी सरोवर से रहा, खुशियों का अहसास।।

नदी जलाशय प्रकृति सब, ईश्वर का वरदान।
स्वच्छ रखें निर्मल सदा, इससे है मधुमास।।

नीर स्वच्छ सबको मिले, मानव रहें निरोग।
रोग शोक से मुक्त हों, जीवन जीते खास।।

जल को संचित कीजिये, नहीं बहाएँ व्यर्थ।
जीवन में अनमोल है, वरुण देव का वास।।

जीवन में जल का सदा, होता बड़ा महत्व।
जलचर,नभचर जीव सब,जल बिन रहें उदास।।

पुरखे भी बनवा गए, कूप और तालाब।
संरक्षित इनको करें,भग जाते संत्रास।।

जल बिन जीवन सून है, रहते सब बैचेन।
अमरित की बूँदे यही, भर देतीं उल्लास।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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दोहाश्रित सजल
पदांत -आर
मात्रा भार -24

घाव भरें तन के सभी, करें वैद्य उपकार ।
मन के घावों का कठिन, जग में है उपचार।।

प्रभु का आँचल जीव को, देता है सुख चैन।
शरण गहें उनकी सदा, होता है उद्धार।।

नैतिकता कहती यही, मानवता की जीत।
स्वार्थों के बाजार में, उसको लगती मार।।

छल विद्या में निपुण हैं, राजनीति के लोग।
दे आश्वासन मुकरते, छोड़ चलें पतवार।।

जनता के सेवक बने, खाते छप्पन भोग।
सत्ता मिलते ही करें, जनता से तकरार।।

पाप पुण्य सब है यहाँ, लोक और परलोक।
करनी का फल भोगना, इस जग का है सार।।

गीता में श्री कृष्ण ने, दिया जगत को ग्यान।
फल की इच्छा छोड़कर, कर्म करे संसार।।

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

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एक गीत वृद्धावस्था के नाम
(मात्रा भार 16)

जर्जर नाव हुई माँझी की,
कब डूबे अब कहांँ किनारा ।
एक-एक बिखरे हैं सपने,
उसका कोई नहीं सहारा।।

छोड़ चले हैं जीवन पथ पर,
अपने ही संगी साथी सब।
जन्मों के संबंध रहे जो,
तोड़ चले नाते रिश्ते अब।।

किसको आना किसको जाना,
जन्म-मरण का यही नजारा।
जर्जर नाव हुई माँझी की,
कब डूबे अब कहांँ किनारा....

जीवन का वह प्रणय निवेदन,
पीछे छूट गया है निश्चल।
यादों में फूलों की खुशबू
कर जाती है मन में हलचल।

संतापों की बजी दुंदभी,
वर्तमान ने सभी बुहारा।
जर्जर नाव हुई माँझी की,
कब डूबे अब कहांँ किनारा....

सप्तपदी की जो साक्षी थी,
गंगाजल से रिश्ते पावन ।
हंँसी-खुशी किल्लोल गूँजता,
घर आंँगन से महका उपवन।

कैसा मौसम है अब बदला,
भटक रहा बनकर बंजारा।
जर्जर नाव हुई माँझी की,
कब डूबे अब कहांँ किनारा....

आदर्शों की उंगली थामे,
कभी न भटका अपने पथ से।
कर्तव्यों की बांँह थाम कर,
खेना सीखा था बचपन से।

ले पोथी वह बाँच रहा है,
कैसे जीवन किया गुजारा।
जर्जर नाव हुई माँझी की,
कब डूबे अब कहांँ किनारा....

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
8 जुलाई 2020

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