विजया बैंक में सहायक प्रबंधक से सेवा निवृत। पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ से साहित्यिक विरासत एवं प्रेरणा। अपने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन के प्रति झुकाव। राष्ट्रीय, सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत साहित्य सृजन की अनवरत यात्रा।

मन का पंछी उड़े गगन है.......

मन का पंछी उड़े गगन है,
खुद में ही वह खूब मगन है।
जितना चाहे उड़े भुवन में,
उड़ने का बस उसे लगन है।

चंचल मन का क्या कहना है,
बंधन में वह कहां बंधा है।
घूरे वह सूरज के तप को,
कहता उसका व्यर्थ तपन है।

मन तो बस सपना जैसा है,
सपना भी कब सच होता है।
नींद खुली तो टूट गया वह,
कर्मठता को सही नमन है।

तन तो आज साथ बैठा है,
मन की भटकन और कहीं है।
कभी यहां पर कभी वहां पर,
मन को आती नहीं थकन है।

मन की चाह बड़ी होती है,
शायद उसकी मजबूरी है।
मन का पूरा करते करते,
होता जीवन पूर्ण हवन है।

मन तो एक खयाली घोड़ा,
भागा जो सरपट है दौड़ा।
क्षितिज उसे लगता है थोड़ा,
उसे रोकना बड़ा कठिन है।

भटकन मन की बहुत बुरी है,
जिसने वश में उसे किया है।
इंद्रजीत बनकर है जीता ,
जग करता तब उसे नमन है।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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भारत माता फिर हरषायी......

भारत माता फिर हरषायी,
घाटी में रौनक है छायी।
सात दशक के बाद है देखो,
केसर की क्यारी मुसकायी।।

बाग बगीचे और हरियाली,
फल फूलों की बगिया न्यारी ।
नाव शिकारे घर झीलों को ,
देख देख दुनियां भरमायी।।

हिमगिरि की मुस्कानें प्यारी,
देवदार की हंसी निराली।
गाल सेव से हुये गुलाबी,
आंखें तो खुद ही शरमायीं।।

स्वर्ग हमारा काश्मीर है,
नरक बनाके रखा हुआ था।
अस्थायी  धारा को फेंका ,
महबूबा जी क्यों कुम्हलायीं।।

नापाकी कुछ सांप पले थे,
बार बार फुफकार रहे थे।
जहर दांत के टूट चुके हैं,
राजनीति है क्यों भरमायी।।

दो विधान औ दो निशान की,
थ्योरी को जग में झुठलायी।
पाकिस्तान को धता बताकर,
मोदी जी ने दी रुसवायी।।

नामुमकिन को मुमकिन करके,
राजनीति की नींद उड़ायी।
नापाकी मंसूबों के घर,
बजरंगी बन आग लगायी।।

राष्ट्र गान गूंजा घाटी में,
तीन रंग ने खुशियाँ पायीं ।
जनगण मन में आस जगी फिर,
वंदेमातरम् नें धुन गायी ।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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सत्ता में घुसकर बैठे थे-----

सत्ता में घुसकर बैठे थे, पाकिस्तान दलाल।
न्यूक्लीयर की धौंस दिखाके, करते रहे कमाल।।

तीन सौ सत्तर लागू करके, दिया था लालीपाप।
डंडा झंडा अलग थमाके, हुआ था हमसे पाप।।

पाकिस्तान सपोटर बनके, जड़ को खोद रहे थे।
धन दौलत की झोली भरके, मिलजुल बांट रहे थे।।

स्वर्ग निवासी बनकर कुछ, सत्ता को भोग रहे थे।
दहशत की वोटें पाकर के, विष ही घोल रहे थे।।

काश्मीर जागीर समझके, लूट रहे थे माल।
कुछ सत्ता के वारिस बनके,भूल गये थे काल।।

बकरे की अम्मा भी देखो, कब तक खैर मनाती।
कुर्बानी की इस बेला में, कैसे ईद सुहाती।।

दो विधान औ दो निशान की,थ्योरी को झुठला दी।
एक देश ध्वज संविधान की, सबको डोर थमा दी।।

नापाकों ने सीमा लांघी, उचित समय है आया।
गद्दारों को जेल मिलेगी, सबको निर्णय भाया।।

सात दशक से कभी न सूझा, कुछ को यही मलाल। नापाकी आतंकी हाथों, कितने हुये हलाल।।

बकरीदी पर ईद मुबारक, सबको खुशियां बांटी।
काश्मीर को आजादी दे, मुक्त करायी घाटी।।

लोकतंत्र की करें सुरक्षा, देश भक्ति की जय हो।
हिन्दुस्तान के संविधान की, भारत मां की जय हो।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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वे घाटी में खून बहाके, करते रहे बवाल।
अनुच्छेदों के छेद बंद कर, जिनने किया कमाल।।
वे ही सच्चे देश भक्त हैं, हितचिन्तक हैं लाल।
सत्ता की जोड़ी ने देखो, कैसा किया धमाल।।
मनोज कुमार शुक्ल मनोज

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बिना दृष्टि के शून्य है......

बिना दृष्टि के शून्य है, लेखन का संसार।
चाहे जितना भी रचोे, पुस्तक का भंडार।।
सही राह हो सृजन में, गहराई भरपूर।
पाठक श्रोता के लिये, तब आँखों का नूर।।
दिशा हीनता रोकता, सद्गुणयुक्त स्वभाव।
संवेदित मन हो सदा, सृजन धर्मिता भाव।।
भावों की अभिव्यंजना, शब्दों का भंडार।
सृजनशीलता दमकती, आता तभी निखार।।
मौलिकता कृतिकार को, दिलवाती पहचान।
पाठक के दिल में पहुँच, तब पाता सम्मान।।
सब लोगों का हित निहित,समाजिक सरोकार।
सृजन तभी उत्कृष्ट है, व्यापक क्षितिजाकार।।
मानवता के हितों का, सदा रखे जो ध्यान।
निज स्वारथ को छोड़ दे, लेखक वही महान।।
उसका तो बस लक्ष्य हो, विसंगतियाँ अन्याय।
कलम सिपाही बन लड़े, मिले सभी को न्याय।।
सही दिशा पर ही बढ़ें, कवि समाज का संत।
उत्साही अभिव्यक्ति हो, निरुत्साह का अंत।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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चन्द्रशेखर आजाद जी.........
चन्द्रशेखर आजाद जी, रहे सदा आजाद।
जनता के हर दिलों में, हैं अब भी आबाद।।
मध्यप्रदेश की धरा में, जन्मा था यह लाल।
अंग्रेजों के लिये तो, बना रहा वह काल।।
अलीराजपुर जिला में, ग्राम भाबरा गाँव।
साधारण परिवार में, मातृ-पितृ की छाँव।।
माता जगरानी रहीं, पिता थे सीताराम।
बचपन इनकी गोद में, बीता था अविराम।।
पंद्रह बरस की उम्र में, कूदे रण संग्राम।
गिरफ्तार वे जब हुये, पूछा था तब नाम।।
कहा नाम आजाद है, पिता स्वतंत्रता नाम।
पता हमारा जेल है, मालिक हुये गुलाम।।
भारत की जयकार से,गूंजा जज दरबार।
पंद्रह बेंतों की सजा, पायी पहली बार।।
राष्ट्रभक्ति रगरग बसी,जिसका नहीं जवाब।
जब तक वे जिंदा रहे, सबकी हवा खराब।।
क्रांति की लौ को जला, फैलायी थी भोर।
सेनापति के रूप में, सबके थे सिरमौर।।
निर्भय मूंछ उमेठते, चैड़ा सीना तान ।
थे रखवाले देश के, आनबान औ शान।।
लालालाजपतराय को, जिसने किया शहीद।
उसका फिर बदला लिया, सबके हुये मुरीद।।
हत्यारों को मारकर, दिया उन्हें ललकार।
आजादी के दौर के, क्रांति वीर सरदार।।
उनकी टोली में रहे, एक से बढ़कर एक।
देश प्रेम की आग से, तपकर बने अनेक।।
राजगुरु सुखदेव जी,भगतसिंह यशपाल।
रोशनसिंह,राजेन्द्रनाथ,बटुकेश्वर,संन्याल।।
भगवतीचरण,विस्मिलजी,अशफाक,मनमथनाथ।
जैसे वीर सपूत थे, थामे उनका हाथ।।
असेम्बली बम कांड हो, या काकोरी कांड।
हत्यारे सांडर्स को, मारा बनकर सांड़।।
भेष बदल वे घूमते, सबको जोड़ा साथ।
सारा तंत्र तलाशता, कभी न आये हाथ।।
घर के ही गद्दार से, हुआ देश शर्मसार।
हाथ मिलाया शत्रु से, उजड़ा था संसार।।
अल्फ्रेडबाग मनहूस था, जहाँ गया था लाल।
जातेजाते बन गया, कई दुश्मन का काल।।
भारत माँ का पूत था, स्वयं सजाया थाल।
कभी नहीं झुकने दिया, ऊँचा उन्नत भाल।
आजादी के वास्ते, किये अनेकों काम।
जीवनअर्पित कर दिया,मातृभूमि के नाम।।
मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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कश्मीर मुद्दे को लेकर हमारे दोनों दुश्मनों द्वारा किये गये कब्जे पर लिखी गई रचना

जब आजाद हुआ यह भारत......

जब आजाद हुआ यह भारत, काश्मीर था पूरा।
नजर लगी जबसे नापाकी, सपना हुआ अधूरा ।।
कभी भाइ कहलाते थे ये, मकड़ जाल अब बुनते।
शांति राह पर चले सदा से,तब भी शूल हैं चुभतेे।।
दोंनो ने भाई भाई का, दिया था मोहक नारा।
नीयत में तो खोट बसा था,रिश्तों से है हारा।।
इक भाई ने कब्जा करके, बना लिया पी ओ के।
दूजे ने नारा ही गढ़कर, बना लिया सी ओ के।।
दोनों पक्के दोस्त बन गये, इक पाले आतंकी।
दूजे ने व्यापार के खातिर, जमा रखी आसंदी।।
निर्भय होकर घुसते रहते, बार्डर से आतंकी।
मूक समर्थन देकर दूजा, करता है नौटंकी।।
सात दशक से देख रहे हैं, इनकी डगमग कश्ती।
सरे आम बंदूक दागते, दहशत में है बस्ती।।
यह धरती जो माँ कहलाती, बहता लहू है रोती।
राजनीति की चाल बेढंगी, छीन सके ना मोती।।
चाहे जब ये भौंह चढ़ाते, जग में रौब दिखाते ।
ड्रेगन को आगे करके ये, हम पर धौंस जमाते ।।
खूब ठोंक ली पीठ है अपनी,बंगला देश बनाया।
अपनी ही धरती को खोकर, कैसा नाम कमाया।।
सीमाओं पर डटा खड़ा है, भारत का हर प्रहरी।
हाथों में पत्थर लेकर के, चोट मारते गहरी।।
कुछ दुश्मन के संग मिले हैं, दिखा रहे थे रस्ता।
बड़े गजब के हैं ये यारो, खूब खाय हैं पिस्ता।।
नापाकी चालों पर देखो, सचमुच लगा विराम।
मतदाता ने निर्णय देकर,करदीनींद हराम।।
मोदी की तो चतुराई ने, सबको दे दी मात।
चारों खाने चित्त हो गये,नहीं सूझती बात।।
भारत ने हरदर्द भुलाकर, पाया बड़ा मुकाम।
पहुँच रहे हैं गगनयान पर,अब भी उन्हें जुकाम।।

मनोजकुमार शुक्ल "मनोज "

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भोंरे अब बौरा गये....

भोंरे अब बौरा गये, माली हैं बैचेन।
कली शाख से टूटतीं, कैसे बीते रैन।।

भौंरों का गुंजन बना,कलियों का अब काल।
फूलों का हँसना छिना, झुके हमारे भाल।।

कातिल बनकर घूमते, हो गये हैं निर्भय ।
काम वासना से घिरे,नहीं समाज से भय ।।

पाप पुण्य को भूलकर, हुये विधर्मी लोग।
रिश्ते नाते बलि चढ़ें, दूषित मन का रोग।।

नन्हीं कलियाँ तोड़कर, फेंक रहे हैं राह।
कैसे जालिम बन गये, जग से बेपरवाह।।

पश्चिम की पुरवाई ने, बदल दिये सब रंग।
पूरब में आंधी चली, सभी देखकर दंग।।

बचपन दूषित हो रहा, मन में बुरे विचार।
कामक्रोधमद लोभ से, छूटे सब सुविचार।।

शिक्षा का संस्कार से, नहीं रहा सम्बंध।
मर्यादायें टूटतीं, सामाजिक अनुबंध।।

मन के रोगी बढ़ गये, व्यर्थ रहा उपचार।
फाँसी जैसे दंड से,रुका नहीं व्यभिचार।।

रोपें आज बबूल को, रखें फलों की आस।
मूरख हैं वे जगत में, होंगे सदा निराश।।

संस्कारों के बीज को, घर घर बोयें आज।
ताकि संस्कृति खिल उठे,गूंज उठें सुरसाज।।

मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "

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गुरु पूर्णिमा पर्व यह..........


गुरु पूर्णिमा पर्व यह,गुरुओं का सम्मान।
हिन्दू संस्कृति ने सदा,माना है भगवान।।

अंधकार को भगा कर, जग में करें प्रकाश।
पथ दिखलाते हैं यही, करते नेक प्रयास।।

प्रगति और उन्नति के, यही खोलते द्वार।
इनके श्रम औ त्याग से, जग का है उद्धार।।

जीवन जीने की कला, बदलें मन की सोच।
ज्ञान और विज्ञान में, पारंगत सर्वोच्च।।

आदि काल से है बना, गुरु के प्रति सद्भाव।
देव,मनुज औ असुर में, श्रृद्धा-भक्ति का भाव।।

देवों के गुरु बृहस्पति, दैत्य शुक्र्राचार्य।
वेदब्यास अरु परशुराम, थे महान आचार्य।।

त्रेतायुग में पूज्य थे, रामराज्य के मित्र।
गुरु विशिष्ठ आचार्य जी, ब्रम्हर्षि विश्वामित्र।।

गुरुवर बालमीकि ने, रचा रामायण ग्रंथ।
रामराज्य परिकल्पना, का अद्भुत है पंथ।।

संदीपनि गुरु कृष्ण के, जिनसे पाया ग्यान।
द्वापर में उनने किया, जग जाहिर कल्यान।।

कौरव पांडव के गुरु, द्रोणाचार्य महान।
पारंगत थे हर विषय, कुशल बुद्धि बलवान।।

वेदब्यास आचार्य ने, सृजन किये कई वेद।
ग्रंथ महाभारत रचा, कौन सका है भेद।।

चन्द्रगुप्त के गुरू ने, फैलायी थी भोर।
नंदवंश का नाश कर, सौंपी सत्ता डोर।।

नाम गुरू चाणक्य था, लिखे अनोखे शास्त्र।
राज, अर्थ व कूटनीति, कलयुग का ब्रम्हास्त्र।।

विद्यालय विद्यार्थी, और गुरू हों नेक।
तीनों के सहयोग से, सद्गुण बढ़ें अनेक।।

इनके तपबल से गढ़ें, हम जीवन संसार।
गुरुओं की हम वंदना, करते बारम्बार।।

मनोजकुमार शुक्ल "मनोज"

९४२५८६२५५०

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#काव्योत्सव _२

कवि ने अल्पनाओ में .......

कवि ने अल्पनाओं में, अनेकों रँग डालें हैं।
सृजन संवेदना के सूत्र, अंर्तमन में ढाले हैं ।।
सफर जीवन का हो या, सृष्टि की अस्मिता का हो।
समुंदर की तलहटी से, सदा मोती निकाले हैं।।

कभी वह ब्यास बन कर, गीता का उपदेश रचता है।
महाभारत का दृष्टा बन, वही संदेश गढ़ता है।।
कभी वह बाल्मीकि बनके, रामायण लिखा करता।
कभी वह तुलसी बनकर, राम का यशगान करता है।।

कभी मीरा की भक्ति का, वह इक तारा बजाता है।
अगुण आराधना में डूब कर, विष को पचाता है।।
कभी कबिरा की वाणी से, मुखर हो डाँटता रहता।
परस्पर प्रेम की धारा बहा, सबको मिलाता है।।

कवि रसखान बनकर, कृष्ण की मुरली बजाता है।
कवि सद्भावना में डूबकर, मन को रिझाता है।।
कभी वह सूर बनकर, कृष्ण की आराधना करता।
जगत में बाल लीला का, चितेरा बन लुभाता है।।

हमेशा आपदा में वह, सदा हिम्मत बंधाता है।
दया ममता के भावों को, दिलों में वह बसाता है।।
बुराई को हटाने राम का, वह पक्ष है लेता।
दशानन को हराकर वह, विभीषण को बिठाता है।।

दिलों में आश का दीपक, कवि बुझने नहीं देता।
निराशाओं की बदली सर, कभी चढ़ने नहीं देता।।
जगत को आगे बढ़ने की, सदा अभिप्रेरणा देता।
दिलों को तोड़ने का भाव, वह पलने नहीं देता।।

मनोजकुमार शुक्ल "मनोज"

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