my mom is the soul of family.

तेरी यादों के उस रेत में हम चलना सीख गए।
तेरी चाहत की उम्मीद में #मारना सीख गए!!

बेशक मैं शायर नहीं!
पर शायरी करना सीख गए!!
माया

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मैं ना मानत कर्म को
कर्म बड़ा अपयाए हैं!

कर कुकर्म जो
उसी का भाग जगाए हैं!!
#कर्मा
माया.

ना हाथों मे लकीरें कुछ,

ना किस्मत का ठिकाना हैं।

यहाँ हर बादशाहत का,

भाग्य ही बस बहाना है।।


कर्म को छोड़ के हर नर,

उलझ जाता लकीरों में।

भाग्य के ही सहारे आज,

खुद बेघर जमाना है


भाग्य के ही सहारे नर,

कर्म सुख छोड़ देता है।

गुजरती हर निगाहों का,

कर्म मुख मोड़ लेता है।।


भाग्य और कर्म में,

अक्सर लड़ाई रोज होती है।

भाग्य मन तोड़ देता है,

कर्म फिर जोड़ लेता है।।


अरे मन मूर्ख बन कर क्यूँ,

भाग्य के गीत गाता है।

भाग्य का साथ है दिन सा,

जो खुद ही बीत जाता है।।


भाग्य पन तू गोते क्यूँ,

लगाता है लकीरों के।

अलौकिक कर्म से ही नर,

भाग्य को खुद बनाता है।।


देखो लकीरें हाथ की,

कुछ कह रही नर से।

कर्म मत बन्द करना तुम,

भाग्य की मार के डर से।।


हाथ जिनके नही होते वो,

नर भी काम करता है।

क्या वो नर कर्म करना छोड़ दे,

दुर्भाग्य के डर से।।


#कर्मा

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अपनों के बिना नहीं जी सकती
कहना आसान हैं!

एक दिन सबको जाना है
यही विधि का विधान है!!
माया

उसने फिर से याद किया न जाने क्यों?

कई यादें कई किस्से ओठों पर आकर रुक गई थी
जब उसने आवाज दिया फिर लौट आई में न जाने क्यों?


ना रास्ते कि पता न मंजिल कि ठिकाना
फिर भी चली जा रही थी न जाने क्यों


जानती थी अंजाम इस रास्ते की!
कभी सहम सी जाती, कभी ठहर सी जाति,

एक पल के लिए फिर बिना सोचे चली जा रही थी न जाने क्यों?


उस रास्ते पर बैठकर आंखें बिछाई रहती!

कभी इस आश में आह भर्ती!
कभी खुद को समझाती न जाने क्यों?


हर रोज एक खत लिखा करती!
यह जानते हुए कि कोई पैगाम नहीं आएगी
फिर भी इसी आश में रहा करती न जाने क्यों?


यह रास्ते कट चुकी थी मेरे रास्ते से!

फिर भी कभी रास्ते को जोड़ा करती ना जाने क्यों
उसने फिर से याद किया न जाने क्यों?
Maya

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आंखों की चमक
तेरे मोहब्बत को दर्शाता है,

मैं हवाओं सी एक लड़की हुँ, माया
जिससे पूरे बाग महकता है!

जब भी पहनु  #गहना /आभूषण,
तेरा चेहरा सूरज सा चमकता है!!
#गहना

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तेरे बिन जैसे बिन फसलें की खेती

बंजर सी खेती जान पड़ी

जब तू गया छोड़ मुझे ऐसा प्रतीत भई

तू आत्मा में शरीर पड़ी



बिन आत्मा शरीर पड़ी

उमड़ी कल थी मिट आज चली

तू जब आया मिलने को मुझसे

सारा जहां छोड़ तेरे पास चली



बातें तेरी जाल साज में फंसती में हर बार चली

उमड़ उमड़ कर मन मेरो, तुमसे मिलने की हर चाल चली।

तेरे यादें तेरी बातें सुनती में हर बार चली।



भूली बिसरी यादें ताजा करती मैं हर बार चली

तू जब गया छोड़ मुझे ,बिना आत्मा शरीर जान पड़ी

उमड़ी कल थी मिट आज चली मैं तो यह आज

जान पड़ी।
Maya

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ए जिंदगी तु इतना क्यों रुलाती है मुझे!

तू नहीं तो मैं नहीं

फिर इतना क्यों तड़पाती है मुझे!!


जब मैं भीड़ में गुम  जाती हूं!

फिर अकेला  क्यों पाती है मुझे!!


ऐसी भी क्या रुसवाई मुझसे!

जो हर वक्त 

अपनों में तउल झाती हो मुझे!!


जब-जब भी तन्हा हो ना चाहुं!

फिर क्यों पास बुलाती हो मुझे!!


आंखों में मेरी !

जज्बातों के अशक हैं

कोई समंदर नहीं 

फिर इतना क्यों रुलाती हो मुझे!!

Maya

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#संकट मे खड़ा हूं मैं, संकट से लड़ा हूं मैं!

ना ङगमगा ऐ गी
मेरी हिम्मत, माया

जब तक युँ अड़ा हूं मैं!!

ऐ इश्क की
सीढ़िया बड़े उलजुलुल होते हैं! माया

चाहत किसी और की
कोई और कबूल होते हैं!!