હું મુસાફર છું સાથી, મને મુસાફર જ રેહવા દે. આજ ભી પુરા દેખા નહિ, મુજસે કલ કી બાતે રેહને દે. હે સાથ તેરા અનમોલ એ દિલ સે મેને માના હે, લેકિન સમય કી ઇસ બેહતી હવાઓ મેં મુજે અભી બહુત દુર જાના હે.

मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक
छोटा सा गार्डन बना लिया।

पिछले दिनों मैं छत पर गया तो ये देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में
फूल खिल गए हैं,
नींबू के पौधे में दो नींबू 🍋🍋भी लटके हुए हैं और दो चार हरी
मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई।

मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस 🎋का जो पौधा गमले में लगाया था,
उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी।

मैंने कहा तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो?

पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं।

मैं हंस पड़ा और कहा अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। 💦

इसे खिसका कर किसी और पौधे
के पास कर देने से क्या होगा?" 😕

_*पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है।*

इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। ☺

पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।"

यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती
चली गईं।

मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे।

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*जीभ नियंत्रक नहीं होनी चाहिए !*

व्यक्ति को वही चीज़ें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं, तुम्हारे लिए प्राकृतिक। फल, सब्जियां , मेवे आदि, खाओ जितना ज्यादा तुम खा सको। खूबसूरती यह है कि तुम इन चीजों को जरूरत से अधिक नहीं खा सकते। जो कुछ भी प्राकृतिक है हमेशा तुम्हें संतुष्टि देता है, क्योंकि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करता है, तुम्हें भर देता है। तुम परिपूर्ण महसूस करते हो। अगर कुछ चीज अप्राकृतिक है वह तुम्हें कभी पूर्णता का एहसास नहीं देती। आइसक्रीम खाते जाओ, तुमको कभी नहीं लगता है कि तुम तृप्त हो। वास्तव में जितना अधिक तुम खाते हो, उतना अधिक तुम्हें खाते रहने का मन करता है। यह खाना नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की जरूरत के हिसाब से नहीं खा रहे हो; तुम केवल इसे स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ नियंत्रक बन गई है।

जीभ नियंत्रक नहीं होनी चाहिए, यह पेट के बारे में कुछ नहीं जानती। यह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती। जीभ का एक विशेष उद्देश्य है: खाने का स्वाद लेना। स्वाभाविक रूप से, जीभ को परखना होता है, केवल यही चीज है, कौन सा खाना शरीर के लिए है, मेरे शरीर के लिए और कौन सा खाना मेरे शरीर के लिए नहीं है। यह सिर्फ दरवाजे पर चौकीदार है; यह स्वामी नहीं है, और अगर दरवाजे पर चौकीदार स्वामी बन जाता है, तो सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाएगा।

अब विज्ञापनदाता अच्छी तरह जानते हैं कि जीभ को बरगलाया जा सकता है, नाक को बरगलाया जा सकता है। और वे स्वामी नहीं हैं। हो सकता है तुम अवगत नहीं हो: भोजन पर दुनिया में अनुसंधान चलता रहता है, और वे कहते हैं कि अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह से बंद कर दी जाए, और तुम्हारी आंखें बंद हों, और फिर तुम्हें खाने के लिए एक प्याज दिया जाए, तुम नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो। तुम सेब और प्याज में अंतर नहीं कर सकते अगर नाक पूरी तरह से बंद हो क्योंकि आधा स्वाद गंध से आता है, नाक द्वारा तय किया जाता है, और आधा जीभ द्वारा तय किया जाता है। ये दोनों नियंत्रक हो गए हैं। अब वे जानते हैं कि : आइसक्रीम पौष्टिक है या नहीं यह बात नहीं है। उसमें स्वाद हो सकता है, उसमें कुछ रसायन हो सकते हैं जो जीभ को परितृप्त भले ही करें मगर शरीर के लिए आवश्यक नहीं होते।

आदमी उलझन में है, भैंसों से भी अधिक उलझन में। तुम भैंसों को आइसक्रीम खाने के लिए राजी नहीं कर सकते। कोशिश करो!

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एक राजधानी में एक भिखारी एक सड़क के किनारे बैठकर पच्चीस वर्षों तक भीख मांगता रहा, फिर मर गया। जीवन भर यही कामना की मैं भी सम्राट हो जाऊं। कौन भिखारी ऐसा है, जो सम्राट होने की कामना नहीं करता? जीवन भर हाथ फैलाये खड़ा रहा रास्तों पर।

लेकिन हाथ फैलाकर, एक-एक पैसा मांगकर कभी कोई सम्राट हुआ है? मांगने वाला कभी सम्राट हुआ है? मांगने की आदत जितनी बढ़ती है, उतना ही बड़ा भिखारी हो जाता है। जो पच्चीस वर्ष पहले छोटा भिखारी था, पच्चीस वर्ष बाद पूरे नगर में प्रसिद्ध भिखारी हो गया था, मौत कोई फिक्र नहीं करती। सम्राटों को भी आ जाती है, भिखारियों को भी आ जाती है। और सच्चाई शायद यही है कि सम्राट थोड़े बड़े भिखारी होते हैं, भिखारी जरा छोटे सम्राट होते हैं। और क्या फर्क होता होगा!

वह मर गया भिखारी तो गांव के लोगों ने उसकी लाश को उठाकर फिकवा दिया। फिर उन्हें लगा कि पच्चीस वर्ष एक ही जगह बैठकर भीख मांगता रहा। सब जगह गंदी हो गयी। गंदे चीथड़े फैला दिये हैं। टीन-टप्पर, बर्तन-भांडे फैला दिये हैं। सब फिकवा दिया। फिर किसी को ख्याल आया कि पच्चीस वर्ष में जमीन भी गंदी कर दी होगी। थोड़ी जमीन उखाड़कर थोड़ी मिट्टी साफ कर दें। ऐसा ही सब व्यवहार करते हैं, मर गये आदमी के साथ। भिखारियों के साथ ही करते हों, ऐसा नहीं। जिसको प्रेमी कहते हैं, उनके साथ भी यही व्यवहार होता है। उखाड़ दी, थोड़ी मिट्टी भी खोद डाली।

मिट्टी खोदी तो नगर दंग रह गया। भीड़ लग गयी। सारा नगर वहां इकट्टा हो गया। वह भिखारी जिस जगह बैठा था, वहां बड़े खजाने गड़े हुए थे। सब कहने लगे, कैसा पागल था! मर गया पागल, भीख मांगते-मांगते! जिस जमीन पर बैठा था, वहां बड़े हंडे गड़े हुए थे, जिनमें बहुमूल्य हीरे-जवाहरात थे, स्वर्ण अशर्फियां थीं! वह सम्राट हो सकता था, लेकिन उसने वह जमीन न खोदी, जिस पर वह बैठा हुआ था! वह उन लोगों की तरफ हाथ पसारे रहा, जो खुद ही भिखारी थे, जो खुद ही दूसरों से मांग-मांगकर ला रहे थे! वे भी अपनी जमीन नहीं खोदे होंगे। उसने भी अपनी जमीन नहीं खोदी! फिर गांव के लोग कहने लगे, बड़ा अभागा था!

हम सब भिखारी हैं और कहीं मांग रहे हैं! प्रेम के बड़े खजाने भीतर हैं, लेकिन हम दूसरों से मांग रहे हैं कि हमें प्रेम दो! पत्नी पति से मांग रही है, मित्र-मित्र से मांग रहा है कि हमें प्रेम दो! जिनके पास खुद ही नहीं है, वे खुद दूसरों से मांग रहे हैं, कि हमें प्रेम दो! हम उनसे मांग रहे हैं! भिखारी भिखारियों से मांग रहे हैं! इसलिए दुनिया बड़ी बुरी हो गयी है। लेकिन अपनी जमीन पर, जहां हम खड़े हैं, कोई खोदने की फिक्र नहीं करता।

वह कैसे खोदा जा सकता है, वह थोड़ी-सी बात मैंने कही हैं। वहां खोदें, वहां बहुत खजाना है और प्रेम का खजाना खोदते-खोदते ही एक दिन आदमी परमात्मा के खजाने तक पहुंच जाता है। और कोई रास्ता न कभी था, न है और न हो सकता है।

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सीता जैसी पूर्ण स्त्री की तेजस्विता

सीता को हम उन स्त्रियों में गिनते हैं
जिनको कि सती कहा जा सके।
अब सीता का समर्पण बहुत अनूठा है;
समर्पण की दृष्टि से पूर्ण है;
और टोटल सरेंडर है।
रावण सीता को ले जाकर भी
सीता का स्पर्श भी नहीं कर सका।
रावण सीता को आंख उठाकर भी नहीं देख सका।
और सीता के लिए रावण का कोई अर्थ नहीं था।
लेकिन, जीत जाने पर राम ने
सीता की परीक्षा लेनी चाही,
अग्नि परीक्षा लेनी चाही।
सीता ने उसको भी इनकार नहीं किया।
अगर वह इनकार भी कर देती
तो सती की हैसियत खो जाती।
सीता कह सकती थी कि आप भी अकेले थे,
और परीक्षा मेरी अकेली ही क्यों हो,
हम दोनों ही अग्नि परीक्षा से गुजर जाएं!
क्योंकि अगर मैं अकेली थी
किसी दूसरे पुरुष के पास,
तो आप भी अकेले थे
और मुझे पता नहीं कि कौन स्त्रियां
आपके पास रही हों।
तो हम दोनों ही अग्नि परीक्षा से गुजर जाएं!

लेकिन सीता के मन में यह सवाल ही नहीं उठा;
सीता अग्नि परीक्षा से गुजर गई।
अगर उसने एक बार भी सवाल उठाया होता
तो सीता सती की हैसियत से खो जाती
समर्पण पूरा नहीं था,
इंच भर फासला उसने रखा था।
और अगर सीता एक बार भी सवाल उठा लेती
और फिर अग्नि से गुजरती,
तो जल जाती;
फिर नहीं बच सकती थी अग्नि से।
लेकिन समर्पण पूरा था,
दूसरा कोई पुरुष नहीं था सीता के लिए।

इसलिए यह हमें चमत्कार मालूम पड़ता है
कि वह आग से गुजरी और जली नहीं!
लेकिन कोई भी व्यक्ति,
जो अंतर समाहित है……
साधारण व्यक्ति भी किसी अंतर समाहित स्थिति में
आग पर से निकले तो नहीं जलेगा।
हिप्नोसिस की हालत में
एक साधारण से आदमी को कह दिया जाए
कि अब तुम आग पर नहीं जलोगे,
तो वह आग पर से निकल जाएगा और नहीं जलेगा।

बिना जले आग पर से गुजर जाने का राज:

साधारण सा फकीर आग पर से गुजर सकता है
एक विशेष भावदशा में,
जब वह भीतर उसका सर्किल पूरा होता है।
सर्किल टूटता है संदेह से।
अगर उसे एक बार भी यह खयाल आ जाए
कि कहीं मैं जल न जाऊं,
तो भीतर का वर्तुल टूट गया,
अब यह जल जाएगा।
अगर भीतर का वर्तुल न टूटे
तो दो फकीर अगर कूद रहे हों कहीं आग पर,
और आप भी पीछे खड़े हों,
और दो को कूदते देखकर आपको लगे कि
जब दो कूद रहे हैं और नहीं जलते
तो मैं क्यों जलूंगा,
और आप भी कूद जाएं,
तो आप भी नहीं जलेंगे।
पूरी कतार, भीड़ गुजर जाए आग से,
नहीं जलेगी।
और उसका कारण है,
क्योंकि जिसको जरा भी शक होगा,
वह उतरेगा नहीं; वह बाहर खड़ा रह जाएगा;
वह कहेगा, पता नहीं मैं न जल जाऊं।
लेकिन जिसको खयाल आ गया है,
जो देख रहा है कि कोई नहीं जल रहा है
तो मैं क्यों जलूंगा, वह गुजर जाएगा,
उसको कोई आग नहीं छुएगी।

अगर हमारे भीतर का वर्तुल पूरा है
तो हमारे भीतर
आग तक के प्रवेश की गुंजाइश नहीं है।

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प्रश्न:- क्या आपकी दृष्टि में स्थान का कोई भी महत्व नहीं है?

ओशो:- है भाई स्थान का महत्व क्यों नहीं है सुनो।

एकबार चंदूलाल मुझसे कह रहे थे कि चौपट हो गया जब से विवाह किया तब से चौपट हो गया।

मैंने उनसे पूछा कि पत्नी से मिले कहां थे? उन्होंने कहा चौपाटी पर

मैंने कहा होगा ही चौपट। स्थान तो सोच-समझ चुना करें। पत्नी से पहली दफे मिले एक तो वैसे ही खतरा और वह भी मिले चौपाटी पर।

मगर मैंने उनसे कहा कि तुम्हारी पत्नी कुछ और ही कहती है। वह तो कहती फिरती है कि जब से मेरा विवाह हुआ तो चंदूलाल लखपति हो गए। और तुम कहते हो चौपट हो गया।

चंदूलाल ने सिर से हाथ मार लिया। कहा वह भी ठीक कहती है।

मैंने कहा कि यह तो बड़ी पहेली हो गई तुम कहते हो चौपट हो गए और पत्नी कहती है कि लखपति हो गए।

वह कहने लगे हां ठीक कहती है। पहले मैं करोड़पति था।

अब तुम पूछते हो कि स्थान का कोई मूल्य होता है कि नहीं?

कहां की पागलपन की बातें पूछते हो सारी पृथ्वी एक है। इसमें क्या काबा और क्या काशी? जहां झुके परमात्मा के प्रेम में वहां काबा।वहां काशी। और ऐसे तुम काबा में ही बैठे रहो और न झुको तो क्या खाक काबा कर लेगा और क्या खाक काशी कर लेगी। काशी में कितने तो बैठे हैं मुर्दे तुम सोचते हो कुछ लाभ हो जाता है?

कबीर भी मरते वक्त बोले कि मैं काशी में नहीं मरूंगा मुझे काशी से ले चलो।

लोगों ने कहा पागल हो गए आप। लोग मरने के लिए काशी आते हैं आखिरी करवट लेने काशी आते हैं। क्योंकि सदा से समझा जाता है कि काशी में जिसने आखिरी करवट ली वह स्वर्ग गया। और तुम्हारा दिमाग फिर गया जिंदगी भर काशी रहे अब मरते वक्त कहते हो काशी नहीं रहेंगे।

कबीर ने कहा काशी में मरे और स्वर्ग गए तो वह काशी का अहसान होगा। अपना क्या गुण? नहीं हम काशी में न मरेंगे। स्वर्ग जाएंगे तो अपने बल से जाएंगे काशी के बल से न जाएंगे।

हट गए काशी से नहीं मरे काशी में। इसको कहते हैं हिम्मत के लोग।

कबीर सिर्फ इतना ही कह रहे हैं कि स्थानों का कोई मूल्य होता है कोई काशी में मरने का सवाल है सारी पृथ्वी उसकी है। सारा आकाश उसका है। मरते किस ढंग से हो इस पर निर्भर करता है। कहां मरते हो इससे क्या होने वाला है? किस आनंद से मृत्यु को अंगीकार करते हो नाचते, गाते तो मृत्यु भी फिर परमात्मा का द्वार बन जाती है।

तुम्हें फिक्र पड़ी है स्थान की अजीब-अजीब बातें हमारे दिमाग में भरी हुई हैं। किसी को स्थान की फिक्र है किसी को समय की फिक्र है किसी को दिन की फिक्र है कि कोई दिन शुभ होता है कोई अशुभ होता है कोई स्थान शुभ, कोई स्थान अशुभ। अपने पर न फिक्र करना और सब चीजों पर टालना स्थान, तिथि, दिन। एक बात भर छोड़ रखना खुद के भीतर मत खोजना कभी

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कुछ बाते है मेरे दिल में जिसका अब कोई मतलब नही
उसे बतादु या दबादू उससे अब किसीको कोई फ़र्क नहीं।

તમારી જીત તમારા સ્પર્ધક પર નહી તમારા મનોબળ પર આધાર રાખે છે.

જીવન માં
ક્રોધ કરવાથી ક્રોધી,
તપ કરવાથી તપસ્વી,
ભોગ કરવાથી ભોગી,
પ્રેમ કરવાથી પ્રેમી,
કપટ કરવાથી કપટી,
ઢોંગ કરવાથી ઢોંગી,
નાટક કરવાથી નોટનકી,
રમૂજ કરવાથી રમુજી,
અને
આનંદ કરવાથી આનંદી
થવાય છે.

#આનંદી

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जरूरी होता है,
कभी कभी जुठ बोलना ,जब उससे किसी का भला होता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब बेटा भूखा होता है, और खाना कम होता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब आपके प्यार का प्यार कोई और होता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब प्रश्न अपनी नहीं परिवार की खुशी का होता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब प्यार में दर्द मिलता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब सवाल तेरी खुशी का होता है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब बाते पुराने प्यार की होती है।
जरूरी होता है ,
जूठ बोलना जब तेरी याद आती है।
जरूरी होता है,
जूठ बोलना जब कहानी मेरी आती है।

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समझ में आया तो अच्छा है,
वरना तू अभी भी छोटा बच्चा है।