I am a Science graduate,having Bachelor degree in Journalism mass media from Magadh University(Bihar).I have started writing from class 8th.During my graduation I have been appointed Science Reporter of vigyan pragati ,monthly journal from Begusarai(Bihar).From the year 1986 started feature writing for Nav Bharat times,Hindustan,Aaj Janshakti(published from Patna).In the year 1989 I was appointed reporter of weekly Sunday Mail,(Delhi).In the year 1992 I started my own Fortnightly Khoji Purvanchal Times from Patna with three edition.In the year 1993 I was appointed Reporter of Hindustan(Patna).and resigned in 2004 due to personal engagement.During my reporting period creative writing were going on.In the year 2003 my collection of stories -Kantili Rahen was published by Rajbhasha Department ,Bihar Govt.again in 2015 my second collection of stories -Prayshchit was published by Raj bhasha Department,Govt of Bihar.Two collection of poems have been published by khoji purvanchal times publication in the name -Rang

झमक झमक,पुलक पुलक,
बूंदे बरस,किलक किलक।
पवन पवन, उड़त कुदत,
नदी ,झील ,घाटी पर्वत।
लता,पुष्प,हिलत खिलत,
हरी हरी ,धरती जगत।
घटा घटा,चमक चमक ,
जगा रही खनक खनक।
सावन भाद्र ,गगन मगन,
सरस उलस ,चमन चमन।
खुशी खुशी,चहक चहक,
प्रेम रस,छलक छलक।
रात रात,सिहर सिहर,
उलट पुलट कटे पहर।
प्रीत प्रीत, महक महक,
बूंदे बरस,किलक किलक।

मुक्तेश्वर सिंह मुकेश

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सुबहा की लाली,
संध्या की लाली,
दोनों ही लाली हैं-
एक दिवस के आगमन का
दूजा दिवस के अवसान का।
हवा चलती है-
शीतल शीतल,या उमस भरी,
शीतलता सबों को भाती है
उमसता सबों को उबाती है।
फूल खिलते हैं-
मटमैले भी,चमकीले भी,
मटमैले होते हैं तीखे,
चमकीले होते हैं फीके।
नित आते हैं जग में कुछ नाम-
एक कौम को करते बदनाम,
दूसरा दुनिया को देते मुकाम।
हर बिम्ब के हैं दो अर्थ,
कौन जरूरी कौन हैं व्यर्थ,
पहचान करने में जो हैं समर्थ,
पाते हैं जीवन का वागर्थ।
*मुक्तेश्वर मुकेश

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हिन्दी दिवस-हिन्दी विवश
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हिन्दी दिवस, हिन्दी दिवस,
क्यों अब भी है हिन्दी विवश।

अंग्रेजियत की शान में,
आधुनिकता के अभिमान में,
पथ से परे छिटकी हुई,
उपेक्षित और कुचली हुई,
जी रही है सिसक सिसक,
हिन्दी दिवस, हिन्दी दिवस।

सवाल करता,मुंह चिढ़ाता,
याद दिलाने हर वर्ष आता,
क्यों कहते हो मातृभाषा,
देते क्यों झूठी दिलासा,
अब तो करो बस।
हिन्दी दिवस, हिन्दी दिवस।

✍🏽मुक्तेश्वर सिंह मुकेश

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राजभाषा हिन्दी दिवस-२०
१४सितम्बर,२०२०
जनभाषा-मातृभाषा-राष्ट्रीय भाषा हिन्दी
अब
विश्वभाषा बन विश्व भर में प्रचलित !
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

मुक्तेश्वर मुकेश,अध्यक्ष
भारतीय सर्वभाषा रचनाकार संघ,सहरसा

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कुछ चटखा ,कुछ टूटा फिरसे
तिनका तिनका बिखरा फिरसे
रात दिन की कलह में झुलसे
जीवन का हर लम्हा कैसे
कैसे बताऊँ क्या हुआ अमंगल
मन का दामन ख़ुशी को तरसे !
#अमंगल

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#अमंगल
दिन नहीं अमंगल ,
मन का वहम अमंगल है,
क़िस्मत नहीं कर्म का फल,
सदा सदा सुमंगल है!

हाथ पकड़ चलना सिखलाया,
आज कुलांचे भरता है।
बेतरतीबी इस हरक़त पे,
मेरा मन कुछ डरता है ।
उड़ान वही भर सकता,
सच्चा दिशा ज्ञान जो रखता है,
वरना उछल उछल कर,
पुनः ज़मीं पर गिरता है।

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बादलों के रूई जैसे सफेद फाहे,
अठखेलियां करते नीले आकाश में,
आलिंगनबद्ध होते हीं झरती हैं,
प्रेम की बूँदें-
छोटी छोटी मनोहारी बूँदें,
धरती पर अंकुरित होते हैं बीज,
सिंचित होते हैं पेड़-पौधे,बाग,
आती हैं हरियाली,
फसलों के दाने भरे पुष्ट बाली,
चहुँ ओर खुशियां
किलकारी मारती हैं,
त्योहार और पर्व मनाती हैं,
तैरते हैं ओठों पर मुस्कान।
हमारे गांव में पहले-
जब बादलों की रूई नहीं दिखती,
इन्द्रदेव की होती पूजा,
महिलाएं गाती समूहगीत
मेंढ़की को उखल में डाल
मूसल से चोट दे
निकलवाती आवाज़-टर्र टर्र।
महिलाएं खिल खिला उठती,
इन्द्रदेव होते प्रसन्न,
बरसने लगती बूँदें,
भागती सूखा,
फटती परती जमीन के सीने,
हो जाते उर्वर,
भर जाते खलिहान।
*
पर काले बादलों के दानव
जब टकराते हैं आकाश में,
अट्टहास करते लड़ते हैं ,
गड़गराहट के साथ आपस में,
चमकती हैं बिजलियां,
गिरती हैं भारी-भारी बूँदें,
हाहाकार मचाती डूबाती हैं,
लहलहाती फसलें,
धंस बह जाते हैं,
माटी के मकान,
नदियों में आता है उफान।
फुफकारती पानी की लहरें,
चलती है वलखाती नदियों से,
तोड़ती हैं सड़कें व बांध,
डुबाती हैं गांव और मैदान।
गांव छोड़ टीले पर आश्रय लेने,
दौड़ते भागते चल पड़ते हैं,
वेवश उजड़े इंसान।
नदियों के तांडव,
बादलों के गर्जन
के बीच गाती हैं महिलाएं-
कहीं गंगा कहीं कोसी गीत,
फिर करती हैं दीपदान।
"आब बकैस दियो गंगा मैया,
आब बकैस दियो कोसी मैया,
चढैबो तोरा जोड़ा पाठा मैया,
डाली चढैबो तोहर थान ।"
धीरे धीरे पानी वापस जाता है
गंगा और कोसी की कोख में,
तब शुरु होता है,
झिलोर का मधुर गान।
अगले वर्ष तक खिले रहते हैं मुस्कान।

*मुक्तेश्वर सिंह मुकेश
17/07/2020

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कुछ बहुरूपिये आ गये इस शहर में
बहुरंगी पोशाक के बदले ज़हर में
इस क़दर लिपटे हैं ख़ून सने ख़ंजर में
कि पता हीं नहीं चलता साज़िश एक नज़र में।

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हया शर्म सब छोड़कर करते ऐसे काम,
अपनी सुविधा बनी रहे बाक़ी हों परेशान,
बाक़ी हों परेशान,चलें वो सीना तान,
ऐसे दुष्टों का करिये तुरंत ही मर्दन मान।

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