Born n brought up in a RSS Swayamsevak Parivaar. Heard stories of Shivaji and Lakshmi bai rather than prince or princess. Got primary education @ Saraswati Shishu Mandir. Started reading Premchand in early childhood. Trained Plant Pathologist. Later turned into SBCC and SBCM Program designer. Won first Kadambini Sahitya Mahotsav prize for story Thake Hare and many more later. VO artist, worked a lot at AIR Lucknow both as presenter and writer. Writing passion -short stories. Sometimes research

जग कहता होगा योगेश्वर,
होगे विराट तुम वासुदेव,
अपना तो नन्हा कान्हा है,
गोकुल में घर घर फिरता है,
जसुमति ऊखल से बंधा हुआ,
गोपी ग्वालों से घिरा हुआ,
जमुना तट नीचे कदम्ब खड़ा,
मुरली मधुर बजाता हुआ।।

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कितनी बार,
भुवनमोहिनी मुस्कान के साथ,
कमलनयनों में
असंख्य समुद्रों की गहराई भरकर,
पूछा था तुमने,
कौन हो "तुम"?

शून्य में टकराकर,
तिरोहित हो जाता
ये प्रश्न, हर बार...
कौन हूँ "मैं"?

कई युगों में ढूंढते,
अब पाया
जब कभी,
सम्पूर्ण प्रेम
सहज साख्यभाव
सम्पूर्ण भक्ति
एक साथ तुम में घुल जाती है,
तब मैं बनती हूँ।

तुम्हारे अनन्त विस्तार का,
एक नन्हा सा कण।।

#कृष्ण

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जानते हो #कृष्ण ,
मुझे लगता है,
तुम, एक ठहरा हुआ क्षण हो ।
मैं उसी एक क्षण में स्थिर होकर जीती हूं।
उससे पहले भी विराट शून्य है
और उसके आगे भी।
अर्थात, सम्पूर्ण सृष्टि में
सिर्फ तुम हो,
और तुम में जीती में हूँ।।
#कृष्ण

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दोस्त सिर्फ दोस्त होते हैं.

न लड़का न लड़की ,न स्त्री न पुरुष

न बड़े न छोटे, न अमीर न गरीब

न कड़वे न मीठे

वो सिर्फ दोस्त होते हैं.

कभी नहीं जांचते

सही गलत, वक़्त –बेवक्त

ऊँचा –नीचा, अपना पराया

हार-जीत , लाभ –हानि

बस खड़े रहते है हमारे साथ

आंधी- तूफ़ान, कड़ी धूप में

बारिश की रिमझिम या

सुबह की ओस में

क्योंकि, दोस्त सिर्फ दोस्त होते हैं.

दोस्त कभी कभी कर देते हैं

कड़वे सवाल,

क्योंकि वो हमारी चिंता करते हैं

हम उलझ जाते हैं

पर वो नाराज़ नहीं होते

क्योंकि, दोस्त सिर्फ दोस्त होते

Wish you all a very Happy #FriendshipDay

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तेज हवा मेरे बालों को उड़ाकर ,
मेरी आँखें बंद नहीं कर पाती,
सर्द हवा से मेरे रोयें खड़े नहीं होते
न मेरी हथेलियाँ मेरी कोहनियों
के पास जाकर मुझे अपने में समेटती हैं
ठंढ से बचाने के लिए
झमाझम बारिश में खड़ी रहती हूँ ,
खुले आकाश के तले, बाँहे पसारे
पर कोई बादल मुझे भिगो नहीं पाता
शायद, मेरे भीतर का ज़िन्दापन
मुझे छोड़कर,
तुम्हें ढूँढने निकल गया है
#कृष्ण

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तुम्हारे पीताम्बर से रंग गए
सरसों के फूल
तुम्हारी आँखों सी चमकने लगीं
नयी कोपलें
तुम्हारी बांसुरी की तान सी बोल उठीं
कोयलें
तुम में खोया अलसाया मन
सपनों में मयूर पंखी रंग
आ गया #वसंत #कृष्ण

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कुछ वर्ष पूर्व की बात है, मैं आकशवाणी के युव वाणी कार्यक्रम के अंतर्गत नियमित रूप से Eco-friends के शीर्षक से एक चर्चा करती थी , जिसमे हर दिन पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक ऐसे उपाय के विषय में बताया जाता था जिसे अपनाना और जीवन में उतारना बहुत आसान होता था. जैसे कागज़ के दोनों तरफ लिखना या प्रिंट निकालना, घर के नालों का टपकना रोकना, AC तथा Fridge जैसी choro-Floro carbon उत्सर्जित करने वाली चीज़ों का कम से कम प्रयोग करना, पॉलिथीन का प्रयोग कम करना.

उन दिनों आकाशवाणी तक अपनी बात पहुचाने के लिए हमारे श्रोता पोस्ट कार्ड का लिखा करते थे. एक श्रोता ने मुझे लिखा, मीनाक्षीजी कृपया बिन्दुवार बताएं कि इनमे से आप कितने सुझावों पर अमल करती है? अन्यथा इन्हें बताना बन्द कर दें. बात चौंकाने वाली थी क्योंकि हम कार्यक्रम प्रस्तोता प्रायः " आपकी आवाज़ बहुत मीठी है", "कार्यक्रम बहुत अच्छा लगता है" जैसी बातें पढने के आदि होते हैं.

लेकिन उस पत्र ने मेरे मन को झकझोरा.

निश्चय किया- कागज़ का दुरुपयोग कदापि नहीं, कितने पेड़ कटते हैं कागज़ बनाने के लिए? पॉलिथीन का प्रयोग लगभग छोड़ दिया है, घर में AC नहीं लगाया, Fridge दिसम्बर-जनवरी में बंद रखती हूँ, कोशिश है जब तक संभव है दो पहिया वाहन से ही काम चल जाये. मेरे व्यक्तिगत उपभोग से पर्यावरण को कम से कम क्षति हो.

उस श्रोता का नाम याद नहीं, लेकिन उसका एक बार फिर धन्यवाद् आप सभी से इस अपेक्षा के साथ कि अपनी छोटी सहूलियत की तुलना में पर्यावरण को महत्त्व दें.

ये वसुंधरा माँ जिसकी, गोद में हमने जन्म लिया, खाकर जिसका अन्न अमृत सैम निर्मल शीतल नीर पिया, श्वासे भरी समीर में, जिसका रक्त शारीर में आज उसी कि व्याकुल होकर ममता तुम्हे पुकारती......आओ सब मिल कर माँ वसुधा के संरक्षण में अपना गिलहरी योगदान दें,

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अब वो पहले वाली दीवाली नहीं आती.
गाँव जाने के पहले वाले सप्ताहांत में होने वाली खरीददारी,
बहनों, भाभियों, चाचियों,मामियों की साड़ियाँ
बिंदियाँ, कंगन, नेल पॉलिश, क्लिप्स...
महीनों पहले देखे बच्चों की लम्बाई का अनुमान लगाकर कपड़े
विद्यालय जाने वालों के बस्ते, पानी की बोतलें, लंच बॉक्स.
चीनी -गुड की रेवड़ियाँ, तरह तरह की गजक
डायरियां, कलम, टाफियाँ, चाकलेट...
और भी कुछ...जो किसी को भी दिया जा सके
महालक्ष्मी में जा रहे हैं...
किसी का उपहार छूटना नहीं चाहिए.
सबके लिए ले लिया ना...
कोई छूटा तो नहीं.....
इतना सारा सामान ..कैसे ले जायेंगे..
हमारे सिर्फ दो कपड़े हैं, बाकी सब वहीँ का है.
लम्बी, थकान वाली लेकिन बहुत खूबसूरत यात्रा
उजास और उल्लास से तुम्हारी आँखें ऐसे चमकतीं जैसे ,
बर्फ से ढकी साथ साथ चलती हिमालय की चोटी
सूरज की पहली किरण के स्पर्श से चमकती है.
गगनचुम्बी देवदार से टकरा कर ठंडी हवा के आते ही
तुम अपनी बाहों से मेरे चारों ओर दीवार बना देते.
दूर से देखकर अलग अलग वृक्षों को पहचाने का हमारा खेल चलता
तुम् बचपन की कहानियां फिर फिर दोहराते,
जैसे वो हर घाटी में छुपी बैठी हो, तुम्हे पुकारती हुयीं..
पहुँचते ही तुम्हारा मन करता,
उपहारों की पोटली खोलने का,
न कोई बच्चा अपना न कोई पराया
सब घेर लेते तुम्हे.....
तुम्हारी आँखों की चमक
तुम्हारी वो भुवन मोहिनी हँसी
मेरे लिए पूरी दीवाली थी......
अब वो दीवाली नहीं आती....
गाँव बदल रहा था ....
मैगी, कुरकुरे, टीवी मिलकर
बहुत कुछ बदल रहे थे, तेजी से
वो गाँव की आखिरी दीवाली थी....
किसी ने कहा....
सबको पैसे दिया करो.
तुम्हारी लायी चीज़ें इन्हें पसंद नहीं आतीं अब
गाँव पहले वाला नहीं रहा...
मैंने देखा था
एक चमक को खोते हुए
एक हँसी को फीका पड़ते हुए...
बहुत कुछ दरक गया था तुम्हारे भीतर...
फिर तुमने अपने को संभाल लिया...
हाँ...ठीक तो है. पैसे से सब अपने मन का उपहार ले लेंगे.
उसी समय से, उस चमक भरी दीवाली ने हमारे घर आना बंद कर दिया.
अब वो पहले वाली दीवाली हमारे घर नहीं आती.

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ये मुस्कराहटें , ये हँसी,
ये बेवज़ह बातें जिंदादिली की,
थक गयी हैं
मेरी गहराती उदासी का
बोझ उठाते -उठाते,
सोचती हूँ,
इन्हें मुक्त कर दूं,
तुम नाराज़ तो नहीं-
हो जाओगे न...
ये मुस्कराहटों का बंधन
बस तुम्हारा है #कृष्ण

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इस राह पे आऊं तो
इधर उधर हर मोड़
तुम ही दिखते हो,
गूँजती है बाँसुरी।
हवाओं में तुम्हारी
साँसों की खुशबू।
नहीं आ पाती यहाँ...
क्या करूं...
मेरा वजूद भी तो यहीं बिखरा पड़ा है
उसे समेटने आना ही होगा मुझे
कब तक भागूँगी.....
#कृष्ण

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