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ज़र-ए-उम्मीद के बिना दिलगीर-सी है…
हर शख्स की जिंदगानी यहां…!
क़ूवत (ताक़त) है ये उम्मीद की…
कि हर बिखरा शख़्स ढूंढ़ता है ज़िंदादिली यहां…!
क्योंकि…जीना तो इसी का नाम है…!

-Naina Gupta

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#Happy_New_Year to all of you with a lots of smiles and achievements... And all the best  for your eagerly awaiting happiness…😊


एक बार फिर यह दिसंबर 12 महीनों का सफर कर… जनवरी से मिलने आया है…!
और जनवरी ने सर्द सुबह की तरह…
दिसंबर से हाथ मिलाया है…!
इनका यह मिलन नया साल का आगमन लाया है…!


बहुत कुछ पाया…
और बहुत कुछ खोया भी है हमने…
इस गुजर जाने वाले साल में…!
कई खूबसूरत यादें बनाने के लिए…
बहुत कुछ पाने के लिए…
नया साल एक बार फिर आया है…!


इस गुजरते साल ने हमें एक बार फिर…
हमारे गुज़रे सारे लम्हें याद दिलाया है…!
1 जनवरी 2021 से शुरू हुआ यह सफर 31 दिसंबर 2021 के साथ अपने अंत को आया है…!
जनवरी 2022 के साथ…
मेरे हर्षित दिल से स्वागत है इस नववर्ष का…!


आपके सफलताओं की श्रेणी में ढेरों पंक्तियां जुड़ें…
इस अग्रिम नव वर्ष पर…
दुआ है मेरी ये उस रब से…!
अपनी सफलता के अनंत ऊंचाई को छू लें आप…
अपने बेजोड़ हौसले के दम पर…!



कैसा रहा यह गुजर जाने वाले साल का सफर…
आपके लिए…?
'अंकिता' ने आपसे यह जानने का दरख्वास्त किया है…!
बताइएगा जरूर…!


- नैना गुप्ता 'अंकिता'

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मुझे पसंद हैं ऐसे लोग…
जो खुद की अपनी एक अहम शख्सियत रखते हैं…!
न कि वो जो…
कभी इनकी तो कभी उनकी शख्सियत लिए फिरते हैं…!

-Naina Gupta

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इक आम सी इंसान हूं जनाब
इक लोअर मिडिल क्लास फैमिली से
जहां जरुरतें ज्यादा और शौक़ कम पूरे किए जाते हैं
फिर भी हम उसमें बहुत खुश रहते हैं…

पता है कैसे…?
इक जादू अपना कर…
अपनी जरूरतों को अपने शौक बना कर…
ना…ना…ना…ये मत समझिए कि गरीब हैं हम…
क्योंकि कुछ बेशकीमती चीज़ों से बहुत अमीर हैं हम…

हम अमीर हैं अपने सपनों से…
वो जो रातों को हमें सोने नहीं देते…
हम अमीर हैं अपने उस ज़िद से…
जो इक आम-सी शख्सियत को ख़ास बना देती है…
हम अमीर हैं अपने अपनों से…!


-Naina Gupta

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खामोशियां हयात के छुपे दास्तानों के मानिंद है…
कभी इत्मीनान से इबादत तो कीजिए इसकी…
खामोश रहकर भी कहर बरपा जाएंगी…!

-Naina Gupta

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Just take risk...
because it works as a medicine for your life...

-Naina Gupta

तारों को जमीं पर लाने के ख्वाब है तेरे…
तो तुझे उसकी ऊंचाइयों तक उड़ना भी पड़ेगा…
कभी हवा के झोंकों से बिखरना पड़ेगा…
तो कभी बूंदों-सा जमीं पर गिरना पड़ेगा…

-Naina Gupta

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# LUCKNOW LOVERS ❤️❤️


शिक्षा से लेकर इमारतों तक एक लखनवी अंदाज समेटे हुए है…!
पार्कों से लेकर सड़कों तक एक अलग ख़ूबसूरती झलकाते हुए है…!
यहां के हर ज़र्रे-ज़र्रे नवाबीपन लपेटे हुए हैं…!
क्योंकि…
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!


उगते सूरज की सुनहरी किरणों से चमकता अंबेडकर पार्क की चमचमाती पत्थरों-सा है…!
इमामबाड़े के ढलते सूरज के सुन्दर नज़ारे-सा है…!
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!


टुंडे कबाबी की गलियों में पहुंचते ही कबाबी तड़के-सा है…!
मोहन मार्केट की रेशमी जुल्फों को छुपाती खूबसूरत दुपट्टे-सा है…!
हज़रतगंज के आलीशान समां में सादगी-सा है…!
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!


अमौसी के उड़ते उतरते हवाई जहाजों के धुन-सा है…!
चारबाग के सरपट दौड़ती ट्रेनों के ‌रफ्तार-सा है…!
आलमबाग पर ठहरे बस के काफ़िलों-सा है…!
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!


गोमती के किनारे उठती शरारती मौज़ों-सा है…!
जनेश्वर के झील के किनारे टहलने पर मिले सुकून-सा है…!
यहां के फ्लाईओवर से नज़र आते खूबसूरत मंज़र-सा है…!
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!


भूतनाथ मंदिर से उद् घोषित शंखनाद-सा है…!
चाय की टपरी पर चुस्की लेते हैं स्टूडेंट्स के संघर्ष-सा है…!
अपने अंदर एक अजब-सी सादगी समेटे हमारा लखनऊ थोड़ा नवाबी-सा है…!
अरे भई ! हमारा लखनऊ कुछ नवाबी-सा है…!




- नैना गुप्ता 'अंकिता'


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कुछ लिखने की ख्वाहिश लिए बैठी सोच रही थी मैं…
क्या लिखूं…?
हाथ में पकड़े कलम की बेताबी देख सोच रही थी मैं…
क्या लिखूं…?

कलम की रफ्तार से कोरे कागज पर उकेरे शब्द रूपी मोतियों को देख सोच रही थी मैं…
क्या अलग नजरिए के साथ इन शब्दों के अलग ही मायने हैं…?

अल्फ़ाज़ो के बेजोड़ मेल से बने एक सुंदर-सी रचना को देखकर सोच रही थी मैं…
पढ़ने वालों के लिए तो यह बस कुछ अल्फाज़ हैं…!
पर महसूस करने वालों के लिए एहसासों का एक दरिया…!

अपने ही दिमाग के कारस्तानियों में उलझी सोच रही थी मैं…
कोई इसे पढ़ अधूरा ही छोड़ जायेगा…!
और कोई इसे पढ़ यादों के समन्दर में गोते लगा आएगा…!

और अंत में अपने ही सोच में उलझते सुलझते मैंने महसूस किया…
हर इंसान का अपना एक अलग ही नज़रिया है…!
इस गुलज़ार अहसासों से भरी दुनिया को देखने का…!

- नैना गुप्ता 'अंकिता'

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आसमान के उस टूटे तारों को देख कर…
अक्सर देखा है मैंने…
लोगों को उससे दुआ मांगते हुए…
क्योंकि वो टूट कर भी उनकी दुआ कुबूल कर जाता है…
बिल्कुल मेरे पापा की तरह…!

मेरे होठों के सिलन के खुलते ही…
कुबूल कर जाते हैं जो मेरी दुआ…
हाँ…वो मेरे पापा…मेरे लिए उस टूटे तारे से हैं…!

अगर मेरी मां धरती-सी बन…
मुझे गर्भ में पाल आंचल में छुपाया है…!
तो मेरे पापा मेरा आसमान बन…
हर बादल को छांट मुझे उड़ना सिखाया है…!

मैंने सुना है…
लोगों को कहते हुए…
कि आज पिता का दिन है…
पर मेरा तो हर दिन ही मेरे पापा से है…!
क्योंकि मेरे घर की…मेरे ज़िन्दगी की…
रौनक हैं मेरे पापा…!

- नैना गुप्ता 'अंकिता'

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