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Like to write But took a long pause from it Now wanna resume my writtings and would Like to publish them If found situable

॥आया दिन मतदान का ॥
पाँच साल के बाद है देखो ,
फिर आया दिन मतदान का ।
जनता से किए गए वादों का ,
सेना ,किसान स्वाभिमान का ।
चुनाव आते ही नेता जन,
मेंढक सा टर्र – टर्र टर्राते हैं ,
मुखर हो गई जनता देखो ,
फिर आईना दिखलाते हैं ।
मत फसना झूठी बातों में ,
और थोथें वादे, फरमान का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
जनमत की खातिर जोर लगाए ,
एड़ी, चोटी रगड़े पांव ,
दलित के घर खाते रोटी,
घूम रहे हर गल्ली- गांव ,
अतिवृष्टि ,पाला, सूखा से,
तप्त ह्रदय हर किसान का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
गौर से तुम इन को देखो ,
वस्त्र उजले तन काले हैं ,
लगा के मुंह पर नकली चेहरा ,
सुरसा से दांत निकाले हैं ,
अच्छी शिक्षा ,स्वास्थ्य , चिकित्सा ,
काम हो जन कल्याण का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
जाति -धर्म में बाँट रहें ,
आपस में रेवडियां बाँट रहें ,
खैरात का लाँलीपाँप दिखा ,
बेरोजगार बना ‘पर’ काट रहे,
बच्चा ,बूढ़ा औंर नौजवान का ,
करें आदर -सम्मान सभी का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
सर्व -धर्म सम्मान करें ,
देश का गौरव मान करें,
जनसेवक बन कर रहे सदा ,
दिन आए भ्रष्टों के फरमान का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
वादों की गठरी लादे हैं ,
नहीं इनके नेक इरादे हैं ,
पद, दारु , पैसा बांट रहे,
वोट खरीदते प्यादे हैं ,
जनता का पैसा छुपा लिया,
ऊपर से ओढे लबादे हैं ,
दशकों से मुद्दा घूम रहा ,
हैं ,रोटी और मकान का ।
फिर आया दिन मतदान का ।।
॥ नमिता गुप्ता ॥
(कृपया ,अपनी प्रतिक्रिया से मेरा हौसला बढ़ाएं )

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