उपन्यास लेखक @flydream publication.//https://imojo.in/AuthorNirpendra

चाहत बड़ी चीज है जर्रे को तस्वीर बना देती है।
सच्ची चाहत आशिक की तकदीर बना देती है।

अपनी तनहाई का, आलम अजीब है यारो।
दूर नज़रों से है, जो दिल के करीब है यारो।।

चाहता हूं जिसे, वो ही बिछुड़ता जाता है।
आजकल गर्दिश में, अपना नशीब है यारो।।

मोहब्बत में हमेशा, दर्द हमने पाया है।
इश्क़ अपने लिए, जैसे सलीब है यारो।।

दिल जिसे देता हूँ अपना, वो तोड़ देता है।
जमाने में ना कोई, अपना रकीब है यारो।।

मान ले 'सागर' चाहत, एक बुरी बीमारी है।
सबको लग जाती है ये, श: अजीब है यारो।।

©नृपेंद्र शर्मा "सागर"

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#काव्योत्सव2 (प्रेरक)

'लक्ष्य'

उठ जाग लक्ष्य कोई चुन लो,
निज हृदय की वाणी सुन लो।
कोई काम नहीं मुश्किल जग में।
कुछ करने का तुम बस प्रण लो।।

    कुछ ठान अगर तुम ठानोगे,
    तो हार कभी ना मानोगे।
     ना हो निराश गर हार गया।
     तेरा बस एक प्रयास गया।।

एक सबक नया तुमने पाया,
इस हार ने भी कुछ सिखलाया।
अपनी भूलें पहचान चलो।
कोई लक्ष्य नया फिर से चुन लो।।

नृपेन्द्र शर्मा "सागर"

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#काव्योत्सव2 (प्रेरक)

'जीत'

हर हार में अपनी जीत सुनो,
पथ एक नया फिर से चुन लो।
मंजिल तक वे ही जायेंगे,
जो कभी ना हिम्मत हारेंगे।।

पथ पर चलना है काम तेरा,
आगे ही बढ़ते जाना है।
छोटी सी एक असफलता से,
तनिक नही घबराना है।

मंजिल उनको ही मिलती है,
जो आगे बढ़ते जाते हैं।
उठते हैं फिर चल पड़ते हैं,
वे अपना भाग्य बनाते हैं।।

नृपेंद्र शर्मा"सागर"

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"हिम्मत,,", को मातृभारती पर पढ़ें :
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