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पाठकों की आश्वस्ति के लिए मैं यह हलफनामा नहीं दे सकता कि कहानी के पात्र, घटनाक्रम, स्थान आदि काल्पनिक हैं। किसी भी तरह के मेल को मैं स्थितियों का संयोग नहीं ठहरा रहा। इसके बाद आपकी मर्जी, इसे कहानी ...Read More

दुबारा शाम को भी सिन्हा जी उसी का प्रवचन सुनते हुए दफ्तर जाते। अखबार के दफ्तर में पांव पड़ते ही, दस मौडम और पांच ब्यूरो के फोन कान को चैन ही नहीं लेने देते। मुख्यालय के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग, ...Read More

लोगों को क्या मालूम कि सिन्हा जी चाट रहे हैं या झेल रहे हैं कोई फोड़ा जो फूटने का नाम नहीं ले रहा। यह कोफ्त भी तो हो सकती है उनकी, मवाद के नहीं बहने की। कामयाबी की पैमाइश इसी ...Read More

जले-भुने प्रसाद जी एक दिन सिन्हा जी से कहते हैं – ‘जानते हैं बास, अब बहुत जल्द हम सभी संपादक शब्द सुनने को तरस जाएंगे। जब विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक, व्यवसाय संपादक जैसे पद चल गए हैं तो संपादक ...Read More

सिन्हा जी – ‘बाजार में अपने स्पेस को लोकेट किए बिना आप कहीं नहीं रह सकते। अखबार अपने ढंग से पत्रकार के कौशल को खरीदता है और पत्रकार अपने कौशल से उस अवसर को खरीदता है। दोनों समझते हैं ...Read More

समझता तो वह भी था कि जीवन इससे चलनेवाला नहीं, लेकिन यह समझदारी किसी काम की नहीं थी। वह उस रास्ते पर चल नहीं सकता था, जहां रिलीज से पैसे झड़ते और स्टोरी सेरुपए। एक्सक्लूसिव का मतलब अब वैसी ...Read More

प्रसाद जी ने एक विद्यालय संचालक शकर सर की दबंगई का राज खोलते हुए कहा- जानते हैं शंकर सर को इतना बड़ा छोकड़ीबाज बनाने में इन्हीं संपादक जी का हाथ है ! आपमें से बहुत कम लोग जानते हैं ...Read More

और इधर शहर के पत्रकारों रमेंद्र जी, दयाल जी, पी चौबे आदि की सारी रामकहानी सुमन जी से सुनकर - जानकर तो असहाय से हो गए सैयद जी के रगों मे ज्वार आ गया था उस दिन। लगता था ...Read More