Free Lance Writer. Senior Hindi Teacher retired from a Top School of West Delhi. Avid International and Domestic Traveller. Music Enthusiast. Amateur Photographer. Keen for new learning.

कोशिश (हाइकु)
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सपना देख!
पाएगा सबकुछ
कर कोशिश।

सम्भव पाना
आकाश - कुसुम भी
कर कोशिश।

कोशिश ही है
सफलता का राज़
कर तो सही।

कोशिश कर
बना राह ख़ुद की
तोड़ पहाड़।

कोशिश हुई
भाग रहा कोरोना
टीकाकरण।

रूठे जो रिश्ते
मना लें उनको यूँ
कर कोशिश।

भूधर से भू
दुर्गम पथ चल
नदी - कोशिश।

फूटा अंकुर
भूमि का सीना फाड़
कोशिश से ही।

नन्हीं चीटियाँ
समर्पित कर्म को
फले कोशिश।

छात्र - कोशिश
औ समर्पित गुरु
फल - शिखर।

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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक
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नज़र बनाए हुए हैं!
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नेता लगातार नज़र बनाए हुए हैं!
हवाईजहाज से निरंतर
देश में बाढ़ के हर दृश्य पर
एकटक नज़र बनाए हुए हैं।
पहाड़ खिसक रहे हैं, दरक रहे हैं
नेता लगातार स्थिति पर
नज़र बनाए हुए हैं।
झुग्गियों में लगी आग पर,
किसानों के आंदोलन पर
8 महीने से नज़र बनाए हुए हैं।
बहन - बेटियों पर होते बलात्कार
की खबरों पर लगातार
नेता नज़र बनाए हुए हैं।
कोरोना की दूसरी लहर के समय
आॅक्सीज़न की कमी से दम तोड़ते
मरीज़ों पर वे
लगातार नज़र बनाए रहे।
कोरोना से हुई मौत के आँकड़ों पर भी
वे हमेशा नज़र बनाए रहे।

चीन और पाकिस्तान की सीमा पर
बढ़ते विवाद पर सरकार
लगातार नज़र बनाए हुए है।
कश्मीर की वादियों में पनपते
आतंकवाद पर सरकार हरदम
नज़र बनाए हुए है ।
मुल्क में जासूसी के मामले में
पेगासस पर हर पल
नज़र बनाए हुए है ।
समाज में होने वाले हर भ्रष्टाचार पर
वे पैनी नज़र बनाए हुए हैं ।
कोई भी नज़ारा उनकी नज़रों से
ओझल न हो जाए इसलिए
हर नज़ारे पर हर पल वे
नज़र बनाए हुए हैं ।

देखा! कितनी मेहनत करनी पड़ती है
इन्हें हर समय हर जगह लगातार
नज़र बनाए रखने के लिए।
देश का कितना भला करते हैं ये,
जनता में यह भ्रम सदैव ही
बनाए रखने के लिए।

लेकिन क्या सरकार हर स्थिति पर
केवल नज़र बनाए रखने के लिए है?
खुली आँखों से अंधेपन का नाटक
कर बस धृतराष्ट्र बन जाने के लिए है?

क्यों नहीं वह सभी मुद्दों पर विचार कर
देशहित में कोई फैसला ले पाती ?
पूरे देश के सामने अपने मन की बात
तो हमेशा करती रहती ।
क्यों नहीं वह सबकी समस्याओं को
खुले मन से सुन पाती ?
क्यों नहीं वह संवेदनशीलता के साथ
जनता को साथ ले चल पाती ?
क्यों नहीं वह हर स्थिति में
चुनाव हित से ऊपर सोच पाती ?

असंतुष्टि की चिंगारी ने जनता में
ज्वाला को धधका दिया है अब ।
क्रांति का बिगुल जो बज चुका है
आवाज़ को कैसे दबा पाओगे अब?
विरोधी जन सैलाब जो उमड़ पड़ा है
उस बहाव को कैसे रोक पाओगे अब?

गूँगे - बहरे होकर अपंग मत बनो,
धृतराष्ट्र बने मत बैठो, ठोस निर्णय लो ।
सारथी बनाया था तुमको जनता ने,
कृष्ण की तरह लगाम हाथ में थाम लो ।
दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचो!
नज़र बनाने की बजाय देशहित में सोचो!
देश को पतन की राह पर मत जाने दो।
उत्थान करो देश का, खुशहाली आने दो।।

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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक
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मेरी बाल्यावस्था की अनुभूति पर आधारित रचना---------
" तितली मर क्यों जाती है ?"
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रचयिता-----प्रमिला कौशिक
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पापा ! मेरी तितली मर क्यों जाती है ?
कितने प्यार से,
धीरे से, हौले से;
मैं इसे पकड़ती हूँ ।
फिर इसे सख्ती से नहीं,
कोमलता से थामती हूँ ।
फिर एक हाथ से,
काँच की एकदम साफ़
चमकदार खाली दवात में
चुपके से उसे रख देती हूँ ।
ढक्कन भी उसका
ठीक से बंद कर देती हूँ ।
थोड़ी देर वह
इधर से उधर,उधर से इधर,
ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर
पंखों को हिलाती घूमती फिरती है ।
पर पापा ! वह मर क्यों जाती है ?
मैंने इसे बिस्कुट दिया
टॉफ़ी भी दी खाने को
पानी के अतिरिक्त
दूध भी दिया पीने को;
मैंने भूखा- प्यासा भी नहीं रखा कभी;
फिर भी मेरी तितली मर क्यों जाती है ?
मैं इससे बात करती हूँ,
कहानी इसे सुनाती हूँ ;
इसके लिए मीठा- मीठा गीत भी
मैं बार- बार गाती हूँ ।
लोरी गा- गाकर रात को
थपकी दे इसे सुलाती हूँ ।
इतना ध्यान मैं इसका रखती हूँ;
फिर भी पापा ! यह मर क्यों जाती है ।

बिटिया ! तुम तो बड़ी नासमझ हो
अनजान हो, नादान हो
और बहुत भोली हो ।
आँसू पोंछो, चुप हो जाओ;
तुम अब तक बहुत रो ली हो ।
सुनो ! ध्यान से सुनो
तुमने अपनी तितली रानी को
प्यार से खिलाया- पिलाया,
लोरी गाकर थपकी दे सुलाया;
पर तुमने उसे साँस तो
लेने ही नहीं दिया ।
साँस ही तो प्राण है,
प्राण ही तो जीवन है ।
दवात का ढक्कन बंद कर
तुमने तो उसका
दम ही घोंट दिया,
साँस उसका रोक दिया;
इसलिए तुम्हारी तितली मर जाती है;
हर बार हर तितली तुम्हारी मर जाती है ।
इसको गुलाम रहकर जीना भी
अच्छा नहीं लगता है ।
यह तो वायुमंडल में आकाश तक
उड़ान भरना चाहती है ।
हर दिशा में विचरण यह करना चाहती है ।
इसको आज़ाद यूँ ही उड़ने दो,
जहाँ चाहे वहाँ विचरने दो ।
फिर यह नहीं मरेगी,
तुम्हें दुआएँ भी देगी ।

समझ गई पापा समझ गई
मुझे बात आज समझ आ गई
कि मेरी तितली क्यों मर जाती है ?
बार-बार मेरी हर तितली
क्यों मर जाती है ।
अब मैं कभी उसे
दवात में बंद नहीं करूँगी ।
अब मैं उसे उड़ने दूँगी,
उसके साथ-साथ स्वयं भी
जहाँ वह जाए वहाँ दौड़ूँगी
और उसके साथ हर खेल मैं खेलूँगी ।
अब उसको मैं नहीं मरने दूँगी
पापा ! अब उसको मैं नहीं मरने दूँगी ।।

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दीवानी
💃💃💃💃💃
💦💦💦💦💦
टर्र टर्र टर्र टर्र ,
मेंढक की तान पर।
घुँघरू पहन कर ,
बूँदों की ताल पर ।

नाच रही छमाछम ,
धरा पर पाँव धर ।
प्रकृति दीवानी हुई ,
मेघों की थाप पर ।।
🌧️🌧️🌧️🌧️🌧️🌧️
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रचना व वीडियो -
प्रमिला कौशिक
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मेघा आए
💭💭💭
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मेघा आए ,
मन हर्षाए।
पाखी गाए ,
पंख फैलाए।
स्मित वसुंधरा,
स्नेह यूँ झरा।
वृक्ष भी हरा,
नीर है भरा।
मेघ - गर्जन,
प्रकृति नर्तन।
उठाए गर्दन,
भू करे दर्शन।।
💭💭💭💭
💦💦💦💦
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अभिव्यक्ति व फ़ोटो -
प्रमिला कौशिक
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मेरा प्यारा देश
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मेरे देश की धरती पर
खिले हर रंग के फूल हैं।
कल कल बहती नदियाँ
और बाँधे इन्हें कूल हैं।
हर जाति-धर्म से सजा
देश मेरा यह प्यारा है।
कहलाता जो विश्वगुरु
जगत में सबसे न्यारा है।
जहाँ न हो कोई भेदभाव
ऐसा सुंदर - रंगबिरंगा है।
सभी रहते मिलजुल यहाँ
शान से फ़हराए तिरंगा है।

प्यारे देशवासियो! सोचो, विचारो
अगर कोई तुम्हें बरगलाएगा।
देश के अमन चैन को लूट कर
कोई भी चैन से सो न पाएगा।
इस हरी-भरी खुशहाल धरती को
हरियाली संग लहलहाने दो।
अपने इस सबके प्यारे तिरंगे को
आन बान शान से फ़हराने दो।

जय हिंद जय हिंद जय हिंद
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अभिव्यक्ति व फ़ोटो ( द्वारा ) -
प्रमिला कौशिक
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खुशनुमा ज़िंदगी
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द्वारा - - - प्रमिला कौशिक
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सचमुच !
अजीब कशमकश है ज़िंदगी,
वक्त है कि रुकता ही नहीं है।
ख्वाब देख, दर्द पाले हैं हमने,
खुशी भी तो इनमें ही कहीं है।
कुछ खोया कुछ पाया हमने,
पर शिकवा किसी से नहीं है।
खुश हो जाती हूँ ये सोचकर,
कि तू मेरे पास यहीं कहीं है।
काफ़ी है यह अहसास ही कि,
जहाँ भी देखूँ तू बस वहीं है।।
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I was in knee pain for many days. This composition is linked with this pain only. Composed this poem with this actual experience of pain.
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DANCE IN PAIN
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I was in a severe pain
tried to walk but in vain.

Then came to me my prince charming
Who was giving me multiple warning.
Suddenly he held my hands
took me on the fairy lands.

He said - people dance in the rain
but i will make you dance in pain.
Now the melodious music was in the air.
we were on the dance - floor with care.

I was in pain but we were dancing.
slowly pain transformed in romancing.
For many hours music was on
feeling of pain was totally gone.

So anybody can dance in the pain.
dance is not meant only for rain.
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Composed by - - - - - - Pramila Kaushik
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उत्तर ???💟
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नज़रों से
नज़रों को छूकर,
तुम मुझमें समाए थे
या मैं तुम में ?

अधरों पर
धर अधर,
तुम मुझमें समाए थे
या मैं तुम में ?

बाहुपाश कस
कर आलिंगन,
तुम मुझमें समाए थे
या मैं तुम में ?

रचना द्वारा - - - प्रमिला कौशिक
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( बाल्य - रैप - गीत )

पायलट ही बनूँगा
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जन्मदिन था मेरा,
गिफ़्ट में मुझको
पापा ने दिया था।
वीडियो गेम,
मैं खुश नहीं था।
पापा बोले -
तू क्या चाहे ?
मुझे बस चाहिए
हवाई जहाज।
लाकर दे दिया
वह भी मुझे।
यहाँ उड़ाया
वहाँ उड़ाया
मैंने जहाज।
दौड़ा लेकर
यहाँ से वहाँ।

बड़ा हुआ हूँ
जब से मैं।
दादी बोलें,
इंजीनियर बन।
दादा बोलते,
कमिश्नर बन।
दीदी बोलें,
एक्टर बन।
मम्मी बोलें,
डॉक्टर बन।
पापा बोलें,
कुछ भी बन।
टीचर बोलतीं,
जो चाहे बन।
मैं ये बनूँ
वो बनूँ।
अरे! मैं बनूँ
तो क्या बनूँ ????
क्या बनूँ, क्या बनूँ ?
मैं तो बनूँगा
केवल पायलट।
लेकर उड़ जाऊँ
सबको आकाश।
बादलों के ऊपर
सैर कराऊँ ।
दुनिया घुमाऊँ
दादा दादी को।
मम्मी पापा दीदी
और टीचर को।
देश रक्षा की
बात जब आए।
छाताधारी बन
लगाऊँ छलाँग।
घुसकर दुश्मन
के खेमें में।
मार गिराऊँ
दुश्मन को भी।
फिर फ़र्राटे से
लूँ उड़ान ।
वापिस आ जाऊँ
लौट फिर।
गर्व से अपने
भारतवर्ष।
इसलिए मैं
पायलट ही बनूँगा।
मैं तो अब
पायलट ही बनूँगा।।।।
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अभिव्यक्ति व फ़ोटो -
प्रमिला कौशिक
*******************

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