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दृश्य इतना ख़ूबसूरत लगा कि मैंने कार में बैठे बैठे ही पहले यह फ़ोटो खींचा और फिर भावाभिव्यक्ति ने रच डाली यह छोटी सी कविता।- - -

सुनहरा आँचल
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(रचनाकार - प्रमिला कौशिक)

तारकोल से यह बना रास्ता
लगता था काला साया सा।
सूरज ने अपनी किरणों से
आँचल सुनहरा फैलाया सा।

अब तो प्रतीत होता है ऐसा
ज्यों नदी बह रही सोने की।
सूरज की प्यारी धरती की हो
ज्यों चाह पिया में खोने की।

सूरज का सुंदर मुखड़ा देखो
निहार धरा को कैसे मुस्काए है।
नज़रों से नज़रें मिलने पर
स्मित वसुंधरा कैसे लजाए है।

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रेलगाड़ी... भावों की
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रेलगाड़ी
भावों की
चलने लगी
अनेक दृश्य
अच्छे - बुरे
कई स्टेशन
गाँव - शहर
छोटे - बड़े
रुकती है
चलती है
इंजन भी
बदलती है।

भावों की
रेलगाड़ी
तेज़ है
रफ़्तार।
छुक छुक
छुक छुक
चलती ही
जाती है।
कविता में
बदलती है।

दुःख है
सुख भी है
करुणा है
स्नेह है
शांत भी है
क्रोध भी है
बच्चों सा
वात्सल्य भी
ईर्ष्या भी है
द्वेष भी है
घृणा का
है भाव भी

बातें घर की
परिवार की
समाज की
देश की भी
देश की
राजनीति भी।
समेटे ख़ुद में
सारे राहगीर
चलती ही
जाती है।
भावों की
रेलगाड़ी
चली तो
चलती ही
जाती है।

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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक

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पिता
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आज के संदर्भ में पिता,
नहीं रह गया केवल पिता।
बच्चों को ज़िंदगी जीना सिखाता,
एक शिक्षक है पिता।
ग़लत राह पर जाने से बचाता,
राह दिखाता, मार्गदर्शक है पिता।

एक मित्र की तरह साथ बैठकर,
सवालों के जवाब तलाशता,
दोस्त है पिता।
कंधे पर हाथ धर,
संबल बनता है पिता।
निराश बालक में संचार
आशा का करता, प्रेरक है पिता।

हर तरह के झंझावातों से,
सुरक्षित निकाल लाने वाला,
संरक्षक है पिता।
सही-ग़लत की पहचान कराने वाला,
नीर-क्षीर विवेकी है पिता।
बच्चों को मानसिक और शारीरिक,
शक्ति प्रदान करने वाला है पिता।

हर कदम पर साथ चलने वाला,
सहचर है पिता।
पालन-पोषण करने वाला,
पालक और पोषक है पिता।
पिता को कभी भी कम न आ़कें,
बालक का भाग्य-विधाता है पिता।।
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रचनाकार - प्रमिला कौशिक

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रचनाकार - प्रमिला कौशिक (21/4/2022)
रोबोट
* * * *
बुलडोज़र नहीं रोबोट है यह
निर्माता जिसका है मानव।
रिमोट हाथ में उसके ही है
बना दिया उसको है दानव।

निर्माण हेतु बनाया था जो
पर कर रहा विध्वंस है।
नियम कानून ताक पर रख
चलाया जा रहा नृशंस है।

रिमोट का दबाकर बटन
चाहे जिधर मुख मोड़ दो।
भेज कर इस दैत्य को
किसी का भी घर तोड़ दो।

विडंबना कैसी है देखो
दैत्य बन गया गुलाम है।
कठपुतली सा वह घूमता
इशारों पर वो सरेआम है।।
* * *

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दादाजी--- (रचनाकार - प्रमिला कौशिक)
- - - - - - (14 अप्रैल 2022)

दादाजी आप दादाजी न रहे
आप गांधारी क्यों बन गए ?
धृतराष्ट्र की तो विवशता थी
आप यूँ अंधे क्यों बन गए?

आप रोज़ शाम को बैठकर
सबकी शिकायतें सुनते थे।
प्रेम से सबमें मेल कराकर
निष्पक्ष न्याय तब करते थे।

कितना कुछ घट रहा है घर में
अब क्यों न आप कुछ कहते हैं?
गूँगे अंधे बहरे बनकर अपंग से
किसविध अनाचार यूँ सहते हैं?

दादाजी, पक्षपात करते करते
पापा अब तानाशाह हो गए।
बच्चे तो हम सब हैं उनके ही
क्यों वे एक पक्षधर हो गए ?

भैया का हर दोष माफ़ क्यों ?
मुझको ही पीटा जाता क्यों ?
भैया का हर क़त्ल माफ़ क्यों ?
मेरा घर तोड़ा जाता क्यों ?

काले गोरे में भेदभाव क्यों
लंबे नाटे में भेदभाव क्यों ?
आपस में हैं लड़वाते क्यों ?
सबमें नफ़रत फैलाते क्यों ?

पापा ने दरारें खींची मन में
सब कुछ यहाँ छितर गया है।
कितना सुंदर घर था हमारा
देखो! अब कैसे बिखर गया है।

पापा ने कुछ बेटों के हाथ थमाए
धार्मिक आडंबर के अमोघ अस्त्र।
एक अजान का एक हनुमान का
दोनों ही ओर से चल रहे शस्त्र।

दोनों दिशाओं से आते, टकराकर
काश ये अस्त्र भी निरस्त हो जाते।
किसी का न होता बाल भी बाँका
सब अस्त्र शस्त्र जब पस्त हो जाते।

पापा ने अपनी ही संतानों में
फैलाया जो यह धर्मोन्माद।
शायद वे जान नहीं पाए हैं
कर देगा वह सबको बर्बाद।

अपने ही बच्चों को बताओ भला
कौन पिता यूँ लड़वाता है ?
कैसे कहलाएगा वह इंसान भला
जो अपना ही घर जलवाता है।

दादाजी, आपसे ही थी उम्मीद
नीर क्षीर विवेकी आप ही थे।
कोई भी समस्या आती घर में
सबका समाधान आप ही थे।

पट्टी आँखों पर बाँध कर
यदि अंधे बन जाएँगे आप।
होठों को सी, कानों को ढक
मूक बधिर बन जाएँगे आप।

तो तहस नहस हो जाएगा घर
न पापा बचेंगे, न आप और हम।
तमाशबीन दुनिया करेगी अट्टहास
हमारा खेल ख़त्म और पैसा हजम।

अपंगता का मुखौटा उतारिए
अत्याचारों से हमें उबारिए।
दादाजी फिर से हुंकार भर
शक्ति का मंजर दिखाइए।

विक्रमादित्य के सिंहासन पर
फिर एक बार आप विराजिए।
न्याय प्रिय हैं आप आज भी
संसार को यह बता दीजिए ।।

सबकी खिलखिलाहटों से
घर हमारा फिर गुंजायमान हो।
पहले सी प्रेम सरिता
दिलों में अनवरत प्रवहमान हो।

कानून तोड़ने की हिम्मत न हो
किसी की, कुछ ऐसा वर दो।
महत्व न्याय का परिवार समझे
दादाजी, कुछ ऐसा कर दो।
* * * * * * * * * * * * * * *

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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक (17/4/2022)

एक पत्थर की व्यथा
* * * * * * * * * * *

क्या सुनोगे एक पत्थर की कथा ?
कहना चाहता हूँ मैं अपनी व्यथा ।
मुझे ज़मीन से किसने था उठाया ?
उठा कर यूँ किस पर था चलाया ?

काश! कि मेरी भी होतीं आँखें
और घटना सारी देख मैं पाता।
काश! कि होते कान मेरे भी
और मैं सुन हर पक्ष को पाता।
काश! कि मेरी भी होती ज़ुबान
सब कुछ बयान मैं कर पाता।
काश! कि इतनी ताकत होती
कोई मुझे ज़मीं से उठा न पाता।

देता हर एक की गवाही तब मैं
किससे क्या क्यूँ कहा था किसने ?
बात बढ़ी तो पहले कौन बढ़ा था ?
सबसे पहले मुझे उठाया किसने ?
उठा लेना तो अलग बात थी
पर पहला पत्थर मारा किसने?

कितने पत्थर चले कहाँ कहाँ से ?
फिर क्यों यह कोहराम मच गया ?
कितनों ने कितनों को मारा ?
कौन था घायल कौन बच गया ?
कौन था निर्दोष, कौन था दोषी ?
कौन झूठा कौन कह सच गया ?

जो भी हुआ वह हुआ था यूँ ही
क्योंकि मैं कुछ देख न पाया।
चलता रहा सब कुछ निर्द्वन्द्व
शोर शराबा भी मैं सुन न पाया।
बोलने से भी सच आता सामने
था मूक मैं कुछ बोल भी न पाया।

एहसास बस एक ही हो रहा था
यहाँ से वहाँ मैं फेंका जा रहा था।
एक दूसरे के कंधे पर रख बंदूक
हथियार मुझे बनाया जा रहा था।
किस किस को लगी चोट पता नहीं
पर मैं बार - बार टूटा जा रहा था।। - 2

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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक
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कविता
* * * *
कविता ईश्वर की सौगात है।
कविता मेरे दिल की बात है।
कभी तो उलझा झंझावात है।
कविता कभी मन की घात है।
तो कभी दिल पर आघात है।
कविता मनोभावों का गात है।
जैसे वृक्ष से झरा कोई पात है।
कविता की बड़ी औकात है।
चाहे तो तन मन पे छा जात है।
मिश्रित हो जैसे दाल भात है।
किसी के दिल को देती मात है।
तो किसी दिल को जाती भात है।
ज़िंदगी का दिन कभी रात है।
कविता सच में एक सौगात है।
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होली यूक्रेन में
* * * * * * * *
होली आई रे हरजाई अग्नि बरसे
सुनाई देते सायरन।
पल पल दागे मिसाइल रशिया - 2
यूक्रेन हो रहा तबाह।
सुनाई - - -
कैसे मनाएँ हम होली खुशी संग - 2
कानों में आए जब कराह।
सुनाई देते सायरन।

हर ओर लपटें दीख रहीं हैं - 2
दहन होलिका सा हो रहा है।
मानव क्यूँ बन गया है दानव
होली खून की खेल रहा है।
जला एक शहर फिर दूजा
अभी यहाँ तो अभी वहाँ।
सुनाई - - -

नभ में उड़े गुलाल अनल का - 2
धुएँ के उठें हैं गुबार
सुनाई - -
अबकी कैसी आई रे होली
मन को हमरे न भाई होली।
अरे! कुछ तो करो जतन
सुनाई देते सायरन।

बम और मिसाइलों के बने हैं गुब्बारे - 2
दागें वो हम पर बिना विचारे।
आग के गोले बरसाएँ
भस्म होते शहर शहर।
देख रहे सब तमाशा
टूटा है देखो कैसा कहर।
दहशत में, हम सब हैं, यहाँ पर - 2
पहुँचें कैसे भी घर।
सुनाई देते सायरन।

प्रभु तेरी कैसी है ये माया?
कोई भी मदद को न आया
होली आई रे हरजाई कैसी होली
सुनाई देते सायरन।
धुन बाँसुरी की हुई तिरोहित - 2
रुदन हो गया गायन।
सुनाई देते सायरन।
कान्हा अब तो सुध ले लो तुम
बचा लो शेष दामन।
सुनाई देते सायरन

चमत्कार कुछ कर दो ऐसा - 2
युद्ध का हो अब समापन
बाँसुरी बने सायरन।
होली आई रे कन्हाई रंग बरसा
सुना दे ज़रा बाँसुरी।
सुनाई न दे सायरन
सुना दे ज़रा बाँसुरी।
* * * * * * * * * * * *
रचनाकार - प्रमिला कौशिक

रचनाकार शकील बदायूँनी जी से साभार एक पँक्ति - "होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसुरी" ।
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समस्या का हल
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(रचनाकार - प्रमिला कौशिक)

देश है एक समस्याएँ अनेक
क्या है हल जगाओ विवेक।
अरे भाई! ये जो है ''महँगाई''
आज अचानक ही नहीं आई।

सब सरकारों ने रखा ज़िंदा
तभी तो यह मर नहीं पाई।
सबने था पाला पोसा इसे
इसीलिए परवान चढ़ आई।
बोलो हमारी क्या है ग़लती
यह तो यौवन की तरुणाई।

एक और कन्या "गरीबी" आई
साथ में "बेरोज़गारी" भी लाई।
अब दोनों जुड़वाँ बहनें सी
सोच रहीं अब आए भाई।

"भ्रष्टाचार" भाई बन आया
बजे ढोल, सोहर भी गाई।
तीन थीं बहनें भाई एक
हुई ख़ूब खिलाई पिलाई।
भ्रष्टाचार फला और फूला
खाकर ख़ूब दूध मलाई।

वर्तमान और पूर्व सरकारें
एक दूजे पर दोष लगातीं।
कोई कहे ये अभी बढ़े हैं
कोई कहे ये पूर्व की थाती।
जले पर नमक का मरहम
भीख दे एहसान करते रहो।
रहमोकरम पर रहे जनता
ताकि वोट तुम पाते रहो।

आत्मनिर्भर भारत का
गीत तो ख़ूब ज़ोर से गाओ।
पर ग़रीबों को कभी भी
आत्मनिर्भर मत बनाओ।
अरे ! सारा खेल वोट का है
चुनाव में वोट से चोट का है।

अनगिन वर्षों से नहीं हुई जब
"गंगा माँ - यमुना की सफाई" ।
तो कैसे कुछ वर्षों में हो जाए ?
क्यों नहीं बात समझ यह आई ?

पावन गंगा ही हो गई दूषित
तो कैसे वह अब उद्धार करे।
पापियों की नगरी चमक रही
किसके पापों को कौन हरे ?

"गंगा में तिरती दिखीं जो लाशें"
कोरोना मरीजों की नहीं थीं वे।
भगीरथ के पुरखों की थीं सब
बहकर आई हिमालय से थीं वे।
जो पुरखे तब तर नहीं पाए थे
वे अब धरती पर उतर आए थे।
विश्राम कर रहे, लेट रेत पर
चूँकि थक कर चूर हुए आए थे।

"आवारा पशु" भी एक समस्या है
लो जी! एक मुद्दा और आया।
नेता ने कहा - कि साँडों को
कोई बाँध कहाँ कब रख पाया?
आवारा पशु का यह मुद्दा
नहीं केवल एक प्रदेश का है।
यह तो हर गाँव शहर का है
हर प्रांत समूचे देश का है।

कितना हास्यास्पद लगता है
हल कहीं न कोई मिलता है।
इकदूजे पर सब दोष मढ़ो
पर हल कोई भी मत खोजो।
अरे! उत्तरदायित्व लेगा कौन ?
समस्या का हल देगा कौन ?
* * * * * * * * * * * * * * * *

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जोत जोत में विलीन
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(रचनाकार - प्रमिला कौशिक)
21 जनवरी 2022

जोत से जोत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो।
सदियों से सुनते आए थे
दिये से दिये जलाए थे।

दीवाली जितनी आई हैं
दीपमालिका बनाई हैं।
एक दीप जलाकर पहले
उससे सब दीप जलाए हैं।

आज देखो! न जाने किसने
इतनी उल्टी गंगा बहाई है।
अमर जवान ज्योति आज
इंडिया गेट की बुझाई है।

चाटुकार देते दलील, ज्योति
ज्योति में विलीन कराई है।
अरे! किसकी आत्मा यह
परमात्मा में विलीन कराई है ?

किसकी मृत्यु हुई है ? जो
आत्मा प्रभु में समा गई है।
क्या वह इतिहास नहीं है ?
जिसकी हत्या आज हुई है।

किसी को मिटाकर क्या
कोई राज कर पाएगा ?
गर करने की कोशिश की
तो मिट्टी में मिल जाएगा।

तानाशाह बन न जीतोगे
तुम दिल कभी अवाम का।
उठा कर इतिहास देखो
रहा न वो किसी काम का।

तानाशाह न पाएगा कभी
प्रजा का प्यार या सम्मान।
किया जो अत्याचार जन पर
तो वह पाएगा बस अपमान।

युद्धस्थल में नरमुंडों के बीच बैठ
सम्राट अशोक भी पछताए थे।
कोई बचा न बाकी था, यह देख
फूट - फूट कर अश्रु बहाए थे।

मौत का तांडव होगा फिर से
ऐसा घनघोर मातम छाएगा।
किस पर करेगा राज और
किस पर रौब जमाएगा ?

अमर जवान ज्योति, शहीदों के
सम्मान में जो जल रही थी।
आज जब बुझा दिया उसे,
आत्मा शहीदों की सिसक रही थी।

जोत से जोत जलाने की परंपरा
का गला देखो! घोंट दिया है।
जोत को जोत में विलीन करने की
नई परंपरा को जन्म दिया है।

क्या मालूम कल इंडिया गेट को
भी धराशायी कर दिया जाए।
न जाने क्या क्या मिटा दिया जाए
और क्या क्या बना दिया जाए।

एक दिन ऐसा भी आएगा जब
दीवाली जगमग नहीं दमकेगी।
सारे दिये विलीन होंगे एक दिये में
महाराजा की जोत बस चमकेगी।

तब जोत से जोत जलाई नहीं जाएगी
सब एक दिये में विलीन कराई जाएगी।
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