प्रवीण बसोतिया का जन्म १४ जुलाई १९९४ में हुआ। पहली बार जब उन्होंने लिखना प्रारंभ किया उस वक्त वह पढ़ाई किया करते थे। और लेखन को केवल एक शौक समझ कर लिखा करते थे। तेरह वर्ष की आयु में एक पेज की कहानी लिखने के बाद उन्हें अपनी प्रतिभा का अहसास हुआ। और उस दिन के बाद जब भी वह निराश होते। तो कलम उठा कर लिखने बैठ जाते, लिखने में आनंद प्राप्त करने वाले, प्रवीण बसोतिया लोगों द्वारा कही गई। असभ्य बातों का त्याग करते हुए आगे बढ़े, और उन्होंने तीन उपन्यास लिखें, जिनमें से दो अंग्रेजी में अनुवादित है इनकी रचनाए

कोई है जो मेरा ज़िंदगी भर साथ दे?

-प्रवीण बसोतिया

कुछ नहीं अपना बस इस वक़्त के बिना, जैसा भी है। साथ रहता है। हर एक पल, और तब तक साथ नहीं छोड़ता, जब तक मौत नहीं आती। दिल ने भी की मोहब्बत बहुत बार, पर कोई इस वक़्त कि जगह ले ले। ऐसी मोहब्बत नज़र नहीं आती।

-प्रवीण बसोतिया

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टूटे दिल के साथ जीना ऐसा है।मानों। जैसे मौत का इन्तेजार करना। दिल दर्द में सिर्फ इतना ही कहता है। ओए सुन मुझे फिरसे नहीं प्यार करना।

-प्रवीण बसोतिया

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तुम मिलते तो हम फिर से लिखते, दिल मना करता ,लेकिन हम उसकी भी नही सुनते। तुम उधेड़ दोगे, हमारी ख्वाहिशों को भी, लेकिन हम तुम्हारी गलती समझकर उसे फिर से बूनते

-प्रवीण बसोतिया

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जज्बाती हो जाते हैं हम गेरों को अपने आँगन में देखकर, गैर क्या जानेंगे। दिलों की बातों को। चल देते हैं। मुह फेरकर ।

-प्रवीण बसोतिया

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पानी सा बहता हूँ। कभी मैं,
कभी ठहर जाता हूँ।
कुछ कहता नहीं अब किसी से, सब सह जाता हूँ। ऐसा नही की कहना नहीं चाहता। बस कह नहीं पाता हूँ।

-प्रवीण बसोतिया

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जिस तरह चाँद पर दाग है ना, उसी तरह मेरे दिल पर ज़ख्म बन चुके हैं

-प्रवीण बसोतिया

सुबह हो चली, फिर तुम याद आने लगे, झूठी ख्वाहिश फिर उठ गई। तुम मिलों एक दिन। रोज की तरह बीत जाएगा। येही सोचते हुए। मेरा दिन।

-प्रवीण बसोतिया

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हमेसा किसी न किसी की निंदा करने वाला व्यक्ति अंत स्वंम को आलोचना से घिरा हुआ पाता है। क्योंकि अपने पूरे जीवन को वो इसी कार्य में बर्बाद कर देता हैं। और कभी कुछ नहीं कर पाता। जलन और द्वेष उसके मस्तिष्क पर अहंकार की चादर डाल देता है। जिससे उसे कभी कुछ पता नहीं चलता।

-प्रवीण बसोतिया

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नींद जब आनी है सबको पड़ेगा सोना,, तुम ये सोच मत रखना ,हमारा क्या बिगाड़ लेगा कोरोना।

-प्रवीण बसोतिया