दोहा

बिना लक्ष्य के दौङना , है बिल्कुल बेकार।
अपनी मंजिल के रहो, हरदम पहरेदार।।

डॉ पूनम गुजरानी

दोहा

बिन साधे सधते रहे, सांसों के सुर ताल।
जब न सधे तो हो गये,पल भर में कंगाल।।

डॉ पूनम गुजरानी

गजल

माटी पानी आग हवा ये साथ हमेशा‌ रहते हैं,
हे मानव तू ऐसे रह ले हंसकर हमसे कहते हैं।

तरुवर संत सरीखे जीते भेद नहीं करते कोई,
छायां फल देने वाले वे कितने पत्थर सहते हैं।

खुशबू तितली कोयल देखो बोले अपनी मस्ती में,
कहने वाले फिर भी उनको जाने क्या क्या कहते हैं।

सबका वक्त बदलता भाई पतझर होगा फिर से मधुवन,
रोना छोङों जी लो जी भर बहते झरने कहते हैं।

गरदन की ये अकङन तेरी कितने दिन चल पाएगी,
चाहे जितने ऊंचे हो सब किले एक दिन ढहते हैं।

नरम मुलायम दूब बताती जीवन की ये सच्चाई,
इस दुनिया में 'पूनम' टिकते जो मुश्किल को सहते हैं।

डॉ पूनम गुजरानी
सूरत

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कविता


आंखों खेलती है
हर रात
सपनों का जुआ
दिखती है
मंजिलों के महल
पर दिन के
उजाले में
थक जाते हैं पांव
जिंदगी
हर बार
हार जाती है

डॉ पूनम गुजरानी

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शेर
चिट्ठियों कब तक संभालूं कह जरा,
आंखों में सपनों के माफिक रह जरा।

डॉ पूनम गुजरानी

दोहा

बङबोले के बोल ही, खोले अपनी पोल।
अगर मकां है कांच का, तो पत्थर मत तोल।।

डॉ पूनम गुजरानी

दोहा

आंखें बरसी रात भर , आई तेरी याद।
जीवन में भी सुन रही , सखे मौत का नाद।।

डॉ पूनम गुजरानी

दोहा

अधरों ने खोले सजन
अधरों के तटबंध।
प्यार, इश्क, इकरार के
तभी बने सब छंद।।

डाँ पूनम गुजरानी

दोहा

रोली सजे ललाट पर ,राखी शोभे
हाथ।
हर घर में अक्षुण्ण रहे,भाई बहन का साथ।।

डॉ पूनम गुजरानी

दोहा

धरा गगन के बीच में, रहती मानव जात।
तन मन दोनों से करें , हर पल ही उत्पात।।

डॉ पूनम गुजरानी