उपन्यास - देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश,रेत होते रिश्ते, आखेट महल, सेज गगन में चांद की, जल तू जलाल तू, अकाब,राय साहब की चौथी बेटी. कहानी संग्रह - अंत्यास्त, सत्ताघर की कंदराएं,ख़ाली हाथ वाली अम्मा, थोड़ी देर और ठहर, प्रोटोकॉल. लघुकथा संग्रह - मेरी सौ लघुकथाएं,दो तितलियां और चुप रहने वाला लड़का. संस्मरण - रस्ते में हो गई शाम.आत्मकथा खंड - इजतिरार, लेडी ऑन द मून, तेरे शहर के मेरे लोग. नाटक - मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजब नारसिस डॉटकॉम, बता मेरा मौत नामा. जीवनी - ज़बाने यार मनतुर्की

हम जो भी पढ़ते हैं वो किसी लेखक की क़लम से निकल कर सीधा हम तक नहीं आता। बीच में विशेषज्ञता और तकनीक के कई स्तर होते हैं।
लेखक, संपादक, समीक्षक, प्रकाशक, कलाकार, मुद्रक और विक्रेता आदि सब मिलकर उसे प्रस्तुति के योग्य बनाते हैं।
जब हम उसे पढ़ते हैं तो हमारे मस्तिष्क (मानस) की लोचशीलता उसे ग्रहण करती है। यदि हमारी ग्रहण शीलता "इलास्टिसिटी" युक्त है तो उससे "विवेक" ग्रहण करने की संभावना भी उसी अनुपात में बढ़ जाती है, किन्तु यदि हमारी ग्रहण क्षमता संकीर्णता युक्त अथवा दकियानूसी है तो हमारे जड़ बने रहने की आशंका बनी रहती है।
इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए -
हमारे पास दो हाथ हैं। हम दिनभर में इनसे कई काम लेते हैं। हम जिस समय जो भी काम इनसे लें, वो दत्तचित्त होकर लें, यही हमारी दक्षता या एकाग्रता है।
खाने की मेज़ पर हम इन हाथों में निवाला लेकर मुंह में रखते हैं और स्वाद से खाते हैं। उस समय हम भुला देते हैं कि सुबह शौचघर में यही हाथ हमारी विष्ठा को साफ करने के काम में तल्लीन थे। हमने इनकी साफ़ - सफाई से ही इन्हें फ़िर किसी भी कार्य के लायक़ बना लिया। इन्हीं हाथों ने किसी के सिर पर लग कर उसे आशीर्वाद दिया है। यही हाथ दिन के किसी क्षण में किसी का चरण स्पर्श कर आए हैं। फ़िर भी जीवन पर्यन्त इनका प्रयोग करना हमारा अधिकार भी है, कर्तव्य भी।
हमारी यही समझ वस्तुतः ज्ञान या विवेक है।
प्रायः उपन्यासों में ऐसा ही होता है कि लगभग हर तरह के प्रसंग आते हैं।
मेरे उपन्यास "अकाब" का ही उदाहरण लीजिए।
इसमें एक देश से दूसरे देश के बीच उम्मीद और सपने लेकर किया जाने वाला पलायन है।
इसमें दो लोगों के बीच प्रणय संबंध दरकने पर संतान के भीतर घर करती असुरक्षा की भावना है।
इसमें वैश्विक आतंकवाद की अमानवीय गुर्राहट है।
इसमें महानगरों में अलग- अलग क्षेत्रों से आकर रहने वालों का सामूहिक संस्कृति -विहीन घालमेल है।
इसमें अलग -अलग देशों के स्त्री पुरुष के बीच केवल दैहिक आकर्षण से उपजा प्रणय है।
इसमें उजड़े घरों से छिटके युवाओं के बीच संस्कार रहित बदन पिपासा है।
इसमें ग्लैमर की दुनिया के सफल लोगों की असीमित भूख से उपजी धन- लिप्सा का कुत्सित खेल है।
इसमें भाग्य के आधार पर व्यक्ति की प्रतिष्ठा बनने - बिगड़ने का दर्दनाक चित्रण है।
ऐसी कृति में अगर किसी एक समाज के ही नैतिक मूल्यों की तलाश की जाएगी तो इसके लेखन - पठन का मक़सद ही तिरोहित हो जाएगा।
मृदुला गर्ग के "चितकोबरा", राही मासूम रज़ा के "आधा गांव" या प्रबोध कुमार गोविल के "देहाश्रम का मनजोगी" को यदि आप शरीर के दबे- छिपे अंगों के चंद नाम, समाज में जड़ तक समाई चंद गालियों अथवा दो समलिंगी बदनों के नैसर्गिक घर्षण के आधार पर ही समूचा आंक देंगे तो ये ऐसा ही होगा कि आपने सुबह शौचघर से निकल कर अपने हाथ ये कह कर काट फेंके, कि ये तो गंदे हो गए।

Read More

ZABANE YAR MANTURKEE (फिल्म अभिनेत्री साधना की जीवनी) https://www.amazon.in/dp/B08FG6M5FW/ref=cm_sw_r_wa_apa_fab_IUSAFbV6DJ37G

शुभकामनाओं सहित -

आप सादर आमंत्रित हैं...

वही हैं झील के मंज़र वही किरणों की बरसातें
जहां हम तुम किया करते थे पहरों प्यार की बातें!

"ज़बाने यार मनतुर्की" का अनूठा विमोचन होगा!
पिछली सदी के सातवें दशक की लोकप्रिय अभिनेत्री साधना के जीवन पर आधारित किताब "ज़बाने यार मनतुर्की" का विमोचन साधना के आगामी जन्मदिन 2 सितम्बर 2020 को मुंबई में एक बेहद गरिमामय और अनूठे समारोह में संपन्न होगा। पुस्तक के लेखक सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल हैं।
वैश्विक महामारी कोरोना के फैलते संक्रमण के कारण समारोहों पर लागू बंदिशों के चलते ये विशिष्ट आयोजन एक अनोखे अंदाज में संपन्न होगा।
इस दिन धर्मयुग पत्रिका के पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक श्री अभिलाष अवस्थी मुंबई में अभिनेत्री साधना के तीन नायकों, मनोज कुमार (वो कौन थी/अनीता/ अमानत), धर्मेन्द्र तथा विश्वजीत (इश्क़ पर ज़ोर नहीं) को उनके आवासों पर जाकर किताब भेंट करेंगे तथा उनके हस्ताक्षर किताब पर लेंगे। इसके बाद अभिनेता रजा मुराद के अंधेरी स्थित आवास पर एक संक्षिप्त बैठक में "साधना और सुनहरे दिन" के तहत बॉलीवुड के गोल्डन एरा को याद किया जाएगा।
पुस्तक भेंट करके हस्ताक्षर लेने के कार्यक्रम को "इन्द्रधनुष" नाम दिया गया है क्योंकि इस क्रम में साधना जी की तत्कालीन चार अंतरंग मित्रों आशा पारेख, वहीदा रहमान, हेलेन और तबस्सुम से भी संपर्क किया जा रहा है। "वक़्त/आरज़ू/वो कौन थी/मेरे मेहबूब/राजकुमार/मेरा साया/एक फूल दो माली/ इंतकाम" जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाली साधना की दत्तक पुत्री भी इस मौक़े पर उपस्थित होंगी।
किताब के लेखक प्रबोध कुमार गोविल ने बताया कि साधना की बॉयोग्राफी सिंधी और अंग्रेज़ी भाषा में पहले प्रकाशित हुई थी, जिसे उन्हें भेंट करने के अवसर पर साधना ने कहा था - " मैंने शोहरत, दौलत और चाहत हिंदी से पाई है, मुझे अच्छा लगेगा अगर मेरी कहानी हिंदी में आए " ! उनकी मृत्यु के पांच साल बाद उनकी ये इच्छा पूरी की जा रही है।
किताब जयपुर के बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।
(- हिमांशु जोनवाल, जयपुर)

Read More

बाहर के उजालों का
रिश्ता है नया कैसा
भीतर के अंधेरों से
निभती है भला कैसे?