उपन्यास - देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश,रेत होते रिश्ते, आखेट महल, सेज गगन में चांद की, जल तू जलाल तू, अकाब, कहानी संग्रह - अंत्यास्त, सत्ताघर की कंदराएं,ख़ाली हाथ वाली अम्मा, थोड़ी देर और ठहर,। मेरी सौ लघुकथाएं,दो तितलियां और चुप रहने वाला लड़का। संस्मरण - रास्ते में हो गई शाम, इजतिरार, लेडी ऑन द मून

बिल्ली और पतंग !
बिल्ली ने देखा पतंग को
झटपट मिलने पहुंची
बोली आसमान में उड़ने
मुझको लेे चल बेटी!
तब पतंग ने कहा ओ मौसी
बहुत कठिन है उड़ना
पड़ता है धागे से मुझको
अपने अंग जकड़ना
म्याऊं बोली- लेे चल बेटी
तुझे खिलाऊं रोटी
अपने पैरों को मैं दुम से
देख बांध कर बैठी !

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सचमुच तब बड़ा गुस्सा आता है जब कोई अधूरी बात कह कर बीच में ही छोड़ दे।
मन कहता है कि ऐसे शख़्स से पूछें तो सही कि अगर हम तुम्हारे अपने हैं तो हमें पूरी बात तो बताओ। ये अधूरी कहानी क्यों?
तो अगर प्रबोध कुमार गोविल की आपबीती (आत्मकथा भाग - 1 : "इज्तिरार" और आत्मकथा भाग - 2 : "लेडी ऑन द मून" ) आपने भी पढ़ी है तो आप भी सोचते तो होंगे-
फ़िर??? आगे???
तो पढ़िए प्रबोध कुमार गोविल की आत्मकथा का तीसरा भाग- "तेरे शहर के मेरे लोग" धारावाहिक!

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फ़िल्म जगत में लोग "लकी चार्म" के बड़े दीवाने होते हैं। गोल्डन एरा की एक मशहूर हीरोइन साधना भी इससे अछूती नहीं थीं। न जाने कैसे उनके दिल में ये बैठ गया था कि उनकी फ़िल्मों के जिन गीतों में कोई न कोई सवाल (प्रश्न वाचक) जैसे कब,क्यों,कौन,कैसे,कहां, कितना... आदि रहता है तो गीत भी हिट होता है और फ़िल्म भी।
वो बताने लगे, उनकी सुपरहिट फिल्म "मेरे मेहबूब" में गाना था ' मेरे मेहबूब में क्या नहीं, क्या नहीं। फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई।
वक़्त में था- 'कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी' ये भी सुपरहिट।
आरज़ू में ' अजी रूठ कर अब कहां जाइएगा ' ने खूब धूम मचाई।
ज़्यादातर हीरोइनें अपने गाने रिकॉर्ड हो जाने के बाद ही सुनती थीं मगर साधना जी का संदेश अपने फ़िल्म निर्देशक पति के माध्यम से गीतकार के पास पहले ही पहुंच जाता था कि वे अपने गीत में क्या चाहती हैं!
नतीजा ये हुआ कि "अनीता" में ' कैसे करूं प्रेम की मैं बात, ना बाबा ना बाबा' लिखवाया गया।
"इंतकाम" तो उनके होम प्रोडक्शन की फिल्म ही थी तो उस में ' कैसे रहूं चुप कि मैंने पी ही क्या है ' गाना तो लिखा ही गया, एक थोड़े स्लो माने जाने वाले गीत ' गीत तेरे साज का तेरी ही आवाज़ हूं ' के अंतरे में भी गीतकार ने जोड़ा- आजा मिलके बांट लें, क्या खुशियां क्या ग़म..!
यहां तक कि एक अन्य गीत ' अा जाने जां ' में भी गीतकार ने अंतरा लिखा- दूर से कितनी अाई हूं...!
"आप आए बहार आई" में लोगों ने सुना- ' कोयल क्यों गाए, बादल क्यों छाए?'
यहां तक कि उनकी बीमारी के बाद रिलीज़ हुई फ़िल्म "वंदना" में भी लोगों को सुनाई दिया - 'आपकी इनायतें आपके करम, आप ही बताएं कैसे भूलेंगे हम?'
"इश्क़ पर ज़ोर नहीं" का ये गीत तो आपको याद होगा ही- ये दिल दीवाना है, कैसा बेदर्दी है, इसकी तो मर्ज़ी है...
उनकी ख़ुद की निर्देशित फिल्म "गीता मेरा नाम" भी इससे अछूती नहीं थी, सुनिए... ज़रा देखिए ना, ज़रा पूछिए ना, हम कौन हैं क्यों आपके साए में बैठे हैं...?
इस तरह कैसे,कौन,क्या,कहां,क्यों,कितनी..से उनके अधिकांश गीतों को सजाया गया।
...इस तरह गीतकार महाशय ने तो ये किस्सा समय गुजारने के लिए सुनाया था। पर कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं।
दर्शकों ने बाद में पद्मा खन्ना पर फिल्माए गए सुपरहिट गीत भी सुने।
- आपका सरकार क्या कुछ खो गया है ( फ़िल्म हेराफेरी में अमिताभ बच्चन के साथ)
- क्यों लायो रे सैयां पान ( फ़िल्म सौदागर में अमिताभ बच्चन के साथ)
- हुस्न के लाख रंग, कौन सा रंग देखोगे ( फ़िल्म जॉनी मेरा नाम में देवानंद के साथ)
- कहां है मेरा दीवाना, मुझे जिसने बनाया निशाना (फ़िल्म लोफर में धर्मेंद्र के साथ)

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"बुद्धि का सूखा पेड़"
घर की रसोई में एक चक्र हमेशा चलता रहता है।
कमाने वाला पैसे देता है, और कोई सदस्य जाकर बाज़ार से राशन लाकर रसोई में रख देता है।
तब घर की अन्नपूर्णा सबको भोजन देती है।
लेकिन कुछ मंदबुद्धि लोगों को ये चक्र समझ में नहीं आता। उन्हें लगता है कि रसोई में भोजन का भंडार है, यदि सौ लोग भी आ जाएं तो उन्हें वहां से खाना क्यों नहीं दिया जाता?
लेकिन लोगों की हिम्मत की दाद दी जानी चाहिए कि वे चाहे अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, पाक शास्त्र, व्यवहार शास्त्र आदि बिल्कुल न समझें,पर राजनीति शास्त्र के सहारे एक दिन देश का राजा बनने का दिवास्वप्न तो देख ही लेते हैं।

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"अकाब" अकेला उड़ता है आसमान में सुदूर।
"अकाब" को धरती पर लाती है भूख।
"अकाब" को उसके इरादे लाते हैं मौत के क़रीब।

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झूठा !
खेतों के किनारे एक कुआ था। उसमें बहुत से मेंढक रहते थे। दिनभर धमा चौकड़ी मचाते। किसी दिन एक पनिहारिन की बाल्टी में दुबक कर एक छोटा सा मेंढक वहां से निकल भागा। मेंढक ने लंबा चौड़ा खेत देखा तो खुल कर सांस ली और वहीं एक किनारे घास में अपना घर बना कर रहने लगा।
उसके ठाठ थे। जब किसान भैंस का दूध दुहता तो वो भी इर्द- गिर्द मंडराता रहता। जब भैंस तालाब में बैठने जाती तो वो भी कीचड़ में अठखेलियां करता हुआ उसके साथ घूमता। किसान की लड़की नहा कर जब अपने कपड़े सूखने के लिए फैलाती तो धूप लगने पर मेंढक उसके कपड़ों के घेर की सिलवटों में दुबक जाता।
भैंस के चरने से जब आसपास की घास से मच्छर उड़ते तो उछल - उछल कर उसका नाश्ता होता।
मजे थे।
एक दिन गांव में बाढ़ आ गई। जल थल एक हो गया।
कुएं की मुंडेर पर उछलते कूदते उसे पुराने दोस्त मिल गए। सब पानी में हाथ- पैर मार रहे थे।
उसने अपने दोस्तों को अपने मौज मस्ती के सारे किस्से सुनाए। इतने दिन बाद जो मिले थे। सब बताया- भैंस उसकी दोस्त है, कैसे वो उसके साथ खेलता है, कैसे वो उसे मच्छरों का नाश्ता कराती है, कैसे वो किसान की लड़की के घाघरे में सो जाता है...
बाढ़ उतरते ही सब वापस कुंए में !
अब छोटा मेंढक वहां सबको अपने किस्से सुनाता, भैंस कैसे दूध दे, भैंस कैसे घास खाए, भैंस कैसे तालाब में तैरे, भैंस कैसे डकराए।
सब मेंढकों को जलन होती। ईर्ष्या में जलते।
एक दिन न जाने क्या हुआ, तेज़ आंधी और धूल के गुबार में भागती- दौड़ती भैंस कुएं में आ गिरी।
बेचारी मर गई।
सारे मेंढक उसके चारों तरफ़ ये देखने जमा हो गए कि ये कौन है।
छोटे मेंढक ने बताया- यही तो है भैंस!
सारे मेंढक ज़ोर से हंसे। बोले- अरे ये तो हिले न डुले, दूध दे न पानी में नहाए, नाश्ता कराए न पगुराए! झूठा कहीं का।
उस दिन से छोटे मेंढक का नाम "झूठा" ही पड़ गया।

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सॉरी, नहीं लिख पा रहा लघुकथा!
मैं अपनी मेज़ के सहारे बैठा एक लघुकथा लिखने की कोशिश बड़ी देर से कर रहा था, पर हो ही नहीं रही थी। लिखता और काटता।
मुझे लगा कि शायद सारी गलती उस अख़बार की है जो मैंने मेज़ पर बिछा रखा है।
जब किसी का दुख उकेरो, किसी न किसी "पॉजिटिव" न्यूज़ पर नजर चली जाती है। कुछ मज़ेदार सा लिखने लगो कि सामने नेगेटिव खबर अा जाती है। भ्रष्टाचार पर लिखने की सोची तो मरी "पेड न्यूज़" सामने आ गई। अब आप जिनकी कलई खोल रहे हो, उनकी तो यहां स्तुति छपी है।
क्या मुसीबत है? मुझे उन संपादक जी पर गुस्सा आने लगा जो कह रहे थे कि कल तो "लास्ट डेट" है, आज ही भेजो।
मुझे ऐसे में अपनी दिवंगत पत्नी की याद आने लगी। अगर वो होती तो...?
अगर वो होती तो मेरी मेज़ पर अख़बार की जगह सुन्दर मेज़पोश बिछा होता। उस मेज़पोश पर रंगीन फूल काढ़ने के लिए वो तरह- तरह के धागे लाकर रखती जिसका सुन्दर डिब्बा कमरे में सामने कहीं रखा होता। डिज़ाइनों की किताब भी।
डिब्बे में सुई- धागा सब होता। अगर कभी सुई हाथ में चुभ जाए तो लगाने के लिए मेडिकेटेड टेप लाकर भी वो रखती। फ़िर उसके लिए एक छोटा सा फर्स्ट- ऐड बॉक्स भी होता। उनकी रोज़ डस्टिंग के लिए ज़रूर वो नेपकिन लाती और उसे टांगने के लिए सुन्दर सी खूंटी ज़रूर लगाती। कभी खूंटी ढीली न हो जाए इसका पूरा एहतियात वो बरतती। कुछ एक्स्ट्रा कीलें और हथौड़ी हम ज़रूर लाते, और उन्हें रखने को प्यारी सी एक अलमारी बनवाते। अलमारी पर एक और सुन्दर सा कवर...वो जैसे ही देखती कि मैं लघुकथा नहीं लिख पा रहा हूं, फ़ौरन रसोई में जाकर मेरे लिए चाय बना लाती। सादा नहीं, बढ़िया मसालेदार चाय। सुन्दर से रंगीन प्याले में...
फ़िर कहती, लघुकथा के साथ पुराना फ़ोटो मत भेजना, लाओ मैं नया खींच दूं!
मैं कुछ समझ पाता उसके पहले ही वो नई शर्ट उठा लाती...लो बदल लो!
मैं कुछ गंभीर दिखने की कोशिश में मुस्कराने से बचता और वो कहती... छी, तुम्हारे मोबाइल का कैमरा बिल्कुल अच्छा नहीं, चलो हम नया मोबाइल ऑर्डर करते हैं "ऑनलाइन"....
हां, याद आया, मैं संपादक जी को ऑनलाइन ही भेज दूंगा लघुकथा।
मैं अपना काग़ज़ उठा कर फाड़ देता हूं और अख़बार भी उठा कर डस्टबिन में फेंकने चला जाता हूं!

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जवाब दो!
चंदा कुल के हो क्या?
रात में याद आते हो!

मैं दबाता हूं मेरे ख़्वाब इसी मिट्टी में
आने वालो ये ज़रा खोदना मिलेंगे तुमको!

आंखों देखी!
हमने जब आपको देखा तो हमें याद आया
लोग कहते थे बड़ी देखने लायक़ दुनिया !