मन्नू की वह एक रात(उपन्यास) , मेरी जनहित याचिका एवँ अन्य कहानियाँ,हार गया फ़ौजी बेटा एवँ अन्य कहानियाँ, औघड़ का दान एवँ अन्य कहानियाँ, नक्सली राजा का बाज़ा एवँ अन्य कहानियाँ,मेरे बाबू जी एवँ अन्य कहानियाँ, मेरा आख़िरी आशियाना एवँ अन्य कहानियाँ, खण्डित संवाद के बाद ( नाटक) ,कहानी ,पुस्तक समीक्षाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हर रोज़ सुबह होती है (काव्य संग्रह) एवं वर्ण व्यवस्था पुस्तक का संपादन .लखनऊ में ही लेखन, संपादन कार्य में संलग्न.

मित्रों कल मेरा उपन्यास " मन्नू की वह एक रात "
Matrubharti पर प्रकाशित होगा.
आप इस दिलचस्प उपन्यास को पढ़िए.इस की तुलना आलोचकों ने मूर्धन्य
हिंदी साहित्यकार अज्ञेय के उपन्यास "शेखर एक जीवनी " से की है.
मगर मैं मानता हूं कि पाठकों से बड़ा आलोचक कोई नहीं होता.
तो प्रिय पाठकों
आप से यह आग्रह है कि
अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएंगे तो बहुत खुशी होगी.
धन्यवाद

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वह जीवन भर गुस्ताखियां करता रहा
उसकी हर गुस्ताखी जैसे उसे और बड़ी गुस्ताखी करने के लिए चुनौती देती थी और वह चुनौती स्वीकार कर कर भी डालता था
बचपन के मित्र की वह हर बात मान लेता था लेकिन गुस्ताखी के समय उसे डार्क में रखता. पता चलने पर मित्र मना करता कि
ऐसी हरकतें किसी दिन बड़ी हाहाकारी साबित होंगी. लेकिन वह मित्र जीना सीखो जीना कह कर अगली गुस्ताखी कर डालता
आखि़र मित्र की बात सही निकली उसकी एक गुस्ताखी ने उसे ही नहीं बल्कि उसके पूरे घर को तबाह कर दिया.

"शकबू की गुस्ताखियां"

दो मित्रों की इस मर्मस्पर्शी कहानी को
पढ़िए Matrubharti पर

देखिये कहीं आप का कोई मित्र तो ऐसी गुस्ताखियां करने का आदी नहीं है.

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वो अपने पार्टनर के साथ मिलकर समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के काम में जुटी हुई थी.
दोनों वसुधैव कुटुम्बकम् से आगे ब्रह्मांडम् कुटुम्बकम् की बात करते. कुछ ही आगे बढ़ पाई थी कि पार्टनर प्रतिक्रियावादी ताकतों का शिकार बन गया.
मगर वह हार नहीं मानती है , अकेले ही आगे बढ़ती है. संयोग से उसे एक नया पार्टनर मिल जाता है. दोनों मंजिल की ओर तेजी से बढ़ते हैं. लेकिन उसकी एक गलत आदत ने उसे उस मुकाम पर पहुंचा दिया कि प्रोफेसर आयशा के पदार्पण का रास्ता साफ हो गया. लेकिन कैसे?
इन सब के साथ अन्य बहुत कुछ पढ़िए
"मेरी जनहित याचिका"
में. Matrubharti पर ही.

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स्त्री विमर्श पर पुरुषों की तुलना में स्त्री ही श्रेष्ठ लिख सकती है क्योंकि वह आत्मानुभव लिखती है और पुरुष परानुभव. वास्तव में यह पूर्ण सच नहीं है. अंतिम रूप से बात पुरुष की लेखन क्षमता पर निर्भर करती है.

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कहानी को जब नदी की धारा की तरह
अपने गंतव्य तक जाने दिया जाता है तो
वह पाठकों के हृदय में स्थायी स्थान बना लेती है
जब विमर्शों विचारधाराओं सिद्धांतों के बाँध खड़े किए जाते हैं तो वह भटक कर पाठकों के हृदय से कहीं दूर विलुप्त हो जाती है.

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भयानक घटाटोप अंधेरा
जानलेवा तूफानी बरसात
वह एक वियावान क्षेत्र में फंस गया
बड़ी मुश्किल से उसे एक झोपड़ी
तिनके का सहारा सी मिल गई
लेकिन वह एक घुसपैठिए की निकली
उसमें वह नहीं था, केवल उसकी बेगम थी
फिर उस सम्पादक के साथ उसने वह किया
जो एक घुसपैठिए की बीवी ही कर सकती थी... क्या?
"घुसपैठिए से आखिरी मुलाकात के बाद"
कहानी में पूरा पढ़ लीजिए
Matrubharti पर ही

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रविन्द्र नाथ टैगोर, मुन्शी प्रेमचन्द, और शरतचंद्र आज भी सबसे ज्यादा पढे जाते हैं क्योंकि इनका साहित्य मुख्यतः यथार्थ और अनुभव पर आधारित है.
कोरी कल्पना कभी दिल को नहीं छू सकता.
अल्प जीवन उसकी नियति है.

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श्रेष्ठ कथा साहित्य वह है
जो बार बार चौंकाए नहीं
बल्कि पहले वाक्य से ही
पाठक को अपने साथ जोड़ ले.

झूमर ने सोचा वो अपनी मेहनत लगन से अपनी मंजिल पा लेगी. लेकिन जब आगे बढ़ी तो भाई, पति से लेकर हर तरफ धोखा मिला. मगर उसे हार स्वीकार नहीं तो कोर्ट पहुंच गई. लेकिन मंजिल मिलना इतना आसान है क्या?
Matrubharti
पर
"झूमर ".
कहानी में पढ़िए वह मंजिल पाने के प्रयास में कहाँ से कहाँ पहुंच गई......
और यह भी तय करिए कि आप झूमर के साथ खड़े होंगे या उसके पति के साथ.....

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वो आज भी सोचता है कि शेनेल लौट आएगी. लेकिन क्या वो लौटने के लिए गई थी?
आप भी जानिए अपने विषय पर अपनी तरह की पहली कहानी
"शेनेल लौट आएगी " में
हमेशा की तरह Matrubharti पर ही

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