किसी के लिए हूं मैं आसान हिन्दी सी तो किसी के लिए जटिल गणित का सवाल हूं मैं ॥ कभी हूं मैं खुद में खोई खोई तो कभी खुली किताब हूं‌ मैं॥

एहसास लिखुं, जज़्बात लिखुं या फिर गहरे राज़ लिखुं,
ए कलम अब तु ही बता, मैं कैसे अपने हालात लिखुं।

-Pragya Chandna

मेरी खामोशियों को भी वह
ऐसे समझ रहा है,
जैसे किसी कागज़ पर लिखें
अल्फाज़ पढ़ रहा है।

-Pragya Chandna

यह लम्हें इंतजार के,
कुछ यूं गुज़र रहें हैं।
हम तुझको ढूंढ रहे हैं,
तेरी यादों में घूम रहे हैं।

-Pragya Chandna

प्यार की तरफ आते हुए
खुद को आजमाते हुए,
हमने तुझको यूं है पा लिया कि
खुद को ही खो दिया,
अब बस यही डर है कि
कहीं हम तुझको भी न खो दे,
वरना खुद को वापस कैसे पाएंगे।
हम यूं ही जीते जी मर जाएंगे।

-Pragya Chandna

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कमी तो कुछ नहीं फिर भी,
यह जिंदगी वीरान सी है।
यह दिल कुछ उदास सा है,
न जाने क्या तलाशता है।

-Pragya Chandna

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मातृभारती पर मेरी नवीन रचना "बर्फ की चादर" को पढ़कर अपने प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करें।

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"बर्फ की चादर", को मातृभारती पर पढ़ें :
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हे प्रभु! यूं न अपना रौद्र रूप दिखलाओ,
उत्तराखंड के लोगों पर अपनी मेहर बरसाओं।
फिर से केदारनाथ वाला दृश्य मत दिखाना,
बर्फ की चादर ओढ़ाकर, लोगों को मौत की नींद मत सुलाना।

-Pragya Chandna

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एक ऐसे रफूगर की तलाश है जो दूसरों पर किए भरोसे के कारण दिल में हुए छेदों को रफू कर सकें।

-Pragya Chandna

कुछ सुनहरे पल,
बचपन में थे दोस्तों संग बिताए।
काश कि वह बिता हुआ कल,
फिर से वापस लौट आए।
दोस्तों के साथ रेस लगा,
झट से स्कूल पहुंच जाएं।
प्रेयर की लाईन में लगकर,
अपनी पूरी ताकत से जय हिन्द चिल्लाएं।
होमवर्क पूर्ण न होने पर,
टीचर को नित नवीन बहाने सुनाएं।
स्कूल की छुट्टी होने पर,
अपने दोस्त का हाथ थामें
झट अपने घर की ओर दौड़ लगाएं।
कैसे शब्दों में बांधे दोस्तों संग बिताए लम्हों को
उनके साथ बिताया तो हर एक पल
अपने आप में एक कहानी कहलाए।

-Pragya Chandna

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