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नाराज है हम तेरी इबादत से खुदा,ऐसा एक तरफा इंसाफ क्यों???
प्यार तो दोनों ने किया, तो सजा मुकम्मल किसी एक के लिए क्यों?????

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सिखा था बचपन में पापा से,
बेटी कभी आंसु मत आने देना आंखो में, मुस्कुराना हर एक सख्स के सामने...
देखा आकर जमाने में, यहां हर कोई मतलब गलत निकालता है,ये हसीं के सामने...

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જોઈ એમને, તો થયો મને પ્રેમ
કર્યો એકરાર, તો પૂછ્યું એમણે કેમ?
થયું મને કરશે એ મારા પર રહેમ....
પડી આજે ખબર એ તો હતો મારો વહેમ..

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जाने से तेरे,कुछ तो फर्क जरूर पड़ा है....
वरना लोग ये नहीं पूछते, की तेरे आंखो में नमी,और मुस्कुराहट में कमी क्यों है???

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खुश तो तुम् आज भी नहीं हमारे मिलने से, तो यूं जूठा मुस्कुराने की क्या जरूरत थी???
एक बार दिल से बोल देती,मौत को हम यूं गले लगा लेते... युं पल पल, मारने की क्या जरूरत थी??

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सावन और प्यार एक जैसा है,
पहेली बार हो तो "बारिश" और "इश्क" जैसा नाम मिलता है....
बार बार हो तो "बाढ़" और "पागलपन" का बिरुद मिलता है....

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चलो, मानलिया एकबार की शायद हम "बेवफा" थे,
तो जिक्र बारबार "वफादारी" का तुम भी तो किया करते थे?

प्यार की अदालत में गए थे हम "गवाह" बनकर
बेपनाह मोहब्ब्त की वजह से "गुनहगार" बन गए