लिखना मह़ज एक शौक़ है और कोशिश ..कि खुद में झाँक सकूँ , मेरा स्वरचित रचनाओं का एकल संग्रह "सरगोशियाँ मेरे ख्यालों की" अमेजन पर उपलब्ध है ... प्रांजलि अवस्थी ..

चलो कहीं दूर चलें जहाँ

बोलने पर सख्तियाँ न हों
गले में रिश्तों की तख्तियाँ न हों
आँखों में झाँकती मुहब्बत ही मिले
गिले शिकवों की नर्मियाँ न हों

चलो कहीं दूर चलें जहाँ
धड़कनों पर फब्तियाँ न हों
मचलती हों ख्वाहिशें और दूरियाँ न हों
एक जमीं हो परछाईं हो एक
हवा भी अब हमारे दरम्याँ न हो

चलो कहीं दूर चलें

#सरगोशियाँ ...

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कविताओं में
दिखता है मुझे
अपनी कहानी का चेहरा
हर रंग रूप में
कुछ इस तरह
जैसे छंद की कोई बेहतरीन विधा हो
जबकि कहानियों में दिखता हर चेहरा
मुझे अनजान लगता है
शायद अभी तक लिखी गयी
कोई भी कहानी
मेरे लिए नहीं

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जमीं ने फ़लक को जिस जगह चूमा था
मेरे मन के मरूस्थल पर
वो जगह
हृदय की गहरी तलहटी में है
हर रात नींद में स्वप्नों पर पाँव रखकर
मैं वहाँ जाती हूँ
ताकि वहाँ जाकर
प्रेम की एक कविता उगा सकूँ

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#"कभी काजल नहीं हटने दिया मैंने"

मेरी आँखों में पूरी दुनियाँ देख लेता था वो
उसके सपनों की पोटली मेरी आँखों में रखी थी
जिसको मैंने बहुत जतन से संभाल कर रखा
आँखों पर काजल लगाकर मैंने हर बला को उसकी दुनियाँ से दूर रखा
और मेरी आँखों में झाँकर कर वो हम दोनों के दर्द संभाल लेता था
उसने मुझे कभी रोने नहीं दिया

इसीलिए उसके जाने पर भी मैं रोयी नहीं
उसकी दुनियाँ आज भी मैं अपनी आँखों में संभाल कर रखती हूँ
और उसके सपनों को बुरी नजर से बचाने के लिए
मैं आज भी काजल हटने नहीं देती

#p -:

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अपने जीवित होने की संभावनाऐं
प्राप्त करने के लिए मैंने
पुरानी किताबों के
वो पन्ने पढ़े
जिनकी पीली रंगत, बासी महक में भी
एक सौंधापन था
जिन्होने अपने अनदेखे किये जाने पर भी
मुझे अपने अंदर जीवित रखा था

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# मेरे शब्द मेरा संबल #

आँखों को मूँद कर
प्रेम की गिरह में उतरना
मेरे लिए खुद को ढूँढ़ निकालना था
ठीक उसी तरह

जैसे कोई चित्रकार
रंग भरते वक्त अपनी आँखों में रंग भरता हो
कोई रचनाकार अपने शब्दों में उतरता है
या कोई पा लेना चाहता हो
अपने ख्वाबों की पूरी कायनात
ले आना चाहती थी मैं
वापस अपने ही रंगों में ढले
अपने एहसासों को
इस जादुई दुनियाँ में

मैं भींच लेना चाहती थी
ममत्व से
अपने ही उस अन- अपेक्षित
मुक्त भाव स्वरूप को
जिसने सारे एहसास खुले मन से खर्च दिये थे
जिसके पास कुछ बाकी नहीं था
लिखने को या कहने को

उस समय मेरा चेहरा बुद्ध की तरह
शान्त और निर्विकार
महसूस किया मैंने

और शायद इसीलिए
मैं नहीं खोलना चाहती थी
वो पलकें जो बोझ से बंद थीं
क्यों कि उन पलकों के आगे उठते गहरे धुयें में
कोई था
जो अपनी सुनहरी कलम से
तो कभी अपनी रंग भरी कूँची से

मेरी हथेलियों पर खींच रहा था
दो समानान्तर चलतीं रेखाऐं
जहाँ एक में प्रेम था
और दूसरी में जीवन
एक जगह क्रास तो एक जगह वक्र

एक अंतिम बिन्दु पर आकर
देखा उसने
मेरी ओर मुस्कुराकर
और गायब हो गया

ये आकृति मेरा संबल थी
मेरी प्रेरणा और प्रेम

मेरे शब्द अब चमकने के लिए अब पुनः तत्पर थे


#pranjali ....

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"कुछ"
जो अशेष है
वो हमेशा बचा रहेगा
तब भी जब तुम भी नहीं बचोगे

'कुछ' जो विशेष है
वो वही विशिष्ट है जिसे तुम हमेशा से बचाना चाहते हो

ये 'कुछ' का होना
दरअसल जीवन पर तुम्हारे अस्तित्व का सूद है
जो हमेशा तुम्हारे अंदर बाकी रहेगा

और इस कुछ में 'तुम' हमेशा बाकी रहोगे

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बाँध दिया मैंने जब
शब्दों को सीमाओं में
लगा जैसे कि
कई बाँध मैंने अपनी जिन्दगी पर लगा दिये
कई नदियों का पानी मैंने
अपनी आँखों में रोक लिया
कितने अहसासों का गरल मैंने
शिव की तरह पी लिया
और जीती चली गयी
फिर मैं
वो पूरी जिन्दगी बिना कोई तेज आवाज़ किये ..
बिना निरस्त किये जिन्दगी के साथ किया गया

औपचारिक अनुबंध

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*ll शुभ दीपावलीll*   
आपको ओर आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओॅ के साथ "प्रकाश व प्रसन्नता के पर्व दीपावली पर बहुत बहुत मंगलकामनाएं। धन, वैभव, यश, ऐश्वर्य के साथ दीपावली पर माँ महालक्ष्मी आपकी सुख सम्पन्नता स्वास्थ्य व हर्षोल्लास में वृद्धि करें, इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ।"*

*ll शुभ दीपावलीll*

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मन का अस्थिर होना भावनाओं के विचलन की आरंभिक स्थिति मात्र है जो किसी अहम् परिणति की ओर इंगित करती है