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And the Isolation from the world, brought him closer to Narayan...

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The sacred union of Shiva & Shakti beyond one's understanding. If the cosmic universe is a mere physical creation; Shiva - Shakti Union is the very soul of it.
The source of very energy that propagates the infinite loop of creation & destruction is the minimal fraction of what this union truly possess.
Not limited to the limitations that limits any ordinary Deva, Asur, Humans or any known creature of this universe & others;
such is the glory of "Shiva-Shakthi"...

~ Pratham Shah

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Be the one;
they FEAR you to BECOME!

-Pratham Shah

वसंत ऋतु में भी, उनके रिश्तों के पत्ते झड़ रहे हैं,

कभी जो बात करते थे सारी रात प्रथम,
आज उनके पास भी शब्द अधूरे पड़ रहे हैं।

-Pratham Shah

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व्यस्त हो गया हूँ इस जीवन में थोड़ा सा,

यह कलम छोड़ने के लिए तो पकड़ी न थीं।

लिखे भी तो कैसे इस भँवर में,

हर विचार का विवरण तो संभव हो नहीं सकता।।

- प्रथम शाह

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हाथों में तलवार भवानी,
जैसे महाराणा का भाला था।
उस भगवे को कौन झुका सका,
जिसे छत्रपति ने संभाला था॥

शेर शिवा का वंशज था जो,
सह्याद्री में जन्मा था।
देखा जिसने आँखों में,
स्वराज्य का एक ही सपना था॥

खदेड़ जिसने मातृभूमि से,
मलेच्छो को निकाला था।
उस भगवे को कौन मिटा सका,
जिसका ‘छत्रपति’ रखवाला था॥

मस्तक पर था तिलक चंद्र जो,
तेज़ सा मुख पर फैला था।
मुघलो को टक्कर देने वाला,
वो शेर एक अकेला था॥

क्षत्रियों का बल था जिसमें,
और भानु सा उजाला था।
उस ‘भगवे’ को कौन झुका सका,
जिसका ‘शिवराज’ रक्षण करने वाला था॥

शाही-सल्तनत को जिसने झुकने पर मजबूर किया,
मर्द-मराठा ऐसा जिसने देश-धर्म मजबूत किया।
‘हर हर महादेव’ घोष से गूंज उठा हर कोना था,
शस्त्र जिसके हाथों में एक मात्र खिलौना था॥

गौरक्षक प्रतिपालक था जो,
नारी सम्मान में तलवार उठाता था।
शत्रुओं से भरे दरबार में जो,
कतई ना शीश झुकाता था॥

मावले जिसके रणचंडी को शत्रु का रूधिर पिलाते थे,
लडे बिना जिसके आगे, लाखों सर झुक जाते थे।

मल्हार सा तेज़ था जिसमें,
वज्रबाहू कहलाता था।
तलवार के प्रताप से जिसके,
यवनों का दिल घबराता था॥

परम पराक्रम से जिसके,
हर किल्ले पर ‘भगवा’ लहराता है।
वो भक्त, भवानी का बेटा ‘छत्रपति’ कहलाता है॥

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The ruins will narrate the tales of the immortals!!!

फिर एक बार होठो पर उसकी बात आयी है।
चुपके से फिर वो आनंद साथ लायी है।
कर ही रहा था प्रयास सोने का मै,
उनकी स्मृतियाँ लेकर फिर से ये रात आयी है।।
- प्रथम शाह

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उस शैतान के अंधकार से भरे जीवन में भी रोशनी का एक चिराग जल गया।
जब किसीने धीरे से आकर उसका हाथ थाम लिया और उसको जीने की नई दिशा मिल गई॥

- प्रथम शाह

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शब्द : *सुंदर*
शीर्षक : *तुम्हारी सुंदरता*

एक बार फिर भोर हो चुकी और इस मन ने तुम्हे याद करना आरंभ कर दिया।
तुम्हारी सुंदरता पे मोहित मैं किसी मृगतृष्णा में फँसता ही जा रहा हूँ।
तुम्हारे उस जग मोहिनी जैसे रूप का वर्णन तो बहुत से व्यक्ति करते होगें, किंतु मेने तुम्हारी उस सुंदरता को परख लिया है, जिससे तुम स्वयं अनभिज्ञ हो।
मुझमें वो शारीरिक सौंदर्य नहीं, जो तुम्हारे निकट एक क्षण भी आ सकूँ। भय है तो बस इस बात का कि पता नहीं तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या तुम मुझसे वार्तालाप करोगी भी?
इसी दुविधा में ये मस्तिष्क तुम्हें विस्मृत करने को तत्पर है।
पर प्रिये, इस चंचल मन का क्या ही किया जाये? ये तो बस उस सुंदरता को जानता है, जो तुममे इसने देखी है।
हर प्रातः, हर निशा - बस तुम्हारी ही सुंदरता के महासागर में पलायन करने को आतुर रहता है।
वो तुम्हारी वाणी, निडरता, और तुम्हारा हास्य; जिसने तुम्हारी सुंदरता को बनाये रखा है - बस वही आकर्षित होना जानता है।
अब इसे तो ये भी नही पता कि मेरी और तुम्हारी सुंदरता में कोई मेल है ही नहीं।
ये श्याम वर्ण कृष्ण तो बस तुम्हारे ही नयनों की सुंदरता के पीछे भागता रहता है।
कहाँ तुम्हारा वो अनुपम अतुलनीय सौंदर्य, और कहाँ मैं?
बस यही विचार है मन में, क्या मेरा श्याम सौंदर्य तुमने भी कभी निहारा है?

- प्रथम शाह

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