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A Short Hindi Poem

थक गया हूँ अब मैं, भार यह उठाते उठाते।
फिर भी बढ़ रहा, मैं मार्ग में आगे निरंतर॥

इन सभी बोझ तले दब कर मैं, टूट सा गया हूँ।
लगता हैं अपने आप ही, पिछे कही छुट सा गया हूँ॥

दिखती नही उम्मीद कही, हर क्षण यहाँ निराश हूँ मैं।
हुआँ अस्त जो सूर्य अभी, उसी के भीतर का प्रकाश हूँ मैं॥

संकट से घिर कर मैं, अपने ही व्यक्तित्व को भूल गया।
पता नही कैसे, यह सर इस तरह से झुक गया॥

नही, नही रुक सकता मैं, अभी पथ तो आगे बाकी है।
क्यों छोडू मैं आशा को, मेरा साहस ही तो एक साथी है॥

जो अस्त हुआ है सूर्य वह, पुनः उदय हो जायेगा।
मेरे एक आशा के प्रकाश से, सारा विश्व
आच्छादित हो जायेगा॥

- PRATHAM SHAH

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A small writeup

Hey dear! 💕
I'm guilty. Neither I do express my feelings for you, nor do I express my love.
Amused I am, how you get me everytime.
I'm not emotionless; but it's just my mind - full of shyness, looking for some moments of privacy. Maybe we could create some of them.

There we are, walking by each other, hands in hands and no formality of words. Just your smile and warmth of my hug can narrate the whole story. Nothing but my feelings will pass through your heart. Giving you the glimpse of my love.

Being a single soul is wonderful. I never tell you how bad was my day. But my love is a language, only you can understand. The way you come and cuddle your fingers in my hair says it all. Putting my head in your lap and a sort of connection of soul established between us is nothing but an exchange of our love and feelings.

It's you with whom I want to cry for a bad fortune. It's you with whom I want to laugh and celebrate the beauty of a moment. It's you with whom I want to share my each and every emotion of my soul.

You deserve my every emotion and all of your emotions belong to me;
And that is what makes us - SOULMATES

- PRATHAM SHAH

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_शीर्षक_ : *आशा की किरण*

_थक गया हूँ अब मैं, भार यह उठाते उठाते।_ (1)
_फिर भी बढ़ रहा, मैं मार्ग में आगे निरंतर॥_ (2)

_इन सभी बोझ तले दब कर मैं, टूट सा गया हूँ।_ (3)
_लगता हैं अपने आप ही, पिछे कही छुट सा गया हूँ॥_ (4)

_दिखती नही उम्मीद कही, हर क्षण यहाँ निराश हूँ मैं।_ (5)
_हुआँ अस्त जो सूर्य अभी, उसी के भीतर का प्रकाश हूँ मैं॥_ (6)

_संकट से घिर कर मैं, अपने ही व्यक्तित्व को भूल गया।_ (7)
_पता नही कैसे, यह सर इस तरह से झुक गया॥_ (8)

_नही, नही रुक सकता मैं, अभी पथ तो आगे बाकी है।_ (9)
_क्यों छोडू मैं आशा को, मेरा साहस ही तो एक साथी है॥_ (10)

_जो अस्त हुआ है सूर्य वह, पुनः उदय हो जायेगा।_ (11)
_मेरे एक आशा के प्रकाश से,_ _सारा विश्व_
_आच्छादित हो जायेगा॥_ (12)

- *PRATHAM SHAH*

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एक डॉक्टर जो खतरों से लड़ रहा निरंतर,
अपना जीवन हथेली पर ले कर भी;
ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहता।

पर वो क्या जाने?

जिसके लिए वहन कर रहा वो यह कष्ट निरंतर,
वो हर सुविधा के बाद भी;
घर में रहना नहीं चाहता॥

- प्रथम शाह

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अधुरा हुआ तो क्या?
हमने किया वो सच्चा प्यार तो था।

दिल के किसी कोने में दबा हुआ तो क्या?
हमें तुमपे एतबार तो था।

तुम समझ न सकी, चलो कोई बात नहीं;

बिना कहें तुम्हें एहसास ना दिला सके तो क्या?
अपने प्यार को बयाँ न कर पाने का हमे मलाल तो था॥

- प्रथम शाह

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कुछ दिनों से जो घर में बैठा हूँ,
जीवन की भागदौड़ से दूर॥

खुद को जो समय देना चालू किया है,
एक ही प्रश्न आता है मन में,
कहाँ था मैं अब तक?

जब से खुद से मिलना चालू किया है,
बस एक ही बात ये खुद से केहता हूँ,
कुछ दिनों से जो घर में बैठा हूँ॥

जाने कहाँ गुम हो गया है जीवन,
सारे मजे जो जिम्मेदारीयों तले छूट गए;
बैठा बैठा कुछ सोच कर बस अब मुस्कुरा देता हूँ,
कुछ दिनों से जो मैं बस घर में बैठा हूँ॥

- प्रथम शाह.

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Bas itni si h meri Kahaani,
mene usko sab bhula ke pyaar kiya,
aur uski soch sirf mere Sharir tak reh gayi.

"આધુનિક કર્ણ - 1" by Pratham Shah read free on Matrubharti
https://www.matrubharti.com/book/19880849/aadhunuk-karn-1

DEATH IS THE 2ND WORST PUNISHMENT FOR ME,
YOUR SILENCE STILL REMAINS AT TOP

do you know?
The worst Mistake of my life;
that i gave you the utmost priority which you never deserved.